Copyright Act 32Aअध्याय VI · Licences
धारा 32A · कतिपय प्रयोजनों के लिए कृतियां पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के लिए अनुज्ञप्ति
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) जहां किसी साहित्यिक, वैज्ञानिक या कलात्मक कृति के संस्करण के प्रथम प्रकाशन की तारीख से सुसंगत अवधि के अवसान के पश्चात्: -
(क) ऐसे संस्करण की प्रतियां भारत में उपलब्ध नहीं कराई जाती हैं; या
(ख) ऐसी प्रतियां भारत में छह मास की अवधि तक जनसाधारण के लिए या व्यवस्थित शिक्षण क्रियाकलाप के संबंध में ऐसी कीमत पर विक्रय के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई हैं, जिसका उस कीमत से युक्तियुक्त रूप से संबंध है जो पुनरुत्पादन अधिकार के स्वामी द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा सदृश्य कृतियों के लिए सामान्यतः भारत में प्रभारित की जाती हैं,
वहां कोई भी व्यक्ति ऐसी कृति का पुनरुत्पादन करने और ऐसी कृति के मुद्रित रूप में या पुनरुत्पादन के सदृश्य रूपों में ऐसी कीमत पर, जिस पर ऐसे संस्करण का विक्रय किया जाता है या व्यवस्थित शिक्षण क्रियाकलाप के प्रयोजनों के लिए उससे कम कीमत पर प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति के लिए प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन कर सकेगा ।
(2) ऐसा प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में किया जाएगा जो विहित किया जाए और उसमें पुनरुत्पादित की जाने वाली कृति की प्रस्थापित फुटकर कीमत कथित होगी ।
(3) इस धारा के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए प्रत्येक आवेदक अपने आवेदन के साथ प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के पास ऐसी फीस जमा करेगा जो विहित की जाए ।
(4) जहां इस धारा के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन किया जाता है वहां वह ऐसी जांच करने के पश्चात् जो विहित की जाए, आवेदन में उल्लिखित कृति के पुनरुत्पादन को उत्पादित और प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति, जो अनन्य अनुज्ञप्ति न हो, निम्नलिखित शर्तों के अधीन रहते हुए आवेदक को अनुदत्त कर सकेगा कि: -
(i) आवेदक, कृति के पुनरुत्पादन की ऐसी प्रतियों की बाबत, जिनका सार्वजनिक विक्रय हुआ है, कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को ऐसी दर से परिकलित स्वामिस्वों का संदाय करेगा जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड प्रत्येक मामले की परिस्थितियों में विहित रीति से अवधारित करे;
(ii) इस धारा के अधीन अनुदत्त अनुज्ञप्ति का विस्तार कृति के पुनरुत्पादन की प्रतियों के भारत के बाहर निर्यात पर नहीं होगा और ऐसे पुनरुत्पादन की प्रत्येक प्रति में इस बात की सूचना होगी कि प्रति केवल भारत में वितरण के लिए उपलब्ध है:
परंतु ऐसी कोई अनुज्ञप्ति उस दशा में के सिवाय अनुदत्त नहीं की जाएगी जिसमें-
(क) आवेदक ने प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया है कि उसने कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी से ऐसी प्रति को पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के प्राधिकार के लिए निवेदन किया था और उसे प्राधिकार देने से इंकार कर दिया गया था या कि वह अपनी ओर से सम्यक् तत्परता बरतने के पश्चात् प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का पता लगाने में असमर्थ था;
(ख) जहां आवेदक प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का पता लगाने में असमर्थ था, उसने ऐसे प्राधिकार के लिए रजिस्ट्रीकृत हवाई डाक द्वारा अपने निवेदन की एक प्रति उस प्रकाशक को, जिसका नाम कृति से प्रकट होता है अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन से कम से कम तीन मास पहले भेज दी थी;
(ग) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का समाधान हो जाता है कि आवेदक कृति के यथार्थ पुनरुत्पादन को पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के लिए सक्षम है और उसके पास प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को उन स्वामिस्वों का संदाय करने के साधन हैं जो उसे इस धारा के अधीन संदेय हैं;
(घ) आवेदक कृति को ऐसी कीमत पर पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने का वचनबंध करता है जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा नियत की जाए और जिसका उस कीमत से युक्तियुक्त रूप से संबंध हो, जो उन्हीं या समरूप विषयों पर वैसे ही स्तर की कृतियों के लिए सामान्यतः भारत में प्रभारित की जाती हैं;
(ङ) खंड (क) के अधीन निवेदन किए जाने की तारीख से या जहां निवेदन की प्रति खंड (ख) के अधीन भेजी गई है वहां प्रति भेजने की तारीख से प्रकृति विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित या प्रौद्योगिकी की किसी कृति के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए आवेदन की दशा में छह मास की अवधि या किसी अन्य कार्य के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए आवेदन की दशा में तीन मास की अवधि बीत गई है और उस कृति के पुनरुत्पादन को कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी द्वारा या, उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा, यथास्थिति, छह मास या तीन मास की उक्त अवधि के भीतर प्रकाशित नहीं किया गया है;
(च) जिस कृति को पुनरुत्पादित किया जाना प्रस्थापित है उसके रचयिता का नाम और विशिष्ट संस्करण का नाम पुनरुत्पादन की सभी प्रतियों पर मुद्रित किया जाता है;
(छ) रचयिता ने कृति की प्रतियों को परिचालन से वापस नहीं लिया है; और
(ज) जहां कहीं भी व्यवहार्य हो, कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को सुनवाई का अवसर दिया गया है ।
(5) किसी कृति का कोई भाषांतर पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के लिए इस धारा के अधीन कोई अनुज्ञप्ति उस दशा के सिवाय अनुदत्त नहीं की जाएगी जिसमें भाषांतर के अधिकार के स्वामी या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा ऐसा भाषांतर प्रकाशित कर दिया गया है और भाषांतर ऐसी भाषा में नहीं है जिसका भारत में साधारणतः प्रयोग किया जाता है ।
(6) इस धारा के उपबंध व्यवस्थित शिक्षण कार्यकलाप के एकमात्र प्रयोजन के लिए दृश्य-श्रव्य स्थायीकरण में निबद्ध किसी पाठ के पुनरुत्पादन और प्रकाशन या भारत में साधारणतः प्रयोग की जाने वाली भाषा में भाषांतर को भी लागू होंगे ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी कृति के संबंध में सुसंगत अवधि" से निम्नलिखित अवधि अभिप्रेत है-
(क) जहां आवेदन कथा-साहित्य, कविता, नाटक, संगीत या कला की या उससे संबंधित किसी कृति के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए है वहां उस कृति के प्रथम प्रकाशन की तारीख से सात वर्ष;
(ख) जहां आवेदन प्रकृति विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित या प्रौद्योगिकी की या उससे संबंधित किसी कृति के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए है वहां उस कृति के प्रथम प्रकाशन की तारीख से तीन वर्ष; और
(ग) किसी अन्य दशा में, उस कृति के प्रथम प्रकाशन की तारीख से पांच वर्ष ।
(क) ऐसे संस्करण की प्रतियां भारत में उपलब्ध नहीं कराई जाती हैं; या
(ख) ऐसी प्रतियां भारत में छह मास की अवधि तक जनसाधारण के लिए या व्यवस्थित शिक्षण क्रियाकलाप के संबंध में ऐसी कीमत पर विक्रय के लिए उपलब्ध नहीं कराई गई हैं, जिसका उस कीमत से युक्तियुक्त रूप से संबंध है जो पुनरुत्पादन अधिकार के स्वामी द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा सदृश्य कृतियों के लिए सामान्यतः भारत में प्रभारित की जाती हैं,
वहां कोई भी व्यक्ति ऐसी कृति का पुनरुत्पादन करने और ऐसी कृति के मुद्रित रूप में या पुनरुत्पादन के सदृश्य रूपों में ऐसी कीमत पर, जिस पर ऐसे संस्करण का विक्रय किया जाता है या व्यवस्थित शिक्षण क्रियाकलाप के प्रयोजनों के लिए उससे कम कीमत पर प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति के लिए प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन कर सकेगा ।
(2) ऐसा प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में किया जाएगा जो विहित किया जाए और उसमें पुनरुत्पादित की जाने वाली कृति की प्रस्थापित फुटकर कीमत कथित होगी ।
(3) इस धारा के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए प्रत्येक आवेदक अपने आवेदन के साथ प्रतिलिप्यधिकार रजिस्ट्रार के पास ऐसी फीस जमा करेगा जो विहित की जाए ।
(4) जहां इस धारा के अधीन प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड को आवेदन किया जाता है वहां वह ऐसी जांच करने के पश्चात् जो विहित की जाए, आवेदन में उल्लिखित कृति के पुनरुत्पादन को उत्पादित और प्रकाशित करने की अनुज्ञप्ति, जो अनन्य अनुज्ञप्ति न हो, निम्नलिखित शर्तों के अधीन रहते हुए आवेदक को अनुदत्त कर सकेगा कि: -
(i) आवेदक, कृति के पुनरुत्पादन की ऐसी प्रतियों की बाबत, जिनका सार्वजनिक विक्रय हुआ है, कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को ऐसी दर से परिकलित स्वामिस्वों का संदाय करेगा जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड प्रत्येक मामले की परिस्थितियों में विहित रीति से अवधारित करे;
(ii) इस धारा के अधीन अनुदत्त अनुज्ञप्ति का विस्तार कृति के पुनरुत्पादन की प्रतियों के भारत के बाहर निर्यात पर नहीं होगा और ऐसे पुनरुत्पादन की प्रत्येक प्रति में इस बात की सूचना होगी कि प्रति केवल भारत में वितरण के लिए उपलब्ध है:
परंतु ऐसी कोई अनुज्ञप्ति उस दशा में के सिवाय अनुदत्त नहीं की जाएगी जिसमें-
(क) आवेदक ने प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड के समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया है कि उसने कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी से ऐसी प्रति को पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के प्राधिकार के लिए निवेदन किया था और उसे प्राधिकार देने से इंकार कर दिया गया था या कि वह अपनी ओर से सम्यक् तत्परता बरतने के पश्चात् प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का पता लगाने में असमर्थ था;
(ख) जहां आवेदक प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी का पता लगाने में असमर्थ था, उसने ऐसे प्राधिकार के लिए रजिस्ट्रीकृत हवाई डाक द्वारा अपने निवेदन की एक प्रति उस प्रकाशक को, जिसका नाम कृति से प्रकट होता है अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन से कम से कम तीन मास पहले भेज दी थी;
(ग) प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड का समाधान हो जाता है कि आवेदक कृति के यथार्थ पुनरुत्पादन को पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के लिए सक्षम है और उसके पास प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को उन स्वामिस्वों का संदाय करने के साधन हैं जो उसे इस धारा के अधीन संदेय हैं;
(घ) आवेदक कृति को ऐसी कीमत पर पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने का वचनबंध करता है जो प्रतिलिप्यधिकार बोर्ड द्वारा नियत की जाए और जिसका उस कीमत से युक्तियुक्त रूप से संबंध हो, जो उन्हीं या समरूप विषयों पर वैसे ही स्तर की कृतियों के लिए सामान्यतः भारत में प्रभारित की जाती हैं;
(ङ) खंड (क) के अधीन निवेदन किए जाने की तारीख से या जहां निवेदन की प्रति खंड (ख) के अधीन भेजी गई है वहां प्रति भेजने की तारीख से प्रकृति विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित या प्रौद्योगिकी की किसी कृति के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए आवेदन की दशा में छह मास की अवधि या किसी अन्य कार्य के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए आवेदन की दशा में तीन मास की अवधि बीत गई है और उस कृति के पुनरुत्पादन को कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी द्वारा या, उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा, यथास्थिति, छह मास या तीन मास की उक्त अवधि के भीतर प्रकाशित नहीं किया गया है;
(च) जिस कृति को पुनरुत्पादित किया जाना प्रस्थापित है उसके रचयिता का नाम और विशिष्ट संस्करण का नाम पुनरुत्पादन की सभी प्रतियों पर मुद्रित किया जाता है;
(छ) रचयिता ने कृति की प्रतियों को परिचालन से वापस नहीं लिया है; और
(ज) जहां कहीं भी व्यवहार्य हो, कृति में प्रतिलिप्यधिकार के स्वामी को सुनवाई का अवसर दिया गया है ।
(5) किसी कृति का कोई भाषांतर पुनरुत्पादित और प्रकाशित करने के लिए इस धारा के अधीन कोई अनुज्ञप्ति उस दशा के सिवाय अनुदत्त नहीं की जाएगी जिसमें भाषांतर के अधिकार के स्वामी या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा ऐसा भाषांतर प्रकाशित कर दिया गया है और भाषांतर ऐसी भाषा में नहीं है जिसका भारत में साधारणतः प्रयोग किया जाता है ।
(6) इस धारा के उपबंध व्यवस्थित शिक्षण कार्यकलाप के एकमात्र प्रयोजन के लिए दृश्य-श्रव्य स्थायीकरण में निबद्ध किसी पाठ के पुनरुत्पादन और प्रकाशन या भारत में साधारणतः प्रयोग की जाने वाली भाषा में भाषांतर को भी लागू होंगे ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी कृति के संबंध में सुसंगत अवधि" से निम्नलिखित अवधि अभिप्रेत है-
(क) जहां आवेदन कथा-साहित्य, कविता, नाटक, संगीत या कला की या उससे संबंधित किसी कृति के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए है वहां उस कृति के प्रथम प्रकाशन की तारीख से सात वर्ष;
(ख) जहां आवेदन प्रकृति विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित या प्रौद्योगिकी की या उससे संबंधित किसी कृति के पुनरुत्पादन और प्रकाशन के लिए है वहां उस कृति के प्रथम प्रकाशन की तारीख से तीन वर्ष; और
(ग) किसी अन्य दशा में, उस कृति के प्रथम प्रकाशन की तारीख से पांच वर्ष ।
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