BNSS 187अध्याय XIII · Information to the Police and Their Powers to Investigateपहले CRPC 167बदलाव हुआ
धारा 187 · जब जांच चौबीस घंटे में पूरी न हो सके तो अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) जब भी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके हिरासत में लिया जाता है, और यह प्रतीत होता है कि धारा 58 द्वारा निर्धारित चौबीस घंटे की अवधि के भीतर जांच पूरी नहीं की जा सकती है, और यह मानने के आधार हैं कि आरोप या सूचना सही है, तो पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाला पुलिस अधिकारी, यदि वह उप-निरीक्षक के पद से नीचे का नहीं है, तो मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टियों की एक प्रति तुरंत निकटतम मजिस्ट्रेट को भेजेगा, और साथ ही आरोपी को ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।
(2) जिस मजिस्ट्रेट को इस धारा के अधीन कोई अभियुक्त भेजा जाता है, वह मामले की सुनवाई करने का अधिकार रखता हो या न रखता हो, इस बात पर विचार करने के बाद कि क्या ऐसे व्यक्ति को जमानत पर रिहा नहीं किया गया है या उसकी जमानत रद्द कर दी गई है, समय-समय पर अभियुक्त को ऐसी हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे, कुल मिलाकर पंद्रह दिनों से अधिक की अवधि के लिए, या आंशिक रूप से, उपधारा (3) में दिए गए प्रावधान के अनुसार साठ दिनों या नब्बे दिनों की हिरासत अवधि में से प्रारंभिक चालीस दिनों या साठ दिनों के दौरान किसी भी समय। और यदि उसे मामले की सुनवाई करने या उसे परीक्षण के लिए भेजने का अधिकार नहीं है, और वह आगे की हिरासत को अनावश्यक समझता है, तो वह अभियुक्त को ऐसे अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट को भेजने का आदेश दे सकता है।
(3) मजिस्ट्रेट, यदि पर्याप्त आधारों से संतुष्ट हो, तो आरोपी व्यक्ति को पंद्रह दिनों से अधिक समय तक हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, परन्तु कोई भी मजिस्ट्रेट इस उपधारा के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति को कुल मिलाकर इससे अधिक अवधि के लिए हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा—
(i) नब्बे दिन, जहाँ जाँच किसी ऐसे अपराध से संबंधित हो जिसके लिए मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दस वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास की सजा दी जा सकती है;
(ii) साठ दिन, जहाँ जाँच किसी अन्य अपराध से संबंधित हो, और उक्त नब्बे दिनों या साठ दिनों की अवधि की समाप्ति पर, जैसा भी मामला हो, यदि अभियुक्त जमानत देने के लिए तैयार हो और जमानत दे दे, तो उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, और इस उपधारा के तहत जमानत पर रिहा किए गए प्रत्येक व्यक्ति को उस अध्याय के प्रयोजनों के लिए अध्याय XXXV के प्रावधानों के तहत रिहा किया गया माना जाएगा।
(4) कोई मजिस्ट्रेट इस धारा के तहत पुलिस हिरासत में अभियुक्त को तब तक हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा जब तक कि अभियुक्त को पहली बार और उसके बाद हर बार पुलिस हिरासत में रहने तक स्वयं उसके समक्ष पेश न किया जाए, लेकिन मजिस्ट्रेट अभियुक्त को स्वयं या ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से पेश करने पर न्यायिक हिरासत में आगे की हिरासत बढ़ा सकता है।
(5) द्वितीय श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट, जिसे उच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त न किया गया हो, पुलिस की हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा।
स्पष्टीकरण 1. — संदेह से बचने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के बावजूद, आरोपी को तब तक हिरासत में रखा जाएगा जब तक वह जमानत प्रस्तुत नहीं करता।
स्पष्टीकरण II.— यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या किसी आरोपी व्यक्ति को उपधारा (4) के अनुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, तो आरोपी व्यक्ति की पेशी को हिरासत अधिकृत करने वाले आदेश पर उसके हस्ताक्षर द्वारा या मजिस्ट्रेट द्वारा ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आरोपी व्यक्ति की पेशी के संबंध में प्रमाणित आदेश द्वारा सिद्ध किया जा सकता है, जैसा भी मामला हो:
बशर्ते कि अठारह वर्ष से कम आयु की महिला के मामले में, उसे किसी सुधार गृह या मान्यता प्राप्त सामाजिक संस्था की हिरासत में रखने की अनुमति दी जाएगी:
इसके अलावा, किसी भी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में पुलिस स्टेशन में या न्यायिक हिरासत में जेल में या केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा जेल घोषित स्थान के अलावा किसी अन्य स्थान पर हिरासत में नहीं रखा जाएगा।
(6) उपधारा (1) से उपधारा (5) में किसी बात के होते हुए भी, यदि पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाला पुलिस अधिकारी उप-निरीक्षक के पद से नीचे का न हो, तो मजिस्ट्रेट की अनुपलब्धता की स्थिति में, निकटतम कार्यकारी मजिस्ट्रेट को, जिसे मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान की गई हैं, मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टि की एक प्रति भेज सकता है, और उसी समय, आरोपी को ऐसे कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास भेज सकता है, और इसके बाद ऐसा कार्यकारी मजिस्ट्रेट, लिखित रूप में कारण दर्ज करते हुए, आरोपी व्यक्ति को अधिकतम सात दिनों की अवधि के लिए ऐसी हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, जैसा वह उचित समझे; और इस प्रकार अधिकृत हिरासत की अवधि समाप्त होने पर, आरोपी व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, सिवाय इसके कि जहां ऐसे आदेश देने के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी व्यक्ति की आगे की हिरासत का आदेश दिया गया हो; और, जहां इस प्रकार की आगे की हिरासत का आदेश दिया जाता है, तो इस उपधारा के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेशों के तहत जिस अवधि के दौरान आरोपी व्यक्ति को हिरासत में रखा गया था, उसे उपधारा (3) में निर्दिष्ट अवधि की गणना में ध्यान में रखा जाएगा।
बशर्ते कि उपर्युक्त अवधि की समाप्ति से पहले, कार्यपालिका मजिस्ट्रेट मामले के अभिलेखों के साथ-साथ मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टियों की एक प्रति निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज देगा, जो उसे पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा भेजी गई हो।
(7) इस धारा के तहत पुलिस की हिरासत में रखने की अनुमति देने वाला मजिस्ट्रेट ऐसा करने के अपने कारण दर्ज करेगा।
(8) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के अलावा कोई अन्य मजिस्ट्रेट ऐसा आदेश देते समय अपने आदेश की एक प्रति, उसे देने के कारणों सहित, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजेगा।
(9) यदि किसी मामले में, जिस पर मजिस्ट्रेट द्वारा समन के रूप में विचारण किया जा सकता है, जांच आरोपी की गिरफ्तारी की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर पूरी नहीं होती है, तो मजिस्ट्रेट अपराध की आगे की जांच रोकने का आदेश देगा, जब तक कि जांच करने वाला अधिकारी मजिस्ट्रेट को संतुष्ट न कर दे कि विशेष कारणों से और न्याय के हित में छह महीने की अवधि के बाद जांच जारी रखना आवश्यक है।
(10) जहाँ उपधारा (9) के अधीन किसी अपराध की आगे की जाँच रोकने का कोई आदेश दिया गया हो, तो सत्र न्यायाधीश, यदि वह अपने समक्ष किए गए आवेदन पर या अन्यथा संतुष्ट हो कि अपराध की आगे की जाँच की जानी चाहिए, तो उपधारा (9) के अधीन दिए गए आदेश को रद्द कर सकता है और जमानत और अन्य मामलों के संबंध में ऐसे निर्देश देने के अधीन अपराध की आगे की जाँच करने का निर्देश दे सकता है, जैसा वह निर्दिष्ट करे।
(2) जिस मजिस्ट्रेट को इस धारा के अधीन कोई अभियुक्त भेजा जाता है, वह मामले की सुनवाई करने का अधिकार रखता हो या न रखता हो, इस बात पर विचार करने के बाद कि क्या ऐसे व्यक्ति को जमानत पर रिहा नहीं किया गया है या उसकी जमानत रद्द कर दी गई है, समय-समय पर अभियुक्त को ऐसी हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे, कुल मिलाकर पंद्रह दिनों से अधिक की अवधि के लिए, या आंशिक रूप से, उपधारा (3) में दिए गए प्रावधान के अनुसार साठ दिनों या नब्बे दिनों की हिरासत अवधि में से प्रारंभिक चालीस दिनों या साठ दिनों के दौरान किसी भी समय। और यदि उसे मामले की सुनवाई करने या उसे परीक्षण के लिए भेजने का अधिकार नहीं है, और वह आगे की हिरासत को अनावश्यक समझता है, तो वह अभियुक्त को ऐसे अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट को भेजने का आदेश दे सकता है।
(3) मजिस्ट्रेट, यदि पर्याप्त आधारों से संतुष्ट हो, तो आरोपी व्यक्ति को पंद्रह दिनों से अधिक समय तक हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, परन्तु कोई भी मजिस्ट्रेट इस उपधारा के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति को कुल मिलाकर इससे अधिक अवधि के लिए हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा—
(i) नब्बे दिन, जहाँ जाँच किसी ऐसे अपराध से संबंधित हो जिसके लिए मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दस वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास की सजा दी जा सकती है;
(ii) साठ दिन, जहाँ जाँच किसी अन्य अपराध से संबंधित हो, और उक्त नब्बे दिनों या साठ दिनों की अवधि की समाप्ति पर, जैसा भी मामला हो, यदि अभियुक्त जमानत देने के लिए तैयार हो और जमानत दे दे, तो उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, और इस उपधारा के तहत जमानत पर रिहा किए गए प्रत्येक व्यक्ति को उस अध्याय के प्रयोजनों के लिए अध्याय XXXV के प्रावधानों के तहत रिहा किया गया माना जाएगा।
(4) कोई मजिस्ट्रेट इस धारा के तहत पुलिस हिरासत में अभियुक्त को तब तक हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा जब तक कि अभियुक्त को पहली बार और उसके बाद हर बार पुलिस हिरासत में रहने तक स्वयं उसके समक्ष पेश न किया जाए, लेकिन मजिस्ट्रेट अभियुक्त को स्वयं या ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से पेश करने पर न्यायिक हिरासत में आगे की हिरासत बढ़ा सकता है।
(5) द्वितीय श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट, जिसे उच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त न किया गया हो, पुलिस की हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा।
स्पष्टीकरण 1. — संदेह से बचने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के बावजूद, आरोपी को तब तक हिरासत में रखा जाएगा जब तक वह जमानत प्रस्तुत नहीं करता।
स्पष्टीकरण II.— यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या किसी आरोपी व्यक्ति को उपधारा (4) के अनुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, तो आरोपी व्यक्ति की पेशी को हिरासत अधिकृत करने वाले आदेश पर उसके हस्ताक्षर द्वारा या मजिस्ट्रेट द्वारा ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आरोपी व्यक्ति की पेशी के संबंध में प्रमाणित आदेश द्वारा सिद्ध किया जा सकता है, जैसा भी मामला हो:
बशर्ते कि अठारह वर्ष से कम आयु की महिला के मामले में, उसे किसी सुधार गृह या मान्यता प्राप्त सामाजिक संस्था की हिरासत में रखने की अनुमति दी जाएगी:
इसके अलावा, किसी भी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में पुलिस स्टेशन में या न्यायिक हिरासत में जेल में या केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा जेल घोषित स्थान के अलावा किसी अन्य स्थान पर हिरासत में नहीं रखा जाएगा।
(6) उपधारा (1) से उपधारा (5) में किसी बात के होते हुए भी, यदि पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाला पुलिस अधिकारी उप-निरीक्षक के पद से नीचे का न हो, तो मजिस्ट्रेट की अनुपलब्धता की स्थिति में, निकटतम कार्यकारी मजिस्ट्रेट को, जिसे मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान की गई हैं, मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टि की एक प्रति भेज सकता है, और उसी समय, आरोपी को ऐसे कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास भेज सकता है, और इसके बाद ऐसा कार्यकारी मजिस्ट्रेट, लिखित रूप में कारण दर्ज करते हुए, आरोपी व्यक्ति को अधिकतम सात दिनों की अवधि के लिए ऐसी हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, जैसा वह उचित समझे; और इस प्रकार अधिकृत हिरासत की अवधि समाप्त होने पर, आरोपी व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, सिवाय इसके कि जहां ऐसे आदेश देने के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी व्यक्ति की आगे की हिरासत का आदेश दिया गया हो; और, जहां इस प्रकार की आगे की हिरासत का आदेश दिया जाता है, तो इस उपधारा के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेशों के तहत जिस अवधि के दौरान आरोपी व्यक्ति को हिरासत में रखा गया था, उसे उपधारा (3) में निर्दिष्ट अवधि की गणना में ध्यान में रखा जाएगा।
बशर्ते कि उपर्युक्त अवधि की समाप्ति से पहले, कार्यपालिका मजिस्ट्रेट मामले के अभिलेखों के साथ-साथ मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टियों की एक प्रति निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज देगा, जो उसे पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा भेजी गई हो।
(7) इस धारा के तहत पुलिस की हिरासत में रखने की अनुमति देने वाला मजिस्ट्रेट ऐसा करने के अपने कारण दर्ज करेगा।
(8) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के अलावा कोई अन्य मजिस्ट्रेट ऐसा आदेश देते समय अपने आदेश की एक प्रति, उसे देने के कारणों सहित, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजेगा।
(9) यदि किसी मामले में, जिस पर मजिस्ट्रेट द्वारा समन के रूप में विचारण किया जा सकता है, जांच आरोपी की गिरफ्तारी की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर पूरी नहीं होती है, तो मजिस्ट्रेट अपराध की आगे की जांच रोकने का आदेश देगा, जब तक कि जांच करने वाला अधिकारी मजिस्ट्रेट को संतुष्ट न कर दे कि विशेष कारणों से और न्याय के हित में छह महीने की अवधि के बाद जांच जारी रखना आवश्यक है।
(10) जहाँ उपधारा (9) के अधीन किसी अपराध की आगे की जाँच रोकने का कोई आदेश दिया गया हो, तो सत्र न्यायाधीश, यदि वह अपने समक्ष किए गए आवेदन पर या अन्यथा संतुष्ट हो कि अपराध की आगे की जाँच की जानी चाहिए, तो उपधारा (9) के अधीन दिए गए आदेश को रद्द कर सकता है और जमानत और अन्य मामलों के संबंध में ऐसे निर्देश देने के अधीन अपराध की आगे की जाँच करने का निर्देश दे सकता है, जैसा वह निर्दिष्ट करे।
पुराने कानून में
BNSS 187CRPC 167
167.Procedure when investigation cannot be completed in twenty-four hours.
दोनों पाठों की तुलना करें →इस धारा पर आपका निजी नोट
यह नोट सिर्फ़ आप देख सकते हैं।
