धारा 328 · धारा 328. विकृतचित्त अभियुक्त की दशा में प्रक्रिया
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
328. विकृतचित्त अभियुक्त की दशा में प्रक्रिया
(1) जब जांच करने वाले मजिस्ट्रेट के पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध जांच की जा रही है, विकृतचित्त है और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है, तब मजिस्ट्रेट ऐसी चित्त-विकृति के तथ्य की जांच करेगा और ऐसे व्यक्ति की परीक्षा जिले के सिविल सर्जन द्वारा या ऐसे अन्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा, जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करे, कराएगा, और तब ऐसे सर्जन या अन्य अधिकारी की साक्षी के रूप में परीक्षा करेगा तथा उस परीक्षा को लेखबद्ध करेगा।
(1क) यदि सिविल सर्जन यह पाता है कि अभियुक्त विकृतचित्त है, तो वह ऐसे व्यक्ति को उसकी दशा की देखभाल, उपचार और रोग-पूर्वानुमान के लिए किसी मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक के पास निर्दिष्ट करेगा, और मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक, जैसी भी स्थिति हो, मजिस्ट्रेट को यह सूचित करेगा कि अभियुक्त चित्त-विकृति से या मानसिक मंदता से ग्रस्त है या नहीं:
परन्तु यदि अभियुक्त मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक द्वारा, जैसी भी स्थिति हो, मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से व्यथित है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा—
(क) निकटतम राजकीय अस्पताल में मनोचिकित्सा इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम चिकित्सा महाविद्यालय में मनोचिकित्सा का कोई संकाय सदस्य।
(2) ऐसी परीक्षा और जांच के लंबित रहने तक, मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति के बारे में धारा 330 के उपबंधों के अनुसार कार्रवाई कर सकेगा।
(3) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृतचित्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट यह और अवधारित करेगा कि क्या वह चित्त-विकृति अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा तथा अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात् किन्तु अभियुक्त से प्रश्न किए बिना, यदि वह यह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है, तो वह जांच को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को उन्मोचित करेगा और उसके बारे में धारा 330 में उपबंधित रीति से कार्रवाई करेगा:
परन्तु यदि मजिस्ट्रेट यह पाता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध, जिसकी बाबत चित्त-विकृति का निष्कर्ष निकाला गया है, प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है, तो वह कार्यवाही को ऐसी अवधि के लिए स्थगित करेगा, जो मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है, और अभियुक्त के बारे में धारा 330 में उपबंधित रूप से कार्रवाई किए जाने का आदेश देगा।
(4) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक मंदता से ग्रस्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट यह और अवधारित करेगा कि क्या वह मानसिक मंदता अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट जांच बंद करने का आदेश देगा और अभियुक्त के बारे में धारा 330 में उपबंधित रीति से कार्रवाई करेगा।
(1) जब जांच करने वाले मजिस्ट्रेट के पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध जांच की जा रही है, विकृतचित्त है और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है, तब मजिस्ट्रेट ऐसी चित्त-विकृति के तथ्य की जांच करेगा और ऐसे व्यक्ति की परीक्षा जिले के सिविल सर्जन द्वारा या ऐसे अन्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा, जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करे, कराएगा, और तब ऐसे सर्जन या अन्य अधिकारी की साक्षी के रूप में परीक्षा करेगा तथा उस परीक्षा को लेखबद्ध करेगा।
(1क) यदि सिविल सर्जन यह पाता है कि अभियुक्त विकृतचित्त है, तो वह ऐसे व्यक्ति को उसकी दशा की देखभाल, उपचार और रोग-पूर्वानुमान के लिए किसी मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक के पास निर्दिष्ट करेगा, और मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक, जैसी भी स्थिति हो, मजिस्ट्रेट को यह सूचित करेगा कि अभियुक्त चित्त-विकृति से या मानसिक मंदता से ग्रस्त है या नहीं:
परन्तु यदि अभियुक्त मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक द्वारा, जैसी भी स्थिति हो, मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से व्यथित है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा—
(क) निकटतम राजकीय अस्पताल में मनोचिकित्सा इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम चिकित्सा महाविद्यालय में मनोचिकित्सा का कोई संकाय सदस्य।
(2) ऐसी परीक्षा और जांच के लंबित रहने तक, मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति के बारे में धारा 330 के उपबंधों के अनुसार कार्रवाई कर सकेगा।
(3) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृतचित्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट यह और अवधारित करेगा कि क्या वह चित्त-विकृति अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा तथा अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात् किन्तु अभियुक्त से प्रश्न किए बिना, यदि वह यह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है, तो वह जांच को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को उन्मोचित करेगा और उसके बारे में धारा 330 में उपबंधित रीति से कार्रवाई करेगा:
परन्तु यदि मजिस्ट्रेट यह पाता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध, जिसकी बाबत चित्त-विकृति का निष्कर्ष निकाला गया है, प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है, तो वह कार्यवाही को ऐसी अवधि के लिए स्थगित करेगा, जो मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है, और अभियुक्त के बारे में धारा 330 में उपबंधित रूप से कार्रवाई किए जाने का आदेश देगा।
(4) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक मंदता से ग्रस्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट यह और अवधारित करेगा कि क्या वह मानसिक मंदता अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट जांच बंद करने का आदेश देगा और अभियुक्त के बारे में धारा 330 में उपबंधित रीति से कार्रवाई करेगा।
नए कानून में
CrPC 328BNSS 367
367. Procedure in case of accused being person of unsound mind.
दोनों पाठों की तुलना करें →इस धारा पर आपका निजी नोट
यह नोट सिर्फ़ आप देख सकते हैं।
