PGST Act 111अध्याय XVIII · Appeals and Revision
धारा 111 · अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष प्रक्रिया
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(1)
अपीलीय न्यायाधिकरण अपने समक्ष किसी कार्यवाही या अपील का निपटारा करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में निर्धारित प्रक्रिया से बाध्य नहीं होगा, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होगा और इस अधिनियम और इसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के अन्य प्रावधानों के अधीन रहते हुए, अपीलीय न्यायाधिकरण को अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने का अधिकार होगा।(2)
इस अधिनियम के अधीन अपने कार्यों के निर्वहन हेतु अपीलीय न्यायाधिकरण को निम्नलिखित मामलों के संबंध में किसी वाद की सुनवाई करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के अधीन किसी सिविल न्यायालय को प्राप्त शक्तियों के समान शक्तियाँ प्राप्त होंगी, अर्थात्:-(क)
किसी व्यक्ति को बुलाना और उसकी उपस्थिति को लागू करना तथा शपथ पर उससे पूछताछ करना;(ख)
दस्तावेजों की खोज और प्रस्तुति की आवश्यकता;(ग)
शपथपत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करना;(घ)
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 123 और 124 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी सार्वजनिक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की मांग करना;(ई)
गवाहों या दस्तावेजों की जांच के लिए आयोग जारी करना;(f)
चूक के कारण किसी अभ्यावेदन को खारिज करना या उस पर एकतरफा निर्णय लेना;(जी)
चूक के कारण किसी अभ्यावेदन को खारिज करने के किसी आदेश या उसके द्वारा एकतरफा पारित किसी आदेश को रद्द करना; और(h)
कोई अन्य मामला जो निर्धारित किया जा सके।(3)
अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा दिया गया कोई भी आदेश उसी प्रकार लागू किया जा सकता है जैसे कि वह किसी न्यायालय द्वारा उसमें लंबित मुकदमे में दिया गया निर्णय हो, और अपीलीय न्यायाधिकरण को अपने आदेशों के निष्पादन के लिए उस न्यायालय को भेजना वैध होगा जिसके स्थानीय क्षेत्राधिकार की सीमा के भीतर,-(क)
किसी कंपनी के विरुद्ध आदेश के मामले में, कंपनी का पंजीकृत कार्यालय स्थित है; या(ख)
किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध आदेश के मामले में, संबंधित व्यक्ति स्वेच्छा से निवास करता है या व्यवसाय करता है या व्यक्तिगत रूप से लाभ के लिए काम करता है।(4)
अपीलीय न्यायाधिकरण के समक्ष सभी कार्यवाही धारा 193 और 228 के अर्थ में तथा भारतीय दंड संहिता की धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही मानी जाएगी तथा अपीलीय न्यायाधिकरण को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 195 और अध्याय XXVI के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय माना जाएगा।इस धारा पर आपका निजी नोट
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