A&C Act 31Aअध्याय VI · Making of arbitral award and termination of proceedings
धारा 31A · लागतों के लिए व्यवस्था।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
1 [ 31ए. लागत निर्धारण व्यवस्था .-- (1) किसी मध्यस्थता कार्यवाही या इस अधिनियम के किसी प्रावधान के अंतर्गत मध्यस्थता से संबंधित किसी कार्यवाही के संबंध में, न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (5 ऑफ 1908) में निहित किसी बात के बावजूद, लागत निर्धारित करने का विवेकाधिकार रखेगा--
(क) क्या एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को लागत का भुगतान किया जाना है;
(ख) ऐसे खर्चों की राशि; और
(ग) ऐसे खर्चों का भुगतान कब किया जाना है।
स्पष्टीकरण .--इस उपधारा के प्रयोजन के लिए, "लागत" से तात्पर्य निम्नलिखित से संबंधित उचित लागतों से है--
(i) मध्यस्थों, न्यायालयों और गवाहों की फीस और व्यय;
(ii) कानूनी फीस और खर्च;
(iii) मध्यस्थता की देखरेख करने वाली संस्था का कोई प्रशासनिक शुल्क; और
(iv) मध्यस्थता या न्यायालय की कार्यवाही और मध्यस्थता निर्णय के संबंध में किए गए कोई अन्य व्यय।
(2) यदि न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण लागतों के भुगतान के संबंध में कोई आदेश देने का निर्णय लेता है,
(क) सामान्य नियम यह है कि असफल पक्ष को सफल पक्ष के खर्चों का भुगतान करने का आदेश दिया जाएगा; या
(ख) न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों के आधार पर भिन्न आदेश दे सकता है।
(3) लागतों का निर्धारण करते समय न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण सभी परिस्थितियों पर विचार करेगा, जिनमें शामिल हैं--
(क) सभी पक्षों का आचरण;
(ख) क्या कोई पक्ष मामले में आंशिक रूप से सफल हुआ है;
(ग) क्या पक्ष ने एक तुच्छ प्रतिदावा किया था जिसके कारण मध्यस्थता कार्यवाही के निपटान में देरी हुई; और
(घ) क्या किसी पक्ष द्वारा विवाद को निपटाने के लिए कोई उचित प्रस्ताव दिया गया है और दूसरे पक्ष द्वारा उसे अस्वीकार कर दिया गया है।
(4) न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण इस धारा के अंतर्गत कोई भी आदेश दे सकता है, जिसमें यह आदेश भी शामिल है कि कोई पक्ष भुगतान करेगा--
(क) दूसरे पक्ष के खर्चों का एक अनुपात;
(ख) दूसरे पक्ष के खर्चों के संबंध में एक निर्धारित राशि;
(सी) केवल किसी निश्चित तिथि से या उस तिथि तक की लागतें;
(घ) कार्यवाही शुरू होने से पहले हुए खर्च;
(ई) कार्यवाही में उठाए गए विशिष्ट कदमों से संबंधित लागतें;
(f) कार्यवाही के केवल एक विशिष्ट भाग से संबंधित लागतें; और
(जी) किसी निश्चित तिथि से या उस तिथि तक लागतों पर ब्याज।
(5) ऐसा कोई समझौता, जिसके अनुसार किसी पक्ष को किसी भी स्थिति में मध्यस्थता की पूरी या आंशिक लागत का भुगतान करना हो, तभी वैध होगा जब ऐसा समझौता संबंधित विवाद उत्पन्न होने के बाद किया गया हो।]
(क) क्या एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को लागत का भुगतान किया जाना है;
(ख) ऐसे खर्चों की राशि; और
(ग) ऐसे खर्चों का भुगतान कब किया जाना है।
स्पष्टीकरण .--इस उपधारा के प्रयोजन के लिए, "लागत" से तात्पर्य निम्नलिखित से संबंधित उचित लागतों से है--
(i) मध्यस्थों, न्यायालयों और गवाहों की फीस और व्यय;
(ii) कानूनी फीस और खर्च;
(iii) मध्यस्थता की देखरेख करने वाली संस्था का कोई प्रशासनिक शुल्क; और
(iv) मध्यस्थता या न्यायालय की कार्यवाही और मध्यस्थता निर्णय के संबंध में किए गए कोई अन्य व्यय।
(2) यदि न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण लागतों के भुगतान के संबंध में कोई आदेश देने का निर्णय लेता है,
(क) सामान्य नियम यह है कि असफल पक्ष को सफल पक्ष के खर्चों का भुगतान करने का आदेश दिया जाएगा; या
(ख) न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों के आधार पर भिन्न आदेश दे सकता है।
(3) लागतों का निर्धारण करते समय न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण सभी परिस्थितियों पर विचार करेगा, जिनमें शामिल हैं--
(क) सभी पक्षों का आचरण;
(ख) क्या कोई पक्ष मामले में आंशिक रूप से सफल हुआ है;
(ग) क्या पक्ष ने एक तुच्छ प्रतिदावा किया था जिसके कारण मध्यस्थता कार्यवाही के निपटान में देरी हुई; और
(घ) क्या किसी पक्ष द्वारा विवाद को निपटाने के लिए कोई उचित प्रस्ताव दिया गया है और दूसरे पक्ष द्वारा उसे अस्वीकार कर दिया गया है।
(4) न्यायालय या मध्यस्थ न्यायाधिकरण इस धारा के अंतर्गत कोई भी आदेश दे सकता है, जिसमें यह आदेश भी शामिल है कि कोई पक्ष भुगतान करेगा--
(क) दूसरे पक्ष के खर्चों का एक अनुपात;
(ख) दूसरे पक्ष के खर्चों के संबंध में एक निर्धारित राशि;
(सी) केवल किसी निश्चित तिथि से या उस तिथि तक की लागतें;
(घ) कार्यवाही शुरू होने से पहले हुए खर्च;
(ई) कार्यवाही में उठाए गए विशिष्ट कदमों से संबंधित लागतें;
(f) कार्यवाही के केवल एक विशिष्ट भाग से संबंधित लागतें; और
(जी) किसी निश्चित तिथि से या उस तिथि तक लागतों पर ब्याज।
(5) ऐसा कोई समझौता, जिसके अनुसार किसी पक्ष को किसी भी स्थिति में मध्यस्थता की पूरी या आंशिक लागत का भुगतान करना हो, तभी वैध होगा जब ऐसा समझौता संबंधित विवाद उत्पन्न होने के बाद किया गया हो।]
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