CP Act 38अध्याय IV · Consumer Disputes Redressal Commission
धारा 38 · शिकायत दर्ज होने पर प्रक्रिया।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) जिला आयोग शिकायत स्वीकार किए जाने पर, या मध्यस्थता द्वारा निपटारे में विफल रहने पर मध्यस्थता के लिए भेजे गए मामलों के संबंध में, ऐसी शिकायत पर आगे बढ़ेगा।
(2) यदि शिकायत किसी माल से संबंधित हो, तो जिला आयोग,--
(क) स्वीकृत शिकायत की एक प्रति, शिकायत में उल्लिखित विपक्षी पक्ष को, उसके स्वीकार किए जाने की तिथि से इक्कीस दिनों के भीतर संदर्भित की जाए, जिसमें उसे तीस दिनों की अवधि के भीतर या उसके द्वारा दी गई पंद्रह दिनों से अधिक की विस्तारित अवधि के भीतर मामले का अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया जाए;
(ख) यदि विपक्षी पक्ष खंड (क) के अधीन उसे भेजी गई शिकायत प्राप्त होने पर शिकायत में निहित आरोपों का खंडन करता है या विवाद करता है, या जिला आयोग द्वारा दिए गए समय के भीतर अपने मामले का प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई कार्रवाई करने में चूक करता है या विफल रहता है, तो खंड ( ग ) से ( घ ) में निर्दिष्ट तरीके से उपभोक्ता विवाद का निपटारा करने की कार्यवाही करें;
(ग) यदि शिकायत में माल में किसी ऐसे दोष का आरोप लगाया गया है जिसे माल के उचित विश्लेषण या परीक्षण के बिना निर्धारित नहीं किया जा सकता है, तो शिकायतकर्ता से माल का एक नमूना प्राप्त करें, उसे सील करें और निर्धारित तरीके से प्रमाणित करें और इस प्रकार सील किए गए नमूने को उपयुक्त प्रयोगशाला को इस निर्देश के साथ भेजें कि ऐसी प्रयोगशाला आवश्यक विश्लेषण या परीक्षण करे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या माल शिकायत में बताए गए किसी दोष या किसी अन्य दोष से ग्रसित है और संदर्भ प्राप्त होने के पैंतालीस दिनों के भीतर या उसके द्वारा दी गई विस्तारित अवधि के भीतर जिला आयोग को अपने निष्कर्षों की रिपोर्ट प्रस्तुत करे;
(घ) माल के किसी भी नमूने को खंड (ग) के तहत किसी उपयुक्त प्रयोगशाला में भेजने से पहले, शिकायतकर्ता को आयोग के खाते में निर्दिष्ट शुल्क जमा करने की आवश्यकता होगी, जिसका भुगतान संबंधित माल के संबंध में आवश्यक विश्लेषण या परीक्षण करने के लिए उपयुक्त प्रयोगशाला को किया जाएगा;
(ई) खंड (घ) के अंतर्गत अपने खाते में जमा की गई राशि को उपयुक्त प्रयोगशाला को भेजेगा ताकि वह खंड (ग) में उल्लिखित विश्लेषण या परीक्षण कर सके और उपयुक्त प्रयोगशाला से रिपोर्ट प्राप्त होने पर, वह रिपोर्ट की एक प्रति, साथ ही ऐसी टिप्पणियाँ जो वह उचित समझे, विपक्षी पक्ष को अग्रेषित करेगा;
(f) यदि कोई भी पक्ष उपयुक्त प्रयोगशाला के निष्कर्षों की शुद्धता पर विवाद करता है, या उपयुक्त प्रयोगशाला द्वारा अपनाई गई विश्लेषण या परीक्षण विधियों की शुद्धता पर विवाद करता है, तो विपरीत पक्ष या शिकायतकर्ता को उपयुक्त प्रयोगशाला द्वारा बनाई गई रिपोर्ट के संबंध में अपनी आपत्तियां लिखित में प्रस्तुत करने की आवश्यकता होगी;
(g) शिकायतकर्ता और विपक्षी पक्ष को उपयुक्त प्रयोगशाला द्वारा दी गई रिपोर्ट की सत्यता या असत्यता के संबंध में और खंड (f) के अंतर्गत उससे संबंधित आपत्ति के संबंध में सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करना तथा धारा 39 के अंतर्गत उपयुक्त आदेश जारी करना।
(3) यदि धारा 36 की उपधारा (2) के अंतर्गत जिला आयोग द्वारा स्वीकार की गई शिकायत उन वस्तुओं से संबंधित है जिनके संबंध में उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा सकता है, या यदि शिकायत किसी सेवा से संबंधित है, तो जिला आयोग,--
(क) ऐसी शिकायत की एक प्रति विपक्षी पक्ष को भेजी जाए और उसे तीस दिनों की अवधि के भीतर या जिला आयोग द्वारा दी गई पंद्रह दिनों से अधिक की विस्तारित अवधि के भीतर मामले का अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया जाए;
(ख) यदि विपक्षी पक्ष, खंड (क) के अधीन उसे भेजी गई शिकायत की प्रति प्राप्त होने पर, शिकायत में निहित आरोपों का खंडन करता है या उन पर विवाद करता है, या जिला आयोग द्वारा दिए गए समय के भीतर अपना पक्ष रखने के लिए कोई कार्रवाई करने में चूक करता है या विफल रहता है, तो जिला आयोग उपभोक्ता विवाद का निपटारा करने की कार्यवाही करेगा।
(i) शिकायतकर्ता और विपक्षी पक्ष द्वारा उसके संज्ञान में लाए गए साक्ष्यों के आधार पर, यदि विपक्षी पक्ष शिकायत में निहित आरोपों का खंडन करता है या उन पर विवाद करता है, या
(ii) शिकायतकर्ता द्वारा इसके संज्ञान में लाए गए साक्ष्य के आधार पर एकतरफा , जहां विपक्षी पक्ष आयोग द्वारा दिए गए समय के भीतर अपने मामले का प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई कार्रवाई करने में चूक करता है या विफल रहता है;
(ग) यदि शिकायतकर्ता सुनवाई की तारीख पर उपस्थित नहीं होता है तो शिकायत का निर्णय गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा।
(4) उपधारा ( 2 ) और ( 3 ) के प्रयोजनों के लिए, जिला आयोग आदेश द्वारा किसी इलेक्ट्रॉनिक सेवा प्रदाता से ऐसी सूचना, दस्तावेज या अभिलेख प्रदान करने की अपेक्षा कर सकता है, जैसा कि उस आदेश में निर्दिष्ट किया गया हो।
(5) उपधारा ( 2 ) और ( 3 ) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने वाली कोई भी कार्यवाही किसी भी न्यायालय में इस आधार पर प्रश्न में नहीं उठाई जाएगी कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया है।
(6) प्रत्येक शिकायत की सुनवाई जिला आयोग द्वारा शपथ पत्र और अभिलेख में रखे गए दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी:
बशर्ते कि जहां पक्षों की व्यक्तिगत रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई या परीक्षा के लिए आवेदन किया जाता है, वहां जिला आयोग पर्याप्त कारण बताए जाने पर और अपने कारणों को लिखित रूप में दर्ज करने के बाद इसकी अनुमति दे सकता है।
(7) प्रत्येक शिकायत का यथाशीघ्र निपटारा किया जाएगा और यह प्रयास किया जाएगा कि शिकायत का निपटारा विपक्षी पक्ष द्वारा नोटिस प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने की अवधि के भीतर किया जाए, यदि शिकायत में वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की आवश्यकता नहीं है, और यदि इसमें वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की आवश्यकता है तो पांच महीने के भीतर किया जाए।
बशर्ते कि जिला आयोग द्वारा सामान्यतः स्थगन तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि पर्याप्त कारण न बताया जाए और स्थगन देने के कारणों को आयोग द्वारा लिखित रूप में दर्ज न किया गया हो:
इसके अलावा, जिला आयोग स्थगन के कारण हुए खर्चों के संबंध में ऐसे आदेश जारी करेगा जो विनियमों द्वारा निर्दिष्ट किए जा सकते हैं:
इसके अलावा, यदि किसी शिकायत का निपटारा निर्धारित अवधि के बाद किया जाता है, तो जिला आयोग उक्त शिकायत के निपटारे के समय इसके कारणों को लिखित रूप में दर्ज करेगा।
(8) जिला आयोग के समक्ष किसी कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान, यदि आवश्यक प्रतीत हो, तो वह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में उचित और न्यायसंगत अंतरिम आदेश पारित कर सकता है।
(9) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, जिला आयोग को वही शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय को निम्नलिखित मामलों के संबंध में वाद की सुनवाई करते समय प्राप्त होती हैं, अर्थात्:--
(क) किसी प्रतिवादी या गवाह को बुलाना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा शपथ पर गवाह से पूछताछ करना;
(ख) साक्ष्य के रूप में किसी दस्तावेज या अन्य भौतिक वस्तु की खोज और प्रस्तुति की आवश्यकता;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना;
(घ) संबंधित विश्लेषण या परीक्षण की रिपोर्ट उपयुक्त प्रयोगशाला या किसी अन्य प्रासंगिक स्रोत से मंगवाना;
(ई) किसी गवाह या दस्तावेज़ की जांच के लिए कमीशन जारी करना; और
(f) कोई अन्य मामला जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
(10) जिला आयोग के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही माना जाएगा, और जिला आयोग को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय XXVI के प्रयोजनों के लिए आपराधिक न्यायालय माना जाएगा।
(11) जहां शिकायतकर्ता धारा 2 के खंड (5) के उपखंड (v) में निर्दिष्ट उपभोक्ता है, वहां सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची के आदेश 1 नियम 8 के प्रावधान लागू होंगे, इस संशोधन के अधीन कि उसमें किसी वाद या डिक्री के प्रत्येक संदर्भ को शिकायत या जिला आयोग के उस पर दिए गए आदेश के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा।
(12) यदि शिकायतकर्ता, जो उपभोक्ता है, या विपक्षी पक्ष, जिसके विरुद्ध शिकायत दर्ज की गई है, की मृत्यु हो जाती है, तो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (5 ऑफ 1908) की प्रथम अनुसूची के आदेश XXII के प्रावधान लागू होंगे, इस संशोधन के साथ कि उसमें वादी और प्रतिवादी के प्रत्येक संदर्भ को शिकायतकर्ता या विपक्षी पक्ष के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा, जैसा भी मामला हो।
(2) यदि शिकायत किसी माल से संबंधित हो, तो जिला आयोग,--
(क) स्वीकृत शिकायत की एक प्रति, शिकायत में उल्लिखित विपक्षी पक्ष को, उसके स्वीकार किए जाने की तिथि से इक्कीस दिनों के भीतर संदर्भित की जाए, जिसमें उसे तीस दिनों की अवधि के भीतर या उसके द्वारा दी गई पंद्रह दिनों से अधिक की विस्तारित अवधि के भीतर मामले का अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया जाए;
(ख) यदि विपक्षी पक्ष खंड (क) के अधीन उसे भेजी गई शिकायत प्राप्त होने पर शिकायत में निहित आरोपों का खंडन करता है या विवाद करता है, या जिला आयोग द्वारा दिए गए समय के भीतर अपने मामले का प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई कार्रवाई करने में चूक करता है या विफल रहता है, तो खंड ( ग ) से ( घ ) में निर्दिष्ट तरीके से उपभोक्ता विवाद का निपटारा करने की कार्यवाही करें;
(ग) यदि शिकायत में माल में किसी ऐसे दोष का आरोप लगाया गया है जिसे माल के उचित विश्लेषण या परीक्षण के बिना निर्धारित नहीं किया जा सकता है, तो शिकायतकर्ता से माल का एक नमूना प्राप्त करें, उसे सील करें और निर्धारित तरीके से प्रमाणित करें और इस प्रकार सील किए गए नमूने को उपयुक्त प्रयोगशाला को इस निर्देश के साथ भेजें कि ऐसी प्रयोगशाला आवश्यक विश्लेषण या परीक्षण करे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या माल शिकायत में बताए गए किसी दोष या किसी अन्य दोष से ग्रसित है और संदर्भ प्राप्त होने के पैंतालीस दिनों के भीतर या उसके द्वारा दी गई विस्तारित अवधि के भीतर जिला आयोग को अपने निष्कर्षों की रिपोर्ट प्रस्तुत करे;
(घ) माल के किसी भी नमूने को खंड (ग) के तहत किसी उपयुक्त प्रयोगशाला में भेजने से पहले, शिकायतकर्ता को आयोग के खाते में निर्दिष्ट शुल्क जमा करने की आवश्यकता होगी, जिसका भुगतान संबंधित माल के संबंध में आवश्यक विश्लेषण या परीक्षण करने के लिए उपयुक्त प्रयोगशाला को किया जाएगा;
(ई) खंड (घ) के अंतर्गत अपने खाते में जमा की गई राशि को उपयुक्त प्रयोगशाला को भेजेगा ताकि वह खंड (ग) में उल्लिखित विश्लेषण या परीक्षण कर सके और उपयुक्त प्रयोगशाला से रिपोर्ट प्राप्त होने पर, वह रिपोर्ट की एक प्रति, साथ ही ऐसी टिप्पणियाँ जो वह उचित समझे, विपक्षी पक्ष को अग्रेषित करेगा;
(f) यदि कोई भी पक्ष उपयुक्त प्रयोगशाला के निष्कर्षों की शुद्धता पर विवाद करता है, या उपयुक्त प्रयोगशाला द्वारा अपनाई गई विश्लेषण या परीक्षण विधियों की शुद्धता पर विवाद करता है, तो विपरीत पक्ष या शिकायतकर्ता को उपयुक्त प्रयोगशाला द्वारा बनाई गई रिपोर्ट के संबंध में अपनी आपत्तियां लिखित में प्रस्तुत करने की आवश्यकता होगी;
(g) शिकायतकर्ता और विपक्षी पक्ष को उपयुक्त प्रयोगशाला द्वारा दी गई रिपोर्ट की सत्यता या असत्यता के संबंध में और खंड (f) के अंतर्गत उससे संबंधित आपत्ति के संबंध में सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करना तथा धारा 39 के अंतर्गत उपयुक्त आदेश जारी करना।
(3) यदि धारा 36 की उपधारा (2) के अंतर्गत जिला आयोग द्वारा स्वीकार की गई शिकायत उन वस्तुओं से संबंधित है जिनके संबंध में उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा सकता है, या यदि शिकायत किसी सेवा से संबंधित है, तो जिला आयोग,--
(क) ऐसी शिकायत की एक प्रति विपक्षी पक्ष को भेजी जाए और उसे तीस दिनों की अवधि के भीतर या जिला आयोग द्वारा दी गई पंद्रह दिनों से अधिक की विस्तारित अवधि के भीतर मामले का अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया जाए;
(ख) यदि विपक्षी पक्ष, खंड (क) के अधीन उसे भेजी गई शिकायत की प्रति प्राप्त होने पर, शिकायत में निहित आरोपों का खंडन करता है या उन पर विवाद करता है, या जिला आयोग द्वारा दिए गए समय के भीतर अपना पक्ष रखने के लिए कोई कार्रवाई करने में चूक करता है या विफल रहता है, तो जिला आयोग उपभोक्ता विवाद का निपटारा करने की कार्यवाही करेगा।
(i) शिकायतकर्ता और विपक्षी पक्ष द्वारा उसके संज्ञान में लाए गए साक्ष्यों के आधार पर, यदि विपक्षी पक्ष शिकायत में निहित आरोपों का खंडन करता है या उन पर विवाद करता है, या
(ii) शिकायतकर्ता द्वारा इसके संज्ञान में लाए गए साक्ष्य के आधार पर एकतरफा , जहां विपक्षी पक्ष आयोग द्वारा दिए गए समय के भीतर अपने मामले का प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई कार्रवाई करने में चूक करता है या विफल रहता है;
(ग) यदि शिकायतकर्ता सुनवाई की तारीख पर उपस्थित नहीं होता है तो शिकायत का निर्णय गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा।
(4) उपधारा ( 2 ) और ( 3 ) के प्रयोजनों के लिए, जिला आयोग आदेश द्वारा किसी इलेक्ट्रॉनिक सेवा प्रदाता से ऐसी सूचना, दस्तावेज या अभिलेख प्रदान करने की अपेक्षा कर सकता है, जैसा कि उस आदेश में निर्दिष्ट किया गया हो।
(5) उपधारा ( 2 ) और ( 3 ) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने वाली कोई भी कार्यवाही किसी भी न्यायालय में इस आधार पर प्रश्न में नहीं उठाई जाएगी कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया है।
(6) प्रत्येक शिकायत की सुनवाई जिला आयोग द्वारा शपथ पत्र और अभिलेख में रखे गए दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी:
बशर्ते कि जहां पक्षों की व्यक्तिगत रूप से या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई या परीक्षा के लिए आवेदन किया जाता है, वहां जिला आयोग पर्याप्त कारण बताए जाने पर और अपने कारणों को लिखित रूप में दर्ज करने के बाद इसकी अनुमति दे सकता है।
(7) प्रत्येक शिकायत का यथाशीघ्र निपटारा किया जाएगा और यह प्रयास किया जाएगा कि शिकायत का निपटारा विपक्षी पक्ष द्वारा नोटिस प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने की अवधि के भीतर किया जाए, यदि शिकायत में वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की आवश्यकता नहीं है, और यदि इसमें वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की आवश्यकता है तो पांच महीने के भीतर किया जाए।
बशर्ते कि जिला आयोग द्वारा सामान्यतः स्थगन तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि पर्याप्त कारण न बताया जाए और स्थगन देने के कारणों को आयोग द्वारा लिखित रूप में दर्ज न किया गया हो:
इसके अलावा, जिला आयोग स्थगन के कारण हुए खर्चों के संबंध में ऐसे आदेश जारी करेगा जो विनियमों द्वारा निर्दिष्ट किए जा सकते हैं:
इसके अलावा, यदि किसी शिकायत का निपटारा निर्धारित अवधि के बाद किया जाता है, तो जिला आयोग उक्त शिकायत के निपटारे के समय इसके कारणों को लिखित रूप में दर्ज करेगा।
(8) जिला आयोग के समक्ष किसी कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान, यदि आवश्यक प्रतीत हो, तो वह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में उचित और न्यायसंगत अंतरिम आदेश पारित कर सकता है।
(9) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, जिला आयोग को वही शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय को निम्नलिखित मामलों के संबंध में वाद की सुनवाई करते समय प्राप्त होती हैं, अर्थात्:--
(क) किसी प्रतिवादी या गवाह को बुलाना और उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा शपथ पर गवाह से पूछताछ करना;
(ख) साक्ष्य के रूप में किसी दस्तावेज या अन्य भौतिक वस्तु की खोज और प्रस्तुति की आवश्यकता;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना;
(घ) संबंधित विश्लेषण या परीक्षण की रिपोर्ट उपयुक्त प्रयोगशाला या किसी अन्य प्रासंगिक स्रोत से मंगवाना;
(ई) किसी गवाह या दस्तावेज़ की जांच के लिए कमीशन जारी करना; और
(f) कोई अन्य मामला जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
(10) जिला आयोग के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही माना जाएगा, और जिला आयोग को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय XXVI के प्रयोजनों के लिए आपराधिक न्यायालय माना जाएगा।
(11) जहां शिकायतकर्ता धारा 2 के खंड (5) के उपखंड (v) में निर्दिष्ट उपभोक्ता है, वहां सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची के आदेश 1 नियम 8 के प्रावधान लागू होंगे, इस संशोधन के अधीन कि उसमें किसी वाद या डिक्री के प्रत्येक संदर्भ को शिकायत या जिला आयोग के उस पर दिए गए आदेश के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा।
(12) यदि शिकायतकर्ता, जो उपभोक्ता है, या विपक्षी पक्ष, जिसके विरुद्ध शिकायत दर्ज की गई है, की मृत्यु हो जाती है, तो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (5 ऑफ 1908) की प्रथम अनुसूची के आदेश XXII के प्रावधान लागू होंगे, इस संशोधन के साथ कि उसमें वादी और प्रतिवादी के प्रत्येक संदर्भ को शिकायतकर्ता या विपक्षी पक्ष के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा, जैसा भी मामला हो।
इस धारा पर आपका निजी नोट
यह नोट सिर्फ़ आप देख सकते हैं।
