FEM Act 16अध्याय V · Adjudication and Appeal
धारा 16 · निर्णयकर्ता प्राधिकरण की नियुक्ति।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) धारा 13 के तहत न्यायनिर्णय के प्रयोजन हेतु, केंद्र सरकार, आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, धारा 13 के तहत उल्लंघन करने के आरोपी व्यक्ति (जिसके विरुद्ध उपधारा (3) के तहत शिकायत दर्ज की गई है, जिसे इसके बाद उक्त व्यक्ति कहा गया है) को किसी दंड लगाने के प्रयोजन से सुनवाई का उचित अवसर देने के बाद, निर्धारित तरीके से जांच करने हेतु केंद्र सरकार के जितने अधिकारियों को उचित समझे, नियुक्त कर सकती है।
बशर्ते कि यदि न्यायनिर्णय प्राधिकारी की राय है कि उक्त व्यक्ति के फरार होने या किसी भी प्रकार से जुर्माने के भुगतान से बचने की संभावना है, तो वह उक्त व्यक्ति को ऐसी राशि और ऐसी शर्तों के अधीन बांड या गारंटी प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकता है, जैसा वह उचित समझे।
(2) केंद्र सरकार उपधारा (1) के अधीन न्यायनिर्णय प्राधिकारियों की नियुक्ति करते समय आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित आदेश में उनके संबंधित अधिकारक्षेत्रों को भी निर्दिष्ट करेगी।
(3) कोई भी न्यायनिर्णय प्राधिकारी उप-धारा (1) के अंतर्गत कोई जाँच नहीं करेगा, सिवाय केंद्र सरकार द्वारा सामान्य या विशेष आदेश द्वारा अधिकृत किसी अधिकारी द्वारा लिखित शिकायत पर।
(4) उक्त व्यक्ति स्वयं उपस्थित हो सकता है या न्यायनिर्णय प्राधिकारी के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करने के लिए अपनी पसंद के किसी कानूनी व्यवसायी या चार्टर्ड लेखाकार की सहायता ले सकता है।
(5) प्रत्येक निर्णय प्राधिकारी को सिविल न्यायालय की वही शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो धारा 28 की उपधारा (2) के अधीन अपीलीय न्यायाधिकरण को प्रदत्त हैं और--
(क) इसके समक्ष सभी कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही मानी जाएगी;
(ख) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और 346 के प्रयोजनों के लिए इसे सिविल न्यायालय माना जाएगा।
(6) प्रत्येक न्यायनिर्णय प्राधिकारी उपधारा (2) के अंतर्गत शिकायत का यथाशीघ्र निपटारा करेगा तथा शिकायत प्राप्त होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर शिकायत का अंतिम निपटारा करने का प्रयास करेगा।
बशर्ते कि यदि शिकायत का निपटारा उक्त अवधि के भीतर नहीं किया जा सकता है, तो न्यायनिर्णय प्राधिकारी उक्त अवधि के भीतर शिकायत का निपटारा न कर पाने के कारणों को समय-समय पर लिखित रूप में दर्ज करेगा।
बशर्ते कि यदि न्यायनिर्णय प्राधिकारी की राय है कि उक्त व्यक्ति के फरार होने या किसी भी प्रकार से जुर्माने के भुगतान से बचने की संभावना है, तो वह उक्त व्यक्ति को ऐसी राशि और ऐसी शर्तों के अधीन बांड या गारंटी प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकता है, जैसा वह उचित समझे।
(2) केंद्र सरकार उपधारा (1) के अधीन न्यायनिर्णय प्राधिकारियों की नियुक्ति करते समय आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित आदेश में उनके संबंधित अधिकारक्षेत्रों को भी निर्दिष्ट करेगी।
(3) कोई भी न्यायनिर्णय प्राधिकारी उप-धारा (1) के अंतर्गत कोई जाँच नहीं करेगा, सिवाय केंद्र सरकार द्वारा सामान्य या विशेष आदेश द्वारा अधिकृत किसी अधिकारी द्वारा लिखित शिकायत पर।
(4) उक्त व्यक्ति स्वयं उपस्थित हो सकता है या न्यायनिर्णय प्राधिकारी के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करने के लिए अपनी पसंद के किसी कानूनी व्यवसायी या चार्टर्ड लेखाकार की सहायता ले सकता है।
(5) प्रत्येक निर्णय प्राधिकारी को सिविल न्यायालय की वही शक्तियाँ प्राप्त होंगी जो धारा 28 की उपधारा (2) के अधीन अपीलीय न्यायाधिकरण को प्रदत्त हैं और--
(क) इसके समक्ष सभी कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही मानी जाएगी;
(ख) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और 346 के प्रयोजनों के लिए इसे सिविल न्यायालय माना जाएगा।
(6) प्रत्येक न्यायनिर्णय प्राधिकारी उपधारा (2) के अंतर्गत शिकायत का यथाशीघ्र निपटारा करेगा तथा शिकायत प्राप्त होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर शिकायत का अंतिम निपटारा करने का प्रयास करेगा।
बशर्ते कि यदि शिकायत का निपटारा उक्त अवधि के भीतर नहीं किया जा सकता है, तो न्यायनिर्णय प्राधिकारी उक्त अवधि के भीतर शिकायत का निपटारा न कर पाने के कारणों को समय-समय पर लिखित रूप में दर्ज करेगा।
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