CP Act 58अध्याय IV · Consumer Disputes Redressal Commission
धारा 58 · राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिकता
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रीय आयोग को निम्नलिखित की अधिकारिता होगी—
(क) (i) उन परिवादों को ग्रहण करना जिनमें माल या सेवाओं का प्रतिफल के रूप में संदत्त मूल्य दस करोड़ रुपए से अधिक है:
परंतु जहां केन्द्रीय सरकार ऐसा करना आवश्यक समझती है वहां वह ऐसा अन्य मूल्य विहित कर सकेगी, जो वह ठीक समझे;
(ii) अनुचित संविदाओं के विरुद्ध परिवाद जहां माल या सेवाओं का प्रतिफल के रूप में संदत्त मूल्य दस करोड़ रुपए से अधिक है:
(iii) किसी राज्य आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपीलें;
(iv) केन्द्रीय प्राधिकारी के आदेशों के विरुद्ध अपीलें और
(ख) जहां राष्ट्रीय आयोग को यह प्रतीत होता है कि ऐसे राज्य आयोग ने ऐसी किसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो विधि द्वारा उसमें निहित नहीं है या जो इस प्रकार निहित अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है या उसने अपनी अधिकारिता का प्रयोग अवैध रूप से या तात्त्विक अनियमितता से किया है वहां किसी भी उपभोक्ता विवाद में, जो राज्य के भीतर किसी राज्य आयोग के समक्ष लंबित है या जिसका विनिश्चय उसके द्वारा किया गया है, अभिलेखों को मंगाना और समुचित आदेश पारित करना ।
(2) राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा और न्यायपीठ का गठन अध्यक्ष द्वारा ऐसे एक या अधिक सदस्यों से किया जा सकेगा जो अध्यक्ष ठीक समझे:
परंतु न्यायपीठ का ज्येठतम सदस्य न्यायपीठ की अध्यक्षता करेगा।
(3) जहां न्यायपीठ के सदस्यों में किसी मुद्दे पर मतभेद है, वहां यदि बहुमत है, तो मुद्दे बहुमत की राय के अनुसार विनिश्चित किए जाएंगे, किन्तु यदि सदस्य बराबर-बराबर बंट जाते हैं तो वे उस मुद्दे या उन मुद्दों का कथन करेंगे जिन पर उनका मतभेद है और अध्यक्ष को निर्देश करेंगे जो या तो मुद्दे या मुद्दों को स्वयं सुनेगा या मामले को अन्य एक या अधिक सदस्यों द्वारा ऐसे मुद्दे या मुद्दों पर सुनवाई के लिए निर्दिष्ट करेगा और ऐसे मुद्दे या मुद्दों को उन सदस्यों की राय के अनुसार विनिश्चित किया जाएगा जिन्होंने मामले की सुनवाई की है जिनमें वे सदस्य भी हैं, जिन्होंने उसकी पहले सुनवाई की थी:
परंतु, यथास्थिति, अध्यक्ष या अन्य सदस्य ऐसे निर्देश की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर इस प्रकार निर्दिष्ट मुद्दे या मुद्दों पर राय देगा।
(क) (i) उन परिवादों को ग्रहण करना जिनमें माल या सेवाओं का प्रतिफल के रूप में संदत्त मूल्य दस करोड़ रुपए से अधिक है:
परंतु जहां केन्द्रीय सरकार ऐसा करना आवश्यक समझती है वहां वह ऐसा अन्य मूल्य विहित कर सकेगी, जो वह ठीक समझे;
(ii) अनुचित संविदाओं के विरुद्ध परिवाद जहां माल या सेवाओं का प्रतिफल के रूप में संदत्त मूल्य दस करोड़ रुपए से अधिक है:
(iii) किसी राज्य आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपीलें;
(iv) केन्द्रीय प्राधिकारी के आदेशों के विरुद्ध अपीलें और
(ख) जहां राष्ट्रीय आयोग को यह प्रतीत होता है कि ऐसे राज्य आयोग ने ऐसी किसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो विधि द्वारा उसमें निहित नहीं है या जो इस प्रकार निहित अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है या उसने अपनी अधिकारिता का प्रयोग अवैध रूप से या तात्त्विक अनियमितता से किया है वहां किसी भी उपभोक्ता विवाद में, जो राज्य के भीतर किसी राज्य आयोग के समक्ष लंबित है या जिसका विनिश्चय उसके द्वारा किया गया है, अभिलेखों को मंगाना और समुचित आदेश पारित करना ।
(2) राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा और न्यायपीठ का गठन अध्यक्ष द्वारा ऐसे एक या अधिक सदस्यों से किया जा सकेगा जो अध्यक्ष ठीक समझे:
परंतु न्यायपीठ का ज्येठतम सदस्य न्यायपीठ की अध्यक्षता करेगा।
(3) जहां न्यायपीठ के सदस्यों में किसी मुद्दे पर मतभेद है, वहां यदि बहुमत है, तो मुद्दे बहुमत की राय के अनुसार विनिश्चित किए जाएंगे, किन्तु यदि सदस्य बराबर-बराबर बंट जाते हैं तो वे उस मुद्दे या उन मुद्दों का कथन करेंगे जिन पर उनका मतभेद है और अध्यक्ष को निर्देश करेंगे जो या तो मुद्दे या मुद्दों को स्वयं सुनेगा या मामले को अन्य एक या अधिक सदस्यों द्वारा ऐसे मुद्दे या मुद्दों पर सुनवाई के लिए निर्दिष्ट करेगा और ऐसे मुद्दे या मुद्दों को उन सदस्यों की राय के अनुसार विनिश्चित किया जाएगा जिन्होंने मामले की सुनवाई की है जिनमें वे सदस्य भी हैं, जिन्होंने उसकी पहले सुनवाई की थी:
परंतु, यथास्थिति, अध्यक्ष या अन्य सदस्य ऐसे निर्देश की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर इस प्रकार निर्दिष्ट मुद्दे या मुद्दों पर राय देगा।
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