BVAT Act 9अध्याय III · Tribunal and Taxing Authorities
धारा 9 · न्यायाधिकरण।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जैसा कि निर्धारित किया जा सकता है, राज्य सरकार आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा एक न्यायाधिकरण का गठन करेगी, जिसे वाणिज्यिक कर न्यायाधिकरण कहा जाएगा, जिसमें एक अध्यक्ष और दो अन्य सदस्य होंगे, जो इस अधिनियम या उस समय लागू किसी अन्य कानून द्वारा ऐसे न्यायाधिकरण को प्रदत्त सभी शक्तियों का प्रयोग करेंगे और सभी कार्यों का निष्पादन करेंगे।
बशर्ते कि जब तक इस अधिनियम के तहत न्यायाधिकरण का गठन नहीं हो जाता, तब तक धारा 94 द्वारा निरस्त किए जाने से पहले बिहार वित्त अधिनियम, 1981 (बिहार अधिनियम 5 ऑफ 1981) के तहत गठित न्यायाधिकरण को इस अधिनियम के तहत गठित वाणिज्यिक कर न्यायाधिकरण माना जाएगा और वह इस अधिनियम या उस समय लागू किसी अन्य कानून द्वारा प्रदत्त सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा और सभी कार्यों का निष्पादन करेगा।
(2) न्यायाधिकरण का अध्यक्ष सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश होगा, जिसकी आयु पैंसठ वर्ष से अधिक नहीं होगी, या जिला न्यायाधीश के पद का न्यायिक अधिकारी होगा।
(3) अन्य दो सदस्यों में से एक राज्य सरकार के वाणिज्यिक कर विभाग का संयुक्त आयुक्त के पद से कम रैंक का अधिकारी नहीं होगा और तीसरा सदस्य एक ऐसा व्यक्ति होगा--
(क) जो कम से कम दस वर्षों से चार्टर्ड अकाउंटेंट्स अधिनियम, 1949 (38 ऑफ 1949) के तहत चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में या किसी पूर्व में लागू कानून के तहत पंजीकृत अकाउंटेंट के रूप में या आंशिक रूप से पंजीकृत अकाउंटेंट और आंशिक रूप से चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में लेखांकन के अभ्यास में रहा हो; या
(ख) जो भारतीय लेखापरीक्षा एवं लेखा सेवा में उप महालेखाकार के पद से नीचे का अधिकारी न हो या रह चुका हो; या
(ग) जो राज्य सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में लेखा प्रशासन या वित्तीय प्रबंधन में कम से कम चार वर्ष का अनुभव रखने वाला सरकारी कर्मचारी हो, चाहे वह सेवारत हो या सेवानिवृत्त।
(4) (क) राज्य सरकार, यदि वह ऐसा करना उचित समझे, तो अधिसूचना द्वारा न्यायाधिकरण की एक या एक से अधिक अतिरिक्त पीठें ऐसे स्थानों पर तथा ऐसे क्षेत्र पर अधिकार क्षेत्र रखते हुए स्थापित कर सकती है, जैसा कि अधिसूचना में निर्दिष्ट किया जा सकता है।
(ख) इसमें ऐसे सदस्य या सदस्य शामिल होंगे, जैसा कि अधिसूचना में निर्दिष्ट किया जा सकता है, जिनके पास उप-धारा (2) और (3) में निर्दिष्ट योग्यताएं हों।
बशर्ते कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी को ऐसी अतिरिक्त पीठ में नियुक्त किया जाता है, तो वह अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पद से नीचे का अधिकारी नहीं होगा।
(5) न्यायाधिकरण की सदस्यता में कोई रिक्ति होने पर उसे राज्य सरकार द्वारा यथाशीघ्र भरा जाएगा।
(6) स्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति होने तक अध्यक्ष के पद में रिक्ति के दौरान, सरकार शेष सदस्यों में से किसी एक को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकती है।
(7) न्यायाधिकरण के सदस्य के रूप में नियुक्त कोई भी व्यक्ति सामान्यतः तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा:
बशर्ते कि यदि किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया जाता है या किसी अन्य सरकारी कर्मचारी को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधिकरण के सदस्य के रूप में नियुक्त किया जाता है, तो सेवा की शर्तें (उनके वेतन और भत्तों सहित) ऐसी होंगी जैसा कि निर्धारित किया जा सकता है।
(8) (क) न्यायाधिकरण के कार्यों का प्रयोग अध्यक्ष द्वारा गठित एक या दो या तीन सदस्यों वाली पीठ द्वारा किया जाएगा।
(ख) इन दोनों पीठों द्वारा निपटाए जाने वाले मामलों की प्रकृति अध्यक्ष के विवेकाधिकार के अधीन होगी:
बशर्ते कि एक या दो सदस्यों वाली पीठ अपने विवेकानुसार किसी मामले को दो या तीन सदस्यों वाली बड़ी पीठ को भेज सकती है।
(9) (क) जहाँ न्यायाधिकरण के तीनों सदस्यों द्वारा किसी आवेदन की सुनवाई की जाती है और सदस्य किसी बिंदु या बिंदुओं पर राय में विभाजित होते हैं, तो ऐसे बिंदु या बिंदुओं का निर्णय बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा:
बशर्ते कि यदि किसी सदस्य का पद रिक्त हो तो ऐसे बिंदुओं पर अध्यक्ष की राय के अनुसार निर्णय लिया जाएगा।
(ख) जहां किसी आवेदन की सुनवाई दो सदस्यों की पीठ द्वारा की जाती है, चाहे उसमें अध्यक्ष शामिल हो या नहीं, और सदस्य किसी बिंदु या बिंदुओं पर राय में विभाजित हों, तो ऐसे बिंदु या बिंदुओं को तीनों सदस्यों की पीठ को संदर्भित किया जाएगा।
(10) (क) न्यायाधिकरण के सदस्यों को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक माना जाएगा।
(ख) कोई भी सदस्य न्यायाधिकरण की सदस्यता की अवधि के दौरान अपने पद के कर्तव्यों के अलावा कोई अन्य सवैतनिक रोजगार स्वीकार नहीं करेगा।
(11) न्यायाधिकरण, राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति से, इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के प्रावधानों के अनुरूप, अपनी प्रक्रिया और अपने कामकाज के निपटान से संबंधित अन्य मामलों को विनियमित करने के लिए विनियम बनाएगा और ऐसे विनियमों को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित करेगा।
(12) न्यायाधिकरण के सदस्यों की नियुक्ति सामान्यतः उनकी नियुक्ति की तिथि से तीन वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी:
बशर्ते कि राज्य सरकार द्वारा नियुक्ति की अवधि को घटाया या बढ़ाया जा सकता है।
(13) अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य राज्य सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर से लिखित सूचना देकर अपने पद से त्यागपत्र दे सकता है:
बशर्ते कि अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, जब तक कि राज्य सरकार द्वारा उन्हें अपना पद पहले छोड़ने की अनुमति न दी जाए, तब तक ऐसे नोटिस की प्राप्ति की तिथि से तीन महीने की समाप्ति तक या उनके उत्तराधिकारी के रूप में विधिवत नियुक्त व्यक्ति के पदभार ग्रहण करने तक या उनके कार्यकाल की समाप्ति तक, इनमें से जो भी पहले हो, पद पर बने रहेंगे।
(14) न्यायाधिकरण के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा की गई जांच के बाद सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर आदेश न दिया जाए, जिसमें अध्यक्ष या संबंधित किसी अन्य सदस्य को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सूचना दी गई हो और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का उचित अवसर दिया गया हो।
(15) राज्य सरकार नियमों द्वारा अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के दुर्व्यवहार या अक्षमता की जांच की प्रक्रिया को विनियमित कर सकती है।
बशर्ते कि जब तक इस अधिनियम के तहत न्यायाधिकरण का गठन नहीं हो जाता, तब तक धारा 94 द्वारा निरस्त किए जाने से पहले बिहार वित्त अधिनियम, 1981 (बिहार अधिनियम 5 ऑफ 1981) के तहत गठित न्यायाधिकरण को इस अधिनियम के तहत गठित वाणिज्यिक कर न्यायाधिकरण माना जाएगा और वह इस अधिनियम या उस समय लागू किसी अन्य कानून द्वारा प्रदत्त सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा और सभी कार्यों का निष्पादन करेगा।
(2) न्यायाधिकरण का अध्यक्ष सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश होगा, जिसकी आयु पैंसठ वर्ष से अधिक नहीं होगी, या जिला न्यायाधीश के पद का न्यायिक अधिकारी होगा।
(3) अन्य दो सदस्यों में से एक राज्य सरकार के वाणिज्यिक कर विभाग का संयुक्त आयुक्त के पद से कम रैंक का अधिकारी नहीं होगा और तीसरा सदस्य एक ऐसा व्यक्ति होगा--
(क) जो कम से कम दस वर्षों से चार्टर्ड अकाउंटेंट्स अधिनियम, 1949 (38 ऑफ 1949) के तहत चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में या किसी पूर्व में लागू कानून के तहत पंजीकृत अकाउंटेंट के रूप में या आंशिक रूप से पंजीकृत अकाउंटेंट और आंशिक रूप से चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में लेखांकन के अभ्यास में रहा हो; या
(ख) जो भारतीय लेखापरीक्षा एवं लेखा सेवा में उप महालेखाकार के पद से नीचे का अधिकारी न हो या रह चुका हो; या
(ग) जो राज्य सरकार या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम में लेखा प्रशासन या वित्तीय प्रबंधन में कम से कम चार वर्ष का अनुभव रखने वाला सरकारी कर्मचारी हो, चाहे वह सेवारत हो या सेवानिवृत्त।
(4) (क) राज्य सरकार, यदि वह ऐसा करना उचित समझे, तो अधिसूचना द्वारा न्यायाधिकरण की एक या एक से अधिक अतिरिक्त पीठें ऐसे स्थानों पर तथा ऐसे क्षेत्र पर अधिकार क्षेत्र रखते हुए स्थापित कर सकती है, जैसा कि अधिसूचना में निर्दिष्ट किया जा सकता है।
(ख) इसमें ऐसे सदस्य या सदस्य शामिल होंगे, जैसा कि अधिसूचना में निर्दिष्ट किया जा सकता है, जिनके पास उप-धारा (2) और (3) में निर्दिष्ट योग्यताएं हों।
बशर्ते कि यदि किसी न्यायिक अधिकारी को ऐसी अतिरिक्त पीठ में नियुक्त किया जाता है, तो वह अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के पद से नीचे का अधिकारी नहीं होगा।
(5) न्यायाधिकरण की सदस्यता में कोई रिक्ति होने पर उसे राज्य सरकार द्वारा यथाशीघ्र भरा जाएगा।
(6) स्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति होने तक अध्यक्ष के पद में रिक्ति के दौरान, सरकार शेष सदस्यों में से किसी एक को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकती है।
(7) न्यायाधिकरण के सदस्य के रूप में नियुक्त कोई भी व्यक्ति सामान्यतः तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा:
बशर्ते कि यदि किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया जाता है या किसी अन्य सरकारी कर्मचारी को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद न्यायाधिकरण के सदस्य के रूप में नियुक्त किया जाता है, तो सेवा की शर्तें (उनके वेतन और भत्तों सहित) ऐसी होंगी जैसा कि निर्धारित किया जा सकता है।
(8) (क) न्यायाधिकरण के कार्यों का प्रयोग अध्यक्ष द्वारा गठित एक या दो या तीन सदस्यों वाली पीठ द्वारा किया जाएगा।
(ख) इन दोनों पीठों द्वारा निपटाए जाने वाले मामलों की प्रकृति अध्यक्ष के विवेकाधिकार के अधीन होगी:
बशर्ते कि एक या दो सदस्यों वाली पीठ अपने विवेकानुसार किसी मामले को दो या तीन सदस्यों वाली बड़ी पीठ को भेज सकती है।
(9) (क) जहाँ न्यायाधिकरण के तीनों सदस्यों द्वारा किसी आवेदन की सुनवाई की जाती है और सदस्य किसी बिंदु या बिंदुओं पर राय में विभाजित होते हैं, तो ऐसे बिंदु या बिंदुओं का निर्णय बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा:
बशर्ते कि यदि किसी सदस्य का पद रिक्त हो तो ऐसे बिंदुओं पर अध्यक्ष की राय के अनुसार निर्णय लिया जाएगा।
(ख) जहां किसी आवेदन की सुनवाई दो सदस्यों की पीठ द्वारा की जाती है, चाहे उसमें अध्यक्ष शामिल हो या नहीं, और सदस्य किसी बिंदु या बिंदुओं पर राय में विभाजित हों, तो ऐसे बिंदु या बिंदुओं को तीनों सदस्यों की पीठ को संदर्भित किया जाएगा।
(10) (क) न्यायाधिकरण के सदस्यों को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक माना जाएगा।
(ख) कोई भी सदस्य न्यायाधिकरण की सदस्यता की अवधि के दौरान अपने पद के कर्तव्यों के अलावा कोई अन्य सवैतनिक रोजगार स्वीकार नहीं करेगा।
(11) न्यायाधिकरण, राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति से, इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के प्रावधानों के अनुरूप, अपनी प्रक्रिया और अपने कामकाज के निपटान से संबंधित अन्य मामलों को विनियमित करने के लिए विनियम बनाएगा और ऐसे विनियमों को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित करेगा।
(12) न्यायाधिकरण के सदस्यों की नियुक्ति सामान्यतः उनकी नियुक्ति की तिथि से तीन वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी:
बशर्ते कि राज्य सरकार द्वारा नियुक्ति की अवधि को घटाया या बढ़ाया जा सकता है।
(13) अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य राज्य सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर से लिखित सूचना देकर अपने पद से त्यागपत्र दे सकता है:
बशर्ते कि अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, जब तक कि राज्य सरकार द्वारा उन्हें अपना पद पहले छोड़ने की अनुमति न दी जाए, तब तक ऐसे नोटिस की प्राप्ति की तिथि से तीन महीने की समाप्ति तक या उनके उत्तराधिकारी के रूप में विधिवत नियुक्त व्यक्ति के पदभार ग्रहण करने तक या उनके कार्यकाल की समाप्ति तक, इनमें से जो भी पहले हो, पद पर बने रहेंगे।
(14) न्यायाधिकरण के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा की गई जांच के बाद सिद्ध दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर आदेश न दिया जाए, जिसमें अध्यक्ष या संबंधित किसी अन्य सदस्य को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सूचना दी गई हो और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का उचित अवसर दिया गया हो।
(15) राज्य सरकार नियमों द्वारा अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के दुर्व्यवहार या अक्षमता की जांच की प्रक्रिया को विनियमित कर सकती है।
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