अनुच्छेद 356 · राज्यों में संवैधानिक तंत्र की विफलता की दशा में उपबंध
(1) यदि राष्ट्रपति, किसी राज्य के राज्यपाल से या किसी अन्य माध्यम से रिपोर्ट प्राप्त होने पर, संतुष्ट हो कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें राज्य का शासन इस संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है, तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा—
(क) राज्य सरकार के सभी या किसी भी कार्य तथा राज्यपाल या राज्य के विधानमंडल के अलावा किसी अन्य निकाय या प्राधिकरण में निहित या उनके द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी या किसी भी शक्ति को अपने ऊपर ग्रहण करना;
(ख) यह घोषित करना कि राज्य के विधानमंडल की शक्तियाँ संसद द्वारा या संसद के अधिकार के अधीन प्रयोग की जाएंगी;
(ग) राष्ट्रपति द्वारा उद्घोषणा के उद्देश्यों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक या वांछनीय प्रतीत होने वाले ऐसे आकस्मिक और परिणामी प्रावधान करना, जिनमें राज्य में किसी निकाय या प्राधिकरण से संबंधित इस संविधान के किसी प्रावधान के संचालन को पूर्ण या आंशिक रूप से निलंबित करने के प्रावधान शामिल हैं।
बशर्ते कि इस खंड में कोई बात राष्ट्रपति को किसी उच्च न्यायालय में निहित या उसके द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियों में से किसी को भी स्वयं ग्रहण करने या उच्च न्यायालयों से संबंधित इस संविधान के किसी प्रावधान के संचालन को पूर्ण या आंशिक रूप से निलंबित करने का अधिकार नहीं देगी।
(2) ऐसी कोई भी उद्घोषणा किसी पश्चात उद्घोषणा द्वारा निरस्त या परिवर्तित की जा सकती है।
(3) इस अनुच्छेद के अंतर्गत प्रत्येक उद्घोषणा संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी और पूर्व उद्घोषणा को निरस्त करने वाली उद्घोषणा को छोड़कर, दो माह की समाप्ति पर उसका प्रभाव समाप्त हो जाएगा, जब तक कि उस अवधि की समाप्ति से पहले संसद के दोनों सदनों के प्रस्तावों द्वारा उसे अनुमोदित न कर दिया गया हो।
बशर्ते कि यदि ऐसी कोई उद्घोषणा (पिछली उद्घोषणा को निरस्त करने वाली उद्घोषणा न हो) उस समय जारी की जाती है जब लोक सभा भंग हो जाती है या इस खंड में निर्दिष्ट दो महीने की अवधि के दौरान लोक सभा का विघटन होता है, और यदि राज्य परिषद द्वारा उद्घोषणा को अनुमोदित करने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया गया है, लेकिन उस अवधि की समाप्ति से पहले लोक सभा द्वारा ऐसी उद्घोषणा के संबंध में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया है, तो लोक सभा के पुनर्गठन के बाद उसके पहली बार बैठने की तारीख से तीस दिनों की समाप्ति पर उद्घोषणा का प्रभाव समाप्त हो जाएगा, जब तक कि उक्त तीस दिनों की अवधि की समाप्ति से पहले लोक सभा द्वारा उद्घोषणा को अनुमोदित करने वाला प्रस्ताव भी पारित न कर दिया गया हो।
(4) इस प्रकार अनुमोदित उद्घोषणा, निरस्त न किए जाने पर, उद्घोषणा जारी होने की तिथि से छह महीने की अवधि समाप्त होने पर प्रभावी होना बंद हो जाएगी:
बशर्ते कि यदि संसद के दोनों सदनों द्वारा ऐसी उद्घोषणा को लागू रखने की स्वीकृति देने वाला प्रस्ताव पारित किया जाता है, तो उद्घोषणा, निरस्त न किए जाने पर, उस तिथि से छह महीने की अवधि तक लागू रहेगी, जिस तिथि के अंतर्गत यह अन्यथा समाप्त हो जाती, परन्तु ऐसी कोई भी उद्घोषणा किसी भी स्थिति में तीन वर्ष से अधिक समय तक लागू नहीं रहेगी।
इसके अलावा, यदि किसी भी छह महीने की अवधि के दौरान लोक सभा का विघटन हो जाता है और राज्य परिषद द्वारा ऐसी उद्घोषणा को लागू रखने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया है, लेकिन उक्त अवधि के दौरान लोक सभा द्वारा ऐसी उद्घोषणा को लागू रखने के संबंध में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया है, तो लोक सभा के पुनर्गठन के बाद पहली बार बैठने की तारीख से तीस दिनों की समाप्ति पर उद्घोषणा का प्रभाव समाप्त हो जाएगा, जब तक कि उक्त तीस दिनों की अवधि समाप्त होने से पहले लोक सभा द्वारा उद्घोषणा को लागू रखने के लिए एक प्रस्ताव भी पारित नहीं किया गया हो।
5 [यह भी प्रावधान है कि पंजाब राज्य के संबंध में 11 मई, 1987 को खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा के मामले में, इस खंड के पहले परंतुक में “तीन वर्ष” का संदर्भ 6 [पांच वर्ष] के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा।]
7 (5) खंड (4) में किसी बात के होते हुए भी, खंड (3) के अधीन अनुमोदित किसी उद्घोषणा को जारी होने की तिथि से एक वर्ष की समाप्ति के बाद किसी अवधि के लिए लागू रखने के संबंध में संसद के किसी भी सदन द्वारा तब तक कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि—
(क) ऐसे प्रस्ताव पारित होने के समय, पूरे भारत में या, जैसा भी मामला हो, राज्य के पूरे या किसी भाग में आपातकाल की घोषणा लागू हो, और
(ख) चुनाव आयोग प्रमाणित करता है कि संबंधित राज्य की विधान सभा के आम चुनाव कराने में कठिनाइयों के कारण ऐसे प्रस्ताव में निर्दिष्ट अवधि के दौरान खंड (3) के तहत अनुमोदित उद्घोषणा का लागू रहना आवश्यक है:]
8 [बशर्ते कि इस खंड की कोई बात पंजाब राज्य के संबंध में 11 मई, 1987 को खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा पर लागू नहीं होगी।]
