धारा 190 · धारा 190. मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
190. मजिस्ट्रेटों द्वारा अपराधों का संज्ञान
(1) इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रथम वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, तथा उपधारा (2) के अधीन इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त किया गया द्वितीय वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, किसी अपराध का संज्ञान कर सकेगा—
(क) ऐसे तथ्यों का परिवाद प्राप्त होने पर, जिनसे ऐसा अपराध बनता है;
(ख) ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर;
(ग) पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति से प्राप्त इत्तिला पर, अथवा अपनी स्वयं की जानकारी पर, कि ऐसा अपराध किया गया है।
(2) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय वर्ग के किसी मजिस्ट्रेट को ऐसे अपराधों का उपधारा (1) के अधीन संज्ञान करने के लिए सशक्त कर सकेगा, जिनकी जांच या विचारण करना उसकी सक्षमता के भीतर है।
राज्य संशोधन
पंजाब और संघ राज्यक्षेत्र चंडीगढ़:
धारा 190 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:—
"190क. कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा अपराधों का संज्ञान—इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट किसी विनिर्दिष्ट अपराध का संज्ञान कर सकेगा—
(क) ऐसे तथ्यों का परिवाद प्राप्त होने पर, जिनसे ऐसा अपराध बनता है;
(ख) ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर;
(ग) पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति से प्राप्त इत्तिला पर, अथवा अपनी स्वयं की जानकारी पर, कि ऐसा अपराध किया गया है।"
[पंजाब अधिनियम 1983 का 22 (27-6-1983 से)]
(1) इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रथम वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, तथा उपधारा (2) के अधीन इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त किया गया द्वितीय वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, किसी अपराध का संज्ञान कर सकेगा—
(क) ऐसे तथ्यों का परिवाद प्राप्त होने पर, जिनसे ऐसा अपराध बनता है;
(ख) ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर;
(ग) पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति से प्राप्त इत्तिला पर, अथवा अपनी स्वयं की जानकारी पर, कि ऐसा अपराध किया गया है।
(2) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय वर्ग के किसी मजिस्ट्रेट को ऐसे अपराधों का उपधारा (1) के अधीन संज्ञान करने के लिए सशक्त कर सकेगा, जिनकी जांच या विचारण करना उसकी सक्षमता के भीतर है।
राज्य संशोधन
पंजाब और संघ राज्यक्षेत्र चंडीगढ़:
धारा 190 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:—
"190क. कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा अपराधों का संज्ञान—इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट किसी विनिर्दिष्ट अपराध का संज्ञान कर सकेगा—
(क) ऐसे तथ्यों का परिवाद प्राप्त होने पर, जिनसे ऐसा अपराध बनता है;
(ख) ऐसे तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर;
(ग) पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति से प्राप्त इत्तिला पर, अथवा अपनी स्वयं की जानकारी पर, कि ऐसा अपराध किया गया है।"
[पंजाब अधिनियम 1983 का 22 (27-6-1983 से)]
नए कानून में
CrPC 190BNSS 210
210. Cognizance of offences by Magistrate.
दोनों पाठों की तुलना करें →इस धारा पर आपका निजी नोट
यह नोट सिर्फ़ आप देख सकते हैं।
