The Companies Act, 2013 140अध्याय X · Audit and Auditors
धारा 140 · लेखा परीक्षक को हटाना, उसका इस्तीफा और विशेष नोटिस जारी करना।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) धारा 139 के तहत नियुक्त लेखा परीक्षक को उसके कार्यकाल की समाप्ति से पहले केवल कंपनी के विशेष प्रस्ताव द्वारा, इस संबंध में केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति निर्धारित तरीके से प्राप्त करने के बाद ही उसके पद से हटाया जा सकता है:
इस उपधारा के अंतर्गत कोई भी कार्रवाई करने से पहले, संबंधित लेखा परीक्षक को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा।
(2) कंपनी से इस्तीफा देने वाला लेखा परीक्षक, इस्तीफे की तारीख से तीस दिनों की अवधि के भीतर, कंपनी और रजिस्ट्रार के पास निर्धारित प्रपत्र में एक विवरण प्रस्तुत करेगा, और धारा 139 की उपधारा (5) में निर्दिष्ट कंपनियों के मामले में, लेखा परीक्षक भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पास भी ऐसा विवरण प्रस्तुत करेगा, जिसमें इस्तीफे के कारण और अन्य प्रासंगिक तथ्य बताए जाएंगे।
1 [(3) यदि लेखा परीक्षक उपधारा (2) के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करता है, तो वह पचास हजार रुपये या लेखा परीक्षक के पारिश्रमिक के बराबर राशि, जो भी कम हो, के जुर्माने का उत्तरदायी होगा, और निरंतर विफलता के मामले में, पहली विफलता के बाद प्रत्येक दिन के लिए पांच सौ रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया जाएगा, जिस दौरान ऐसी विफलता जारी रहती है, अधिकतम 2 [दो लाख रुपये] के अधीन।]
(4) (i) वार्षिक आम बैठक में किसी सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को लेखा परीक्षक नियुक्त करने के प्रस्ताव के लिए, या यह स्पष्ट रूप से निर्धारित करने के लिए कि सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक को पुनः नियुक्त नहीं किया जाएगा, विशेष सूचना आवश्यक होगी, सिवाय इसके कि सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक ने धारा 139 की उपधारा (2) के अनुसार लगातार पांच वर्ष या, जैसा भी मामला हो, दस वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया हो।
(ii) ऐसे संकल्प की सूचना प्राप्त होने पर, कंपनी तुरंत उसकी एक प्रति सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक को भेजेगी।
(iii) जहां ऐसे संकल्प की सूचना दी जाती है और सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक इस संबंध में कंपनी को लिखित रूप में (उचित लंबाई से अधिक नहीं) अभ्यावेदन देता है और कंपनी के सदस्यों को इसकी सूचना देने का अनुरोध करता है, तो कंपनी, जब तक कि अभ्यावेदन उसे ऐसा करने के लिए बहुत देर से प्राप्त न हो,--
(क) कंपनी के सदस्यों को दिए गए संकल्प की किसी भी सूचना में, अभ्यावेदन किए जाने के तथ्य का उल्लेख करें; और
(ख) कंपनी के प्रत्येक सदस्य को, जिसे बैठक की सूचना भेजी गई है, अभ्यावेदन की एक प्रति भेजी जाए, चाहे कंपनी द्वारा अभ्यावेदन प्राप्त होने से पहले या बाद में।
और यदि अभ्यावेदन की प्रति उपर्युक्त अनुसार नहीं भेजी जाती है, क्योंकि यह बहुत देर से प्राप्त हुई थी या कंपनी की चूक के कारण, तो लेखा परीक्षक (मौखिक रूप से सुने जाने के अपने अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना) यह मांग कर सकता है कि अभ्यावेदन को बैठक में पढ़कर सुनाया जाए:
बशर्ते कि यदि अभ्यावेदन की प्रति उपर्युक्त प्रकार से नहीं भेजी जाती है, तो उसकी एक प्रति रजिस्ट्रार के पास दाखिल की जाएगी:
इसके अलावा, यदि न्यायाधिकरण कंपनी या किसी अन्य पीड़ित व्यक्ति के आवेदन पर संतुष्ट हो जाता है कि लेखा परीक्षक द्वारा इस उपधारा द्वारा प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो अभ्यावेदन की प्रति न भेजी जाए और अभ्यावेदन को बैठक में पढ़कर सुनाने की आवश्यकता न हो।
(5) इस अधिनियम या किसी अन्य कानून के प्रावधानों के तहत किसी भी कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, न्यायाधिकरण या तो स्वतः संज्ञान से या केंद्र सरकार या किसी संबंधित व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर, यदि वह संतुष्ट है कि किसी कंपनी के लेखा परीक्षक ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कपटपूर्ण तरीके से कार्य किया है या कंपनी या उसके निदेशकों या अधिकारियों द्वारा या उनके संबंध में किसी भी धोखाधड़ी में सहायता की है या मिलीभगत की है, तो वह आदेश द्वारा कंपनी को अपने लेखा परीक्षकों को बदलने का निर्देश दे सकता है।
बशर्ते कि यदि आवेदन केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है और न्यायाधिकरण संतुष्ट है कि लेखा परीक्षक में किसी परिवर्तन की आवश्यकता है, तो वह ऐसे आवेदन की प्राप्ति के पंद्रह दिनों के भीतर यह आदेश देगा कि वह लेखा परीक्षक के रूप में कार्य नहीं करेगा और केंद्र सरकार उसके स्थान पर किसी अन्य लेखा परीक्षक को नियुक्त कर सकती है:
इसके अलावा, कोई भी लेखा परीक्षक, चाहे वह व्यक्ति हो या फर्म, जिसके विरुद्ध इस धारा के अंतर्गत न्यायाधिकरण द्वारा अंतिम आदेश पारित किया गया हो, आदेश पारित होने की तिथि से पाँच वर्ष की अवधि तक किसी भी कंपनी के लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त होने के लिए पात्र नहीं होगा और लेखा परीक्षक धारा 447 के अंतर्गत कार्रवाई के लिए भी उत्तरदायी होगा।
स्पष्टीकरण 1. -- यह स्पष्ट किया जाता है कि किसी फर्म के मामले में, दायित्व फर्म का और प्रत्येक साझेदार या साझेदारों का होगा जिन्होंने कंपनी या उसके निदेशक या अधिकारियों द्वारा या उनके संबंध में किसी भी धोखाधड़ी में कपटपूर्ण तरीके से कार्य किया हो या सहायता की हो या मिलीभगत की हो।
स्पष्टीकरण II. -- इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए "लेखा परीक्षक" शब्द में लेखा परीक्षकों की फर्म भी शामिल है।
इस उपधारा के अंतर्गत कोई भी कार्रवाई करने से पहले, संबंधित लेखा परीक्षक को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा।
(2) कंपनी से इस्तीफा देने वाला लेखा परीक्षक, इस्तीफे की तारीख से तीस दिनों की अवधि के भीतर, कंपनी और रजिस्ट्रार के पास निर्धारित प्रपत्र में एक विवरण प्रस्तुत करेगा, और धारा 139 की उपधारा (5) में निर्दिष्ट कंपनियों के मामले में, लेखा परीक्षक भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के पास भी ऐसा विवरण प्रस्तुत करेगा, जिसमें इस्तीफे के कारण और अन्य प्रासंगिक तथ्य बताए जाएंगे।
1 [(3) यदि लेखा परीक्षक उपधारा (2) के प्रावधानों का अनुपालन नहीं करता है, तो वह पचास हजार रुपये या लेखा परीक्षक के पारिश्रमिक के बराबर राशि, जो भी कम हो, के जुर्माने का उत्तरदायी होगा, और निरंतर विफलता के मामले में, पहली विफलता के बाद प्रत्येक दिन के लिए पांच सौ रुपये का अतिरिक्त जुर्माना लगाया जाएगा, जिस दौरान ऐसी विफलता जारी रहती है, अधिकतम 2 [दो लाख रुपये] के अधीन।]
(4) (i) वार्षिक आम बैठक में किसी सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को लेखा परीक्षक नियुक्त करने के प्रस्ताव के लिए, या यह स्पष्ट रूप से निर्धारित करने के लिए कि सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक को पुनः नियुक्त नहीं किया जाएगा, विशेष सूचना आवश्यक होगी, सिवाय इसके कि सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक ने धारा 139 की उपधारा (2) के अनुसार लगातार पांच वर्ष या, जैसा भी मामला हो, दस वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया हो।
(ii) ऐसे संकल्प की सूचना प्राप्त होने पर, कंपनी तुरंत उसकी एक प्रति सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक को भेजेगी।
(iii) जहां ऐसे संकल्प की सूचना दी जाती है और सेवानिवृत्त लेखा परीक्षक इस संबंध में कंपनी को लिखित रूप में (उचित लंबाई से अधिक नहीं) अभ्यावेदन देता है और कंपनी के सदस्यों को इसकी सूचना देने का अनुरोध करता है, तो कंपनी, जब तक कि अभ्यावेदन उसे ऐसा करने के लिए बहुत देर से प्राप्त न हो,--
(क) कंपनी के सदस्यों को दिए गए संकल्प की किसी भी सूचना में, अभ्यावेदन किए जाने के तथ्य का उल्लेख करें; और
(ख) कंपनी के प्रत्येक सदस्य को, जिसे बैठक की सूचना भेजी गई है, अभ्यावेदन की एक प्रति भेजी जाए, चाहे कंपनी द्वारा अभ्यावेदन प्राप्त होने से पहले या बाद में।
और यदि अभ्यावेदन की प्रति उपर्युक्त अनुसार नहीं भेजी जाती है, क्योंकि यह बहुत देर से प्राप्त हुई थी या कंपनी की चूक के कारण, तो लेखा परीक्षक (मौखिक रूप से सुने जाने के अपने अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना) यह मांग कर सकता है कि अभ्यावेदन को बैठक में पढ़कर सुनाया जाए:
बशर्ते कि यदि अभ्यावेदन की प्रति उपर्युक्त प्रकार से नहीं भेजी जाती है, तो उसकी एक प्रति रजिस्ट्रार के पास दाखिल की जाएगी:
इसके अलावा, यदि न्यायाधिकरण कंपनी या किसी अन्य पीड़ित व्यक्ति के आवेदन पर संतुष्ट हो जाता है कि लेखा परीक्षक द्वारा इस उपधारा द्वारा प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो अभ्यावेदन की प्रति न भेजी जाए और अभ्यावेदन को बैठक में पढ़कर सुनाने की आवश्यकता न हो।
(5) इस अधिनियम या किसी अन्य कानून के प्रावधानों के तहत किसी भी कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, न्यायाधिकरण या तो स्वतः संज्ञान से या केंद्र सरकार या किसी संबंधित व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर, यदि वह संतुष्ट है कि किसी कंपनी के लेखा परीक्षक ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कपटपूर्ण तरीके से कार्य किया है या कंपनी या उसके निदेशकों या अधिकारियों द्वारा या उनके संबंध में किसी भी धोखाधड़ी में सहायता की है या मिलीभगत की है, तो वह आदेश द्वारा कंपनी को अपने लेखा परीक्षकों को बदलने का निर्देश दे सकता है।
बशर्ते कि यदि आवेदन केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है और न्यायाधिकरण संतुष्ट है कि लेखा परीक्षक में किसी परिवर्तन की आवश्यकता है, तो वह ऐसे आवेदन की प्राप्ति के पंद्रह दिनों के भीतर यह आदेश देगा कि वह लेखा परीक्षक के रूप में कार्य नहीं करेगा और केंद्र सरकार उसके स्थान पर किसी अन्य लेखा परीक्षक को नियुक्त कर सकती है:
इसके अलावा, कोई भी लेखा परीक्षक, चाहे वह व्यक्ति हो या फर्म, जिसके विरुद्ध इस धारा के अंतर्गत न्यायाधिकरण द्वारा अंतिम आदेश पारित किया गया हो, आदेश पारित होने की तिथि से पाँच वर्ष की अवधि तक किसी भी कंपनी के लेखा परीक्षक के रूप में नियुक्त होने के लिए पात्र नहीं होगा और लेखा परीक्षक धारा 447 के अंतर्गत कार्रवाई के लिए भी उत्तरदायी होगा।
स्पष्टीकरण 1. -- यह स्पष्ट किया जाता है कि किसी फर्म के मामले में, दायित्व फर्म का और प्रत्येक साझेदार या साझेदारों का होगा जिन्होंने कंपनी या उसके निदेशक या अधिकारियों द्वारा या उनके संबंध में किसी भी धोखाधड़ी में कपटपूर्ण तरीके से कार्य किया हो या सहायता की हो या मिलीभगत की हो।
स्पष्टीकरण II. -- इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए "लेखा परीक्षक" शब्द में लेखा परीक्षकों की फर्म भी शामिल है।
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