Advocates Act 3अध्याय II · Bar Councils
धारा 3 · राज्य विधिज्ञ परिषद्
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) (क) आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, [जम्मू-कश्मीर,] [झारखंड,] [मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़], [कर्नाटक], उड़ीसा, राजस्थान और [उत्तर प्रदेश, [उत्तराखण्ड, मेघालय, मणिपुर और त्रिपुरा]] राज्य में से प्रत्येक के लिए, उस राज्य की विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात, एक विधिज्ञ परिषद् होगी;
(ख) अरुणाचल प्रदेश, असम, मिजोरम और नागालैंड राज्यों के लिए अरुणाचल प्रदेश, असम, मिजोरम और नागालैंड विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात विधिज्ञ परिषद् होगी;]
(ग) केरल राज्य और [लक्षद्वीप] संघ राज्यक्षेत्र के लिए, केरल विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी;
(गग) [तमिलनाडु राज्य] तथा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र के लिए, मद्रास विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी;
(गगग) महाराष्ट्र और गोवा राज्यों के लिए और दादरा और नागर हवेली तथा दमण और दीव के संघ राज्यक्षेत्र के लिए होगी जिसका नाम महाराष्ट्र और गोवा विधिज्ञ परिषद् होगा;
(घ) पंजाब और हरियाणा राज्यों के लिए तथा चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र के लिए, पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात, एक विधिज्ञ परिषद् होगी;
(घघ) हिमाचल प्रदेश राज्य के लिए, हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी;]
(ङ) पश्चिमी बंगाल राज्य तथा [अंदमान और निकोबार द्वीप समूह संघ राज्यक्षेत्र] के लिए, पश्चिमी बंगाल विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी; और
(च) दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के लिए, दिल्ली विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिक परिषद् होगी;
(2) राज्य विधिज्ञ परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात्: -
(क) दिल्ली राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में भारत का अपर महासालिसिटर, पदेन; 1[असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में प्रत्येक राज्य, अर्थात् असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, और नागालैंड का महाधिवक्ता] पदेन, पंजाब और हरियाणा राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में प्रत्येक राज्य, अर्थात् पंजाब और हरियाणा का महाधिवक्ता, पदेन; और किसी अन्य राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में उस राज्य का महाधिवक्ता, पदेन;
(ख) पांच हजार से अनधिक के निर्वाचक-मंडल वाली राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में, पन्द्रह सदस्य, पांच हजार से अधिक किन्तु दस हजार से अनधिक के निर्वाचक-मंडल वाली राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में बीस सदस्य, और दस हजार से अधिक के निर्वाचक-मंडल वाली राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में पच्चीस सदस्य, जो राज्य विधिज्ञ परिषद् की निर्वाचक नामावली के अधिवक्ताओं में से आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित हों:
परन्तु ऐसे निर्वाचित सदस्यों में से यथासंभव आधे के निकट सदस्य, ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, ऐसे व्यक्ति होंगे जो किसी राज्य नामावली में कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहे हों, और ऐसे किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में दस वर्ष की उक्त अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी, जिसके दौरान ऐसा व्यक्ति भारतीय विधिज्ञ परिषद् अधिनियम, 1926 (1926 का 38) के अधीन नामंकित अधिवक्ता रहा हो ।
(3) प्रत्येक राज्य विधिज्ञ परिषद् का एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होगा जो उस परिषद् द्वारा ऐसी रीति से निर्वाचित किया जाएगा जो विहित की जाए ।
(3क) अधिवक्ता (संशोधन) अधिनियम, 1977 (1977 का 38) के प्रारम्भ के ठीक पूर्व किसी राज्य विधिज्ञ परिषद् के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, ऐसे प्रारम्भ पर, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद धारण नहीं करेगा:
परन्तु ऐसा प्रत्येक व्यक्ति अपने पद के कर्तव्यों का तब तक पालन करता रहेगा जब तक कि प्रत्येक राज्य विधिज्ञ परिषद् का, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष, जो अधिवक्ता (संशोधन) अधिनियम, 1977 (1977 का 38) के प्रारंभ के पश्चात् निर्वाचित हुआ है, पद भार संभाल नहीं लेता ।]
(4) कोई अधिवक्ता उपधारा (2) के अधीन किसी निर्वाचन में मतदान करने, या किसी राज्य विधिज्ञ परिषद् के सदस्य के रूप में चुने जाने और सदस्य होने के लिए तब तक निरर्हित होगा जब तक उसके पास ऐसी अर्हताएं न हों या वह ऐसी शर्तें पूरी न करता हो, जो भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा इस निमित्त विहित की जाएं, और किन्हीं ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो बनाए जाएं, प्रत्येक राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा निर्वाचक नामावली तैयार की जाएगी और समय-समय पर पुनरीक्षित की जाएगी ।
(5) उपधारा (2) के परन्तुक की कोई भी बात, अधिवक्ता (संशोधन) अधिनियम, 1964 (1964 का 21) के प्रारम्भ के पूर्व निर्वाचित किसी सदस्य की पदावधि पर प्रभाव नहीं डालेगी, किन्तु ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् प्रत्येक निर्वाचन, उक्त परन्तुक को प्रभावी करने के लिए, भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अनुसार कराया जाएगा ।
(6) उपधारा (2) के खंड (ख) की कोई भी बात, अधिवक्ता (संशोधन) अधिनियम, 1973 (1973 का 60) के प्रारम्भ के ठीक पूर्व गठित किसी राज्य विधिज्ञ परिषद् में निर्वाचित सदस्यों के प्रतिनिधित्व पर तब तक प्रभाव नहीं डालेगी जब तक वह राज्य विधिज्ञ परिषद् इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार पुनर्गठित नहीं की जाती ।
(ख) अरुणाचल प्रदेश, असम, मिजोरम और नागालैंड राज्यों के लिए अरुणाचल प्रदेश, असम, मिजोरम और नागालैंड विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात विधिज्ञ परिषद् होगी;]
(ग) केरल राज्य और [लक्षद्वीप] संघ राज्यक्षेत्र के लिए, केरल विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी;
(गग) [तमिलनाडु राज्य] तथा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र के लिए, मद्रास विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी;
(गगग) महाराष्ट्र और गोवा राज्यों के लिए और दादरा और नागर हवेली तथा दमण और दीव के संघ राज्यक्षेत्र के लिए होगी जिसका नाम महाराष्ट्र और गोवा विधिज्ञ परिषद् होगा;
(घ) पंजाब और हरियाणा राज्यों के लिए तथा चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र के लिए, पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात, एक विधिज्ञ परिषद् होगी;
(घघ) हिमाचल प्रदेश राज्य के लिए, हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी;]
(ङ) पश्चिमी बंगाल राज्य तथा [अंदमान और निकोबार द्वीप समूह संघ राज्यक्षेत्र] के लिए, पश्चिमी बंगाल विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी; और
(च) दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के लिए, दिल्ली विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिक परिषद् होगी;
(2) राज्य विधिज्ञ परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात्: -
(क) दिल्ली राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में भारत का अपर महासालिसिटर, पदेन; 1[असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में प्रत्येक राज्य, अर्थात् असम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, और नागालैंड का महाधिवक्ता] पदेन, पंजाब और हरियाणा राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में प्रत्येक राज्य, अर्थात् पंजाब और हरियाणा का महाधिवक्ता, पदेन; और किसी अन्य राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में उस राज्य का महाधिवक्ता, पदेन;
(ख) पांच हजार से अनधिक के निर्वाचक-मंडल वाली राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में, पन्द्रह सदस्य, पांच हजार से अधिक किन्तु दस हजार से अनधिक के निर्वाचक-मंडल वाली राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में बीस सदस्य, और दस हजार से अधिक के निर्वाचक-मंडल वाली राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में पच्चीस सदस्य, जो राज्य विधिज्ञ परिषद् की निर्वाचक नामावली के अधिवक्ताओं में से आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित हों:
परन्तु ऐसे निर्वाचित सदस्यों में से यथासंभव आधे के निकट सदस्य, ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, ऐसे व्यक्ति होंगे जो किसी राज्य नामावली में कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहे हों, और ऐसे किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में दस वर्ष की उक्त अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी, जिसके दौरान ऐसा व्यक्ति भारतीय विधिज्ञ परिषद् अधिनियम, 1926 (1926 का 38) के अधीन नामंकित अधिवक्ता रहा हो ।
(3) प्रत्येक राज्य विधिज्ञ परिषद् का एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होगा जो उस परिषद् द्वारा ऐसी रीति से निर्वाचित किया जाएगा जो विहित की जाए ।
(3क) अधिवक्ता (संशोधन) अधिनियम, 1977 (1977 का 38) के प्रारम्भ के ठीक पूर्व किसी राज्य विधिज्ञ परिषद् के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, ऐसे प्रारम्भ पर, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद धारण नहीं करेगा:
परन्तु ऐसा प्रत्येक व्यक्ति अपने पद के कर्तव्यों का तब तक पालन करता रहेगा जब तक कि प्रत्येक राज्य विधिज्ञ परिषद् का, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष, जो अधिवक्ता (संशोधन) अधिनियम, 1977 (1977 का 38) के प्रारंभ के पश्चात् निर्वाचित हुआ है, पद भार संभाल नहीं लेता ।]
(4) कोई अधिवक्ता उपधारा (2) के अधीन किसी निर्वाचन में मतदान करने, या किसी राज्य विधिज्ञ परिषद् के सदस्य के रूप में चुने जाने और सदस्य होने के लिए तब तक निरर्हित होगा जब तक उसके पास ऐसी अर्हताएं न हों या वह ऐसी शर्तें पूरी न करता हो, जो भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा इस निमित्त विहित की जाएं, और किन्हीं ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो बनाए जाएं, प्रत्येक राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा निर्वाचक नामावली तैयार की जाएगी और समय-समय पर पुनरीक्षित की जाएगी ।
(5) उपधारा (2) के परन्तुक की कोई भी बात, अधिवक्ता (संशोधन) अधिनियम, 1964 (1964 का 21) के प्रारम्भ के पूर्व निर्वाचित किसी सदस्य की पदावधि पर प्रभाव नहीं डालेगी, किन्तु ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् प्रत्येक निर्वाचन, उक्त परन्तुक को प्रभावी करने के लिए, भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अनुसार कराया जाएगा ।
(6) उपधारा (2) के खंड (ख) की कोई भी बात, अधिवक्ता (संशोधन) अधिनियम, 1973 (1973 का 60) के प्रारम्भ के ठीक पूर्व गठित किसी राज्य विधिज्ञ परिषद् में निर्वाचित सदस्यों के प्रतिनिधित्व पर तब तक प्रभाव नहीं डालेगी जब तक वह राज्य विधिज्ञ परिषद् इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार पुनर्गठित नहीं की जाती ।
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