धारा 475 · धारा 475. सेना न्यायालय द्वारा विचारणीय व्यक्तियों का कमान अधिकारियों को परिदान
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475. सेना न्यायालय द्वारा विचारणीय व्यक्तियों का कमान अधिकारियों को परिदान
(1) केंद्रीय सरकार, इस संहिता तथा सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) और वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) और संघ के सशस्त्र बलों से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि से संगत नियम, उन मामलों के बारे में बना सकेगी जिनमें सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक विधि के, अथवा ऐसी अन्य विधि के, अध्यधीन व्यक्तियों का विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा, जिसको यह संहिता लागू होती है, अथवा सेना न्यायालय द्वारा किया जाएगा; और जब कोई व्यक्ति किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष लाया जाता है और उस पर ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है जिसके लिए उसका विचारण या तो ऐसे न्यायालय द्वारा, जिसको यह संहिता लागू होती है, अथवा सेना न्यायालय द्वारा किया जा सकता है, तब ऐसा मजिस्ट्रेट ऐसे नियमों को ध्यान में रखेगा और उचित मामलों में उसे, उस अपराध के, जिसका उस पर अभियोग है, कथन सहित, उस यूनिट के कमान अधिकारी को, जिससे वह संबंधित है, अथवा निकटतम सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक स्टेशन के कमान अधिकारी को, जैसी भी स्थिति हो, सेना न्यायालय द्वारा विचारण किए जाने के प्रयोजन के लिए परिदत्त करेगा।
स्पष्टीकरण—इस धारा में,—
(क) "यूनिट" के अंतर्गत रेजिमेंट, कोर, जहाज, टुकड़ी, ग्रुप, बटालियन या कंपनी भी है;
(ख) "सेना न्यायालय" के अंतर्गत ऐसा कोई अधिकरण भी है जिसकी शक्तियां संघ के सशस्त्र बलों को लागू सुसंगत विधि के अधीन गठित सेना न्यायालय की शक्तियों के सदृश हैं।
(2) हर मजिस्ट्रेट, ऐसे किसी स्थान पर स्टेशन किए गए या नियोजित सैनिकों, नौसैनिकों या वायुसैनिकों की किसी यूनिट या निकाय के कमान अधिकारी द्वारा उस प्रयोजन के लिए लिखित आवेदन प्राप्त होने पर, ऐसे अपराध के किसी अभियुक्त व्यक्ति को पकड़ने और सुरक्षित अभिरक्षा में लेने के लिए अपना अधिकतम प्रयत्न करेगा।
(3) उच्च न्यायालय, यदि वह ठीक समझे तो, यह निदेश दे सकेगा कि राज्य के भीतर स्थित किसी जेल में निरुद्ध कोई बंदी विचारण के लिए, अथवा सेना न्यायालय के समक्ष लंबित किसी विषय के बारे में परीक्षा किए जाने के लिए, सेना न्यायालय के समक्ष लाया जाए।
(1) केंद्रीय सरकार, इस संहिता तथा सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) और वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) और संघ के सशस्त्र बलों से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि से संगत नियम, उन मामलों के बारे में बना सकेगी जिनमें सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक विधि के, अथवा ऐसी अन्य विधि के, अध्यधीन व्यक्तियों का विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा, जिसको यह संहिता लागू होती है, अथवा सेना न्यायालय द्वारा किया जाएगा; और जब कोई व्यक्ति किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष लाया जाता है और उस पर ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है जिसके लिए उसका विचारण या तो ऐसे न्यायालय द्वारा, जिसको यह संहिता लागू होती है, अथवा सेना न्यायालय द्वारा किया जा सकता है, तब ऐसा मजिस्ट्रेट ऐसे नियमों को ध्यान में रखेगा और उचित मामलों में उसे, उस अपराध के, जिसका उस पर अभियोग है, कथन सहित, उस यूनिट के कमान अधिकारी को, जिससे वह संबंधित है, अथवा निकटतम सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक स्टेशन के कमान अधिकारी को, जैसी भी स्थिति हो, सेना न्यायालय द्वारा विचारण किए जाने के प्रयोजन के लिए परिदत्त करेगा।
स्पष्टीकरण—इस धारा में,—
(क) "यूनिट" के अंतर्गत रेजिमेंट, कोर, जहाज, टुकड़ी, ग्रुप, बटालियन या कंपनी भी है;
(ख) "सेना न्यायालय" के अंतर्गत ऐसा कोई अधिकरण भी है जिसकी शक्तियां संघ के सशस्त्र बलों को लागू सुसंगत विधि के अधीन गठित सेना न्यायालय की शक्तियों के सदृश हैं।
(2) हर मजिस्ट्रेट, ऐसे किसी स्थान पर स्टेशन किए गए या नियोजित सैनिकों, नौसैनिकों या वायुसैनिकों की किसी यूनिट या निकाय के कमान अधिकारी द्वारा उस प्रयोजन के लिए लिखित आवेदन प्राप्त होने पर, ऐसे अपराध के किसी अभियुक्त व्यक्ति को पकड़ने और सुरक्षित अभिरक्षा में लेने के लिए अपना अधिकतम प्रयत्न करेगा।
(3) उच्च न्यायालय, यदि वह ठीक समझे तो, यह निदेश दे सकेगा कि राज्य के भीतर स्थित किसी जेल में निरुद्ध कोई बंदी विचारण के लिए, अथवा सेना न्यायालय के समक्ष लंबित किसी विषय के बारे में परीक्षा किए जाने के लिए, सेना न्यायालय के समक्ष लाया जाए।
नए कानून में
CrPC 475BNSS 521
521. Delivery to commanding officers of persons liable to be tried by Court-martial.
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