Advocates Act 24अध्याय III · Admission and Enrolment of Advocates
धारा 24 · वे व्यक्ति, जिन्हें किसी राज्य नामावली में अधिवक्ताओं के रूप में प्रविष्ट किया जा सकता है
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए कोई व्यक्ति किसी राज्य नामावली में अधिवक्ता के रूप में प्रविष्ट किए जाने के लिए अर्हित तभी होगा जब वह निम्नलिखित शर्तें पूरी करे, अर्थात्: -
(क) वह भारत का नागरिक हो:
परन्तु इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किसी अन्य देश का राष्ट्रिक किसी राज्य नामावली में अधिवक्ता के रूप में उस दशा में प्रविष्ट किया जा सकेगा जब सम्यक् रूप से अर्हित भारत के नागरिक उस अन्य देश में विधि व्यवसाय करने के लिए अनुज्ञात हों;
(ख) उसने इक्कीस वर्ष की आयु पूरी कर ली है;
(ग) उसने-
(i) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी विश्वविद्यालय से [12 मार्च, 1967] से पूर्व विधि की उपाधि प्राप्त कर ली है;
(ii) किसी ऐसे क्षेत्र के, जो भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा परिनिश्चित भारत के भीतर 15 अगस्त, 1947 के पूर्व समाविष्ट था, किसी विश्वविद्यालय से, उस तारीख के पूर्व विधि की उपाधि प्राप्त कर ली है; या
(iii) उपखण्ड (त्त्त्क) में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, विधि विषय में तीन वर्ष के पाठ्यक्रम को पूरा करने के पश्चात् भारत के किसी ऐसे विश्वविद्यालय से जिसे भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यता प्राप्त है, 12 मार्च, 1967 के पश्चात् विधि की उपाधि प्राप्त कर ली है; या
(त्त्त्क) विधि विषय में ऐसा पाठ्यक्रम पूरा करने के पश्चात् जिसकी अवधि शिक्षण वर्ष 1967-68 या किसी पूर्ववर्ती शिक्षण वर्ष से आरम्भ होकर दो शिक्षण वर्षों से कम की न हो, भारत के किसी ऐसे विश्वविद्यालय से जिसे भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यता प्राप्त है, विधि की उपाधि प्राप्त कर ली है; या]
(iv) किसी अन्य दशा में भारत के राज्यक्षेत्र से बारह के किसी विश्वविद्यालय से विधि की उपाधि प्राप्त की है, यदि उस उपाधि को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा मान्यता प्राप्त है; या
वह बैरिस्टर है और उसे 31 दिसम्बर, 1976 को या उसके पूर्व विधि व्यवसायी वर्ग में लिया गया है,
अथवा वह मुम्बई अथवा कलकत्ता उच्च न्यायालय के अटर्नी रूप में नामांकन के लिए मुम्बई या कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट आबद्ध शिक्षार्थी की परीक्षा या किसी अन्य परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुका है;
अथवा उसने विधिमें ऐसी अन्य विदेशी अर्हता प्राप्त कर ली है जिसे इस अधिनियम के अधीन अधिवक्ता के रूप में प्रवेश पाने के प्रयोजन के लिए भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा मान्यता प्राप्त है;
(ङ) वह ऐसी अन्य शर्तें पूरी करता है, जो इस अध्याय के अधीन राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट की जाएं;
(च) उसने, नामांकन के लिए, भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 (1899 का 2) के अधीन प्रभार्य स्टाम्प शुल्क, यदि कोई हो, और राज्य विधिज्ञ परिषद् को [संदेय छह सौ रुपए और भारतीय विधिज्ञ परिषद् को, उस परिषद् के पक्ष में लिखे गए बैंक ड्राफ्ट के रूप में, संदेय एक सौ पचास रुपए की] नामांकन फीस दे दी है:
परन्तु जहां ऐसा व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है और ऐसे प्राधिकारी से जो विहित किया जाए, उस आशय का प्रमाणपत्र पेश करता है वहां 7[उसके द्वारा संदेय नामांकन फीस राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में एक सौ रुपए और भारतीय विधिज्ञ परिषद् की दशा में पच्चीस रुपए होगी ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति को भारत के किसी विश्वविद्यालय से विधि की उपाधि-प्राप्त उस तारीख से समझा जाएगा, जिस तारीख को उस उपाधि की परीक्षा के परिणाम, विश्वविद्यालय द्वारा अपनी सूचना पट्ट पर, प्रकाशित किए जाते हैं या अन्यथा यह घोषित किया जाता है कि उसने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी [कोई वकील या प्लीडर, जो विधि स्नातक है,] राज्य नामावली में अधिवक्ता के रूप में प्रविष्ट किया जा सकता है, यदि वह-
(क) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ऐसे नामांकन के लिए आवेदन नियत दिन से दो वर्ष के भीतर, न कि उसके पश्चात् करता है; और
(ख) उपधारा (1) के खंड (क), (ख), (ङ) और (च) में विनिर्दिष्ट शर्तें पूरी करता है ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, जो-
(क) कम से कम तीन वर्ष तक वकील या प्लीडर या मुख्तार रहा हो, या किसी विधि के अधीन किसी भी समय किसी उच्च न्यायालय के (जिसके अन्तर्गत भूतपूर्व भाग ख राज्य का उच्च न्यायालय भी है) या किसी संघ राज्यक्षेत्र में न्यायिक आयुक्त के न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में नामांकित किए जाने का हकदार था; या
(कक) किसी विधि के उपबंधों के आधार पर (चाहे अभिवचन द्वारा या कार्य द्वारा या दोनों के द्वारा) विधि व्यवसाय करने के लिए अधिवक्ता से भिन्न रूप में 1 दिसम्बर, 1961 के पूर्व हकदार था, या जो इस प्रकार हकदार होता यदि वह उस तारीख को लोक सेवा में न होता; या
(ग) भारत शासन अधिनियम, 1935 (25 और 26 जॉ० 5 सी 42) द्वारा परिनिश्चित बर्मा में समाविष्ट किसी क्षेत्र के किसी उच्च न्यायालय का, 1 अप्रैल, 1937 के पूर्व अधिवक्ता था; या
(घ) भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा इस निमित्त बनाए गए किसी नियम के अधीन अधिवक्ता के रूप में नामांकित किए जाने के लिए हकदार है,
किसी राज्य नामावली में अधिवक्ता के रूप में प्रविष्ट किया जा सकेगा, यदि वह-
(i) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ऐसे नामांकन के लिए आवेदन करता है; और
(ii) उपधारा (1) के खंड (क), (ख), (ङ) और (च) में विनिर्दिष्ट शर्तें पूरी करता है ।
(क) वह भारत का नागरिक हो:
परन्तु इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किसी अन्य देश का राष्ट्रिक किसी राज्य नामावली में अधिवक्ता के रूप में उस दशा में प्रविष्ट किया जा सकेगा जब सम्यक् रूप से अर्हित भारत के नागरिक उस अन्य देश में विधि व्यवसाय करने के लिए अनुज्ञात हों;
(ख) उसने इक्कीस वर्ष की आयु पूरी कर ली है;
(ग) उसने-
(i) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी विश्वविद्यालय से [12 मार्च, 1967] से पूर्व विधि की उपाधि प्राप्त कर ली है;
(ii) किसी ऐसे क्षेत्र के, जो भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा परिनिश्चित भारत के भीतर 15 अगस्त, 1947 के पूर्व समाविष्ट था, किसी विश्वविद्यालय से, उस तारीख के पूर्व विधि की उपाधि प्राप्त कर ली है; या
(iii) उपखण्ड (त्त्त्क) में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, विधि विषय में तीन वर्ष के पाठ्यक्रम को पूरा करने के पश्चात् भारत के किसी ऐसे विश्वविद्यालय से जिसे भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यता प्राप्त है, 12 मार्च, 1967 के पश्चात् विधि की उपाधि प्राप्त कर ली है; या
(त्त्त्क) विधि विषय में ऐसा पाठ्यक्रम पूरा करने के पश्चात् जिसकी अवधि शिक्षण वर्ष 1967-68 या किसी पूर्ववर्ती शिक्षण वर्ष से आरम्भ होकर दो शिक्षण वर्षों से कम की न हो, भारत के किसी ऐसे विश्वविद्यालय से जिसे भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यता प्राप्त है, विधि की उपाधि प्राप्त कर ली है; या]
(iv) किसी अन्य दशा में भारत के राज्यक्षेत्र से बारह के किसी विश्वविद्यालय से विधि की उपाधि प्राप्त की है, यदि उस उपाधि को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा मान्यता प्राप्त है; या
वह बैरिस्टर है और उसे 31 दिसम्बर, 1976 को या उसके पूर्व विधि व्यवसायी वर्ग में लिया गया है,
अथवा वह मुम्बई अथवा कलकत्ता उच्च न्यायालय के अटर्नी रूप में नामांकन के लिए मुम्बई या कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट आबद्ध शिक्षार्थी की परीक्षा या किसी अन्य परीक्षा में उत्तीर्ण हो चुका है;
अथवा उसने विधिमें ऐसी अन्य विदेशी अर्हता प्राप्त कर ली है जिसे इस अधिनियम के अधीन अधिवक्ता के रूप में प्रवेश पाने के प्रयोजन के लिए भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा मान्यता प्राप्त है;
(ङ) वह ऐसी अन्य शर्तें पूरी करता है, जो इस अध्याय के अधीन राज्य विधिज्ञ परिषद् द्वारा बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट की जाएं;
(च) उसने, नामांकन के लिए, भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 (1899 का 2) के अधीन प्रभार्य स्टाम्प शुल्क, यदि कोई हो, और राज्य विधिज्ञ परिषद् को [संदेय छह सौ रुपए और भारतीय विधिज्ञ परिषद् को, उस परिषद् के पक्ष में लिखे गए बैंक ड्राफ्ट के रूप में, संदेय एक सौ पचास रुपए की] नामांकन फीस दे दी है:
परन्तु जहां ऐसा व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है और ऐसे प्राधिकारी से जो विहित किया जाए, उस आशय का प्रमाणपत्र पेश करता है वहां 7[उसके द्वारा संदेय नामांकन फीस राज्य विधिज्ञ परिषद् की दशा में एक सौ रुपए और भारतीय विधिज्ञ परिषद् की दशा में पच्चीस रुपए होगी ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी व्यक्ति को भारत के किसी विश्वविद्यालय से विधि की उपाधि-प्राप्त उस तारीख से समझा जाएगा, जिस तारीख को उस उपाधि की परीक्षा के परिणाम, विश्वविद्यालय द्वारा अपनी सूचना पट्ट पर, प्रकाशित किए जाते हैं या अन्यथा यह घोषित किया जाता है कि उसने परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी [कोई वकील या प्लीडर, जो विधि स्नातक है,] राज्य नामावली में अधिवक्ता के रूप में प्रविष्ट किया जा सकता है, यदि वह-
(क) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ऐसे नामांकन के लिए आवेदन नियत दिन से दो वर्ष के भीतर, न कि उसके पश्चात् करता है; और
(ख) उपधारा (1) के खंड (क), (ख), (ङ) और (च) में विनिर्दिष्ट शर्तें पूरी करता है ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, जो-
(क) कम से कम तीन वर्ष तक वकील या प्लीडर या मुख्तार रहा हो, या किसी विधि के अधीन किसी भी समय किसी उच्च न्यायालय के (जिसके अन्तर्गत भूतपूर्व भाग ख राज्य का उच्च न्यायालय भी है) या किसी संघ राज्यक्षेत्र में न्यायिक आयुक्त के न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में नामांकित किए जाने का हकदार था; या
(कक) किसी विधि के उपबंधों के आधार पर (चाहे अभिवचन द्वारा या कार्य द्वारा या दोनों के द्वारा) विधि व्यवसाय करने के लिए अधिवक्ता से भिन्न रूप में 1 दिसम्बर, 1961 के पूर्व हकदार था, या जो इस प्रकार हकदार होता यदि वह उस तारीख को लोक सेवा में न होता; या
(ग) भारत शासन अधिनियम, 1935 (25 और 26 जॉ० 5 सी 42) द्वारा परिनिश्चित बर्मा में समाविष्ट किसी क्षेत्र के किसी उच्च न्यायालय का, 1 अप्रैल, 1937 के पूर्व अधिवक्ता था; या
(घ) भारतीय विधिज्ञ परिषद् द्वारा इस निमित्त बनाए गए किसी नियम के अधीन अधिवक्ता के रूप में नामांकित किए जाने के लिए हकदार है,
किसी राज्य नामावली में अधिवक्ता के रूप में प्रविष्ट किया जा सकेगा, यदि वह-
(i) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ऐसे नामांकन के लिए आवेदन करता है; और
(ii) उपधारा (1) के खंड (क), (ख), (ङ) और (च) में विनिर्दिष्ट शर्तें पूरी करता है ।
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