IIIT Act 17अध्याय III · Authorities of Indian Institutes of Information Technology Established in Public-private Partnership
धारा 17 · बोर्ड की शक्तियां और कार्य।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) इस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, बोर्ड सामान्य नीति निर्माण, अधीक्षण, दिशा-निर्देश प्रदान करने के लिए उत्तरदायी होगा और धारा 6 में निर्दिष्ट उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संस्थान के मामलों को नियंत्रित करने वाले विधानों और अध्यादेशों को बनाने, संशोधित करने, बदलने या निरस्त करने का अधिकार रखेगा।
(2) उपधारा (1) के प्रावधानों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात्:—
(क) संस्थान से संबंधित नीतिगत प्रश्नों पर निर्णय लेना;
(ख) संस्थान में विभाग, संकाय या अध्ययन विद्यालय स्थापित करना तथा अध्ययन कार्यक्रम या पाठ्यक्रम शुरू करना;
(ग) संस्थान के वार्षिक बजट अनुमानों की जांच और अनुमोदन करना;
(घ) संस्थान के विकास की योजना की जांच और अनुमोदन करना तथा योजना के कार्यान्वयन के लिए वित्त के स्रोतों की पहचान करना;
(ई) शिक्षण, अकादमिक, प्रशासनिक, तकनीकी और अन्य पदों का सृजन करना और उन पर नियुक्तियाँ करना;
(f) संस्थान में शिक्षण और अन्य पदों पर नियुक्ति के लिए योग्यता, मानदंड और प्रक्रियाओं का प्रावधान विधानों द्वारा करना;
(जी) संस्थान में अध्ययन, पाठ्यक्रम या कार्यक्रमों के लिए देय शुल्क और अन्य प्रभारों को मंजूरी देना;
(h) धारा 32 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, ऐसे संस्थान के प्रशासन, प्रबंधन और संचालन को नियंत्रित करने वाले विधान बनाना;
(i) डिग्री, डिप्लोमा और अन्य शैक्षणिक उपाधियाँ या पदवी प्रदान करना, तथा फेलोशिप, छात्रवृत्ति, पुरस्कार और पदक स्थापित करना और प्रदान करना; और
(j) इस अधिनियम या क़ानूनों द्वारा प्रदत्त या अधिसूचित अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और अन्य कर्तव्यों का पालन करना।
(3) बोर्ड, इस अधिनियम और विधानों के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, सीनेट या निदेशक को ऐसी शक्तियाँ और कार्य सौंप सकता है, जैसा बोर्ड उचित समझे।
(4) बोर्ड पांच वर्षों की अवधि के भीतर संस्थान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नीतियां लागू करेगा।
(5) बोर्ड समय-समय पर संस्थान के उद्देश्यों की प्राप्ति में नेतृत्व के संदर्भ में निदेशक के प्रदर्शन की समीक्षा करेगा।
(6) बोर्ड शक्तियों का प्रयोग करते हुए और कार्यों का निर्वहन करते हुए, सीनेट और संकायों या विद्यालयों के विभागों को, जैसा भी मामला हो, शैक्षणिक मामलों में स्वायत्तता प्रदान करने का प्रयास करेगा।
(7) यदि निदेशक या अध्यक्ष की राय में स्थिति इतनी अत्यावश्यक है कि संस्थान के हित में तत्काल निर्णय लेना आवश्यक है, तो अध्यक्ष, निदेशक से परामर्श करके, ऐसे आदेश जारी कर सकता है जो आवश्यक हों, और अपनी राय के आधार लिखित रूप में दर्ज कर सकता है:
बशर्ते कि ऐसे आदेश अगली बैठक में बोर्ड के अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किए जाएंगे।
(2) उपधारा (1) के प्रावधानों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात्:—
(क) संस्थान से संबंधित नीतिगत प्रश्नों पर निर्णय लेना;
(ख) संस्थान में विभाग, संकाय या अध्ययन विद्यालय स्थापित करना तथा अध्ययन कार्यक्रम या पाठ्यक्रम शुरू करना;
(ग) संस्थान के वार्षिक बजट अनुमानों की जांच और अनुमोदन करना;
(घ) संस्थान के विकास की योजना की जांच और अनुमोदन करना तथा योजना के कार्यान्वयन के लिए वित्त के स्रोतों की पहचान करना;
(ई) शिक्षण, अकादमिक, प्रशासनिक, तकनीकी और अन्य पदों का सृजन करना और उन पर नियुक्तियाँ करना;
(f) संस्थान में शिक्षण और अन्य पदों पर नियुक्ति के लिए योग्यता, मानदंड और प्रक्रियाओं का प्रावधान विधानों द्वारा करना;
(जी) संस्थान में अध्ययन, पाठ्यक्रम या कार्यक्रमों के लिए देय शुल्क और अन्य प्रभारों को मंजूरी देना;
(h) धारा 32 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, ऐसे संस्थान के प्रशासन, प्रबंधन और संचालन को नियंत्रित करने वाले विधान बनाना;
(i) डिग्री, डिप्लोमा और अन्य शैक्षणिक उपाधियाँ या पदवी प्रदान करना, तथा फेलोशिप, छात्रवृत्ति, पुरस्कार और पदक स्थापित करना और प्रदान करना; और
(j) इस अधिनियम या क़ानूनों द्वारा प्रदत्त या अधिसूचित अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और अन्य कर्तव्यों का पालन करना।
(3) बोर्ड, इस अधिनियम और विधानों के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, सीनेट या निदेशक को ऐसी शक्तियाँ और कार्य सौंप सकता है, जैसा बोर्ड उचित समझे।
(4) बोर्ड पांच वर्षों की अवधि के भीतर संस्थान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नीतियां लागू करेगा।
(5) बोर्ड समय-समय पर संस्थान के उद्देश्यों की प्राप्ति में नेतृत्व के संदर्भ में निदेशक के प्रदर्शन की समीक्षा करेगा।
(6) बोर्ड शक्तियों का प्रयोग करते हुए और कार्यों का निर्वहन करते हुए, सीनेट और संकायों या विद्यालयों के विभागों को, जैसा भी मामला हो, शैक्षणिक मामलों में स्वायत्तता प्रदान करने का प्रयास करेगा।
(7) यदि निदेशक या अध्यक्ष की राय में स्थिति इतनी अत्यावश्यक है कि संस्थान के हित में तत्काल निर्णय लेना आवश्यक है, तो अध्यक्ष, निदेशक से परामर्श करके, ऐसे आदेश जारी कर सकता है जो आवश्यक हों, और अपनी राय के आधार लिखित रूप में दर्ज कर सकता है:
बशर्ते कि ऐसे आदेश अगली बैठक में बोर्ड के अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किए जाएंगे।
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