UP Police Regs 508अध्याय 32 · Departmental Punishment of Police Officers and Their Criminal Prosecution
धारा 508 · पैरा-490. पुलिस अधिकारियों के विभागीय विचारण के नियम
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
न्यायिक विचारण अथवा मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच के परिणामस्वरूप पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही किये जाने सम्बन्धी विशेष उपबन्ध पैरा 493 तथा 494 में दिये गये हैं, और लघु दण्डों से सम्बन्धित उपबन्ध पैरा 495 में दिये गये हैं। इन उपबन्धों के अधीन रहते हुये पुलिस अधिकारियों के विभागीय विचारण निम्नलिखित नियमों के अनुसार किये जाने चाहिये :-
(1) प्रारम्भिक जाँच के पश्चात् आरोपों का सार आरोप-पत्र में अभिलिखित किया जाना चाहिये, जो यथासम्भव यथार्थ हो। आरोप आरोपित अधिकारी को पढ़कर सुनाये और समझाये जाने चाहिये तथा आरोप-पत्र की एक प्रति उसे दी जानी चाहिये।
(2) तत्पश्चात् आरोपित अधिकारी से यह पूछा जाना चाहिये कि वह अपने विरुद्ध विरचित आरोप को स्वीकार करता है या उससे इन्कार करता है। उसका उत्तर, जो मौखिक या लिखित हो सकता है, पुलिस अधीक्षक को उतने समय के भीतर प्रस्तुत किया जाना चाहिये जितना पुलिस अधीक्षक युक्तियुक्त समझे, और लिखित उत्तर की दशा में वह 48 घण्टे से कम न होगा। इस प्रक्रम पर आरोपित अधिकारी से किसी विस्तृत स्पष्टीकरण की अपेक्षा नहीं है। यदि अधिकारी आरोप स्वीकार कर ले तो उसके विरुद्ध कोई अभियोजन साक्ष्य अभिलिखित करना आवश्यक न होगा। किन्तु यदि वह आरोप से इन्कार करता है तो उसके विरुद्ध उतना साक्ष्य अभिलिखित किया जाना चाहिये जितना पुलिस अधीक्षक पुलिस ऐक्ट की धारा 7 के अधीन आरोप को साबित करने के लिये आवश्यक समझे। साक्ष्य या तो मौखिक होगा या दस्तावेजी, और उसका आरोप के लिये तात्विक होना आवश्यक है। यदि मौखिक हो, तो -
(क) वह प्रत्यक्ष होना चाहिये, अर्थात् यदि वह ऐसे तथ्य के बारे में हो जो देखा जा सकता हो या अन्यथा जाना जा सकता हो, तो उस व्यक्ति द्वारा दिया जाना चाहिये जो यह कहे कि उसने उसे देखा या जाना।
(ख) वह पुलिस अधीक्षक द्वारा आरोपित पक्ष की उपस्थिति में अभिलिखित किया जाना चाहिये, जिसे साक्षियों से जिरह करने की अनुमति दी जावेगी। आरोपित पक्ष के आचरण के बारे में प्रारम्भिक जाँच में राजपत्रित पुलिस अधिकारियों द्वारा अथवा किसी मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलिखित कथन ग्राह्य होंगे और उन्हें पुनः अभिलिखित करना आवश्यक न होगा, यदि वे आरोपित पक्ष की उपस्थिति में साक्षियों को पढ़कर सुना दिये जायें और उनके द्वारा स्वीकार कर लिये जायें तथा आरोपित पक्ष को साक्षियों से जिरह करने का अवसर दे दिया जाये।
(3) (क) जब किसी आरोप के समर्थन में कोई दस्तावेज अवलम्ब में लिया जाये, तब उन्हें प्रदर्श के रूप में साक्ष्य में लाया जावेगा, और आरोपित अधिकारी को अपनी सफाई देने के लिये बुलाये जाने से पूर्व ऐसे दस्तावेजों का निरीक्षण करने की अनुमति दी जावेगी तथा उनकी प्रतियाँ निःशुल्क दी जावेंगी। जिन दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु उपर्युक्त नियम 2 (क) और (ख) के अधीन साक्ष्य में अग्राह्य हो, उन्हें प्रदर्श के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जावेगा। उदाहरणार्थ, अधीनस्थ अधिकारियों को दिये गये साक्षियों के कथन तथा ऐसे अधिकारियों के निष्कर्षों और अभिमतों की रिपोर्टें साक्ष्य नहीं हैं, और ऐसे कथन तथा निष्कर्ष प्रदर्शित नहीं किये जावेंगे। किन्तु अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा लिये गये कथनों का प्रयोग पुलिस अधीक्षक द्वारा साक्षियों की सत्यता की परीक्षा के लिये किया जा सकता है, और ऐसा करते समय कथनों की प्रतियाँ नमूने के रूप में रखी जावेंगी।
यदि कोई सरकारी सेवक उपर्युक्त दस्तावेजों से भिन्न किसी दस्तावेज या दस्तावेजों की प्रतियाँ चाहे और जाँच करने वाला अधिकारी इन दस्तावेजों को सुसंगत समझे, तो प्रतिलिपि के व्यय का भुगतान करने पर उसे प्रतियाँ दी जा सकती हैं। यदि जाँच करने वाला अधिकारी आरोपित पक्ष द्वारा माँगे गये दस्तावेजों को असंगत अथवा कार्यवाही से असम्बद्ध समझे, तो वह प्रतियाँ देने से इन्कार कर सकता है और ऐसे इन्कार के कारण लिखित रूप में अभिलिखित करेगा।
(ख) लोक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियों को साबित करना आवश्यक नहीं है।
(ग) इस तथ्य के बारे में साक्ष्य कि कोई पुलिस अधिकारी अपने साधनों से अधिक व्यय करके रहता है, इस मत के लिये प्रबल उपधारणा माना जावेगा कि वह अवैध परितोषण प्राप्त करता है। ऐसे मामलों में सामान्य ख्याति का साक्ष्य, चाहे वह कड़ाई से प्रत्यक्ष न हो, ग्राह्य किया जाना चाहिये।
(घ) औपचारिक प्रकृति के किसी विशेषज्ञ का दस्तावेजी साक्ष्य, दस्तावेज को साबित करने के लिये इन साक्षियों को बुलाये बिना, ग्राह्य किया जा सकता है। इसी प्रकार अभियुक्त द्वारा स्वीकृत नमूनों को साबित करना आवश्यक नहीं है।
नोट - यह पैरा अधिसूचना संख्या 7857/आठ-अ-37-65, दिनांक 21 फरवरी, 1969 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।
(4) यदि अभियोजन साक्ष्य अभिलिखित करने के पश्चात् पुलिस अधीक्षक आरोप में कोई वृद्धि या परिवर्तन करना आवश्यक समझे, तो वह आरोपित अधिकारी को संशोधित आरोप-पत्र की प्रति देगा और संशोधित आरोप के निहितार्थ उसे समझायेगा। तत्पश्चात् आरोपित अधिकारी को उन बिन्दुओं पर अभियोजन साक्षियों से पुनः जिरह करने का अवसर दिया जावेगा जो आरोप के संशोधन के कारण सुसंगत हो गये हों।
(5) आरोपित अधिकारी को अपना सफाई का कथन उतने समय के भीतर, जो सात दिन से कम न हो और जितना पुलिस अधीक्षक युक्तियुक्त समझे, प्रस्तुत करने के लिये आमन्त्रित किया जाना चाहिये। इस प्रक्रम पर उससे यह पूछा जाना चाहिये कि क्या वह सफाई में कोई साक्षी प्रस्तुत करना अथवा कोई दस्तावेजी साक्ष्य दाखिल करना चाहता है। यदि हाँ, तो उसे अपने लिखित सफाई कथन के साथ साक्षियों के नाम तथा दस्तावेज बताने चाहिये और यह भी बताना चाहिये कि वह प्रत्येक साक्षी और दस्तावेज से क्या साबित करने की आशा रखता है। यदि पुलिस अधीक्षक यह समझे कि आरोपित अधिकारी जिस साक्षी या दस्तावेज को अपनी सफाई में प्रस्तुत करना चाहता है उसका साक्ष्य मामले के लिये तात्विक होने की सम्भावना नहीं है, तो वह ऐसे साक्षी को बुलाने से अथवा ऐसे दस्तावेज को साक्ष्य में प्रस्तुत करने की अनुमति देने से इन्कार कर सकता है, किन्तु ऐसी दशा में उसे ऐसे इन्कार के कारण संक्षेप में अभिलिखित करने चाहिये। तत्पश्चात् वह या तो शेष साक्षियों को स्वयं बुलावेगा अथवा आरोपित अधिकारी को यह स्पष्ट कर देगा कि उसे अपना लिखित कथन या सफाई के साक्षी प्रस्तुत करने में तंग करने वाले विलम्ब द्वारा कार्यवाही को लम्बा खींचने की अनुमति नहीं दी जावेगी, और यदि वह नियत तिथि पर बिना पर्याप्त कारण के उन्हें प्रस्तुत न कर सके तो कार्यवाही उसके बिना ही आगे चलेगी।
(6) लिखित सफाई स्पष्टीकरण प्राप्त होने पर पुलिस अधीक्षक द्वारा आरोपित अधिकारी का मौखिक कथन भी अभिलिखित किया जाना चाहिये, जिससे लिखित स्पष्टीकरण की संपुष्टि हो सके अथवा वह किसी ऐसे बिन्दु को स्पष्ट कर सके जिसे वह आवश्यक समझे।
(7) तत्पश्चात् सफाई के साक्षियों के कथन पुलिस अधीक्षक द्वारा अभिलिखित किये जाने चाहिये, जो उनसे ऐसे किसी बिन्दु पर जिरह कर सकता है जिसे वह आवश्यक समझे।
(8) पुलिस अधीक्षक अपना निष्कर्ष लिखेगा। निष्कर्ष में उसे कड़ाई से आरोप की विषय-वस्तु तथा अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य तक ही सीमित रहना चाहिये और आरोपित अधिकारी द्वारा उठाये गये प्रत्येक बिन्दु पर विचार करना चाहिये। तथ्य के प्रश्न पर तथ्यात्मक निष्कर्ष पर पहुँचने पर, यदि वह आरोप को सिद्ध पाये, तो यह विनिश्चय करने से पूर्व कि प्रथम दृष्टया कौन सा दण्ड, यदि कोई हो, उपयुक्त होगा, उसे आरोपित व्यक्ति के चरित्र तथा पूर्व आचरण पर विचार करना चाहिये। यदि पुलिस अधीक्षक यह समझे कि पदच्युति, हटाया जाना अथवा पदावनति उपयुक्त दण्ड है, तो उसे उन सभी मामलों में जिनमें उसे ऐसे दण्ड अधिरोपित करने की शक्ति है, अपने निष्कर्ष की प्रति आरोपित अधिकारी को देनी चाहिये और उससे युक्तियुक्त समय के भीतर (जो एक सप्ताह से कम न हो) ऐसे दण्डों के अधिरोपण के विरुद्ध कारण दर्शित करने को कहना चाहिये। आरोपित अधिकारी को यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिये कि कोई दण्डादेश पारित किये जाने से पूर्व इस सम्बन्ध में उसके द्वारा किये गये किसी अभ्यावेदन पर विचार किया जावेगा।
(9) उन सभी मामलों में जिनमें पुलिस अधीक्षक निरीक्षकों या उपनिरीक्षकों को पदच्युत करने या हटाने की प्रस्थापना करता है, वह इन मामलों को जिला मजिस्ट्रेट के मार्फत अन्तिम आदेश के लिये पुलिस उप महानिरीक्षक को अग्रसारित करेगा।
(10) जब उप महानिरीक्षक यह समझे कि उपयुक्त दण्ड पदच्युति, हटाया जाना अथवा पदावनति है, तब वह पुलिस अधीक्षक के निष्कर्ष की प्रति आरोपित अधिकारी को दिलवायेगा और साथ ही उससे इन दण्डों के अधिरोपण के विरुद्ध कारण दर्शित करने को कहेगा।
आरोपित अधिकारी से यह अपेक्षित होगा कि वह अपना लिखित अभ्यावेदन, यदि कोई हो, उतने समय के भीतर प्रस्तुत करे जो एक सप्ताह से कम न हो और जितना उप महानिरीक्षक युक्तियुक्त समझे। सभी मामलों में उप महानिरीक्षक को अपना निष्कर्ष और आदेश लिखने से पूर्व आरोपित अधिकारी का मौखिक कथन अभिलिखित करना चाहिये।
(11) किसी भी ऐसे मामले में जिसमें पुलिस अधीक्षक यह समझे कि विशेष परिस्थितियों के कारण इन नियमों से हटना न्यायोचित है, वह अपने विनिश्चय के कारण अभिलिखित करेगा, और अधीक्षक का यह कर्तव्य होगा कि वह अपने निष्कर्ष में यह दर्शाये कि सामान्य प्रक्रिया से हटने का आरोपित अधिकारी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है।
(12) इन नियमों के अधीन संस्थित किसी कार्यवाही में अभियुक्त का प्रतिनिधित्व अभिभाषक (वकील) द्वारा नहीं किया जावेगा।
(13) इन नियमों के अधीन पुलिस अधीक्षक द्वारा प्रयोग किये जाने वाले सभी या कोई कर्तव्य उससे वरिष्ठ अधिकारी द्वारा भी प्रयोग किये जा सकते हैं।
(14) पुलिस महानिरीक्षक अथवा पुलिस उप महानिरीक्षक, लेखबद्ध किये जाने वाले कारणों से, या तो स्वप्रेरणा से अथवा पुलिस ऐक्ट की धारा 7 के अधीन विभागीय विचारण करने वाले अधिकारी के अनुरोध पर, किसी मामले को तत्स्थानी पंक्ति के किसी अन्य अधिकारी को अन्तरित कर सकता है।
नोट
(1) सामान्य नियम - पुलिस विनियमावली मात्र प्रशासनिक निदेश नहीं है और उसे लिखित विधि के रूप में माना जाना है। उसके आदेशात्मक उपबन्धों की अवहेलना उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप को आमन्त्रित कर सकती है।
नैसर्गिक न्याय का सिद्धान्त यह अपेक्षा करता है कि अपचारी कर्मचारी को स्पष्ट रूप से (1) आरोप, (2) आरोप को स्थापित करने वाला कथन, (3) आरोप को साबित करने के लिये अपेक्षित साक्ष्य की जानकारी दी जाये, तथा (4) साक्षी का कथन उसकी उपस्थिति में लिया जाये और उसे साक्षियों से जिरह करने का अवसर दिया जाये।
आरोप पर कारण बताओ नोटिस की तामील में डेढ़ वर्ष का विलम्ब पर्याप्त अवसर दिये जाने की दृष्टि से घातक माना गया है, और इसलिये सन्तोषजनक उत्तर की अपेक्षा करना असम्भव है।
विचार करने का अर्थ अभ्यावेदन के तथ्यों पर विचार करना है। यदि अभ्यावेदन के तथ्यों पर विचार नहीं किया गया और पारित आदेश से यह प्रकट होता हो कि सम्यक् प्रक्रिया का प्रयोग नहीं किया गया, तो उसे विचार किया गया नहीं माना जावेगा।
यह सुस्थापित है कि जब तक किसी कार्य का किया जाना या लोप किसी सेवा नियम अथवा प्रमाणित स्थायी आदेश में परिभाषित दुराचरण की कोटि में न आता हो, तब तक दुराचरण की जाँच और रिपोर्ट करके कर्मचारी को दण्डित नहीं किया जा सकता। दण्डनीय दुराचरण के आधारों का उल्लेख होना ही चाहिये।
शासकीय निदेशों को सेवा नियमों के साथ पढ़ा जाना चाहिये। विभागीय अधिकारी उनकी अवहेलना नहीं कर सकते।
प्रशासनिक निदेश सेवा नियम नहीं माने जाते, किन्तु यदि अधिकारी उन्हें कुछ कर्मचारियों पर लागू करें और अन्य को उस निदेश से अपवर्जित कर दें, तो कर्मचारी को अपने सम्बन्ध में उन्हें प्रवृत्त कराने का अधिकार बना रहता है।
सेवामुक्ति के आदेश के विरुद्ध अपील खारिज करते हुये और उसे विधिमान्य तथा नियमों के अनुरूप ठहराते हुये न्यायालय ने कहा कि अपील विनिश्चित करने वाले प्राधिकारी को नियमों में दिये गये सभी तथ्यों पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिये, जिनमें (1) क्या सम्यक् प्रक्रिया का पालन हुआ है, (2) क्या विनिश्चय पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से समर्थित है, तथा (3) क्या अधिरोपित दण्ड उपयुक्त और उचित है, सम्मिलित हैं, और पारित आदेश से यह प्रतिबिम्बित होना चाहिये कि इन बातों पर विचार किया गया है।
किसी साक्ष्य देने वाले साक्षी को जाँच अधिकारी नियुक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे नैसर्गिक न्याय के नियमों का उल्लंघन होता है।
(2) नियम का भंग - नियम का भंग दो प्रकार का हो सकता है : एक मूलभूत नियम का, जैसे प्राधिकार के बिना सेवा से पदच्युति, और दूसरा प्रक्रिया सम्बन्धी नियम का। प्रथम दशा में आदेश स्वयं शून्य और निष्प्रभावी होता है; पदच्युति सम्बन्धी परन्तुक या शर्त स्वयं विधि का बल रखती है, जो अन्य नियमों से पूर्णतया भिन्न स्तर पर है, जबकि अन्य नियम अनेक प्रकार के होते हैं और समय-समय पर बदले जा सकते हैं। कानूनी रक्षा कवच का अत्यन्त सावधानी से पालन होना चाहिये और जो अधिकारी पदच्युति के आदेश देने का कानून अधिकारी नहीं है उसका आदेश अवैध नींव पर है, जहाँ पर प्रक्रिया सम्बन्धित नियम को भंग किया गया है, जैसे विभागीय कार्यवाही के पहले नियमानुसार जाँच नहीं हुई, जिसमें कानून और पवित्रता का आश्वासन है कि दण्ड दुर्भावना या ऐच्छिक क्रिया से नहीं, बल्कि नियमों के आधार पर होगा, वहाँ दण्ड का आदेश टिक नहीं सकता, मगर इनमें कोई विशेष आयातित संविदा के शर्त नहीं है कि प्रक्रिया सम्बन्धी नियमों का अनादर करके पदच्युति करने के फलस्वरूप राज्य के विरुद्ध सदोष पदच्युति के लिए कोई कार्यवाही की जा सके यह अनुचित होगा कि अधिकारी जिसे अनुशासनिक मामलों में अनुशासनिक कार्यवाही करने का अधिकार है, उसे अदालत के आदेशों के भय से अपने उचित अधिकार के प्रयोग से रोका जाय।
(3) कार्यवाही अधिकार सीमा - किसी पुलिस अधिकारी पर धारा 7 में विभागीय कार्यवाही करने के लिए न्यायिक जांच के निष्कर्ष पर कि उक्त अधिकारी के विरुद्ध प्रथम दृष्टया अपराध का बनना पाया जाता है, निर्भर नहीं करता। धारा 7 के विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ करने के लिये मात्र आवश्यकता है कि न्यायिक जाँच को समाप्त हो लेने दिया जाय।
जब फौजदारी विधि में कर्मचारी का अभियोजन हो रहा हो तो विभागीय कार्यवाही को स्थगित रखने की बाध्यता नहीं है, मगर ऐसा करना औचित्य के हित में अच्छा है। मगर फौजदारी अदालत के निर्णय को स्वीकार करना आवश्यक नहीं है।
न्यायालय से दण्डित होने के फलस्वरूप जब कर्मचारी को सेवाच्युत कर दिया गया और वह अपील से दण्ड मुक्त हो गया तो विभाग सेवक को पुनः सेवा में स्थित करने के बाद, भिन्न आरोप पर आगे जाँच कार्यवाही कर सकता है, मगर इस स्थिति में सरकारी कर्मचारी निलम्बन की अवस्था में ही माना जायेगा।
यदि दीवानी अदालत ने विभागीय कार्यवाही को नैसर्गिक न्याय के नियम का उल्लंघन करने के कारण तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया है और सरकारी कर्मचारी पुनः पदस्थ कर दिया है तो यह पूर्णरूपेण दोषमुक्त रूप से नहीं माना जायेगा तथा उन्हीं आधार पर कर्मचारी के विरुद्ध दूसरी जाँच करने पर कोई रोक न होगा।
याची को जाँच रिपोर्ट दिए बिना याची का निलम्बन अवैध ठहराया गया ।
विभागीय जाँच एवं क्रिमनल प्रोसीडिग्स विभागीय जाँच को इसलिए नहीं रोका जा सकता कि अपचारी कर्मचारी के विरुद्ध किसी न्यायालय में क्रिमनल प्रोसिडिंग्स चल रही है। याची के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की विभिन्न धाराओं के अन्तर्गत न्यायालय में वाद चल रहा था। विभागीय जाँच अपचारी कर्मचारी के विरुद्ध दुराचार के सम्बन्ध में की जा रही थी। अभिनिर्णीत हुआ कि उक्त जाँच एवं वाद साथ ही साथ चल सकते हैं।
माननीय उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्णीत किया कि विभाग द्वारा नियुति जाँच अधिकारी द्वारा याची के विरुद्ध लगाए गए आरोप सही पाये गए। कमेटी द्वारा याची के प्रिमेच्योर रिटायरमेन्ट सम्बन्धी संस्तुति भी ठीक पायी गयी है। इस आधार पर माननीय उच्च न्यायालय ने याची द्वारा दायर की गयी अपील को खारिज कर दिया।
अनुशासनिक कार्यवाही - अनुशासनिक कार्यवाही एक प्रशासकीय विधि हैं। इसे अर्द्ध न्यायिक कार्यवाही माना गया है। अर्द्ध न्यायिक कार्यवाही के अन्तर्गत नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 में दिए गए मूलभूत सिद्धान्तों का अनिवार्य रूप से पालन किया जाना है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय ए०के० क्रेपक बनाम यूनियन आफ इण्डिया में व्यवस्था दी है कि प्रशासनिक शक्ति तथा न्यायिक कल्पश्क्तियों में विभाजन रेखा समाप्त हो चुकी है। अतः प्रशासनिक अधिकारी विधि प्रदत्त प्रावधानों का अक्षरशः पालन करें और कोई भी कार्य अविवेकपूर्ण अथवा द्वेष भाव ढंग से न करें। इसी श्रृंखला में भी उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय स्टेट आफ उड़ीसा बनाम वीणार्पण में व्यवस्टया दी है कि कोई प्रशासनिक कृत्य जिनसे व्यक्तियों पर प्रभाव पड़ता है नैसर्गिक न्याय के नियमों के अनुसार होना चाहिए ।।
पुलिस द्वारा बन्दी बनाये गए तथा पुलिस अभिरक्षा में रखे जाने के सम्बन्ध में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अनेकों स्पष्ट निर्देश दिए हैं, जिनका उल्लंघन किए जाने पर विधि समस्त न्यायिक कार्यवाही के अतिरिक्त बृहद प्रकृति की विभागीय कार्यवाही की जा सकती है ।
याची के विरुद्ध 22-12-1987 से अनुशासनिक कार्यवाही चल रही थी। इस बीच कई जाँच अधिकारी आये, परन्तु जांच पूर्ण नहीं हुयी। अनुशासनिक कार्यवाही लम्बित रहने के आधार पर याची की पदोन्नति नहीं की गयी। यह अभिनिर्णीत हुआ कि विलम्ब हेतु याची दोषी नहीं है, अतः वह पदोन्नति का पात्र है
याची की तैनाती पुलिस विभाग में कान्सटेबिल के पद पर हुयी। याची की सेवायें इस आधार पर समाप्त कर दी गयी कि उसने अपने हाईस्कूल प्रमाण पत्र में अपनी जन्म तिथि बदल दी तथा उसने जाली दस्तावेज प्रस्तुत किये। अभिनिर्णीत हुआ कि याची की सेवायें यद्यपि उसे सुनवाई का अवसर प्रदान किये बिना समाप्त की गयी फिर भी सेवा समाप्ति उचित ठहराई गई
किसी राज्य कर्मचारी द्वारा अवैध रूप से प्राप्त किया गया धन क्रिमिनल मिसकन्डक्ट में आता है। वह धन जिसका वह हिसाब न दे सके कि वह कहाँ से प्राप्त हुआ है इस श्रेणी में आता है
पुलिस कान्सटेबिल 93 दिनों तक अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित रहा। निर्णीत हुआ कि ड्यूटी से बिना कारण एवं अवकाश प्रार्थना पत्र दिए बिना अनुपस्थित रहना अनुशासनहीन है। जाँच उपरान्त सेवायें समाप्त की जाना उचित ठहरायी गयी।
अवैध पुलिस अभिरक्षा के अन्तर्गत उत्पीड़न करना, बन्दी को चोटें पहुंचाना अथवा मृत्यु कारित करना गम्भीर अपराध है। यह पुलिस विभाग की छवि के विरुद्ध है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय तथा अन्य निर्णयों में इस प्रकार की घटनाओं को निन्दनीय तथा सभ्य समाज के आदेशों के प्रतिकूल होने विषयक मत व्यक्त किए हैं तथा दोषी पुलिस कर्मी को मृतक के परिवार को अनुतोष प्रदान करने के निर्देश दिए हैं।
(4) आरोप सुव्यक्त हो- आरोप पूरे विशिष्टता और सूक्ष्मता के साथ होना चाहिये, स्वाभाविक न्याय के लिये (1) व्यक्ति को आरोप की प्रकृति मालूम होना चाहिये, (2) अपना कथन बताने का अवसर मिलना चाहिये, और (3) अधिकरण का अच्छे श्रद्धा के साथ कार्य करना चाहिये। अनुशासनिक कार्यवाही का एक अर्थ न्यायिक रूप होता है जिसमें साक्ष्य के आधार पर और निश्चिता की मात्रा में निष्कर्ष होना चाहिये, पारित आदेश में इस कारण हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता कि साक्ष्य के जिस आधार पर दण्ड दिया है, वह अदालत में दण्ड देने के लिए अपर्याप्त था, मगर विभागीय कार्यवाही में पारित आदेश अपने में अन्तर्विष्ट एवं मुखर होना चाहिये। राज्य बनाम रतन सिंह में यह निर्णय हुआ कि विभागीय जाँच में सुनी हुई शहादत भी मान्य हो सकती है। एस०आर० गोविन्दन के मामले में यह निर्णय दिया गया कि साक्ष्य कानून के सिद्धान्त विभागीय कार्यवाही पर लागू नहीं है।
(5) साक्ष्य का नियम और प्रक्रिया - अनुशासनिक अधिकारी उन तथ्यों पर अपने विचार के अनुसार निष्कर्ष निकालने को अधिकृत नहीं है, विशेष कर सुनी हुई शहादत पर या उन अभिलेखों पर जिनकी प्रामाणिकता स्थापित न हुई हो और ऐसे निष्कर्ष जीवित नहीं रह सकते ।
विभागीय कार्यवाही में जाँचकर्त्ता अधिकारी को कार्यवाही अपने हाथों करनी चाहिये, ए०आई०आर० 1956 इला० 578 में निर्णीत है कि पुलिस अधीक्षक को भी अधिकार नहीं है कि वह अपने अधीनस्थ को गवाहान का बयान लिखने के अधिकार का प्रतिनिधायन करे, इसमें अपवाद यह है कि यदि पहले इसमें किसी मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी ने बयान लिखा था तो वह कार्यवाही के दौरान गवाह को पढ़कर सुनाया जा सकता है और उसके स्वीकार करने पर आरोपित पक्ष जिरह कर सकता हैं, लेकिन यह अपवाद वहाँ लागू नहीं होगा जहाँ गवाह ने अपना बयान स्वयं लिखकर दिया हो, जब दौरान कार्यवाही किसी विशेष परिस्थिति में नियमित प्रक्रिया से हटना पड़े तो उक्त परिस्थिति के होने के औचित्य पर संतुष्टि पाने के बाद जाँच अधिकारी उस पर अपना निष्कर्ष दे और यह भी दे कि आरोपित पक्ष इस विलगाव से प्रतिकूल प्रभावित नहीं हुआ ।
धारा 133 साक्ष्य एक्ट में एक सह अपराधी की शहादत मान्य है और उसके साक्ष्य पर दिया गया दण्ड इस कारण अवैधानिक न होगा कि दण्ड सह अपराधी के बयान पर आधारित है, साक्ष्य एक्ट के नियम विभागीय कार्यवाहियों पर कठोरतापूर्वक लागू नहीं होते न अधिकारी को न्यायिक रूप से कार्य करना होता है, भारत सरकार बनाम त्रिलोकनाथ में माना गया है कि यह अर्द्ध-न्यायिक कार्यवाही है और न्यायिक सुनवाई प्रक्रिया के नियम इस पर लागू नहीं होते तथा प्रदत्त दण्ड को सही माना गया।
जाँच अधिकारी अपने निष्कर्ष को उन तथ्यों पर आधारित करने का अधिकारी नहीं है जिसे वह उचित समझता है और जिसमें सुनी गई शहादत या वे अभिलेख हैं जिनकी प्रामाणिकता स्थापित नहीं हुई है। इस प्रकार के अमान्य शहादत पर आधारित निर्णय स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यदि पुलिस उपाधीक्षक ने गवाहान का बयान स्वयं नहीं लिखा और गवाहों से उनका अपना लिखा बयान प्राप्त किया है तो ऐसे बयान पर विश्वास करना पुलिस रेगुलेशन के पैरा 490 के प्रावधान के प्रतिकूल होगा। इस नियम के प्रतिवाद में कार्य करने का कारण दिया जाना चाहिये था ।
(6) साक्षी को बुलाने का प्रावधान - यदि जाँचकर्त्ता अधिकारी को विभागीय कार्यवाही में गवाह या अभिलेख तलब करने की जरूरत है तो वह उ०प्र० विभागीय कार्यवाही (साक्षी उपस्थिति बाध्यता एवं अभिलेख प्रस्तुति) एक्ट, 1976 में कर सकते हैं, इसके अधीन वे गवाह की उपस्थिति बाध्य कर सकते हैं व साक्ष्य में किसी अभिलेख या प्रस्तुत योग्य पदार्थ तलब कर सकते है बशर्ते कि साक्ष्य एक्ट में उस पर स्वाधिकार का दावा न किया गया हो, उक्त एक्ट ने 1953 के एक्ट को व 1976 के अध्यादेश को दिनांक 17-9-75 से निरस्त कर दिया है।
पैरा 490 (5) पुलिस रेगुलेशन के अधीन यह पुलिस अधीक्षक को तय करना है कि वह सफाई के उस गवाह को सम्मन करने से इन्कार कर दे जिसके शहादत को वह आरोप में सफाई विषयक तथ्य पर आवश्यक नहीं समझते। सफाई में पेश किये जाने के लिये स्वीकृत गवाहों को वे आरोपित पक्ष द्वारा पेश किये जाने के लिये सम्मन करेंगे। गवाह को पेश किये जाने की अनुमति देने के बाद उन गवाहों को खर्च दिये जाने का प्रश्न महत्व नहीं रखता चाहे वह अधिकारी द्वारा बुलाया गया हो चाहे आरोपित पक्ष ने स्वयं बुलाया हो। खर्चा देने की जिम्मेदारी सरकार की है। जाँच अधिकारी आरोपित पक्ष पर यह प्रतिबन्ध नहीं लगा सकता कि वह गवाहान का बयान होने से पहले उनका खर्च जमा करे। शासनादेश सं० 1371-1/आठ-ब-2000 (10/61) दिनांक 3-7-61 भी इसे स्पष्ट करता है
(7) सफाई के लिये अवसर - जब जाँचकर्त्ता ने आरोपित पक्ष के 32 गवाहान के पेश करने के लिये दी गई सूची में 8 को पर्याप्त माना तो 175 ए०एल० जे० 62 में इस निश्चय को उचित ठहराया गया, पर जब अनुशासनिक अधिकारी ने आरोपित अधिकारी को आरोपित अधिकारी को गवाहान के चयन का अवसर नहीं दिया तो ए०आई०आर० 1958 इला० 607 में इसे सफाई के प्रतिकूल प्रभावी मानकर प्रदत्त दण्ड को अमान्य कर दिया।
गोपनीय अभिलेख के लेखक का, विभागीय कार्यवाही में बयान न कराने पर, उक्त अभिलेख पर आधारित कार्यवाही होने के कारण राज्य बनाम दीवान चंर्दा में सु०को० ने यह माना कि सम्यक् अवसर देने से विमुख रखा गया, अपराधी अधिकारी की सफाई का बयान लेने के बाद जब जाँचकर्ता अधिकारी ने नई शहादत लिया तो यह माना गया कि उचित अवसर दिये जाने व प्रक्रिया की प्रतिकूलता का प्रभाव न होने पर इस अनियमितता के कारण कार्यवाही रद्द न होगी, मगर जहाँ यह आरोप था कि अवैध धन लेकर अभिलेखों को हटा दिया वहाँ अभिलेख को जानकर हटाये जान क बाबत शहादत आवश्यक था और वह कथित पत्र जो अभिलेख हटाने विषयक था को उस अभिलेखों की सूची पर नहीं लाया गया जिस पर भरोसा किया गया था न तो आरोपित पक्ष को उसकी नकल दी गई न तो आरोप में उसका सन्दर्भ था इसलिये फतेह बहादुर बनाम भारत सरकार ने उसे सम्यक् अवसर दिये जाने से विमुख मान कर पदच्युति को अवैध करार दिया।
(8) उचित अवसर का दिया जाना-कम समय की नोटिस देकर जाँच का स्थान बदल देने के कारण सफाई के गवाहान बयान के लिये पेश नहीं हो सके। अपीलकर्त्ता कर्मचारी को उन अभिलेखों के निरीक्षण का भी अवसर नहीं मिला जो उसके विपरीत प्रयुक्त थे। इस कारण जाँच को एक दिखावा माना गया, क्योंकि नैसर्गिक न्याय के नियम का उल्लंघन पाया गया है ।
जहाँ जाँच प्रारम्भ होने के स्तर से पूर्व गवाहान के लिये गये एक पक्षीय बयानात व अभिलेखों को प्रति जिन पर आरोप आधारित है, जाँच प्रारम्भ होने से पूर्व सरकारी कर्मचारी को देने से इन्कार कर दिया गया है उसे संविधान के अनुच्छेद 311 (2) के उल्लंघन में पाकर यह माना गया है कि कर्मचारी को अपनी निर्दोषिता प्रमाणित करने का अवसर नहीं दिया गया है और उसके सेवाच्युति आदेश को अविधिक करार दिया गया है।
अपचारी कर्मचारी को निलंबन के अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता नहीं दिया गया जिससे वह कार्यालय में उपस्थित होने के स्थिति में नहीं था तथा उपस्थित होने से इन्कार कर दिया। उसके अनुपस्थिति में की गई कार्यवाही उसे बिना समुचित अवसर दिये ही किया गया माना गया और उसके सेवाच्युति के आदेश को निरस्त किया गया ।
विवेचना के दौरान सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध लिये गये बयान की नकलें उसे देने से मना किया जाना सही रूप से अनुचित और गलत है। कर्मचारी के विरुद्ध किये जाने वाले प्रस्तावित कार्यवाही के लिये उन बयानात के सारांश देने से उसे कारण बताने के समुचित अवसर दिये जाने की आवश्यकता की संतुष्टि (पूर्ति) नहीं हो जाती ।
आरोप-पत्र में आवश्यक तथ्यों को नहीं दिया गया और प्रारम्भिक जाँच के दौरान लिये गये गवाहान के बयानात उपलब्ध नहीं कराये गये तो इस स्थिति में यह माना गया कि हे० का० को अपने बचाव के लिये समुचित अवसर दिये जाने से वंचित रखा गया और उसके सेवाच्युति आदेश को अविधिक करार दिया गया।
(9) पूर्वाभिलेख एवं अन्य परिस्थितियों पर विचार - शा०आ०सं० 17-6-78, दिनांक 14-10-69 (नियुक्त ख) की वांछा है कि जब अनुशासनिक कार्यवाही में सेवक को, उसके पूर्व प्रतिकूल अभिलेखों पर विचार करके, दण्ड देना है तो उसके आरोप-पत्र में इसका स्पष्ट आरोप होना चाहिए, मगर यह भाव वाद के शा०आ०सं० 16-6-68, दिनांक 26.7 (नियुक्ति 3) द्वारा संशोधित हुआ कि आरोपित पक्ष को दी जाने वाली कारण बताओ नोटिस में इसका उल्लेख कर दिया जाय कि उसकी सेवा के पूर्व अभिलेखों पर भी विचार किया जायेगा, 1963 सु०को० केसेज 713 में भी आया है कि जब तक आरोपित न हो, पूर्वाभिलेख पर विचार नहीं होना चाहिये।
जब पूर्वाभिलेख पर, कम दण्ड देने को विचार करना है तो इसे कारण बताओ नोटिस में देने की आवश्यकता नहीं। अनुशासनिक अधिकारी दण्ड देने के समय अपराधी के निलंबित होने या उसके अन्य कार्य को भी दृष्टि में रख सकता है जो अजित सिंह बनाम कृपाल सिंह डी०आई०जी०२ में गलत या अवैध नहीं माना गया है।
जब प्रस्तावित कारण बताओ नोटिस में सेवा से हटाये जाने का दण्ड देने को कहा गया तो उससे छोटे सभी देय दण्डों का उसमें समावेश है और कोई भी छोटा दण्ड बिना अपवाद के दिया जा सकता है ।
(10) निष्कर्ष की प्रति क्यों दी जानी चाहिये- जब जाँच का प्रथम स्तर डी०आई०जी० से अन्य किसी अधिकारी द्वारा की जाय तो उसे अपना निष्कर्ष देना है, भेजे गये तत्वों पर डी०आई०जी० का अपना स्वयं का निष्कर्ष देना है पर उन्हें आरोपित अधिकारी का बयान लेना होगा, और दण्ड दिये जाने के विरुद्ध कारण बताओ नोटिस देना होगा उन्हें पुलिस अधीक्षक की संस्तुति पर समुचित दण्ड देने के लिए सुविचार करना होगा, इसी हेतु पैरा 490 (8) (बी) के अनुसार, जैसा कि 1957 ए०एल० जे० 62 में आया है, सम्बन्धित अधिकारी की जाँच अधिकारी के निष्कर्ष की प्रति देना चाहिये।
(11) कब पृथक निष्कर्ष का होना आवश्यक है - पहले रामनाथ सिंह बनाम राज्य, 4 में उच्च न्यायालय का यह मत था कि जब जाँच अधिकारी ने केवल वेतनमान में दो स्तर के घटाने के दण्ड की संस्तुति दी तो पुलिस अधीक्षक को अधिकारिता नहीं रही कि पदच्युति अथवा पद से हटाये जाने का दण्ड देते, पर बाद में विशेष अपील सं० 175/64, राज्य बनाम रामनाथ, निर्णीत दिनांक 23-10-64 में यह निर्णय हुआ कि संविधान के अनुच्छेद 311 के अनुसार जब पुलिस अधीक्षक ने कारण बताओ नोटिस देकर अवसर दिया तो सेवक को पदच्युत करने का अधिकार उन्हें है, इसके लिये उन्हें अपना पृथक निष्कर्ष देना होगा (इसके लिये पैरा 471 से सम्बन्धित टिप्पणी भी देखें)।
जहाँ पर अनुशासनिक अधिकारी, आरोप पर जाँच अधिकारी द्वारा पहुँचे निष्कर्ष से सहमत न हों, वहाँ पर अपराधी अधिकारी को कारण बताओ नोटिस के साथ उन्हें (प्रस्तावित दण्ड में) अपना अंतिम निष्कर्ष देना चाहिये पर इसकी बाध्यता उस हालत में नहीं है जब वे जाँच अधिकारी के संस्तुति से सहमत हों ।
(12) प्रक्रिया से विचलन और अनुपस्थिति में कार्यवाही - पुलिस कर्मचारी की अनुपस्थिति में उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही किये जा सकने पर यह पैरा बहुत स्पष्ट नहीं है, जाँच कर्ता अधिकारी के लिए अनुपस्थिति में एकतरफा कार्यवाही करना कठिनाई से परे नहीं है, शा०आ०सं० 1453/आठ 105-93, दिनांक 11-8-64 में शासन ने आरोपित पक्ष पर आरोप-पत्र अपील करने के लिये निम्न सुझाव दिये हैं-
(1) आरोपित पक्ष के जाने हुए पते पर पावती सूचना (Acknowledgment) के साथ रजिस्ट्री पत्र भेजा जाये।
(2) उसके स्थायी पता या थाने से सम्पर्क करके पता करने का प्रयास करें।
(3) और आवश्यक कदम जो आरोपित पक्ष से सम्पर्क करने के लिये जरूरी हो सके।
आरोप-पत्र में पर्याप्त समय देकर यह निदेश दे कि आरोपित पक्ष समय के अन्दर जाकर उत्तर दाखिल करे वरना उसके विरुद्ध अनुपस्थिति में कार्यवाही की जायेगी, यदि आरोप-पत्र बिना तामील हुए वापस आ गया और आरोपित पक्ष भी उपस्थित नहीं हुआ तो सुनवाई अधिकारी उसकी अनुपस्थिति में किये जाने वाली कार्यवाही के पूर्व अपने द्वारा किये गये सभी प्रयत्नों का उल्लेख करेंगे, जब अभियुक्त कर्मचारी अदालती सुनवाई में अनुपस्थित हो जाता है और उसके विरुद्ध धारा 299 जा०फौ० की कार्यवाही, अफसर घोषित करने की, पूर्ण हो जाती है, तो विभाग भी उस पर लगे अन्य आरोपों में कार्यवाही कर सकता है।
अनुशासनिक अधिकारी को इस कारण का उल्लेख करना चाहिये कि क्यों नियत प्रक्रिया का प्रतिपालन व्यवहार्य नहीं है, उन्हें इस बात पर भी संतुष्ट होना है कि उनकी निजी तुष्टि नहीं, बल्कि अभिलेख के तथ्य से लक्ष्य की तुष्टि हो रही है कि नियमित प्रक्रिया अपनाना संभव नहीं है, जिससे कि अपराधी अपील सुनने के अधिकारी के समक्ष उक्त कारण पर आक्षेप न कर सके, मकसूदन पाठक बनाम सुरक्षा अधिकारों में कुछ ऐसे कारण दिये हैं जैसे, कि आरोपित व्यक्ति भाग गया है, कि उत्तम प्रयास के बाद भी नोटिस का तामील होना संभव नहीं हुआ, कि आरोपित व्यक्ति का उपस्थित होना संभव न हो सके, आदि।
(13) वकील की व्यवस्था के लिये - नियमों के अभाव में कर्मचारी विभागीय कार्यवाही में वकील के सहायता की याचना नहीं कर सकता। सी०सी०ए० नियम, जो पुलिस अराजपत्रित कर्मचारियों अधिकारियों पर लागू नहीं है, में व्यवस्था है कि यदि सबूत पक्ष वकील की सहायता लेगा तो विपक्षी भी अपने लिये वकील की सेवा हेतु कह सकता है।
(14) जब प्रदत्त दण्ड मान्य नहीं हुए- कर्मचारी के निलम्बन अवस्था में, बिना अनुशासनिक कार्यवाही किये, पारित सेवा समाप्ति का आदेश निहिर कुमार बनाम राज्य में मान्य नहीं हुआ।
विभागीय कार्यवाही में गुजरने वाले गवाहान के उस बयान की नकल, जो विवेचना के दौरान लिखी गई थी, का न दिया जाना अनुचित ठहराया गया और उसके अभाव में राज्य बनाम भगत राम में यह निष्कर्ष आया कि सरकारी सेवक उसके अभाव में प्रभावी जिरह नहीं कर सका, यही मत सहदेव सिंह बनाम पुलिस अधीक्षक में माना गया व दण्ड अपास्त हुआ।
- जब सरकारी धन के दुर्विनियोग का मामला साक्ष्य के अभाव में न्यायालय से छूट गया तो उसी आरोप पर विभागीय कार्यवाही नहीं हो सकती, इसे गोविंद राम बनाम राज्य में निर्णीत किया, बिना कारण का उल्लेख किये जब जाँच अधिकारी ने गवाहों के द्वारा लिये गये बयान को स्वीकार किया तो इसे 1964 ए०एल० जे० 576 में पुलिस विनियम के अनिवार्य नियम का विचलन माना गया।
(15) कब प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा - असम्मानपूर्ण या रुक्ष व्यवहार भी जो अधीनस्थ अधिकारी का वरिष्ठ अधिकारी के प्रति है उसे कर्तव्य पालन में माना गया है।
जाँच अधिकारी द्वारा उस बाहरी गवाह को सफाई पक्ष से न बुलाने पर जिसका नाम पहले नहीं बताया गया और उसके साक्ष्य के महत्व का निर्धारण नहीं हो सका, यह न दिखा सकने पर कि इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, चंदन सिंह बनाम भारत सरकार में जाँच उचित ठहराया गया।
एक उपनिरीक्षक के प्रति किया गया अभद्र व्यवहार के आरोप में अभद्र व्यवहार का विवरण नहीं था जिसे अस्पष्ट नहीं माना गया, क्योंकि सिपाही को आरोप ज्ञात था व शहादत में इसका विवरण आया था, 1960 ए०एल० जे० 310 में यह माना गया कि सिपाही पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं रहा।
विभागीय जाँच में पुलिस अधीक्षक ने तीन सिपाहियों के पहले दिये बयान पर भरोसा करके, जिससे वे बाद में मुकर गये थे, पदच्युति का आदेश पारित किया, के०एल० शिंडे बनाम राज्य में उक्त आदेश को सही माना गया, क्योंकि साक्ष्य एक्ट के नियम ऐसी कार्यवाही पर सख्ती से लागू नहीं होते ।
जब अपराधी ने गवाहान से स्वयं जिरह किया, विस्तार से सफाई दिया और मामले में बहस किया तो वह अपने विरुद्ध आये आरोप से और सभी सफाई के दृष्टिकोण से पूर्ण अवगत था तो जाँच अधिकारी द्वारा नियमानुसार कर्मचारी से सवालात का न पूछा जाना, किसी प्रतिकूल प्रभाव के अभाव में, दोषपूर्ण नहीं माना गया
(16) उच्च न्यायालय द्वारा प्रदत्त व्याख्या- पुलिस विनियम केवल प्रशासनिक निर्देश नहीं हैं और इन्हें कानून के स्तर की तरह प्रशासनिक प्रावधान मानना चाहिये। जहाँ इनके अनिवार्य प्रावधान की अवहेलना हुई हो वहाँ उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकती है।
पदोन्नति के पूर्व के दुश्चरित्र लेख मार्जित (Condoned) हो गये रहते हैं और पदोन्नति के बाद, उससे पूर्व दिये गये दुश्चरित्र लेख में दण्ड बढ़ाये जाने की कार्यवाही नहीं चल सकेगी ।
दक्षता रोक की अवधि के पहले की प्रतिकूल गोपनीय रिपोर्ट कर्मचारी के विरुद्ध जाँच में प्रयुक्त नहीं होगी, क्योंकि दक्षता अवरोध पार करना उस तिथि तक के लिये समाशोधन है (उपरोक्त)।
भारत सरकार बनाम पौहारी सटन में यह निर्णय हुआ है कि अभद्र व्यवहार के आरोप में सेवा से हटाने के मामले में दीवानी अदालत अपने स्वयं के निर्णय पर आने के लिए मुक्त है कि क्या सिद्ध तथ्यों से अभद्र व्यवहार बनता है।
अदालत, अधिकारी द्वारा प्राप्त तथ्य पर सदशयता से विवेक का उपयोग किया गया है। इसे देखने तक ही सीमित शक्ति रखती है, 8 दिल्ली में यह निर्णय हुआ है कि उपरोक्त निर्णय के लिये प्राप्त तथ्य पर्याप्त थे अथवा नहीं, यह देखना न्यायिक परिधि में नहीं है।
एक सिपाही को भ्रष्टाचार के आरोप में सजा मिलने पर वह विभाग से सेवा से पदच्युत किया गया, दण्ड के विरुद्ध अपील स्वीकृत हो गई, मगर पुनः वाद की सुनवाई का आदेश हुआ जिसमें उसे पुनः दण्ड मिला व अपील में सजा बहाल रही, बसुदेव राव बनाम राज्य में यह निर्णय हुआ कि पहले और दूसरे दण्ड के बीच की अवधि के लिये वह किसी जीवन वृत्ति के पाने का अधिकारी नहीं है, क्योंकि पूर्व दण्ड प्रभावी माना गया, (इस विषय पर अपने उच्च न्यायालय का अभी कोई निर्णय प्राप्त नहीं है)।
पदच्युति का आदेश उसके तामील की तिथि से प्रभावित होगा व दीवानी का वाद वहाँ चलेगा जहाँ उक्त आदेश तामील हुआ इसलिए स्थान तामीला वादी को सिद्ध करना है, आदेश का तामील करना प्रतिवादी का कार्य है जो डाकखाने के माध्यम से हुआ और सेक्रेटरी गृह विभाग बनाम बंशीधस्से में डाकघर को प्रतिवादी का प्रतिनिधि माना गया।
सोमनाथ साहू बनाम राज्य में यह निदेश हुआ कि पदच्युति का आदेश अपील के आदेश में विलीन हो जाता है और केवल अपील में दिया निर्णय ही शेष रहता है जो लागू होगा।
देवराज शर्मा बनाम राज्य ने यह माना कि नियमों के नीचे दिया गया नोट भी कानून का बल रखता है, क्योंकि नियम में आई रिक्ति को वह स्पष्ट करता है जो नियम में अवलक्षित होता है।
जन सेवा के सम्बन्ध में अनुच्छेद 309 में जहाँ प्रावधान नहीं है वहाँ राजेन्द्र नारायन बनाम राज् में यह आया है कि राज्य सरकार शासन सम्बन्धी अधिकार में उसे नियमित करने में सक्षम है।
पुलिस उपाधीक्षक द्वारा विभागीय कार्यवाही किए जाने के अधिकार सीमा का प्रश्न यदि किसी अधीनस्थ अधिकारी के समक्ष नहीं उठाया गया है तो वह रिट याचिका के स्तर पर नहीं उठाया जा सकेगा।
ड्यूटी पर न रहने के समय शराब पीने के बाद कुछ और न करने पर, कर्मचारी वे आचरण को दुराचरण नहीं माना गया तथा कर्मचारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही में पारित सेवाच्युति आदेश को रद्द कर दिया गया।
ऐसा नहीं है कि बिना विभाग से अपील आदि में निर्णय लिये दीवानी में दावा नहीं प्रस्तुत किया जा सकता। पदच्युति का आदेश पारित होने के दिन से ही दावा का कारण हो जाता है। विभागीय निर्णय प्राप्त करने के बाद दावा दायर करते समय तक कालावधि (लिमिटेशन) बीत जाने के कारण धारा 4 उ० प्र० लोक सेवा अधिकरण (ट्राईव्यूनल) का लाभ नहीं दिया गया है
(1) प्रारम्भिक जाँच के पश्चात् आरोपों का सार आरोप-पत्र में अभिलिखित किया जाना चाहिये, जो यथासम्भव यथार्थ हो। आरोप आरोपित अधिकारी को पढ़कर सुनाये और समझाये जाने चाहिये तथा आरोप-पत्र की एक प्रति उसे दी जानी चाहिये।
(2) तत्पश्चात् आरोपित अधिकारी से यह पूछा जाना चाहिये कि वह अपने विरुद्ध विरचित आरोप को स्वीकार करता है या उससे इन्कार करता है। उसका उत्तर, जो मौखिक या लिखित हो सकता है, पुलिस अधीक्षक को उतने समय के भीतर प्रस्तुत किया जाना चाहिये जितना पुलिस अधीक्षक युक्तियुक्त समझे, और लिखित उत्तर की दशा में वह 48 घण्टे से कम न होगा। इस प्रक्रम पर आरोपित अधिकारी से किसी विस्तृत स्पष्टीकरण की अपेक्षा नहीं है। यदि अधिकारी आरोप स्वीकार कर ले तो उसके विरुद्ध कोई अभियोजन साक्ष्य अभिलिखित करना आवश्यक न होगा। किन्तु यदि वह आरोप से इन्कार करता है तो उसके विरुद्ध उतना साक्ष्य अभिलिखित किया जाना चाहिये जितना पुलिस अधीक्षक पुलिस ऐक्ट की धारा 7 के अधीन आरोप को साबित करने के लिये आवश्यक समझे। साक्ष्य या तो मौखिक होगा या दस्तावेजी, और उसका आरोप के लिये तात्विक होना आवश्यक है। यदि मौखिक हो, तो -
(क) वह प्रत्यक्ष होना चाहिये, अर्थात् यदि वह ऐसे तथ्य के बारे में हो जो देखा जा सकता हो या अन्यथा जाना जा सकता हो, तो उस व्यक्ति द्वारा दिया जाना चाहिये जो यह कहे कि उसने उसे देखा या जाना।
(ख) वह पुलिस अधीक्षक द्वारा आरोपित पक्ष की उपस्थिति में अभिलिखित किया जाना चाहिये, जिसे साक्षियों से जिरह करने की अनुमति दी जावेगी। आरोपित पक्ष के आचरण के बारे में प्रारम्भिक जाँच में राजपत्रित पुलिस अधिकारियों द्वारा अथवा किसी मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलिखित कथन ग्राह्य होंगे और उन्हें पुनः अभिलिखित करना आवश्यक न होगा, यदि वे आरोपित पक्ष की उपस्थिति में साक्षियों को पढ़कर सुना दिये जायें और उनके द्वारा स्वीकार कर लिये जायें तथा आरोपित पक्ष को साक्षियों से जिरह करने का अवसर दे दिया जाये।
(3) (क) जब किसी आरोप के समर्थन में कोई दस्तावेज अवलम्ब में लिया जाये, तब उन्हें प्रदर्श के रूप में साक्ष्य में लाया जावेगा, और आरोपित अधिकारी को अपनी सफाई देने के लिये बुलाये जाने से पूर्व ऐसे दस्तावेजों का निरीक्षण करने की अनुमति दी जावेगी तथा उनकी प्रतियाँ निःशुल्क दी जावेंगी। जिन दस्तावेजों की अन्तर्वस्तु उपर्युक्त नियम 2 (क) और (ख) के अधीन साक्ष्य में अग्राह्य हो, उन्हें प्रदर्श के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जावेगा। उदाहरणार्थ, अधीनस्थ अधिकारियों को दिये गये साक्षियों के कथन तथा ऐसे अधिकारियों के निष्कर्षों और अभिमतों की रिपोर्टें साक्ष्य नहीं हैं, और ऐसे कथन तथा निष्कर्ष प्रदर्शित नहीं किये जावेंगे। किन्तु अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा लिये गये कथनों का प्रयोग पुलिस अधीक्षक द्वारा साक्षियों की सत्यता की परीक्षा के लिये किया जा सकता है, और ऐसा करते समय कथनों की प्रतियाँ नमूने के रूप में रखी जावेंगी।
यदि कोई सरकारी सेवक उपर्युक्त दस्तावेजों से भिन्न किसी दस्तावेज या दस्तावेजों की प्रतियाँ चाहे और जाँच करने वाला अधिकारी इन दस्तावेजों को सुसंगत समझे, तो प्रतिलिपि के व्यय का भुगतान करने पर उसे प्रतियाँ दी जा सकती हैं। यदि जाँच करने वाला अधिकारी आरोपित पक्ष द्वारा माँगे गये दस्तावेजों को असंगत अथवा कार्यवाही से असम्बद्ध समझे, तो वह प्रतियाँ देने से इन्कार कर सकता है और ऐसे इन्कार के कारण लिखित रूप में अभिलिखित करेगा।
(ख) लोक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियों को साबित करना आवश्यक नहीं है।
(ग) इस तथ्य के बारे में साक्ष्य कि कोई पुलिस अधिकारी अपने साधनों से अधिक व्यय करके रहता है, इस मत के लिये प्रबल उपधारणा माना जावेगा कि वह अवैध परितोषण प्राप्त करता है। ऐसे मामलों में सामान्य ख्याति का साक्ष्य, चाहे वह कड़ाई से प्रत्यक्ष न हो, ग्राह्य किया जाना चाहिये।
(घ) औपचारिक प्रकृति के किसी विशेषज्ञ का दस्तावेजी साक्ष्य, दस्तावेज को साबित करने के लिये इन साक्षियों को बुलाये बिना, ग्राह्य किया जा सकता है। इसी प्रकार अभियुक्त द्वारा स्वीकृत नमूनों को साबित करना आवश्यक नहीं है।
नोट - यह पैरा अधिसूचना संख्या 7857/आठ-अ-37-65, दिनांक 21 फरवरी, 1969 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया।
(4) यदि अभियोजन साक्ष्य अभिलिखित करने के पश्चात् पुलिस अधीक्षक आरोप में कोई वृद्धि या परिवर्तन करना आवश्यक समझे, तो वह आरोपित अधिकारी को संशोधित आरोप-पत्र की प्रति देगा और संशोधित आरोप के निहितार्थ उसे समझायेगा। तत्पश्चात् आरोपित अधिकारी को उन बिन्दुओं पर अभियोजन साक्षियों से पुनः जिरह करने का अवसर दिया जावेगा जो आरोप के संशोधन के कारण सुसंगत हो गये हों।
(5) आरोपित अधिकारी को अपना सफाई का कथन उतने समय के भीतर, जो सात दिन से कम न हो और जितना पुलिस अधीक्षक युक्तियुक्त समझे, प्रस्तुत करने के लिये आमन्त्रित किया जाना चाहिये। इस प्रक्रम पर उससे यह पूछा जाना चाहिये कि क्या वह सफाई में कोई साक्षी प्रस्तुत करना अथवा कोई दस्तावेजी साक्ष्य दाखिल करना चाहता है। यदि हाँ, तो उसे अपने लिखित सफाई कथन के साथ साक्षियों के नाम तथा दस्तावेज बताने चाहिये और यह भी बताना चाहिये कि वह प्रत्येक साक्षी और दस्तावेज से क्या साबित करने की आशा रखता है। यदि पुलिस अधीक्षक यह समझे कि आरोपित अधिकारी जिस साक्षी या दस्तावेज को अपनी सफाई में प्रस्तुत करना चाहता है उसका साक्ष्य मामले के लिये तात्विक होने की सम्भावना नहीं है, तो वह ऐसे साक्षी को बुलाने से अथवा ऐसे दस्तावेज को साक्ष्य में प्रस्तुत करने की अनुमति देने से इन्कार कर सकता है, किन्तु ऐसी दशा में उसे ऐसे इन्कार के कारण संक्षेप में अभिलिखित करने चाहिये। तत्पश्चात् वह या तो शेष साक्षियों को स्वयं बुलावेगा अथवा आरोपित अधिकारी को यह स्पष्ट कर देगा कि उसे अपना लिखित कथन या सफाई के साक्षी प्रस्तुत करने में तंग करने वाले विलम्ब द्वारा कार्यवाही को लम्बा खींचने की अनुमति नहीं दी जावेगी, और यदि वह नियत तिथि पर बिना पर्याप्त कारण के उन्हें प्रस्तुत न कर सके तो कार्यवाही उसके बिना ही आगे चलेगी।
(6) लिखित सफाई स्पष्टीकरण प्राप्त होने पर पुलिस अधीक्षक द्वारा आरोपित अधिकारी का मौखिक कथन भी अभिलिखित किया जाना चाहिये, जिससे लिखित स्पष्टीकरण की संपुष्टि हो सके अथवा वह किसी ऐसे बिन्दु को स्पष्ट कर सके जिसे वह आवश्यक समझे।
(7) तत्पश्चात् सफाई के साक्षियों के कथन पुलिस अधीक्षक द्वारा अभिलिखित किये जाने चाहिये, जो उनसे ऐसे किसी बिन्दु पर जिरह कर सकता है जिसे वह आवश्यक समझे।
(8) पुलिस अधीक्षक अपना निष्कर्ष लिखेगा। निष्कर्ष में उसे कड़ाई से आरोप की विषय-वस्तु तथा अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य तक ही सीमित रहना चाहिये और आरोपित अधिकारी द्वारा उठाये गये प्रत्येक बिन्दु पर विचार करना चाहिये। तथ्य के प्रश्न पर तथ्यात्मक निष्कर्ष पर पहुँचने पर, यदि वह आरोप को सिद्ध पाये, तो यह विनिश्चय करने से पूर्व कि प्रथम दृष्टया कौन सा दण्ड, यदि कोई हो, उपयुक्त होगा, उसे आरोपित व्यक्ति के चरित्र तथा पूर्व आचरण पर विचार करना चाहिये। यदि पुलिस अधीक्षक यह समझे कि पदच्युति, हटाया जाना अथवा पदावनति उपयुक्त दण्ड है, तो उसे उन सभी मामलों में जिनमें उसे ऐसे दण्ड अधिरोपित करने की शक्ति है, अपने निष्कर्ष की प्रति आरोपित अधिकारी को देनी चाहिये और उससे युक्तियुक्त समय के भीतर (जो एक सप्ताह से कम न हो) ऐसे दण्डों के अधिरोपण के विरुद्ध कारण दर्शित करने को कहना चाहिये। आरोपित अधिकारी को यह स्पष्ट कर दिया जाना चाहिये कि कोई दण्डादेश पारित किये जाने से पूर्व इस सम्बन्ध में उसके द्वारा किये गये किसी अभ्यावेदन पर विचार किया जावेगा।
(9) उन सभी मामलों में जिनमें पुलिस अधीक्षक निरीक्षकों या उपनिरीक्षकों को पदच्युत करने या हटाने की प्रस्थापना करता है, वह इन मामलों को जिला मजिस्ट्रेट के मार्फत अन्तिम आदेश के लिये पुलिस उप महानिरीक्षक को अग्रसारित करेगा।
(10) जब उप महानिरीक्षक यह समझे कि उपयुक्त दण्ड पदच्युति, हटाया जाना अथवा पदावनति है, तब वह पुलिस अधीक्षक के निष्कर्ष की प्रति आरोपित अधिकारी को दिलवायेगा और साथ ही उससे इन दण्डों के अधिरोपण के विरुद्ध कारण दर्शित करने को कहेगा।
आरोपित अधिकारी से यह अपेक्षित होगा कि वह अपना लिखित अभ्यावेदन, यदि कोई हो, उतने समय के भीतर प्रस्तुत करे जो एक सप्ताह से कम न हो और जितना उप महानिरीक्षक युक्तियुक्त समझे। सभी मामलों में उप महानिरीक्षक को अपना निष्कर्ष और आदेश लिखने से पूर्व आरोपित अधिकारी का मौखिक कथन अभिलिखित करना चाहिये।
(11) किसी भी ऐसे मामले में जिसमें पुलिस अधीक्षक यह समझे कि विशेष परिस्थितियों के कारण इन नियमों से हटना न्यायोचित है, वह अपने विनिश्चय के कारण अभिलिखित करेगा, और अधीक्षक का यह कर्तव्य होगा कि वह अपने निष्कर्ष में यह दर्शाये कि सामान्य प्रक्रिया से हटने का आरोपित अधिकारी पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है।
(12) इन नियमों के अधीन संस्थित किसी कार्यवाही में अभियुक्त का प्रतिनिधित्व अभिभाषक (वकील) द्वारा नहीं किया जावेगा।
(13) इन नियमों के अधीन पुलिस अधीक्षक द्वारा प्रयोग किये जाने वाले सभी या कोई कर्तव्य उससे वरिष्ठ अधिकारी द्वारा भी प्रयोग किये जा सकते हैं।
(14) पुलिस महानिरीक्षक अथवा पुलिस उप महानिरीक्षक, लेखबद्ध किये जाने वाले कारणों से, या तो स्वप्रेरणा से अथवा पुलिस ऐक्ट की धारा 7 के अधीन विभागीय विचारण करने वाले अधिकारी के अनुरोध पर, किसी मामले को तत्स्थानी पंक्ति के किसी अन्य अधिकारी को अन्तरित कर सकता है।
नोट
(1) सामान्य नियम - पुलिस विनियमावली मात्र प्रशासनिक निदेश नहीं है और उसे लिखित विधि के रूप में माना जाना है। उसके आदेशात्मक उपबन्धों की अवहेलना उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप को आमन्त्रित कर सकती है।
नैसर्गिक न्याय का सिद्धान्त यह अपेक्षा करता है कि अपचारी कर्मचारी को स्पष्ट रूप से (1) आरोप, (2) आरोप को स्थापित करने वाला कथन, (3) आरोप को साबित करने के लिये अपेक्षित साक्ष्य की जानकारी दी जाये, तथा (4) साक्षी का कथन उसकी उपस्थिति में लिया जाये और उसे साक्षियों से जिरह करने का अवसर दिया जाये।
आरोप पर कारण बताओ नोटिस की तामील में डेढ़ वर्ष का विलम्ब पर्याप्त अवसर दिये जाने की दृष्टि से घातक माना गया है, और इसलिये सन्तोषजनक उत्तर की अपेक्षा करना असम्भव है।
विचार करने का अर्थ अभ्यावेदन के तथ्यों पर विचार करना है। यदि अभ्यावेदन के तथ्यों पर विचार नहीं किया गया और पारित आदेश से यह प्रकट होता हो कि सम्यक् प्रक्रिया का प्रयोग नहीं किया गया, तो उसे विचार किया गया नहीं माना जावेगा।
यह सुस्थापित है कि जब तक किसी कार्य का किया जाना या लोप किसी सेवा नियम अथवा प्रमाणित स्थायी आदेश में परिभाषित दुराचरण की कोटि में न आता हो, तब तक दुराचरण की जाँच और रिपोर्ट करके कर्मचारी को दण्डित नहीं किया जा सकता। दण्डनीय दुराचरण के आधारों का उल्लेख होना ही चाहिये।
शासकीय निदेशों को सेवा नियमों के साथ पढ़ा जाना चाहिये। विभागीय अधिकारी उनकी अवहेलना नहीं कर सकते।
प्रशासनिक निदेश सेवा नियम नहीं माने जाते, किन्तु यदि अधिकारी उन्हें कुछ कर्मचारियों पर लागू करें और अन्य को उस निदेश से अपवर्जित कर दें, तो कर्मचारी को अपने सम्बन्ध में उन्हें प्रवृत्त कराने का अधिकार बना रहता है।
सेवामुक्ति के आदेश के विरुद्ध अपील खारिज करते हुये और उसे विधिमान्य तथा नियमों के अनुरूप ठहराते हुये न्यायालय ने कहा कि अपील विनिश्चित करने वाले प्राधिकारी को नियमों में दिये गये सभी तथ्यों पर सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिये, जिनमें (1) क्या सम्यक् प्रक्रिया का पालन हुआ है, (2) क्या विनिश्चय पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से समर्थित है, तथा (3) क्या अधिरोपित दण्ड उपयुक्त और उचित है, सम्मिलित हैं, और पारित आदेश से यह प्रतिबिम्बित होना चाहिये कि इन बातों पर विचार किया गया है।
किसी साक्ष्य देने वाले साक्षी को जाँच अधिकारी नियुक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे नैसर्गिक न्याय के नियमों का उल्लंघन होता है।
(2) नियम का भंग - नियम का भंग दो प्रकार का हो सकता है : एक मूलभूत नियम का, जैसे प्राधिकार के बिना सेवा से पदच्युति, और दूसरा प्रक्रिया सम्बन्धी नियम का। प्रथम दशा में आदेश स्वयं शून्य और निष्प्रभावी होता है; पदच्युति सम्बन्धी परन्तुक या शर्त स्वयं विधि का बल रखती है, जो अन्य नियमों से पूर्णतया भिन्न स्तर पर है, जबकि अन्य नियम अनेक प्रकार के होते हैं और समय-समय पर बदले जा सकते हैं। कानूनी रक्षा कवच का अत्यन्त सावधानी से पालन होना चाहिये और जो अधिकारी पदच्युति के आदेश देने का कानून अधिकारी नहीं है उसका आदेश अवैध नींव पर है, जहाँ पर प्रक्रिया सम्बन्धित नियम को भंग किया गया है, जैसे विभागीय कार्यवाही के पहले नियमानुसार जाँच नहीं हुई, जिसमें कानून और पवित्रता का आश्वासन है कि दण्ड दुर्भावना या ऐच्छिक क्रिया से नहीं, बल्कि नियमों के आधार पर होगा, वहाँ दण्ड का आदेश टिक नहीं सकता, मगर इनमें कोई विशेष आयातित संविदा के शर्त नहीं है कि प्रक्रिया सम्बन्धी नियमों का अनादर करके पदच्युति करने के फलस्वरूप राज्य के विरुद्ध सदोष पदच्युति के लिए कोई कार्यवाही की जा सके यह अनुचित होगा कि अधिकारी जिसे अनुशासनिक मामलों में अनुशासनिक कार्यवाही करने का अधिकार है, उसे अदालत के आदेशों के भय से अपने उचित अधिकार के प्रयोग से रोका जाय।
(3) कार्यवाही अधिकार सीमा - किसी पुलिस अधिकारी पर धारा 7 में विभागीय कार्यवाही करने के लिए न्यायिक जांच के निष्कर्ष पर कि उक्त अधिकारी के विरुद्ध प्रथम दृष्टया अपराध का बनना पाया जाता है, निर्भर नहीं करता। धारा 7 के विभागीय कार्यवाही प्रारम्भ करने के लिये मात्र आवश्यकता है कि न्यायिक जाँच को समाप्त हो लेने दिया जाय।
जब फौजदारी विधि में कर्मचारी का अभियोजन हो रहा हो तो विभागीय कार्यवाही को स्थगित रखने की बाध्यता नहीं है, मगर ऐसा करना औचित्य के हित में अच्छा है। मगर फौजदारी अदालत के निर्णय को स्वीकार करना आवश्यक नहीं है।
न्यायालय से दण्डित होने के फलस्वरूप जब कर्मचारी को सेवाच्युत कर दिया गया और वह अपील से दण्ड मुक्त हो गया तो विभाग सेवक को पुनः सेवा में स्थित करने के बाद, भिन्न आरोप पर आगे जाँच कार्यवाही कर सकता है, मगर इस स्थिति में सरकारी कर्मचारी निलम्बन की अवस्था में ही माना जायेगा।
यदि दीवानी अदालत ने विभागीय कार्यवाही को नैसर्गिक न्याय के नियम का उल्लंघन करने के कारण तकनीकी आधार पर रद्द कर दिया है और सरकारी कर्मचारी पुनः पदस्थ कर दिया है तो यह पूर्णरूपेण दोषमुक्त रूप से नहीं माना जायेगा तथा उन्हीं आधार पर कर्मचारी के विरुद्ध दूसरी जाँच करने पर कोई रोक न होगा।
याची को जाँच रिपोर्ट दिए बिना याची का निलम्बन अवैध ठहराया गया ।
विभागीय जाँच एवं क्रिमनल प्रोसीडिग्स विभागीय जाँच को इसलिए नहीं रोका जा सकता कि अपचारी कर्मचारी के विरुद्ध किसी न्यायालय में क्रिमनल प्रोसिडिंग्स चल रही है। याची के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की विभिन्न धाराओं के अन्तर्गत न्यायालय में वाद चल रहा था। विभागीय जाँच अपचारी कर्मचारी के विरुद्ध दुराचार के सम्बन्ध में की जा रही थी। अभिनिर्णीत हुआ कि उक्त जाँच एवं वाद साथ ही साथ चल सकते हैं।
माननीय उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्णीत किया कि विभाग द्वारा नियुति जाँच अधिकारी द्वारा याची के विरुद्ध लगाए गए आरोप सही पाये गए। कमेटी द्वारा याची के प्रिमेच्योर रिटायरमेन्ट सम्बन्धी संस्तुति भी ठीक पायी गयी है। इस आधार पर माननीय उच्च न्यायालय ने याची द्वारा दायर की गयी अपील को खारिज कर दिया।
अनुशासनिक कार्यवाही - अनुशासनिक कार्यवाही एक प्रशासकीय विधि हैं। इसे अर्द्ध न्यायिक कार्यवाही माना गया है। अर्द्ध न्यायिक कार्यवाही के अन्तर्गत नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 में दिए गए मूलभूत सिद्धान्तों का अनिवार्य रूप से पालन किया जाना है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय ए०के० क्रेपक बनाम यूनियन आफ इण्डिया में व्यवस्था दी है कि प्रशासनिक शक्ति तथा न्यायिक कल्पश्क्तियों में विभाजन रेखा समाप्त हो चुकी है। अतः प्रशासनिक अधिकारी विधि प्रदत्त प्रावधानों का अक्षरशः पालन करें और कोई भी कार्य अविवेकपूर्ण अथवा द्वेष भाव ढंग से न करें। इसी श्रृंखला में भी उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय स्टेट आफ उड़ीसा बनाम वीणार्पण में व्यवस्टया दी है कि कोई प्रशासनिक कृत्य जिनसे व्यक्तियों पर प्रभाव पड़ता है नैसर्गिक न्याय के नियमों के अनुसार होना चाहिए ।।
पुलिस द्वारा बन्दी बनाये गए तथा पुलिस अभिरक्षा में रखे जाने के सम्बन्ध में माननीय उच्चतम न्यायालय ने अनेकों स्पष्ट निर्देश दिए हैं, जिनका उल्लंघन किए जाने पर विधि समस्त न्यायिक कार्यवाही के अतिरिक्त बृहद प्रकृति की विभागीय कार्यवाही की जा सकती है ।
याची के विरुद्ध 22-12-1987 से अनुशासनिक कार्यवाही चल रही थी। इस बीच कई जाँच अधिकारी आये, परन्तु जांच पूर्ण नहीं हुयी। अनुशासनिक कार्यवाही लम्बित रहने के आधार पर याची की पदोन्नति नहीं की गयी। यह अभिनिर्णीत हुआ कि विलम्ब हेतु याची दोषी नहीं है, अतः वह पदोन्नति का पात्र है
याची की तैनाती पुलिस विभाग में कान्सटेबिल के पद पर हुयी। याची की सेवायें इस आधार पर समाप्त कर दी गयी कि उसने अपने हाईस्कूल प्रमाण पत्र में अपनी जन्म तिथि बदल दी तथा उसने जाली दस्तावेज प्रस्तुत किये। अभिनिर्णीत हुआ कि याची की सेवायें यद्यपि उसे सुनवाई का अवसर प्रदान किये बिना समाप्त की गयी फिर भी सेवा समाप्ति उचित ठहराई गई
किसी राज्य कर्मचारी द्वारा अवैध रूप से प्राप्त किया गया धन क्रिमिनल मिसकन्डक्ट में आता है। वह धन जिसका वह हिसाब न दे सके कि वह कहाँ से प्राप्त हुआ है इस श्रेणी में आता है
पुलिस कान्सटेबिल 93 दिनों तक अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित रहा। निर्णीत हुआ कि ड्यूटी से बिना कारण एवं अवकाश प्रार्थना पत्र दिए बिना अनुपस्थित रहना अनुशासनहीन है। जाँच उपरान्त सेवायें समाप्त की जाना उचित ठहरायी गयी।
अवैध पुलिस अभिरक्षा के अन्तर्गत उत्पीड़न करना, बन्दी को चोटें पहुंचाना अथवा मृत्यु कारित करना गम्भीर अपराध है। यह पुलिस विभाग की छवि के विरुद्ध है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय तथा अन्य निर्णयों में इस प्रकार की घटनाओं को निन्दनीय तथा सभ्य समाज के आदेशों के प्रतिकूल होने विषयक मत व्यक्त किए हैं तथा दोषी पुलिस कर्मी को मृतक के परिवार को अनुतोष प्रदान करने के निर्देश दिए हैं।
(4) आरोप सुव्यक्त हो- आरोप पूरे विशिष्टता और सूक्ष्मता के साथ होना चाहिये, स्वाभाविक न्याय के लिये (1) व्यक्ति को आरोप की प्रकृति मालूम होना चाहिये, (2) अपना कथन बताने का अवसर मिलना चाहिये, और (3) अधिकरण का अच्छे श्रद्धा के साथ कार्य करना चाहिये। अनुशासनिक कार्यवाही का एक अर्थ न्यायिक रूप होता है जिसमें साक्ष्य के आधार पर और निश्चिता की मात्रा में निष्कर्ष होना चाहिये, पारित आदेश में इस कारण हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता कि साक्ष्य के जिस आधार पर दण्ड दिया है, वह अदालत में दण्ड देने के लिए अपर्याप्त था, मगर विभागीय कार्यवाही में पारित आदेश अपने में अन्तर्विष्ट एवं मुखर होना चाहिये। राज्य बनाम रतन सिंह में यह निर्णय हुआ कि विभागीय जाँच में सुनी हुई शहादत भी मान्य हो सकती है। एस०आर० गोविन्दन के मामले में यह निर्णय दिया गया कि साक्ष्य कानून के सिद्धान्त विभागीय कार्यवाही पर लागू नहीं है।
(5) साक्ष्य का नियम और प्रक्रिया - अनुशासनिक अधिकारी उन तथ्यों पर अपने विचार के अनुसार निष्कर्ष निकालने को अधिकृत नहीं है, विशेष कर सुनी हुई शहादत पर या उन अभिलेखों पर जिनकी प्रामाणिकता स्थापित न हुई हो और ऐसे निष्कर्ष जीवित नहीं रह सकते ।
विभागीय कार्यवाही में जाँचकर्त्ता अधिकारी को कार्यवाही अपने हाथों करनी चाहिये, ए०आई०आर० 1956 इला० 578 में निर्णीत है कि पुलिस अधीक्षक को भी अधिकार नहीं है कि वह अपने अधीनस्थ को गवाहान का बयान लिखने के अधिकार का प्रतिनिधायन करे, इसमें अपवाद यह है कि यदि पहले इसमें किसी मजिस्ट्रेट या राजपत्रित अधिकारी ने बयान लिखा था तो वह कार्यवाही के दौरान गवाह को पढ़कर सुनाया जा सकता है और उसके स्वीकार करने पर आरोपित पक्ष जिरह कर सकता हैं, लेकिन यह अपवाद वहाँ लागू नहीं होगा जहाँ गवाह ने अपना बयान स्वयं लिखकर दिया हो, जब दौरान कार्यवाही किसी विशेष परिस्थिति में नियमित प्रक्रिया से हटना पड़े तो उक्त परिस्थिति के होने के औचित्य पर संतुष्टि पाने के बाद जाँच अधिकारी उस पर अपना निष्कर्ष दे और यह भी दे कि आरोपित पक्ष इस विलगाव से प्रतिकूल प्रभावित नहीं हुआ ।
धारा 133 साक्ष्य एक्ट में एक सह अपराधी की शहादत मान्य है और उसके साक्ष्य पर दिया गया दण्ड इस कारण अवैधानिक न होगा कि दण्ड सह अपराधी के बयान पर आधारित है, साक्ष्य एक्ट के नियम विभागीय कार्यवाहियों पर कठोरतापूर्वक लागू नहीं होते न अधिकारी को न्यायिक रूप से कार्य करना होता है, भारत सरकार बनाम त्रिलोकनाथ में माना गया है कि यह अर्द्ध-न्यायिक कार्यवाही है और न्यायिक सुनवाई प्रक्रिया के नियम इस पर लागू नहीं होते तथा प्रदत्त दण्ड को सही माना गया।
जाँच अधिकारी अपने निष्कर्ष को उन तथ्यों पर आधारित करने का अधिकारी नहीं है जिसे वह उचित समझता है और जिसमें सुनी गई शहादत या वे अभिलेख हैं जिनकी प्रामाणिकता स्थापित नहीं हुई है। इस प्रकार के अमान्य शहादत पर आधारित निर्णय स्वीकार नहीं किया जा सकता।
यदि पुलिस उपाधीक्षक ने गवाहान का बयान स्वयं नहीं लिखा और गवाहों से उनका अपना लिखा बयान प्राप्त किया है तो ऐसे बयान पर विश्वास करना पुलिस रेगुलेशन के पैरा 490 के प्रावधान के प्रतिकूल होगा। इस नियम के प्रतिवाद में कार्य करने का कारण दिया जाना चाहिये था ।
(6) साक्षी को बुलाने का प्रावधान - यदि जाँचकर्त्ता अधिकारी को विभागीय कार्यवाही में गवाह या अभिलेख तलब करने की जरूरत है तो वह उ०प्र० विभागीय कार्यवाही (साक्षी उपस्थिति बाध्यता एवं अभिलेख प्रस्तुति) एक्ट, 1976 में कर सकते हैं, इसके अधीन वे गवाह की उपस्थिति बाध्य कर सकते हैं व साक्ष्य में किसी अभिलेख या प्रस्तुत योग्य पदार्थ तलब कर सकते है बशर्ते कि साक्ष्य एक्ट में उस पर स्वाधिकार का दावा न किया गया हो, उक्त एक्ट ने 1953 के एक्ट को व 1976 के अध्यादेश को दिनांक 17-9-75 से निरस्त कर दिया है।
पैरा 490 (5) पुलिस रेगुलेशन के अधीन यह पुलिस अधीक्षक को तय करना है कि वह सफाई के उस गवाह को सम्मन करने से इन्कार कर दे जिसके शहादत को वह आरोप में सफाई विषयक तथ्य पर आवश्यक नहीं समझते। सफाई में पेश किये जाने के लिये स्वीकृत गवाहों को वे आरोपित पक्ष द्वारा पेश किये जाने के लिये सम्मन करेंगे। गवाह को पेश किये जाने की अनुमति देने के बाद उन गवाहों को खर्च दिये जाने का प्रश्न महत्व नहीं रखता चाहे वह अधिकारी द्वारा बुलाया गया हो चाहे आरोपित पक्ष ने स्वयं बुलाया हो। खर्चा देने की जिम्मेदारी सरकार की है। जाँच अधिकारी आरोपित पक्ष पर यह प्रतिबन्ध नहीं लगा सकता कि वह गवाहान का बयान होने से पहले उनका खर्च जमा करे। शासनादेश सं० 1371-1/आठ-ब-2000 (10/61) दिनांक 3-7-61 भी इसे स्पष्ट करता है
(7) सफाई के लिये अवसर - जब जाँचकर्त्ता ने आरोपित पक्ष के 32 गवाहान के पेश करने के लिये दी गई सूची में 8 को पर्याप्त माना तो 175 ए०एल० जे० 62 में इस निश्चय को उचित ठहराया गया, पर जब अनुशासनिक अधिकारी ने आरोपित अधिकारी को आरोपित अधिकारी को गवाहान के चयन का अवसर नहीं दिया तो ए०आई०आर० 1958 इला० 607 में इसे सफाई के प्रतिकूल प्रभावी मानकर प्रदत्त दण्ड को अमान्य कर दिया।
गोपनीय अभिलेख के लेखक का, विभागीय कार्यवाही में बयान न कराने पर, उक्त अभिलेख पर आधारित कार्यवाही होने के कारण राज्य बनाम दीवान चंर्दा में सु०को० ने यह माना कि सम्यक् अवसर देने से विमुख रखा गया, अपराधी अधिकारी की सफाई का बयान लेने के बाद जब जाँचकर्ता अधिकारी ने नई शहादत लिया तो यह माना गया कि उचित अवसर दिये जाने व प्रक्रिया की प्रतिकूलता का प्रभाव न होने पर इस अनियमितता के कारण कार्यवाही रद्द न होगी, मगर जहाँ यह आरोप था कि अवैध धन लेकर अभिलेखों को हटा दिया वहाँ अभिलेख को जानकर हटाये जान क बाबत शहादत आवश्यक था और वह कथित पत्र जो अभिलेख हटाने विषयक था को उस अभिलेखों की सूची पर नहीं लाया गया जिस पर भरोसा किया गया था न तो आरोपित पक्ष को उसकी नकल दी गई न तो आरोप में उसका सन्दर्भ था इसलिये फतेह बहादुर बनाम भारत सरकार ने उसे सम्यक् अवसर दिये जाने से विमुख मान कर पदच्युति को अवैध करार दिया।
(8) उचित अवसर का दिया जाना-कम समय की नोटिस देकर जाँच का स्थान बदल देने के कारण सफाई के गवाहान बयान के लिये पेश नहीं हो सके। अपीलकर्त्ता कर्मचारी को उन अभिलेखों के निरीक्षण का भी अवसर नहीं मिला जो उसके विपरीत प्रयुक्त थे। इस कारण जाँच को एक दिखावा माना गया, क्योंकि नैसर्गिक न्याय के नियम का उल्लंघन पाया गया है ।
जहाँ जाँच प्रारम्भ होने के स्तर से पूर्व गवाहान के लिये गये एक पक्षीय बयानात व अभिलेखों को प्रति जिन पर आरोप आधारित है, जाँच प्रारम्भ होने से पूर्व सरकारी कर्मचारी को देने से इन्कार कर दिया गया है उसे संविधान के अनुच्छेद 311 (2) के उल्लंघन में पाकर यह माना गया है कि कर्मचारी को अपनी निर्दोषिता प्रमाणित करने का अवसर नहीं दिया गया है और उसके सेवाच्युति आदेश को अविधिक करार दिया गया है।
अपचारी कर्मचारी को निलंबन के अवधि में जीवन निर्वाह भत्ता नहीं दिया गया जिससे वह कार्यालय में उपस्थित होने के स्थिति में नहीं था तथा उपस्थित होने से इन्कार कर दिया। उसके अनुपस्थिति में की गई कार्यवाही उसे बिना समुचित अवसर दिये ही किया गया माना गया और उसके सेवाच्युति के आदेश को निरस्त किया गया ।
विवेचना के दौरान सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध लिये गये बयान की नकलें उसे देने से मना किया जाना सही रूप से अनुचित और गलत है। कर्मचारी के विरुद्ध किये जाने वाले प्रस्तावित कार्यवाही के लिये उन बयानात के सारांश देने से उसे कारण बताने के समुचित अवसर दिये जाने की आवश्यकता की संतुष्टि (पूर्ति) नहीं हो जाती ।
आरोप-पत्र में आवश्यक तथ्यों को नहीं दिया गया और प्रारम्भिक जाँच के दौरान लिये गये गवाहान के बयानात उपलब्ध नहीं कराये गये तो इस स्थिति में यह माना गया कि हे० का० को अपने बचाव के लिये समुचित अवसर दिये जाने से वंचित रखा गया और उसके सेवाच्युति आदेश को अविधिक करार दिया गया।
(9) पूर्वाभिलेख एवं अन्य परिस्थितियों पर विचार - शा०आ०सं० 17-6-78, दिनांक 14-10-69 (नियुक्त ख) की वांछा है कि जब अनुशासनिक कार्यवाही में सेवक को, उसके पूर्व प्रतिकूल अभिलेखों पर विचार करके, दण्ड देना है तो उसके आरोप-पत्र में इसका स्पष्ट आरोप होना चाहिए, मगर यह भाव वाद के शा०आ०सं० 16-6-68, दिनांक 26.7 (नियुक्ति 3) द्वारा संशोधित हुआ कि आरोपित पक्ष को दी जाने वाली कारण बताओ नोटिस में इसका उल्लेख कर दिया जाय कि उसकी सेवा के पूर्व अभिलेखों पर भी विचार किया जायेगा, 1963 सु०को० केसेज 713 में भी आया है कि जब तक आरोपित न हो, पूर्वाभिलेख पर विचार नहीं होना चाहिये।
जब पूर्वाभिलेख पर, कम दण्ड देने को विचार करना है तो इसे कारण बताओ नोटिस में देने की आवश्यकता नहीं। अनुशासनिक अधिकारी दण्ड देने के समय अपराधी के निलंबित होने या उसके अन्य कार्य को भी दृष्टि में रख सकता है जो अजित सिंह बनाम कृपाल सिंह डी०आई०जी०२ में गलत या अवैध नहीं माना गया है।
जब प्रस्तावित कारण बताओ नोटिस में सेवा से हटाये जाने का दण्ड देने को कहा गया तो उससे छोटे सभी देय दण्डों का उसमें समावेश है और कोई भी छोटा दण्ड बिना अपवाद के दिया जा सकता है ।
(10) निष्कर्ष की प्रति क्यों दी जानी चाहिये- जब जाँच का प्रथम स्तर डी०आई०जी० से अन्य किसी अधिकारी द्वारा की जाय तो उसे अपना निष्कर्ष देना है, भेजे गये तत्वों पर डी०आई०जी० का अपना स्वयं का निष्कर्ष देना है पर उन्हें आरोपित अधिकारी का बयान लेना होगा, और दण्ड दिये जाने के विरुद्ध कारण बताओ नोटिस देना होगा उन्हें पुलिस अधीक्षक की संस्तुति पर समुचित दण्ड देने के लिए सुविचार करना होगा, इसी हेतु पैरा 490 (8) (बी) के अनुसार, जैसा कि 1957 ए०एल० जे० 62 में आया है, सम्बन्धित अधिकारी की जाँच अधिकारी के निष्कर्ष की प्रति देना चाहिये।
(11) कब पृथक निष्कर्ष का होना आवश्यक है - पहले रामनाथ सिंह बनाम राज्य, 4 में उच्च न्यायालय का यह मत था कि जब जाँच अधिकारी ने केवल वेतनमान में दो स्तर के घटाने के दण्ड की संस्तुति दी तो पुलिस अधीक्षक को अधिकारिता नहीं रही कि पदच्युति अथवा पद से हटाये जाने का दण्ड देते, पर बाद में विशेष अपील सं० 175/64, राज्य बनाम रामनाथ, निर्णीत दिनांक 23-10-64 में यह निर्णय हुआ कि संविधान के अनुच्छेद 311 के अनुसार जब पुलिस अधीक्षक ने कारण बताओ नोटिस देकर अवसर दिया तो सेवक को पदच्युत करने का अधिकार उन्हें है, इसके लिये उन्हें अपना पृथक निष्कर्ष देना होगा (इसके लिये पैरा 471 से सम्बन्धित टिप्पणी भी देखें)।
जहाँ पर अनुशासनिक अधिकारी, आरोप पर जाँच अधिकारी द्वारा पहुँचे निष्कर्ष से सहमत न हों, वहाँ पर अपराधी अधिकारी को कारण बताओ नोटिस के साथ उन्हें (प्रस्तावित दण्ड में) अपना अंतिम निष्कर्ष देना चाहिये पर इसकी बाध्यता उस हालत में नहीं है जब वे जाँच अधिकारी के संस्तुति से सहमत हों ।
(12) प्रक्रिया से विचलन और अनुपस्थिति में कार्यवाही - पुलिस कर्मचारी की अनुपस्थिति में उसके विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही किये जा सकने पर यह पैरा बहुत स्पष्ट नहीं है, जाँच कर्ता अधिकारी के लिए अनुपस्थिति में एकतरफा कार्यवाही करना कठिनाई से परे नहीं है, शा०आ०सं० 1453/आठ 105-93, दिनांक 11-8-64 में शासन ने आरोपित पक्ष पर आरोप-पत्र अपील करने के लिये निम्न सुझाव दिये हैं-
(1) आरोपित पक्ष के जाने हुए पते पर पावती सूचना (Acknowledgment) के साथ रजिस्ट्री पत्र भेजा जाये।
(2) उसके स्थायी पता या थाने से सम्पर्क करके पता करने का प्रयास करें।
(3) और आवश्यक कदम जो आरोपित पक्ष से सम्पर्क करने के लिये जरूरी हो सके।
आरोप-पत्र में पर्याप्त समय देकर यह निदेश दे कि आरोपित पक्ष समय के अन्दर जाकर उत्तर दाखिल करे वरना उसके विरुद्ध अनुपस्थिति में कार्यवाही की जायेगी, यदि आरोप-पत्र बिना तामील हुए वापस आ गया और आरोपित पक्ष भी उपस्थित नहीं हुआ तो सुनवाई अधिकारी उसकी अनुपस्थिति में किये जाने वाली कार्यवाही के पूर्व अपने द्वारा किये गये सभी प्रयत्नों का उल्लेख करेंगे, जब अभियुक्त कर्मचारी अदालती सुनवाई में अनुपस्थित हो जाता है और उसके विरुद्ध धारा 299 जा०फौ० की कार्यवाही, अफसर घोषित करने की, पूर्ण हो जाती है, तो विभाग भी उस पर लगे अन्य आरोपों में कार्यवाही कर सकता है।
अनुशासनिक अधिकारी को इस कारण का उल्लेख करना चाहिये कि क्यों नियत प्रक्रिया का प्रतिपालन व्यवहार्य नहीं है, उन्हें इस बात पर भी संतुष्ट होना है कि उनकी निजी तुष्टि नहीं, बल्कि अभिलेख के तथ्य से लक्ष्य की तुष्टि हो रही है कि नियमित प्रक्रिया अपनाना संभव नहीं है, जिससे कि अपराधी अपील सुनने के अधिकारी के समक्ष उक्त कारण पर आक्षेप न कर सके, मकसूदन पाठक बनाम सुरक्षा अधिकारों में कुछ ऐसे कारण दिये हैं जैसे, कि आरोपित व्यक्ति भाग गया है, कि उत्तम प्रयास के बाद भी नोटिस का तामील होना संभव नहीं हुआ, कि आरोपित व्यक्ति का उपस्थित होना संभव न हो सके, आदि।
(13) वकील की व्यवस्था के लिये - नियमों के अभाव में कर्मचारी विभागीय कार्यवाही में वकील के सहायता की याचना नहीं कर सकता। सी०सी०ए० नियम, जो पुलिस अराजपत्रित कर्मचारियों अधिकारियों पर लागू नहीं है, में व्यवस्था है कि यदि सबूत पक्ष वकील की सहायता लेगा तो विपक्षी भी अपने लिये वकील की सेवा हेतु कह सकता है।
(14) जब प्रदत्त दण्ड मान्य नहीं हुए- कर्मचारी के निलम्बन अवस्था में, बिना अनुशासनिक कार्यवाही किये, पारित सेवा समाप्ति का आदेश निहिर कुमार बनाम राज्य में मान्य नहीं हुआ।
विभागीय कार्यवाही में गुजरने वाले गवाहान के उस बयान की नकल, जो विवेचना के दौरान लिखी गई थी, का न दिया जाना अनुचित ठहराया गया और उसके अभाव में राज्य बनाम भगत राम में यह निष्कर्ष आया कि सरकारी सेवक उसके अभाव में प्रभावी जिरह नहीं कर सका, यही मत सहदेव सिंह बनाम पुलिस अधीक्षक में माना गया व दण्ड अपास्त हुआ।
- जब सरकारी धन के दुर्विनियोग का मामला साक्ष्य के अभाव में न्यायालय से छूट गया तो उसी आरोप पर विभागीय कार्यवाही नहीं हो सकती, इसे गोविंद राम बनाम राज्य में निर्णीत किया, बिना कारण का उल्लेख किये जब जाँच अधिकारी ने गवाहों के द्वारा लिये गये बयान को स्वीकार किया तो इसे 1964 ए०एल० जे० 576 में पुलिस विनियम के अनिवार्य नियम का विचलन माना गया।
(15) कब प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा - असम्मानपूर्ण या रुक्ष व्यवहार भी जो अधीनस्थ अधिकारी का वरिष्ठ अधिकारी के प्रति है उसे कर्तव्य पालन में माना गया है।
जाँच अधिकारी द्वारा उस बाहरी गवाह को सफाई पक्ष से न बुलाने पर जिसका नाम पहले नहीं बताया गया और उसके साक्ष्य के महत्व का निर्धारण नहीं हो सका, यह न दिखा सकने पर कि इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, चंदन सिंह बनाम भारत सरकार में जाँच उचित ठहराया गया।
एक उपनिरीक्षक के प्रति किया गया अभद्र व्यवहार के आरोप में अभद्र व्यवहार का विवरण नहीं था जिसे अस्पष्ट नहीं माना गया, क्योंकि सिपाही को आरोप ज्ञात था व शहादत में इसका विवरण आया था, 1960 ए०एल० जे० 310 में यह माना गया कि सिपाही पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं रहा।
विभागीय जाँच में पुलिस अधीक्षक ने तीन सिपाहियों के पहले दिये बयान पर भरोसा करके, जिससे वे बाद में मुकर गये थे, पदच्युति का आदेश पारित किया, के०एल० शिंडे बनाम राज्य में उक्त आदेश को सही माना गया, क्योंकि साक्ष्य एक्ट के नियम ऐसी कार्यवाही पर सख्ती से लागू नहीं होते ।
जब अपराधी ने गवाहान से स्वयं जिरह किया, विस्तार से सफाई दिया और मामले में बहस किया तो वह अपने विरुद्ध आये आरोप से और सभी सफाई के दृष्टिकोण से पूर्ण अवगत था तो जाँच अधिकारी द्वारा नियमानुसार कर्मचारी से सवालात का न पूछा जाना, किसी प्रतिकूल प्रभाव के अभाव में, दोषपूर्ण नहीं माना गया
(16) उच्च न्यायालय द्वारा प्रदत्त व्याख्या- पुलिस विनियम केवल प्रशासनिक निर्देश नहीं हैं और इन्हें कानून के स्तर की तरह प्रशासनिक प्रावधान मानना चाहिये। जहाँ इनके अनिवार्य प्रावधान की अवहेलना हुई हो वहाँ उच्च न्यायालय हस्तक्षेप कर सकती है।
पदोन्नति के पूर्व के दुश्चरित्र लेख मार्जित (Condoned) हो गये रहते हैं और पदोन्नति के बाद, उससे पूर्व दिये गये दुश्चरित्र लेख में दण्ड बढ़ाये जाने की कार्यवाही नहीं चल सकेगी ।
दक्षता रोक की अवधि के पहले की प्रतिकूल गोपनीय रिपोर्ट कर्मचारी के विरुद्ध जाँच में प्रयुक्त नहीं होगी, क्योंकि दक्षता अवरोध पार करना उस तिथि तक के लिये समाशोधन है (उपरोक्त)।
भारत सरकार बनाम पौहारी सटन में यह निर्णय हुआ है कि अभद्र व्यवहार के आरोप में सेवा से हटाने के मामले में दीवानी अदालत अपने स्वयं के निर्णय पर आने के लिए मुक्त है कि क्या सिद्ध तथ्यों से अभद्र व्यवहार बनता है।
अदालत, अधिकारी द्वारा प्राप्त तथ्य पर सदशयता से विवेक का उपयोग किया गया है। इसे देखने तक ही सीमित शक्ति रखती है, 8 दिल्ली में यह निर्णय हुआ है कि उपरोक्त निर्णय के लिये प्राप्त तथ्य पर्याप्त थे अथवा नहीं, यह देखना न्यायिक परिधि में नहीं है।
एक सिपाही को भ्रष्टाचार के आरोप में सजा मिलने पर वह विभाग से सेवा से पदच्युत किया गया, दण्ड के विरुद्ध अपील स्वीकृत हो गई, मगर पुनः वाद की सुनवाई का आदेश हुआ जिसमें उसे पुनः दण्ड मिला व अपील में सजा बहाल रही, बसुदेव राव बनाम राज्य में यह निर्णय हुआ कि पहले और दूसरे दण्ड के बीच की अवधि के लिये वह किसी जीवन वृत्ति के पाने का अधिकारी नहीं है, क्योंकि पूर्व दण्ड प्रभावी माना गया, (इस विषय पर अपने उच्च न्यायालय का अभी कोई निर्णय प्राप्त नहीं है)।
पदच्युति का आदेश उसके तामील की तिथि से प्रभावित होगा व दीवानी का वाद वहाँ चलेगा जहाँ उक्त आदेश तामील हुआ इसलिए स्थान तामीला वादी को सिद्ध करना है, आदेश का तामील करना प्रतिवादी का कार्य है जो डाकखाने के माध्यम से हुआ और सेक्रेटरी गृह विभाग बनाम बंशीधस्से में डाकघर को प्रतिवादी का प्रतिनिधि माना गया।
सोमनाथ साहू बनाम राज्य में यह निदेश हुआ कि पदच्युति का आदेश अपील के आदेश में विलीन हो जाता है और केवल अपील में दिया निर्णय ही शेष रहता है जो लागू होगा।
देवराज शर्मा बनाम राज्य ने यह माना कि नियमों के नीचे दिया गया नोट भी कानून का बल रखता है, क्योंकि नियम में आई रिक्ति को वह स्पष्ट करता है जो नियम में अवलक्षित होता है।
जन सेवा के सम्बन्ध में अनुच्छेद 309 में जहाँ प्रावधान नहीं है वहाँ राजेन्द्र नारायन बनाम राज् में यह आया है कि राज्य सरकार शासन सम्बन्धी अधिकार में उसे नियमित करने में सक्षम है।
पुलिस उपाधीक्षक द्वारा विभागीय कार्यवाही किए जाने के अधिकार सीमा का प्रश्न यदि किसी अधीनस्थ अधिकारी के समक्ष नहीं उठाया गया है तो वह रिट याचिका के स्तर पर नहीं उठाया जा सकेगा।
ड्यूटी पर न रहने के समय शराब पीने के बाद कुछ और न करने पर, कर्मचारी वे आचरण को दुराचरण नहीं माना गया तथा कर्मचारी के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाही में पारित सेवाच्युति आदेश को रद्द कर दिया गया।
ऐसा नहीं है कि बिना विभाग से अपील आदि में निर्णय लिये दीवानी में दावा नहीं प्रस्तुत किया जा सकता। पदच्युति का आदेश पारित होने के दिन से ही दावा का कारण हो जाता है। विभागीय निर्णय प्राप्त करने के बाद दावा दायर करते समय तक कालावधि (लिमिटेशन) बीत जाने के कारण धारा 4 उ० प्र० लोक सेवा अधिकरण (ट्राईव्यूनल) का लाभ नहीं दिया गया है
इस धारा पर आपका निजी नोट
यह नोट सिर्फ़ आप देख सकते हैं।
