MS Act 182अध्याय III · Civil Liability for Oil Pollution Damage
धारा 182 · परिसीमा निधि का गठन।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) इस अध्याय के अंतर्गत अपनी देयता की सीमा का लाभ उठाने के इच्छुक कोई भी जहाज स्वामी, अपने देयता की सीमा का प्रतिनिधित्व करने वाली कुल राशि के लिए निधि के गठन हेतु क्षेत्राधिकार रखने वाले उच्च न्यायालय या केंद्र सरकार को ऐसे समय और ऐसे तरीके से आवेदन करेगा, जैसा कि निर्धारित किया जा सकता है।
(2) ऐसा कोष या तो राशि जमा करके या उच्च न्यायालय या केंद्र सरकार के पास बैंक गारंटी या ऐसी अन्य सुरक्षा प्रदान करके गठित किया जा सकता है।
(3) बीमाकर्ता या जहाज मालिक को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने वाला कोई अन्य व्यक्ति उपधारा ( 1 ) के तहत निधि के गठन के लिए उच्च न्यायालय या केंद्र सरकार से आवेदन कर सकता है और इस प्रकार गठित निधि का वही प्रभाव होगा मानो वह जहाज मालिक द्वारा गठित की गई हो।
(4) इस धारा के अंतर्गत बीमाकर्ता द्वारा निधि के गठन हेतु आवेदन उन मामलों में भी किया जा सकता है जहाँ जहाज मालिक धारा 181 की उपधारा ( 2 ) के अंतर्गत अपनी देयता को सीमित करने का हकदार नहीं है, और ऐसी किसी भी स्थिति में, निधि का गठन जहाज मालिक के विरुद्ध किसी भी दावेदार के निधि में जमा या सुरक्षित राशि से अधिक पूर्ण मुआवजे के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।
(5) इस धारा के अंतर्गत निधि में जमा या सुरक्षित किए जाने वाले विशेष आहरण अधिकार की राशि को निधि के गठन की तिथि पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित विशेष आहरण अधिकारों के रुपये में आधिकारिक मूल्य के आधार पर रुपये में परिवर्तित किया जाएगा।
(6) जहां किसी उच्च न्यायालय के समक्ष तेल प्रदूषण की घटना के संबंध में जहाज मालिक द्वारा कोई कोष स्थापित किया जाता है, तो इस अध्याय के अंतर्गत मुआवजे के सभी दावे केवल उसी उच्च न्यायालय में दायर किए जाएंगे जहां कोष का गठन किया गया था:
बशर्ते कि जहां तेल प्रदूषण की घटना से उत्पन्न दावे उस उच्च न्यायालय के अलावा किसी अन्य उच्च न्यायालय में किए जाते हैं जहां निधि की स्थापना की गई थी, वहां जहाज मालिक सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में जाकर दावों को उस उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने का अनुरोध कर सकता है जहां ऐसी निधि की स्थापना की गई थी।
(2) ऐसा कोष या तो राशि जमा करके या उच्च न्यायालय या केंद्र सरकार के पास बैंक गारंटी या ऐसी अन्य सुरक्षा प्रदान करके गठित किया जा सकता है।
(3) बीमाकर्ता या जहाज मालिक को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने वाला कोई अन्य व्यक्ति उपधारा ( 1 ) के तहत निधि के गठन के लिए उच्च न्यायालय या केंद्र सरकार से आवेदन कर सकता है और इस प्रकार गठित निधि का वही प्रभाव होगा मानो वह जहाज मालिक द्वारा गठित की गई हो।
(4) इस धारा के अंतर्गत बीमाकर्ता द्वारा निधि के गठन हेतु आवेदन उन मामलों में भी किया जा सकता है जहाँ जहाज मालिक धारा 181 की उपधारा ( 2 ) के अंतर्गत अपनी देयता को सीमित करने का हकदार नहीं है, और ऐसी किसी भी स्थिति में, निधि का गठन जहाज मालिक के विरुद्ध किसी भी दावेदार के निधि में जमा या सुरक्षित राशि से अधिक पूर्ण मुआवजे के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।
(5) इस धारा के अंतर्गत निधि में जमा या सुरक्षित किए जाने वाले विशेष आहरण अधिकार की राशि को निधि के गठन की तिथि पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित विशेष आहरण अधिकारों के रुपये में आधिकारिक मूल्य के आधार पर रुपये में परिवर्तित किया जाएगा।
(6) जहां किसी उच्च न्यायालय के समक्ष तेल प्रदूषण की घटना के संबंध में जहाज मालिक द्वारा कोई कोष स्थापित किया जाता है, तो इस अध्याय के अंतर्गत मुआवजे के सभी दावे केवल उसी उच्च न्यायालय में दायर किए जाएंगे जहां कोष का गठन किया गया था:
बशर्ते कि जहां तेल प्रदूषण की घटना से उत्पन्न दावे उस उच्च न्यायालय के अलावा किसी अन्य उच्च न्यायालय में किए जाते हैं जहां निधि की स्थापना की गई थी, वहां जहाज मालिक सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में जाकर दावों को उस उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने का अनुरोध कर सकता है जहां ऐसी निधि की स्थापना की गई थी।
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