IR Code 49अध्याय VII · Mechanism for Resolution of Industrial Disputes
धारा 49 · मध्यस्थ, सुलह अधिकारी, न्यायाधिकरण और राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) इस संहिता के प्रावधानों और इस संबंध में बनाए जाने वाले नियमों के अधीन रहते हुए, मध्यस्थ, सुलह अधिकारी, न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण ऐसी प्रक्रिया का पालन करेगा जिसे मध्यस्थ, सुलह अधिकारी, न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण उचित समझे।
(2) सुलह अधिकारी या न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा इस संबंध में अधिकृत अधिकारी, किसी मौजूदा या संभावित औद्योगिक विवाद की जांच के उद्देश्य से, उचित सूचना देने के बाद, उस प्रतिष्ठान के परिसर में प्रवेश कर सकता है जिससे विवाद संबंधित है।
(3) सुलह अधिकारी, न्यायाधिकरण और राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण को, 1908 की सिविल प्रक्रिया संहिता (1908 का 5) के तहत किसी सिविल न्यायालय को वाद की सुनवाई करते समय, निम्नलिखित मामलों के संबंध में वही शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात्: ---
(क) किसी व्यक्ति की उपस्थिति को लागू करना और उससे शपथ पर पूछताछ करना;
(ख) दस्तावेजों और भौतिक वस्तुओं के उत्पादन को बाध्य करना;
(ग) गवाहों की जांच के लिए आयोग जारी करना;
(घ) ऐसे अन्य मामलों के संबंध में, जैसा कि निर्धारित किया जा सकता है,
और न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा की गई प्रत्येक पूछताछ या जांच को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही माना जाएगा।
(4) सुलह अधिकारी किसी व्यक्ति की जांच के उद्देश्य से उसकी उपस्थिति अनिवार्य कर सकता है या किसी ऐसे दस्तावेज को मंगवाकर उसकी जांच कर सकता है जिसे वह औद्योगिक विवाद से संबंधित मानता हो या किसी निर्णय के कार्यान्वयन को सत्यापित करने या इस संहिता के तहत उस पर लगाए गए किसी अन्य कर्तव्य को पूरा करने के लिए आवश्यक मानता हो, और उपरोक्त उद्देश्यों के लिए सुलह अधिकारी को वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (5 ऑफ 1908) के तहत किसी सिविल न्यायालय को किसी व्यक्ति की उपस्थिति अनिवार्य करने और उसकी जांच करने या दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने के संबंध में प्राप्त हैं।
(5) उपयुक्त सरकार, यदि वह उचित समझे, तो विचाराधीन मामले का विशेष ज्ञान रखने वाले एक या अधिक व्यक्तियों को न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, जैसा भी मामला हो, के समक्ष किसी भी कार्यवाही के संबंध में मूल्यांकनकर्ता या विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त कर सकती है।
(6) सभी सुलह अधिकारी और न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण के सदस्य भारतीय दंड संहिता (45 ऑफ 1860) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक माने जाएंगे।
(7) इस संहिता के अधीन बनाए गए किसी भी नियम के अधीन रहते हुए, किसी न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण के समक्ष किसी भी कार्यवाही की लागत और उससे संबंधित लागतें उस न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण के विवेकाधिकार में होंगी और न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, जैसा भी मामला हो, को यह निर्धारित करने का पूर्ण अधिकार होगा कि ऐसी लागतें किसके द्वारा, किसे, किस सीमा तक और किन शर्तों के अधीन, यदि कोई हो, भुगतान की जानी हैं और उपरोक्त प्रयोजनों के लिए सभी आवश्यक निर्देश देने का अधिकार होगा और ऐसी लागतें, पात्र व्यक्ति द्वारा उपयुक्त सरकार को किए गए आवेदन पर, उस सरकार द्वारा भू-राजस्व के बकाया के समान तरीके से वसूल की जा सकती हैं।
(8) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345, 346 और 348 के प्रयोजनों के लिए प्रत्येक न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण को सिविल न्यायालय माना जाएगा।
(9) किसी न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा या उसके समक्ष दिया गया प्रत्येक पुरस्कार, जारी किया गया आदेश या किया गया समझौता, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश XXI के तहत सिविल न्यायालय के आदेशों और डिक्री के निष्पादन के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निष्पादित किया जाएगा और उस उद्देश्य के लिए ऐसे न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण को सिविल न्यायालय माना जाएगा।
(2) सुलह अधिकारी या न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा इस संबंध में अधिकृत अधिकारी, किसी मौजूदा या संभावित औद्योगिक विवाद की जांच के उद्देश्य से, उचित सूचना देने के बाद, उस प्रतिष्ठान के परिसर में प्रवेश कर सकता है जिससे विवाद संबंधित है।
(3) सुलह अधिकारी, न्यायाधिकरण और राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण को, 1908 की सिविल प्रक्रिया संहिता (1908 का 5) के तहत किसी सिविल न्यायालय को वाद की सुनवाई करते समय, निम्नलिखित मामलों के संबंध में वही शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात्: ---
(क) किसी व्यक्ति की उपस्थिति को लागू करना और उससे शपथ पर पूछताछ करना;
(ख) दस्तावेजों और भौतिक वस्तुओं के उत्पादन को बाध्य करना;
(ग) गवाहों की जांच के लिए आयोग जारी करना;
(घ) ऐसे अन्य मामलों के संबंध में, जैसा कि निर्धारित किया जा सकता है,
और न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा की गई प्रत्येक पूछताछ या जांच को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही माना जाएगा।
(4) सुलह अधिकारी किसी व्यक्ति की जांच के उद्देश्य से उसकी उपस्थिति अनिवार्य कर सकता है या किसी ऐसे दस्तावेज को मंगवाकर उसकी जांच कर सकता है जिसे वह औद्योगिक विवाद से संबंधित मानता हो या किसी निर्णय के कार्यान्वयन को सत्यापित करने या इस संहिता के तहत उस पर लगाए गए किसी अन्य कर्तव्य को पूरा करने के लिए आवश्यक मानता हो, और उपरोक्त उद्देश्यों के लिए सुलह अधिकारी को वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (5 ऑफ 1908) के तहत किसी सिविल न्यायालय को किसी व्यक्ति की उपस्थिति अनिवार्य करने और उसकी जांच करने या दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने के संबंध में प्राप्त हैं।
(5) उपयुक्त सरकार, यदि वह उचित समझे, तो विचाराधीन मामले का विशेष ज्ञान रखने वाले एक या अधिक व्यक्तियों को न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, जैसा भी मामला हो, के समक्ष किसी भी कार्यवाही के संबंध में मूल्यांकनकर्ता या विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त कर सकती है।
(6) सभी सुलह अधिकारी और न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण के सदस्य भारतीय दंड संहिता (45 ऑफ 1860) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक माने जाएंगे।
(7) इस संहिता के अधीन बनाए गए किसी भी नियम के अधीन रहते हुए, किसी न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण के समक्ष किसी भी कार्यवाही की लागत और उससे संबंधित लागतें उस न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण के विवेकाधिकार में होंगी और न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण, जैसा भी मामला हो, को यह निर्धारित करने का पूर्ण अधिकार होगा कि ऐसी लागतें किसके द्वारा, किसे, किस सीमा तक और किन शर्तों के अधीन, यदि कोई हो, भुगतान की जानी हैं और उपरोक्त प्रयोजनों के लिए सभी आवश्यक निर्देश देने का अधिकार होगा और ऐसी लागतें, पात्र व्यक्ति द्वारा उपयुक्त सरकार को किए गए आवेदन पर, उस सरकार द्वारा भू-राजस्व के बकाया के समान तरीके से वसूल की जा सकती हैं।
(8) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345, 346 और 348 के प्रयोजनों के लिए प्रत्येक न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण को सिविल न्यायालय माना जाएगा।
(9) किसी न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण द्वारा या उसके समक्ष दिया गया प्रत्येक पुरस्कार, जारी किया गया आदेश या किया गया समझौता, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश XXI के तहत सिविल न्यायालय के आदेशों और डिक्री के निष्पादन के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार निष्पादित किया जाएगा और उस उद्देश्य के लिए ऐसे न्यायाधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण को सिविल न्यायालय माना जाएगा।
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