IT Act 46अध्याय IX · Penalties, Compensation and Adjudication
धारा 46 · निर्णय करने की शक्ति।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
( 1 ) इस अधिनियम के अंतर्गत यह निर्णय करने के उद्देश्य से कि क्या किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम के किसी प्रावधान या इसके अंतर्गत बनाए गए किसी नियम, विनियम, निर्देश या आदेश का उल्लंघन किया है, जिसके तहत वह दंड या मुआवजा देने के लिए उत्तरदायी है, केंद्र सरकार उपधारा (3) के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, भारत सरकार में निदेशक से कम रैंक के किसी अधिकारी या राज्य सरकार के समकक्ष अधिकारी को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित तरीके से जांच करने के लिए निर्णायक अधिकारी नियुक्त करेगी।
3 [(1ए) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त निर्णय अधिकारी उन मामलों का निर्णय करने के लिए क्षेत्राधिकार का प्रयोग करेगा जिनमें क्षतिपूर्ति का दावा पाँच करोड़ रुपये से अधिक नहीं है: बशर्ते कि पाँच करोड़ रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति के दावे के संबंध में क्षेत्राधिकार सक्षम न्यायालय के पास निहित होगा।]
(2) निर्णय अधिकारी उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति को मामले में प्रतिनिधित्व करने का उचित अवसर देने के बाद, और यदि ऐसी जाँच पर वह संतुष्ट हो जाता है कि व्यक्ति ने उल्लंघन किया है, तो वह उस धारा के प्रावधानों के अनुसार ऐसा दंड लगा सकता है या ऐसा मुआवजा दे सकता है जैसा वह उचित समझे।
(3) किसी भी व्यक्ति को निर्णायक अधिकारी के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा, जब तक कि उसके पास सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ऐसा अनुभव और कानूनी या न्यायिक अनुभव न हो, जैसा कि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
(4) जहाँ एक से अधिक निर्णय अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं, वहाँ केंद्र सरकार आदेश द्वारा उन मामलों और स्थानों को निर्दिष्ट करेगी जिनके संबंध में ऐसे अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करेंगे।
(5) प्रत्येक निर्णय अधिकारी को सिविल न्यायालय की वे शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो धारा 58 की उपधारा (2) के अधीन अपीलीय न्यायाधिकरण को प्रदत्त हैं, और--
(क) इसके समक्ष सभी कार्यवाहियाँ भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही मानी जाएंगी;
(ख) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और 346 के प्रयोजनों के लिए इसे सिविल न्यायालय माना जाएगा;
6 [(सी) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश XXI के प्रयोजनों के लिए इसे सिविल न्यायालय माना जाएगा।]
3 [(1ए) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त निर्णय अधिकारी उन मामलों का निर्णय करने के लिए क्षेत्राधिकार का प्रयोग करेगा जिनमें क्षतिपूर्ति का दावा पाँच करोड़ रुपये से अधिक नहीं है: बशर्ते कि पाँच करोड़ रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति के दावे के संबंध में क्षेत्राधिकार सक्षम न्यायालय के पास निहित होगा।]
(2) निर्णय अधिकारी उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति को मामले में प्रतिनिधित्व करने का उचित अवसर देने के बाद, और यदि ऐसी जाँच पर वह संतुष्ट हो जाता है कि व्यक्ति ने उल्लंघन किया है, तो वह उस धारा के प्रावधानों के अनुसार ऐसा दंड लगा सकता है या ऐसा मुआवजा दे सकता है जैसा वह उचित समझे।
(3) किसी भी व्यक्ति को निर्णायक अधिकारी के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा, जब तक कि उसके पास सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में ऐसा अनुभव और कानूनी या न्यायिक अनुभव न हो, जैसा कि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
(4) जहाँ एक से अधिक निर्णय अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं, वहाँ केंद्र सरकार आदेश द्वारा उन मामलों और स्थानों को निर्दिष्ट करेगी जिनके संबंध में ऐसे अधिकारी अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करेंगे।
(5) प्रत्येक निर्णय अधिकारी को सिविल न्यायालय की वे शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो धारा 58 की उपधारा (2) के अधीन अपीलीय न्यायाधिकरण को प्रदत्त हैं, और--
(क) इसके समक्ष सभी कार्यवाहियाँ भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही मानी जाएंगी;
(ख) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और 346 के प्रयोजनों के लिए इसे सिविल न्यायालय माना जाएगा;
6 [(सी) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के आदेश XXI के प्रयोजनों के लिए इसे सिविल न्यायालय माना जाएगा।]
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