धारा 211 · धारा 211. आरोप की अंतर्वस्तु
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211. आरोप की अंतर्वस्तु
(1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में वह अपराध कथित किया जाएगा जिसका अभियुक्त पर आरोप है।
(2) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया है, तो आरोप में उस अपराध का वर्णन केवल उसी नाम से किया जा सकेगा।
(3) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम नहीं दिया है, तो उस अपराध की परिभाषा का उतना भाग कथित किया जाना चाहिए जिससे अभियुक्त को उस बात की सूचना मिल जाए जिसका उस पर आरोप है।
(4) वह विधि और विधि की वह धारा, जिसके विरुद्ध अपराध किया जाना कहा गया है, आरोप में वर्णित की जाएगी।
(5) यह तथ्य कि आरोप लगाया गया है, इस कथन के तुल्य है कि आरोपित अपराध की रचना के लिए विधि द्वारा अपेक्षित प्रत्येक विधिक शर्त उस विशिष्ट मामले में पूरी कर दी गई थी।
(6) आरोप न्यायालय की भाषा में लिखा जाएगा।
(7) यदि अभियुक्त, किसी अपराध के लिए पूर्व में दोषसिद्ध किए जाने के कारण, किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए वर्धित दंड का या भिन्न प्रकार के दंड का भागी है, और यह आशयित है कि ऐसी पूर्व दोषसिद्धि उस दंड पर प्रभाव डालने के प्रयोजन के लिए साबित की जाए जो न्यायालय पश्चात्वर्ती अपराध के लिए अधिनिर्णीत करना ठीक समझे, तो पूर्व दोषसिद्धि का तथ्य, तारीख और स्थान आरोप में कथित किया जाएगा; और यदि ऐसा कथन छूट गया है, तो न्यायालय दंडादेश दिए जाने के पूर्व किसी भी समय उसे जोड़ सकेगा।
दृष्टांत
(क) क पर ख की हत्या का आरोप है। यह इस कथन के तुल्य है कि क का कार्य भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 299 और धारा 300 में दी गई हत्या की परिभाषा के अंतर्गत आता था; कि वह उक्त संहिता के साधारण अपवादों में से किसी के अंतर्गत नहीं आता था; और कि वह धारा 300 के पांच अपवादों में से किसी के अंतर्गत नहीं आता था, या यह कि यदि वह अपवाद 1 के अंतर्गत आता था तो उस अपवाद के तीन परन्तुकों में से कोई एक या दूसरा उसे लागू था।
(ख) क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 326 के अधीन, गोली चलाने के किसी उपकरण के माध्यम से ख को स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने का आरोप है। यह इस कथन के तुल्य है कि यह मामला उक्त संहिता की धारा 335 द्वारा उपबंधित नहीं था, और यह कि साधारण अपवाद उसे लागू नहीं थे।
(ग) क पर हत्या, छल, चोरी, उद्दापन, जारकर्म या आपराधिक अभित्रास का, या मिथ्या संपत्ति-चिह्न के उपयोग का अभियोग है। आरोप में यह कथित किया जा सकेगा कि क ने हत्या की, या छल किया, या चोरी की, या उद्दापन किया, या जारकर्म किया, या आपराधिक अभित्रास किया, या यह कि उसने मिथ्या संपत्ति-चिह्न का उपयोग किया, बिना भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में अंतर्विष्ट उन अपराधों की परिभाषाओं के प्रति निर्देश किए; किंतु वे धाराएं, जिनके अधीन अपराध दंडनीय है, प्रत्येक दशा में आरोप में निर्दिष्ट की जानी चाहिए।
(घ) क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 184 के अधीन, लोक सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित संपत्ति के विक्रय में साशय बाधा डालने का आरोप है। आरोप उन्हीं शब्दों में होना चाहिए।
(1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में वह अपराध कथित किया जाएगा जिसका अभियुक्त पर आरोप है।
(2) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया है, तो आरोप में उस अपराध का वर्णन केवल उसी नाम से किया जा सकेगा।
(3) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम नहीं दिया है, तो उस अपराध की परिभाषा का उतना भाग कथित किया जाना चाहिए जिससे अभियुक्त को उस बात की सूचना मिल जाए जिसका उस पर आरोप है।
(4) वह विधि और विधि की वह धारा, जिसके विरुद्ध अपराध किया जाना कहा गया है, आरोप में वर्णित की जाएगी।
(5) यह तथ्य कि आरोप लगाया गया है, इस कथन के तुल्य है कि आरोपित अपराध की रचना के लिए विधि द्वारा अपेक्षित प्रत्येक विधिक शर्त उस विशिष्ट मामले में पूरी कर दी गई थी।
(6) आरोप न्यायालय की भाषा में लिखा जाएगा।
(7) यदि अभियुक्त, किसी अपराध के लिए पूर्व में दोषसिद्ध किए जाने के कारण, किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए वर्धित दंड का या भिन्न प्रकार के दंड का भागी है, और यह आशयित है कि ऐसी पूर्व दोषसिद्धि उस दंड पर प्रभाव डालने के प्रयोजन के लिए साबित की जाए जो न्यायालय पश्चात्वर्ती अपराध के लिए अधिनिर्णीत करना ठीक समझे, तो पूर्व दोषसिद्धि का तथ्य, तारीख और स्थान आरोप में कथित किया जाएगा; और यदि ऐसा कथन छूट गया है, तो न्यायालय दंडादेश दिए जाने के पूर्व किसी भी समय उसे जोड़ सकेगा।
दृष्टांत
(क) क पर ख की हत्या का आरोप है। यह इस कथन के तुल्य है कि क का कार्य भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 299 और धारा 300 में दी गई हत्या की परिभाषा के अंतर्गत आता था; कि वह उक्त संहिता के साधारण अपवादों में से किसी के अंतर्गत नहीं आता था; और कि वह धारा 300 के पांच अपवादों में से किसी के अंतर्गत नहीं आता था, या यह कि यदि वह अपवाद 1 के अंतर्गत आता था तो उस अपवाद के तीन परन्तुकों में से कोई एक या दूसरा उसे लागू था।
(ख) क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 326 के अधीन, गोली चलाने के किसी उपकरण के माध्यम से ख को स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने का आरोप है। यह इस कथन के तुल्य है कि यह मामला उक्त संहिता की धारा 335 द्वारा उपबंधित नहीं था, और यह कि साधारण अपवाद उसे लागू नहीं थे।
(ग) क पर हत्या, छल, चोरी, उद्दापन, जारकर्म या आपराधिक अभित्रास का, या मिथ्या संपत्ति-चिह्न के उपयोग का अभियोग है। आरोप में यह कथित किया जा सकेगा कि क ने हत्या की, या छल किया, या चोरी की, या उद्दापन किया, या जारकर्म किया, या आपराधिक अभित्रास किया, या यह कि उसने मिथ्या संपत्ति-चिह्न का उपयोग किया, बिना भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में अंतर्विष्ट उन अपराधों की परिभाषाओं के प्रति निर्देश किए; किंतु वे धाराएं, जिनके अधीन अपराध दंडनीय है, प्रत्येक दशा में आरोप में निर्दिष्ट की जानी चाहिए।
(घ) क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 184 के अधीन, लोक सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित संपत्ति के विक्रय में साशय बाधा डालने का आरोप है। आरोप उन्हीं शब्दों में होना चाहिए।
नए कानून में
CrPC 211BNSS 234
234. Contents of charge.
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संबंधित कानूनी धाराएँ
- संबंधितभा.दं.सं. §184धारा 184 - लोक सेवक के प्राधिकार द्वारा विक्रय के लिए प्रस्थापित की गई संपत्ति के विक्रय में बाधा उपस्थित करना
- संबंधितभा.दं.सं. §299गैर इरादतन हत्या।
- संबंधितद.प्र.सं. §300धारा 300. एक बार दोषसिद्ध या दोषमुक्त किए गए व्यक्ति का उसी अपराध के लिए विचारण न किया जाना
- संबंधितभा.दं.सं. §326धारा 326 - खतरनाक आयुधों या साधनों द्वारा स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना
- संबंधितद.प्र.सं. §335धारा 335. ऐसे आधार पर दोषमुक्त किए गए व्यक्ति का सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाना
