धारा 356 · घोषित अपराधी की अनुपस्थिति में जांच, मुकदमा या निर्णय।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) इस संहिता या किसी अन्य कानून में किसी बात के होते हुए भी, जब कोई व्यक्ति जिसे उद्घोषित अपराधी घोषित किया गया हो, चाहे उस पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया गया हो या नहीं, मुकदमे से बचने के लिए फरार हो गया हो और उसे तुरंत गिरफ्तार करने की कोई संभावना न हो, तो यह माना जाएगा कि उसने ऐसे व्यक्ति के व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने और मुकदमा चलाने के अधिकार का त्याग कर दिया है, और न्यायालय, न्याय के हित में, लिखित में कारण दर्ज करने के बाद, इस संहिता के तहत उसी तरह और उसी प्रभाव से मुकदमा चलाएगा जैसे कि वह उपस्थित था, और निर्णय सुनाएगा:
बशर्ते कि न्यायालय अभियोग निर्धारित होने की तिथि से नब्बे दिनों की अवधि बीत जाने तक मुकदमे की कार्यवाही प्रारंभ नहीं करेगा।
(2) न्यायालय उपधारा (1) के तहत कार्यवाही करने से पहले यह सुनिश्चित करेगा कि निम्नलिखित प्रक्रिया का अनुपालन किया गया है, अर्थात्:---
(i) कम से कम तीस दिनों के अंतराल में लगातार दो गिरफ्तारी वारंट जारी करना;
(ii) उसके अंतिम ज्ञात निवास स्थान पर प्रसारित होने वाले किसी राष्ट्रीय या स्थानीय दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित करना, जिसमें घोषित अपराधी को न्यायालय के समक्ष मुकदमे के लिए उपस्थित होने की आवश्यकता हो और उसे सूचित किया जाए कि यदि वह ऐसे प्रकाशन की तिथि से तीस दिनों के भीतर उपस्थित होने में विफल रहता है, तो मुकदमा उसकी अनुपस्थिति में शुरू होगा;
(iii) यदि उसका कोई रिश्तेदार या मित्र हो, तो उसे मुकदमे की शुरुआत के बारे में सूचित करे; और
(iv) मुकदमे की शुरुआत के बारे में जानकारी उस घर या मकान के किसी प्रमुख हिस्से पर चिपकाएँ जिसमें ऐसा व्यक्ति आमतौर पर रहता है और उसके अंतिम ज्ञात निवास पते वाले जिले के पुलिस स्टेशन में प्रदर्शित करें।
(3) जहां घोषित अपराधी का प्रतिनिधित्व किसी वकील द्वारा नहीं किया जाता है, वहां उसे राज्य के खर्च पर उसकी रक्षा के लिए एक वकील उपलब्ध कराया जाएगा।
(4) जहां न्यायालय, जो मामले की सुनवाई करने या परीक्षण के लिए भेजने में सक्षम है, ने अभियोजन पक्ष के लिए किसी गवाह की जांच की है और उनके बयान दर्ज किए हैं, तो ऐसे बयान उस घोषित अपराधी के विरुद्ध उस अपराध की जांच या परीक्षण में साक्ष्य के रूप में दिए जाएंगे, जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है:
बशर्ते कि यदि घोषित अपराधी को गिरफ्तार किया जाता है और ऐसे मुकदमे के दौरान न्यायालय के समक्ष पेश किया जाता है या वह उपस्थित होता है, तो न्यायालय न्याय के हित में, उसे किसी भी ऐसे साक्ष्य की जांच करने की अनुमति दे सकता है जो उसकी अनुपस्थिति में एकत्र किया गया हो।
(5) जहां इस धारा के अंतर्गत किसी व्यक्ति से संबंधित मुकदमा हो, वहां गवाह का बयान और उसकी जांच, जहां तक संभव हो, ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों, अधिमानतः मोबाइल फोन द्वारा रिकॉर्ड की जाएगी और ऐसी रिकॉर्डिंग न्यायालय द्वारा निर्देशित तरीके से रखी जाएगी।
(6) इस संहिता के अंतर्गत अपराधों के अभियोग में, उपधारा (1) के तहत मुकदमा शुरू होने के बाद अभियुक्त की स्वैच्छिक अनुपस्थिति मुकदमे को जारी रखने से नहीं रोकेगी, जिसमें निर्णय सुनाना भी शामिल है, भले ही उसे गिरफ्तार कर लिया जाए और पेश किया जाए या वह ऐसे मुकदमे के समापन पर उपस्थित हो।
(7) इस धारा के तहत दिए गए फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं होगी, जब तक कि घोषित अपराधी अपील न्यायालय के समक्ष स्वयं उपस्थित न हो:
बशर्ते कि फैसले की तारीख से तीन साल की अवधि समाप्त होने के बाद दोषसिद्धि के खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकेगी।
(8) राज्य अधिसूचना द्वारा इस धारा के प्रावधानों को धारा 84 की उपधारा (1) में उल्लिखित किसी भगोड़े पर लागू कर सकता है।
बशर्ते कि न्यायालय अभियोग निर्धारित होने की तिथि से नब्बे दिनों की अवधि बीत जाने तक मुकदमे की कार्यवाही प्रारंभ नहीं करेगा।
(2) न्यायालय उपधारा (1) के तहत कार्यवाही करने से पहले यह सुनिश्चित करेगा कि निम्नलिखित प्रक्रिया का अनुपालन किया गया है, अर्थात्:---
(i) कम से कम तीस दिनों के अंतराल में लगातार दो गिरफ्तारी वारंट जारी करना;
(ii) उसके अंतिम ज्ञात निवास स्थान पर प्रसारित होने वाले किसी राष्ट्रीय या स्थानीय दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित करना, जिसमें घोषित अपराधी को न्यायालय के समक्ष मुकदमे के लिए उपस्थित होने की आवश्यकता हो और उसे सूचित किया जाए कि यदि वह ऐसे प्रकाशन की तिथि से तीस दिनों के भीतर उपस्थित होने में विफल रहता है, तो मुकदमा उसकी अनुपस्थिति में शुरू होगा;
(iii) यदि उसका कोई रिश्तेदार या मित्र हो, तो उसे मुकदमे की शुरुआत के बारे में सूचित करे; और
(iv) मुकदमे की शुरुआत के बारे में जानकारी उस घर या मकान के किसी प्रमुख हिस्से पर चिपकाएँ जिसमें ऐसा व्यक्ति आमतौर पर रहता है और उसके अंतिम ज्ञात निवास पते वाले जिले के पुलिस स्टेशन में प्रदर्शित करें।
(3) जहां घोषित अपराधी का प्रतिनिधित्व किसी वकील द्वारा नहीं किया जाता है, वहां उसे राज्य के खर्च पर उसकी रक्षा के लिए एक वकील उपलब्ध कराया जाएगा।
(4) जहां न्यायालय, जो मामले की सुनवाई करने या परीक्षण के लिए भेजने में सक्षम है, ने अभियोजन पक्ष के लिए किसी गवाह की जांच की है और उनके बयान दर्ज किए हैं, तो ऐसे बयान उस घोषित अपराधी के विरुद्ध उस अपराध की जांच या परीक्षण में साक्ष्य के रूप में दिए जाएंगे, जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है:
बशर्ते कि यदि घोषित अपराधी को गिरफ्तार किया जाता है और ऐसे मुकदमे के दौरान न्यायालय के समक्ष पेश किया जाता है या वह उपस्थित होता है, तो न्यायालय न्याय के हित में, उसे किसी भी ऐसे साक्ष्य की जांच करने की अनुमति दे सकता है जो उसकी अनुपस्थिति में एकत्र किया गया हो।
(5) जहां इस धारा के अंतर्गत किसी व्यक्ति से संबंधित मुकदमा हो, वहां गवाह का बयान और उसकी जांच, जहां तक संभव हो, ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों, अधिमानतः मोबाइल फोन द्वारा रिकॉर्ड की जाएगी और ऐसी रिकॉर्डिंग न्यायालय द्वारा निर्देशित तरीके से रखी जाएगी।
(6) इस संहिता के अंतर्गत अपराधों के अभियोग में, उपधारा (1) के तहत मुकदमा शुरू होने के बाद अभियुक्त की स्वैच्छिक अनुपस्थिति मुकदमे को जारी रखने से नहीं रोकेगी, जिसमें निर्णय सुनाना भी शामिल है, भले ही उसे गिरफ्तार कर लिया जाए और पेश किया जाए या वह ऐसे मुकदमे के समापन पर उपस्थित हो।
(7) इस धारा के तहत दिए गए फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं होगी, जब तक कि घोषित अपराधी अपील न्यायालय के समक्ष स्वयं उपस्थित न हो:
बशर्ते कि फैसले की तारीख से तीन साल की अवधि समाप्त होने के बाद दोषसिद्धि के खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकेगी।
(8) राज्य अधिसूचना द्वारा इस धारा के प्रावधानों को धारा 84 की उपधारा (1) में उल्लिखित किसी भगोड़े पर लागू कर सकता है।
पुराने कानून में
BNSS 356CRPC New Section
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