The Companies Act, 2013 212अध्याय XIV · Inspection, Inquiry and Investigation
धारा 212 · गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय द्वारा कंपनी के मामलों की जांच।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) धारा 210 के प्रावधानों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां केंद्र सरकार की राय हो कि गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय द्वारा किसी कंपनी के मामलों की जांच करना आवश्यक है--
(क) धारा 208 के तहत रजिस्ट्रार या निरीक्षक की रिपोर्ट प्राप्त होने पर;
(ख) किसी कंपनी द्वारा पारित विशेष प्रस्ताव की सूचना मिलने पर कि उसके मामलों की जांच की जानी आवश्यक है;
(ग) जनहित में; या
(घ) केंद्र सरकार के किसी विभाग या राज्य सरकार के अनुरोध पर,
केंद्र सरकार आदेश द्वारा उक्त कंपनी के मामलों की जांच गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को सौंप सकती है और इसका निदेशक ऐसी जांच के उद्देश्य से जितने निरीक्षकों को आवश्यक समझे, उतने निरीक्षकों को नियुक्त कर सकता है।
(2) यदि केंद्र सरकार द्वारा किसी मामले को इस अधिनियम के अंतर्गत जांच के लिए गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को सौंपा गया है, तो केंद्र सरकार या किसी राज्य सरकार की कोई अन्य जांच एजेंसी इस अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध के संबंध में ऐसे मामले में जांच नहीं करेगी और यदि ऐसी कोई जांच पहले ही शुरू की जा चुकी है, तो उसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा और संबंधित एजेंसी इस अधिनियम के अंतर्गत ऐसे अपराधों से संबंधित प्रासंगिक दस्तावेज और अभिलेख गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को हस्तांतरित करेगी।
(3) जहां किसी कंपनी के मामलों की जांच केंद्र सरकार द्वारा गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को सौंपी गई है, वहां वह इस अध्याय में दिए गए तरीके से जांच करेगा और प्रक्रिया का पालन करेगा; और आदेश में निर्दिष्ट अवधि के भीतर केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।
(4) गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय के निदेशक कंपनी के मामलों की जांच एक जांच अधिकारी द्वारा करवाएंगे, जिसे धारा 217 के तहत निरीक्षक की शक्तियां प्राप्त होंगी।
(5) कंपनी और उसके अधिकारी एवं कर्मचारी, जो कंपनी के रोजगार में हैं या रह चुके हैं, जांच अधिकारी को जांच के संचालन के लिए आवश्यक सभी सूचना, स्पष्टीकरण, दस्तावेज एवं सहायता प्रदान करने के लिए जिम्मेदार होंगे।
(6) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (2 ऑफ 1974) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम की धारा 447 के अंतर्गत आने वाला कोई भी अपराध संज्ञेय होगा और उन धाराओं के अंतर्गत किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति को जमानत पर या अपने निजी मुचलके पर तब तक रिहा नहीं किया जाएगा जब तक कि--
(i) लोक अभियोजक को ऐसी रिहाई के आवेदन का विरोध करने का अवसर दिया गया है; और
(ii) जहां लोक अभियोजक आवेदन का विरोध करता है, वहां न्यायालय संतुष्ट है कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए उसके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है:
इस प्रकार कि सोलह वर्ष से कम आयु का व्यक्ति, या महिला, या बीमार या दुर्बल व्यक्ति को विशेष न्यायालय के निर्देशानुसार जमानत पर रिहा किया जा सकता है:
इसके अलावा, विशेष न्यायालय इस उपधारा में निर्दिष्ट किसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा जब तक कि लिखित में शिकायत न की गई हो--
(i) गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय के निदेशक; या
(ii) केंद्र सरकार का कोई अधिकारी जिसे उस सरकार द्वारा इस संबंध में लिखित रूप में सामान्य या विशेष आदेश द्वारा अधिकृत किया गया हो।
(7) उपधारा (6) में निर्दिष्ट जमानत देने पर सीमा, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) या जमानत देने पर लागू किसी अन्य कानून के तहत सीमाओं के अतिरिक्त है।
(8) 2 [यदि केंद्रीय सरकार द्वारा सामान्य या विशेष आदेश द्वारा इस संबंध में अधिकृत गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय के सहायक निदेशक से कम रैंक के किसी अधिकारी को अपने पास मौजूद सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण हो (ऐसे विश्वास का कारण लिखित में दर्ज किया जाएगा) कि कोई व्यक्ति उपधारा (6) में निर्दिष्ट धाराओं के तहत दंडनीय किसी अपराध का दोषी है, तो वह ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है और यथाशीघ्र उसे ऐसी गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देगा।
(9) 3 [उपधारा (8) के तहत अधिकृत अधिकारी, ऐसी उपधारा के तहत ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी के तुरंत बाद], आदेश की एक प्रति, उसके कब्जे में मौजूद सामग्री के साथ, उस उपधारा में निर्दिष्ट, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को एक सीलबंद लिफाफे में, निर्धारित तरीके से भेजेगा और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय ऐसे आदेश और सामग्री को निर्धारित अवधि तक रखेगा।
(10) उपधारा (8) के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए प्रत्येक व्यक्ति को चौबीस घंटे के भीतर क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी [विशेष न्यायालय या न्यायिक मजिस्ट्रेट] या मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया जाएगा:
बशर्ते कि चौबीस घंटे की अवधि में गिरफ्तारी के स्थान से 5 [विशेष न्यायालय या मजिस्ट्रेट न्यायालय] तक की यात्रा के लिए आवश्यक समय शामिल नहीं होगा।
(11) यदि केंद्र सरकार ऐसा निर्देश दे, तो गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय केंद्र सरकार को एक अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।
(12) जांच पूरी होने पर, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय जांच रिपोर्ट केंद्र सरकार को प्रस्तुत करेगा।
(13) इस अधिनियम या किसी अन्य कानून में किसी बात के होते हुए भी, जांच रिपोर्ट की एक प्रति संबंधित व्यक्ति द्वारा न्यायालय में इस संबंध में आवेदन करके प्राप्त की जा सकती है।
(14) जांच रिपोर्ट प्राप्त होने पर, केंद्र सरकार, रिपोर्ट की जांच करने के बाद (और ऐसी कानूनी सलाह लेने के बाद, जैसा वह उचित समझे), गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को कंपनी और उसके अधिकारियों या कर्मचारियों, जो कंपनी के रोजगार में हैं या रहे हैं, या कंपनी के मामलों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ अभियोजन शुरू करने का निर्देश दे सकती है।
6 [(14ए) जहां उपधारा (11) या उपधारा (12) के तहत रिपोर्ट में यह कहा गया है कि किसी कंपनी में धोखाधड़ी हुई है और ऐसी धोखाधड़ी के कारण किसी निदेशक, प्रमुख प्रबंधकीय अधिकारी, कंपनी के अन्य अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति या संस्था ने किसी परिसंपत्ति, संपत्ति या नकदी के रूप में या किसी अन्य तरीके से अनुचित लाभ या फायदा उठाया है, तो केंद्र सरकार ऐसी परिसंपत्ति, संपत्ति या नकदी की वापसी के संबंध में और ऐसे निदेशक, प्रमुख प्रबंधकीय अधिकारी, अन्य अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को बिना किसी दायित्व सीमा के व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराने के लिए न्यायाधिकरण के समक्ष उचित आदेशों के लिए आवेदन कर सकती है।]
(15) इस अधिनियम या किसी अन्य कानून में किसी बात के होते हुए भी, आरोप तय करने के लिए विशेष न्यायालय में दायर की गई जांच रिपोर्ट को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (2 ऑफ 1974) की धारा 173 के तहत पुलिस अधिकारी द्वारा दायर की गई रिपोर्ट माना जाएगा।
(16) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, कंपनी अधिनियम, 1956 (1 ऑफ 1956) के प्रावधानों के तहत गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय द्वारा की गई या शुरू की गई कोई भी जांच या अन्य कार्रवाई उस अधिनियम के तहत जारी रहेगी मानो यह अधिनियम पारित नहीं हुआ हो।
(17) (क) यदि गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय इस अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध की जांच कर रहा है, तो किसी अन्य जांच एजेंसी, राज्य सरकार, पुलिस प्राधिकरण, आयकर प्राधिकरण के पास ऐसे अपराध के संबंध में कोई सूचना या दस्तावेज होने पर वह सभी उपलब्ध सूचना या दस्तावेज गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को प्रदान करेगा;
(ख) गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय किसी भी जांच एजेंसी, राज्य सरकार, पुलिस प्राधिकरण या आयकर प्राधिकरणों के साथ अपने पास उपलब्ध कोई भी जानकारी या दस्तावेज साझा करेगा, जो किसी अन्य कानून के तहत उसके द्वारा जांच या परीक्षण किए जा रहे किसी अपराध या मामले के संबंध में ऐसी जांच एजेंसी, राज्य सरकार, पुलिस प्राधिकरण या आयकर प्राधिकरणों के लिए प्रासंगिक या उपयोगी हो सकता है।
(क) धारा 208 के तहत रजिस्ट्रार या निरीक्षक की रिपोर्ट प्राप्त होने पर;
(ख) किसी कंपनी द्वारा पारित विशेष प्रस्ताव की सूचना मिलने पर कि उसके मामलों की जांच की जानी आवश्यक है;
(ग) जनहित में; या
(घ) केंद्र सरकार के किसी विभाग या राज्य सरकार के अनुरोध पर,
केंद्र सरकार आदेश द्वारा उक्त कंपनी के मामलों की जांच गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को सौंप सकती है और इसका निदेशक ऐसी जांच के उद्देश्य से जितने निरीक्षकों को आवश्यक समझे, उतने निरीक्षकों को नियुक्त कर सकता है।
(2) यदि केंद्र सरकार द्वारा किसी मामले को इस अधिनियम के अंतर्गत जांच के लिए गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को सौंपा गया है, तो केंद्र सरकार या किसी राज्य सरकार की कोई अन्य जांच एजेंसी इस अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध के संबंध में ऐसे मामले में जांच नहीं करेगी और यदि ऐसी कोई जांच पहले ही शुरू की जा चुकी है, तो उसे आगे नहीं बढ़ाया जाएगा और संबंधित एजेंसी इस अधिनियम के अंतर्गत ऐसे अपराधों से संबंधित प्रासंगिक दस्तावेज और अभिलेख गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को हस्तांतरित करेगी।
(3) जहां किसी कंपनी के मामलों की जांच केंद्र सरकार द्वारा गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को सौंपी गई है, वहां वह इस अध्याय में दिए गए तरीके से जांच करेगा और प्रक्रिया का पालन करेगा; और आदेश में निर्दिष्ट अवधि के भीतर केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।
(4) गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय के निदेशक कंपनी के मामलों की जांच एक जांच अधिकारी द्वारा करवाएंगे, जिसे धारा 217 के तहत निरीक्षक की शक्तियां प्राप्त होंगी।
(5) कंपनी और उसके अधिकारी एवं कर्मचारी, जो कंपनी के रोजगार में हैं या रह चुके हैं, जांच अधिकारी को जांच के संचालन के लिए आवश्यक सभी सूचना, स्पष्टीकरण, दस्तावेज एवं सहायता प्रदान करने के लिए जिम्मेदार होंगे।
(6) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (2 ऑफ 1974) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम की धारा 447 के अंतर्गत आने वाला कोई भी अपराध संज्ञेय होगा और उन धाराओं के अंतर्गत किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति को जमानत पर या अपने निजी मुचलके पर तब तक रिहा नहीं किया जाएगा जब तक कि--
(i) लोक अभियोजक को ऐसी रिहाई के आवेदन का विरोध करने का अवसर दिया गया है; और
(ii) जहां लोक अभियोजक आवेदन का विरोध करता है, वहां न्यायालय संतुष्ट है कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए उसके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है:
इस प्रकार कि सोलह वर्ष से कम आयु का व्यक्ति, या महिला, या बीमार या दुर्बल व्यक्ति को विशेष न्यायालय के निर्देशानुसार जमानत पर रिहा किया जा सकता है:
इसके अलावा, विशेष न्यायालय इस उपधारा में निर्दिष्ट किसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा जब तक कि लिखित में शिकायत न की गई हो--
(i) गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय के निदेशक; या
(ii) केंद्र सरकार का कोई अधिकारी जिसे उस सरकार द्वारा इस संबंध में लिखित रूप में सामान्य या विशेष आदेश द्वारा अधिकृत किया गया हो।
(7) उपधारा (6) में निर्दिष्ट जमानत देने पर सीमा, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) या जमानत देने पर लागू किसी अन्य कानून के तहत सीमाओं के अतिरिक्त है।
(8) 2 [यदि केंद्रीय सरकार द्वारा सामान्य या विशेष आदेश द्वारा इस संबंध में अधिकृत गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय के सहायक निदेशक से कम रैंक के किसी अधिकारी को अपने पास मौजूद सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण हो (ऐसे विश्वास का कारण लिखित में दर्ज किया जाएगा) कि कोई व्यक्ति उपधारा (6) में निर्दिष्ट धाराओं के तहत दंडनीय किसी अपराध का दोषी है, तो वह ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकता है और यथाशीघ्र उसे ऐसी गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देगा।
(9) 3 [उपधारा (8) के तहत अधिकृत अधिकारी, ऐसी उपधारा के तहत ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी के तुरंत बाद], आदेश की एक प्रति, उसके कब्जे में मौजूद सामग्री के साथ, उस उपधारा में निर्दिष्ट, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को एक सीलबंद लिफाफे में, निर्धारित तरीके से भेजेगा और गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय ऐसे आदेश और सामग्री को निर्धारित अवधि तक रखेगा।
(10) उपधारा (8) के अंतर्गत गिरफ्तार किए गए प्रत्येक व्यक्ति को चौबीस घंटे के भीतर क्षेत्राधिकार रखने वाले किसी [विशेष न्यायालय या न्यायिक मजिस्ट्रेट] या मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाया जाएगा:
बशर्ते कि चौबीस घंटे की अवधि में गिरफ्तारी के स्थान से 5 [विशेष न्यायालय या मजिस्ट्रेट न्यायालय] तक की यात्रा के लिए आवश्यक समय शामिल नहीं होगा।
(11) यदि केंद्र सरकार ऐसा निर्देश दे, तो गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय केंद्र सरकार को एक अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा।
(12) जांच पूरी होने पर, गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय जांच रिपोर्ट केंद्र सरकार को प्रस्तुत करेगा।
(13) इस अधिनियम या किसी अन्य कानून में किसी बात के होते हुए भी, जांच रिपोर्ट की एक प्रति संबंधित व्यक्ति द्वारा न्यायालय में इस संबंध में आवेदन करके प्राप्त की जा सकती है।
(14) जांच रिपोर्ट प्राप्त होने पर, केंद्र सरकार, रिपोर्ट की जांच करने के बाद (और ऐसी कानूनी सलाह लेने के बाद, जैसा वह उचित समझे), गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को कंपनी और उसके अधिकारियों या कर्मचारियों, जो कंपनी के रोजगार में हैं या रहे हैं, या कंपनी के मामलों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ अभियोजन शुरू करने का निर्देश दे सकती है।
6 [(14ए) जहां उपधारा (11) या उपधारा (12) के तहत रिपोर्ट में यह कहा गया है कि किसी कंपनी में धोखाधड़ी हुई है और ऐसी धोखाधड़ी के कारण किसी निदेशक, प्रमुख प्रबंधकीय अधिकारी, कंपनी के अन्य अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति या संस्था ने किसी परिसंपत्ति, संपत्ति या नकदी के रूप में या किसी अन्य तरीके से अनुचित लाभ या फायदा उठाया है, तो केंद्र सरकार ऐसी परिसंपत्ति, संपत्ति या नकदी की वापसी के संबंध में और ऐसे निदेशक, प्रमुख प्रबंधकीय अधिकारी, अन्य अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को बिना किसी दायित्व सीमा के व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी ठहराने के लिए न्यायाधिकरण के समक्ष उचित आदेशों के लिए आवेदन कर सकती है।]
(15) इस अधिनियम या किसी अन्य कानून में किसी बात के होते हुए भी, आरोप तय करने के लिए विशेष न्यायालय में दायर की गई जांच रिपोर्ट को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (2 ऑफ 1974) की धारा 173 के तहत पुलिस अधिकारी द्वारा दायर की गई रिपोर्ट माना जाएगा।
(16) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, कंपनी अधिनियम, 1956 (1 ऑफ 1956) के प्रावधानों के तहत गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय द्वारा की गई या शुरू की गई कोई भी जांच या अन्य कार्रवाई उस अधिनियम के तहत जारी रहेगी मानो यह अधिनियम पारित नहीं हुआ हो।
(17) (क) यदि गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय इस अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध की जांच कर रहा है, तो किसी अन्य जांच एजेंसी, राज्य सरकार, पुलिस प्राधिकरण, आयकर प्राधिकरण के पास ऐसे अपराध के संबंध में कोई सूचना या दस्तावेज होने पर वह सभी उपलब्ध सूचना या दस्तावेज गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को प्रदान करेगा;
(ख) गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय किसी भी जांच एजेंसी, राज्य सरकार, पुलिस प्राधिकरण या आयकर प्राधिकरणों के साथ अपने पास उपलब्ध कोई भी जानकारी या दस्तावेज साझा करेगा, जो किसी अन्य कानून के तहत उसके द्वारा जांच या परीक्षण किए जा रहे किसी अपराध या मामले के संबंध में ऐसी जांच एजेंसी, राज्य सरकार, पुलिस प्राधिकरण या आयकर प्राधिकरणों के लिए प्रासंगिक या उपयोगी हो सकता है।
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