धारा 107 · संपत्ति की कुर्की, ज़ब्ती या बहाली।
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(1) जहाँ किसी पुलिस अधिकारी को जाँच करते समय यह विश्वास करने का कारण हो कि कोई संपत्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी आपराधिक गतिविधि या किसी अपराध के घटित होने के परिणामस्वरूप प्राप्त हुई है, तो वह पुलिस अधीक्षक या पुलिस आयुक्त की स्वीकृति से, उस संपत्ति की कुर्की के लिए न्यायालय या मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन कर सकता है, जिसके पास अपराध का संज्ञान लेने या मामले को परीक्षण के लिए भेजने का अधिकार है।
(2) यदि न्यायालय या मजिस्ट्रेट को साक्ष्य लेने से पहले या बाद में यह विश्वास करने का कारण हो कि ऐसी सभी या कोई भी संपत्ति अपराध की आय है, तो न्यायालय या मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को नोटिस जारी कर चौदह दिनों की अवधि के भीतर कारण बताने को कह सकता है कि कुर्की का आदेश क्यों नहीं दिया जाना चाहिए।
(3) जहां उपधारा (2) के तहत किसी व्यक्ति को जारी किए गए नोटिस में किसी संपत्ति को ऐसे व्यक्ति की ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा धारित संपत्ति के रूप में निर्दिष्ट किया गया हो, तो नोटिस की एक प्रति ऐसे अन्य व्यक्ति को भी तामील की जाएगी।
(4) न्यायालय या मजिस्ट्रेट, उपधारा (2) के तहत जारी किए गए कारण बताओ नोटिस के संबंध में यदि कोई स्पष्टीकरण दिया गया हो, तो उस पर विचार करने के बाद और ऐसे न्यायालय या मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद तथा ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद, उन संपत्तियों के संबंध में कुर्की का आदेश पारित कर सकता है जो अपराध की आय पाई जाती हैं।
बशर्ते कि यदि ऐसा व्यक्ति कारण बताओ नोटिस में निर्दिष्ट चौदह दिनों की अवधि के भीतर न्यायालय या मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित नहीं होता है या न्यायालय या मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं करता है, तो न्यायालय या मजिस्ट्रेट एकतरफा आदेश पारित करने की कार्यवाही कर सकता है।
(5) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, यदि न्यायालय या मजिस्ट्रेट की राय हो कि उक्त उपधारा के तहत नोटिस जारी करने से कुर्की या जब्ती का उद्देश्य विफल हो जाएगा, तो न्यायालय या मजिस्ट्रेट एकतरफा पारित अंतरिम आदेश द्वारा ऐसी संपत्ति की कुर्की या जब्ती का निर्देश दे सकता है, और ऐसा आदेश उपधारा (6) के तहत आदेश पारित होने तक लागू रहेगा।
(6) यदि न्यायालय या मजिस्ट्रेट को संलग्न या जब्त की गई संपत्ति अपराध की आय प्राप्त हो, तो न्यायालय या मजिस्ट्रेट आदेश द्वारा जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश देगा कि वह अपराध की ऐसी आय को अपराध से प्रभावित व्यक्तियों में आनुपातिक रूप से वितरित करे।
(7) उपधारा (6) के तहत पारित आदेश प्राप्त होने पर जिला मजिस्ट्रेट साठ दिनों की अवधि के भीतर अपराध की आय को या तो स्वयं वितरित करेगा या अपने अधीनस्थ किसी अधिकारी को ऐसा वितरण करने के लिए अधिकृत करेगा।
(8) यदि ऐसे लाभ प्राप्त करने के लिए कोई दावेदार न हो या कोई दावेदार निर्धारित न हो या दावेदारों को संतुष्ट करने के बाद कोई अधिशेष हो, तो अपराध से प्राप्त ऐसी आय सरकार के पास जब्त हो जाएगी।
(2) यदि न्यायालय या मजिस्ट्रेट को साक्ष्य लेने से पहले या बाद में यह विश्वास करने का कारण हो कि ऐसी सभी या कोई भी संपत्ति अपराध की आय है, तो न्यायालय या मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को नोटिस जारी कर चौदह दिनों की अवधि के भीतर कारण बताने को कह सकता है कि कुर्की का आदेश क्यों नहीं दिया जाना चाहिए।
(3) जहां उपधारा (2) के तहत किसी व्यक्ति को जारी किए गए नोटिस में किसी संपत्ति को ऐसे व्यक्ति की ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा धारित संपत्ति के रूप में निर्दिष्ट किया गया हो, तो नोटिस की एक प्रति ऐसे अन्य व्यक्ति को भी तामील की जाएगी।
(4) न्यायालय या मजिस्ट्रेट, उपधारा (2) के तहत जारी किए गए कारण बताओ नोटिस के संबंध में यदि कोई स्पष्टीकरण दिया गया हो, तो उस पर विचार करने के बाद और ऐसे न्यायालय या मजिस्ट्रेट के समक्ष उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद तथा ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद, उन संपत्तियों के संबंध में कुर्की का आदेश पारित कर सकता है जो अपराध की आय पाई जाती हैं।
बशर्ते कि यदि ऐसा व्यक्ति कारण बताओ नोटिस में निर्दिष्ट चौदह दिनों की अवधि के भीतर न्यायालय या मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित नहीं होता है या न्यायालय या मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत नहीं करता है, तो न्यायालय या मजिस्ट्रेट एकतरफा आदेश पारित करने की कार्यवाही कर सकता है।
(5) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, यदि न्यायालय या मजिस्ट्रेट की राय हो कि उक्त उपधारा के तहत नोटिस जारी करने से कुर्की या जब्ती का उद्देश्य विफल हो जाएगा, तो न्यायालय या मजिस्ट्रेट एकतरफा पारित अंतरिम आदेश द्वारा ऐसी संपत्ति की कुर्की या जब्ती का निर्देश दे सकता है, और ऐसा आदेश उपधारा (6) के तहत आदेश पारित होने तक लागू रहेगा।
(6) यदि न्यायालय या मजिस्ट्रेट को संलग्न या जब्त की गई संपत्ति अपराध की आय प्राप्त हो, तो न्यायालय या मजिस्ट्रेट आदेश द्वारा जिला मजिस्ट्रेट को निर्देश देगा कि वह अपराध की ऐसी आय को अपराध से प्रभावित व्यक्तियों में आनुपातिक रूप से वितरित करे।
(7) उपधारा (6) के तहत पारित आदेश प्राप्त होने पर जिला मजिस्ट्रेट साठ दिनों की अवधि के भीतर अपराध की आय को या तो स्वयं वितरित करेगा या अपने अधीनस्थ किसी अधिकारी को ऐसा वितरण करने के लिए अधिकृत करेगा।
(8) यदि ऐसे लाभ प्राप्त करने के लिए कोई दावेदार न हो या कोई दावेदार निर्धारित न हो या दावेदारों को संतुष्ट करने के बाद कोई अधिशेष हो, तो अपराध से प्राप्त ऐसी आय सरकार के पास जब्त हो जाएगी।
पुराने कानून में
BNSS 107CRPC New Section
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