UP Police Regs 492अध्याय 32 · Departmental Punishment of Police Officers and Their Criminal Prosecution
धारा 492 · पैरा-477. धारा 2 पुलिस ऐक्ट के तहत नियुक्त पुलिस अधिकारियों पर ही धारा 2 पुलिस ऐक्ट लागू
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
इस अध्याय के अधीन नियम पुलिस एक्ट (1861 का पाँचवाँ) की धारा 7 के अधीन बनाए गये हैं और पुलिस एक्ट (1861 का पाँचवाँ) की धारा 2 के अधीन नियुक्त किये गये पुलिस अधिकारियों पर ही लागू होते हैं। उस धारा के अधीन नियुक्त किया गया कोई अधिकारी, किसी कार्यपालिका आदेश द्वारा दण्डित नहीं किया जावेगा।
राजपत्रित अधिकारियों को दिये जाने वाले दण्ड सेक्रेट्री आफ स्टेट से हुये उनके करार गवर्नमेन्ट आफ इंडिया एक्ट, 1919 की धारा 96-ख की उपधारा (2) के अधीन परिषद् सहित सेक्रेट्री आफ स्टेट के द्वारा बनाए गये नियमों के द्वारा विनियमित किए जाते हैं। लिपिकीय कर्मचारी मण्डल को
दण्डित करने के नियम आफिस मैन्युअल में और ग्राम के चौकीदारों के बारे में इन विनियमों के नवें अध्याय में दिये गए हैं।
टिप्पणी
(1) सामान्य - पुलिस एक्ट की धारा 7 स्वयं अपने में किसी जाँच की व्यवस्था नहीं करता, बल्कि यह निर्धारित करता है कि अनुशासनिक कार्यवाही उन नियमों के अनुसार होगी जिन्हें राज्य सरकार बनायेगी।
अध्याय 32 यह व्यवस्था देता है कि धारा 7 पुलिस एक्ट में दण्ड देने के लिये विभागीय कार्यवाही की जाय।।
(2) राजपत्रित अधिकारियों के नियुक्ति प्राधिकारी - राज्य के श्रेणी 1 के राजपत्रित अधिकारियों के नियुक्ति प्राधिकारी राज्यपाल हैं अतएव इनको दण्ड देने के भी प्राधिकारी वे ही हैं। पुलिस विनियम केवल पुलिस के अराजपत्रित अधिकारी एवं कर्मचारियों पर लागू हैं। मगर राज्यपाल ने अपने नियंत्रण के अधीन संबंधित विभागाध्यक्षों को, उनके अधीन कार्य कर रहे श्रेणी 2 के अधिकारियों को क्षुद्र दण्ड देने के अधिकार हस्तांतरित किये हैं। ये क्षुद्र दण्ड हैं। (1) परिनिन्दा (Censure), (2) वेतन वृद्धि तथा दक्षता अवरोध, या (3) उनके वेतन से, उनके उपेक्षा या आदेश भंग के कारण राज्य को हुई आर्थिक क्षति की वसूली। ये व्यवस्था यू० पी० क्लास 2 सर्विसेज (इंपोजिशन आफ माइनर पनिश्मेंट) रूल्स, 1973 में दिए हैं जिसे शासकीय विज्ञप्ति सं० 22/1/72 नियुक्ति-3, दिनांक 21-7-73 द्वारा प्रकाशित किया गया है। (कृपया इन्हीं प्रकाशक के मैनुअल आफ गवर्नमेन्ट आर्डर्स देखें)
(3) प्रशासनिक नियंत्रण का अर्थ - प्रशासनिक एवं अनुशासनिक से अर्थ है उनके कार्य संबंधित विषय का अव्यवहित पर्यवेक्षण जिसमें उनसे उत्तर माँगना, निलंबन करना, क्षुद्र दण्ड (उपरोक्त) देना निहित है। प्रशासनिक नियंत्रण में, उन अधीनस्थ अधिकारियों का, जो नियंत्रण अधिकारी के प्रति उत्तरदायी है और जिन पर उनके आदेश व निदेश पालन करने का दायित्व है, नियंत्रण व विनिमय करना सम्मिलित है, जैसा कि जयपाल सिंह नरेश बनाम राज्य में स्पष्ट किया गया है।
(4) मार्गदर्शन के सिद्धान्त - इस विनियम के प्रावधान अपने में एक पूर्ण संग्रह हैं और अनुशासनिक अधिकारी जो अपने अधिकारी के अन्दर विनियमित व नियंत्रित करने को अधिकृत हैं, दण्ड दे सकता है। अनुशासनिक कार्यवाही के लिये पुलिस एक्ट और विनियम पुलिस अधिकारी के विरुद्ध सेवा नियोजन के दौरान किये गये कार्यों तक के लिये ही सीमित नहीं हैं। अनुशासनिक अधिकारी को अपने जाँच में निष्कर्ष उसके समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य पर आधारित करना है और वह आरोपित अधिकारी के ऊपर अन्य रीति से आरोप अवधारित करने को मुक्त नहीं है। धारा 7 के अंतर्गत विभागीय कार्यवाही एक न्यायिक कल्प (Quasi judicial) स्वरूप है और इसमें उत्प्रेषण आदेश हो सकता है। अध्याय 32, 33 भेदकारक नहीं है और सेवाच्युति तक इसमें निहित है। सिविल सर्विस रूल्स के प्रावधान अधीनस्थ पुलिस दल पर लागू नहीं है।
सेवाच्युति व सेवा से हटाया जाना, दोनों में अंतर है। सेवाच्युति में सामान्यतया व्यक्ति भविष्य में सेवा के अयोग्य माना जाता है पर सेवा से हटाये जाने पर सामान्यतया यह मान्यता न होगी। यदि राज्य सेवक का कथन है कि किसी नियम के उपेक्षा से उस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है तो उसे इसे सिद्ध करना होगा
(5) उत्तराधिकारी अधिकारी कार्यवाही करने में सक्षम है- किसी पुलिस अधीक्षक या इकाई के सेनानायक का, आरोपित पक्ष को कारण बताओ नोटिस देने के बाद, स्थानांतरण हो जाय तो उत्तराधिकारी बिना फिर से कारण बताओ नोटिस जारी किए, आदेश पारित करने में सक्षम हैं, मगर अवमुक्त करने वाला अधिकारी भी उसी पद का होना चाहिये। यदि उप अधीक्षक पुलिस या सहायक अधीक्षक पुलिस पदोन्नति पर स्थानापन्न अधीक्षक का कार्य कर रहे हों तो उन्हें पद परिवर्तन के कारण फिर से कारण बताओ नोटिस देना होगा।
(6) सेवा से निवृत्ति के बाद अनुशासनिक कार्यवाही - पैरा 351 सेन्ट्रल सर्विस रूल्स के अन्दर सेवानिवृत्ति के बाद भी, नियत अवधि के अन्दर अनुशासनिक कार्यवाही की जा सकती है। शा०आ०सं० 1014/आठ कार्मिक-3-50 (2)/60, दिनांक 19-2-70 इसे स्पष्ट करता है। पुलिस के नियम में सरकारी क्षति की वसूली दण्डकोटि में नहीं आती और वसूली कारण बताओ नोटिस देकर की जा सकती है।
(7) अनुशासनिक कार्यवाही और पुलिस विनियम - सरकार को यह विशेषाधिकार है कि उ०प्र० अनुशासनिक कार्यवाही (प्रशासनिक अधिकरण) नियमावली, 1974 के नियम 10 के अन्तर्गत अधिकरण के सिफारिश के अनुकूल दण्ड का आदेश पारित करे, पर पुलिस अधिकारी के लिए, जो पैरा 490 पु० रे० अन्तर्गत कार्यवाही करते हैं, ऐसा आदेश पारित करने की बाध्यता नहीं है। उक्त दोनों परिस्थिति में पुलिस अधिकारी (आरोपित) को यह अधिकार है कि वह अनुच्छेद 311 (2) में कारण बताओ नोटिस पर, राज्यपाल या सक्षम अधिकारी के तुष्टिपरक उत्तर, उसके विरुद्ध प्रस्तावित अनुयोजन पर दे। उक्त दोनों समूह की प्रक्रिया में अन्तर हो सकता है, पर दोनों अनुच्छेद 311 (2) का बचाव उपलब्ध है।
पैरा 490 भी अधिकरण के नियम 8 व 9 की तरह कार्यवाही में अनुपालन करने की प्रक्रिया देता है। दोनों प्रावधानों में होने वाली जांच साक्ष्य एवं प्रक्रिया सम्बन्धी औपचारिकता से बाध्य नहीं है पर केवल सुनी गई शहादत विश्वसनीय नहीं मानी जायेगी और साभ्या (Equity) तथा स्वाभाविक न्याय के नियमों का पालन होगा।
(8) लोक सेवा अधिकरण के सामने दावा- कोई कर्मचारी अपने सेवा सम्बन्धी मामले में अपने मालिक के उस कार्य के विरुद्ध, जो सेवाशर्तों, अनुच्छेद 16 व 311 या सेवा नियमों के पुष्टि में न हों, उ०प्र० लोक सेवा अधिकरण में जा सकता है पर इससे पूर्व विभागीय समस्त उपचारों को निःशेष करना पड़ेगा। अधिकरण का आदेश उच्च न्यायालय द्वारा पुनर्विलोकित हो सकता है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 226 व 227 में सभी न्यायालयों पर अधीक्षण के अधिकार है।
पुलिस एक्ट के धारा 7 के प्रारम्भिक शब्द ही संकेत देते हैं कि जो नियम पुलिस वालों पर लागू होंगे। वे इसी एक्ट के अधीन बनेंगे, सिविल सर्विस रूल्स में कोई प्रावधान नहीं है जो इसे अधीनस्थ पुलिस दल के सदस्यों पर लागू होने को कहे, क्योंकि पुलिस एक्ट के प्रावधान और धारा 7 के अधीन लागू पुलिस विनियम पदच्युति के प्रश्न को पूर्णतया आवरण देते हैं और इसमें भेद दृष्टि नहीं है।
कानून के निबन्धन को पालने से वंचित रहने व केवल नियमों के पालन से वंचित रहने में स्पष्ट अन्तर है। सेवक की पदच्युति जो नियमों में दी गयी प्रक्रिया के पूर्ण अवहेलना से हुई हो, उसे राज्य के विरुद्ध संदोष पदच्युति के लिए किसी हर्जे के वाद का अधिकार नहीं देता।
राजपत्रित अधिकारियों को दिये जाने वाले दण्ड सेक्रेट्री आफ स्टेट से हुये उनके करार गवर्नमेन्ट आफ इंडिया एक्ट, 1919 की धारा 96-ख की उपधारा (2) के अधीन परिषद् सहित सेक्रेट्री आफ स्टेट के द्वारा बनाए गये नियमों के द्वारा विनियमित किए जाते हैं। लिपिकीय कर्मचारी मण्डल को
दण्डित करने के नियम आफिस मैन्युअल में और ग्राम के चौकीदारों के बारे में इन विनियमों के नवें अध्याय में दिये गए हैं।
टिप्पणी
(1) सामान्य - पुलिस एक्ट की धारा 7 स्वयं अपने में किसी जाँच की व्यवस्था नहीं करता, बल्कि यह निर्धारित करता है कि अनुशासनिक कार्यवाही उन नियमों के अनुसार होगी जिन्हें राज्य सरकार बनायेगी।
अध्याय 32 यह व्यवस्था देता है कि धारा 7 पुलिस एक्ट में दण्ड देने के लिये विभागीय कार्यवाही की जाय।।
(2) राजपत्रित अधिकारियों के नियुक्ति प्राधिकारी - राज्य के श्रेणी 1 के राजपत्रित अधिकारियों के नियुक्ति प्राधिकारी राज्यपाल हैं अतएव इनको दण्ड देने के भी प्राधिकारी वे ही हैं। पुलिस विनियम केवल पुलिस के अराजपत्रित अधिकारी एवं कर्मचारियों पर लागू हैं। मगर राज्यपाल ने अपने नियंत्रण के अधीन संबंधित विभागाध्यक्षों को, उनके अधीन कार्य कर रहे श्रेणी 2 के अधिकारियों को क्षुद्र दण्ड देने के अधिकार हस्तांतरित किये हैं। ये क्षुद्र दण्ड हैं। (1) परिनिन्दा (Censure), (2) वेतन वृद्धि तथा दक्षता अवरोध, या (3) उनके वेतन से, उनके उपेक्षा या आदेश भंग के कारण राज्य को हुई आर्थिक क्षति की वसूली। ये व्यवस्था यू० पी० क्लास 2 सर्विसेज (इंपोजिशन आफ माइनर पनिश्मेंट) रूल्स, 1973 में दिए हैं जिसे शासकीय विज्ञप्ति सं० 22/1/72 नियुक्ति-3, दिनांक 21-7-73 द्वारा प्रकाशित किया गया है। (कृपया इन्हीं प्रकाशक के मैनुअल आफ गवर्नमेन्ट आर्डर्स देखें)
(3) प्रशासनिक नियंत्रण का अर्थ - प्रशासनिक एवं अनुशासनिक से अर्थ है उनके कार्य संबंधित विषय का अव्यवहित पर्यवेक्षण जिसमें उनसे उत्तर माँगना, निलंबन करना, क्षुद्र दण्ड (उपरोक्त) देना निहित है। प्रशासनिक नियंत्रण में, उन अधीनस्थ अधिकारियों का, जो नियंत्रण अधिकारी के प्रति उत्तरदायी है और जिन पर उनके आदेश व निदेश पालन करने का दायित्व है, नियंत्रण व विनिमय करना सम्मिलित है, जैसा कि जयपाल सिंह नरेश बनाम राज्य में स्पष्ट किया गया है।
(4) मार्गदर्शन के सिद्धान्त - इस विनियम के प्रावधान अपने में एक पूर्ण संग्रह हैं और अनुशासनिक अधिकारी जो अपने अधिकारी के अन्दर विनियमित व नियंत्रित करने को अधिकृत हैं, दण्ड दे सकता है। अनुशासनिक कार्यवाही के लिये पुलिस एक्ट और विनियम पुलिस अधिकारी के विरुद्ध सेवा नियोजन के दौरान किये गये कार्यों तक के लिये ही सीमित नहीं हैं। अनुशासनिक अधिकारी को अपने जाँच में निष्कर्ष उसके समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य पर आधारित करना है और वह आरोपित अधिकारी के ऊपर अन्य रीति से आरोप अवधारित करने को मुक्त नहीं है। धारा 7 के अंतर्गत विभागीय कार्यवाही एक न्यायिक कल्प (Quasi judicial) स्वरूप है और इसमें उत्प्रेषण आदेश हो सकता है। अध्याय 32, 33 भेदकारक नहीं है और सेवाच्युति तक इसमें निहित है। सिविल सर्विस रूल्स के प्रावधान अधीनस्थ पुलिस दल पर लागू नहीं है।
सेवाच्युति व सेवा से हटाया जाना, दोनों में अंतर है। सेवाच्युति में सामान्यतया व्यक्ति भविष्य में सेवा के अयोग्य माना जाता है पर सेवा से हटाये जाने पर सामान्यतया यह मान्यता न होगी। यदि राज्य सेवक का कथन है कि किसी नियम के उपेक्षा से उस पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है तो उसे इसे सिद्ध करना होगा
(5) उत्तराधिकारी अधिकारी कार्यवाही करने में सक्षम है- किसी पुलिस अधीक्षक या इकाई के सेनानायक का, आरोपित पक्ष को कारण बताओ नोटिस देने के बाद, स्थानांतरण हो जाय तो उत्तराधिकारी बिना फिर से कारण बताओ नोटिस जारी किए, आदेश पारित करने में सक्षम हैं, मगर अवमुक्त करने वाला अधिकारी भी उसी पद का होना चाहिये। यदि उप अधीक्षक पुलिस या सहायक अधीक्षक पुलिस पदोन्नति पर स्थानापन्न अधीक्षक का कार्य कर रहे हों तो उन्हें पद परिवर्तन के कारण फिर से कारण बताओ नोटिस देना होगा।
(6) सेवा से निवृत्ति के बाद अनुशासनिक कार्यवाही - पैरा 351 सेन्ट्रल सर्विस रूल्स के अन्दर सेवानिवृत्ति के बाद भी, नियत अवधि के अन्दर अनुशासनिक कार्यवाही की जा सकती है। शा०आ०सं० 1014/आठ कार्मिक-3-50 (2)/60, दिनांक 19-2-70 इसे स्पष्ट करता है। पुलिस के नियम में सरकारी क्षति की वसूली दण्डकोटि में नहीं आती और वसूली कारण बताओ नोटिस देकर की जा सकती है।
(7) अनुशासनिक कार्यवाही और पुलिस विनियम - सरकार को यह विशेषाधिकार है कि उ०प्र० अनुशासनिक कार्यवाही (प्रशासनिक अधिकरण) नियमावली, 1974 के नियम 10 के अन्तर्गत अधिकरण के सिफारिश के अनुकूल दण्ड का आदेश पारित करे, पर पुलिस अधिकारी के लिए, जो पैरा 490 पु० रे० अन्तर्गत कार्यवाही करते हैं, ऐसा आदेश पारित करने की बाध्यता नहीं है। उक्त दोनों परिस्थिति में पुलिस अधिकारी (आरोपित) को यह अधिकार है कि वह अनुच्छेद 311 (2) में कारण बताओ नोटिस पर, राज्यपाल या सक्षम अधिकारी के तुष्टिपरक उत्तर, उसके विरुद्ध प्रस्तावित अनुयोजन पर दे। उक्त दोनों समूह की प्रक्रिया में अन्तर हो सकता है, पर दोनों अनुच्छेद 311 (2) का बचाव उपलब्ध है।
पैरा 490 भी अधिकरण के नियम 8 व 9 की तरह कार्यवाही में अनुपालन करने की प्रक्रिया देता है। दोनों प्रावधानों में होने वाली जांच साक्ष्य एवं प्रक्रिया सम्बन्धी औपचारिकता से बाध्य नहीं है पर केवल सुनी गई शहादत विश्वसनीय नहीं मानी जायेगी और साभ्या (Equity) तथा स्वाभाविक न्याय के नियमों का पालन होगा।
(8) लोक सेवा अधिकरण के सामने दावा- कोई कर्मचारी अपने सेवा सम्बन्धी मामले में अपने मालिक के उस कार्य के विरुद्ध, जो सेवाशर्तों, अनुच्छेद 16 व 311 या सेवा नियमों के पुष्टि में न हों, उ०प्र० लोक सेवा अधिकरण में जा सकता है पर इससे पूर्व विभागीय समस्त उपचारों को निःशेष करना पड़ेगा। अधिकरण का आदेश उच्च न्यायालय द्वारा पुनर्विलोकित हो सकता है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 226 व 227 में सभी न्यायालयों पर अधीक्षण के अधिकार है।
पुलिस एक्ट के धारा 7 के प्रारम्भिक शब्द ही संकेत देते हैं कि जो नियम पुलिस वालों पर लागू होंगे। वे इसी एक्ट के अधीन बनेंगे, सिविल सर्विस रूल्स में कोई प्रावधान नहीं है जो इसे अधीनस्थ पुलिस दल के सदस्यों पर लागू होने को कहे, क्योंकि पुलिस एक्ट के प्रावधान और धारा 7 के अधीन लागू पुलिस विनियम पदच्युति के प्रश्न को पूर्णतया आवरण देते हैं और इसमें भेद दृष्टि नहीं है।
कानून के निबन्धन को पालने से वंचित रहने व केवल नियमों के पालन से वंचित रहने में स्पष्ट अन्तर है। सेवक की पदच्युति जो नियमों में दी गयी प्रक्रिया के पूर्ण अवहेलना से हुई हो, उसे राज्य के विरुद्ध संदोष पदच्युति के लिए किसी हर्जे के वाद का अधिकार नहीं देता।
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