बीएनएसएस → सीआरपीसी
180 प्रविष्टियाँ
न्यायाधीशों और लोक सेवकों पर मुकदमा चलाना।
(1) जब कोई व्यक्ति जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या लोक सेवक है या रहा है, जिसे सरकार की स्वीकृति के बिना उसके पद से हटाया नहीं जा सकता, पर किसी ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है जो उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का आशय रखते हुए किया हो, तो कोई भी न्यायालय लोकपाल और लोकायुक्त…
पूरा पढ़ेंधारा 197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन
197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन (1) जब कोई व्यक्ति, जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट है या रह चुका है, या ऐसा लोक सेवक है, जो सरकार द्वारा या सरकार की मंजूरी से ही अपने पद से हटाया जा सकता है, किसी ऐसे अपराध का अभियुक्त है, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह उसके द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते…
पूरा पढ़ेंवैवाहिक अपराधों के लिए अभियोजन।
(1) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 81 से 84 (दोनों सहित) के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न्यायालय तब तक नहीं लेगा जब तक कि उस अपराध से पीड़ित किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत न की गई हो: उसे उपलब्ध कराया- (क) जहाँ ऐसा व्यक्ति बच्चा हो, या मानसिक रूप से अस्वस्थ हो, या बौद्धिक अक्षमता के कारण उच्च स्तर की सहायता की…
पूरा पढ़ेंधारा 198. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन
198. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन (1) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 20 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, उस अपराध से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं: परन्तु— (क) जहां ऐसा व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का है, या जड़ या पागल है, या रुग्णता अथवा…
पूरा पढ़ेंभारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत अपराधों का अभियोजन।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न्यायालय तब तक नहीं लेगा, जब तक कि ऐसे अपराध का गठन करने वाले तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट न हो, या अपराध से पीड़ित व्यक्ति द्वारा, या उसके पिता, माता, भाई, बहन, या उसके पिता या माता के भाई या बहन द्वारा, या न्यायालय की अनुमति से, रक्त, विवाह या दत्तक…
पूरा पढ़ेंधारा 198A. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन
198A. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन कोई न्यायालय भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 498क के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान उन तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर, जो ऐसा अपराध गठित करते हैं, या अपराध से व्यथित व्यक्ति द्वारा या उसके पिता, माता, भाई, बहन द्वारा या उसके पिता या माता के भाई या बहन…
पूरा पढ़ेंअपराध का संज्ञान।
कोई भी न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 67 के तहत दंडनीय अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा, जब तक कि पत्नी द्वारा पति के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने पर अपराध गठित करने वाले तथ्यों से प्रथम दृष्टया संतुष्टि न हो जाए।
पूरा पढ़ेंधारा 198B. अपराध का संज्ञान
198B. अपराध का संज्ञान कोई न्यायालय, भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का 45) की धारा 376ख के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, जहां व्यक्ति वैवाहिक संबंध में हैं, संज्ञान, पत्नी द्वारा पति के विरुद्ध प्रस्तुत किए गए या किए गए परिवाद पर उन तथ्यों की, जो उस अपराध का गठन करते हैं, प्रथमदृष्ट्या तुष्टि के सिवाय, नहीं करेगा ।
पूरा पढ़ेंमानहानि के लिए अभियोग।
(1) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न्यायालय तब तक नहीं लेगा जब तक कि उस अपराध से पीड़ित किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत न की गई हो: बशर्ते कि यदि ऐसा व्यक्ति बच्चा हो, या मानसिक रूप से अस्वस्थ हो, या बौद्धिक अक्षमता से ग्रस्त हो, या बीमारी या दुर्बलता के कारण शिकायत करने में…
पूरा पढ़ेंधारा 199. मानहानि के लिए अभियोजन
199. मानहानि के लिए अभियोजन (1) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 21 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान उस अपराध से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं: परन्तु जहां ऐसा व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का है, या जड़ या विकृतचित्त है, या रुग्णता या अंगशैथिल्य के कारण…
पूरा पढ़ेंशिकायतकर्ता की जांच।
(1) किसी शिकायत पर किसी अपराध का संज्ञान लेते समय अधिकार क्षेत्र रखने वाला मजिस्ट्रेट, शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों (यदि कोई हो) से शपथ पर पूछताछ करेगा और ऐसी पूछताछ का सार लिखित रूप में दर्ज किया जाएगा और उस पर शिकायतकर्ता और गवाहों तथा मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। बशर्ते कि मजिस्ट्रेट द्वारा किसी अपराध…
पूरा पढ़ेंधारा 200. परिवादी की परीक्षा
200. परिवादी की परीक्षा परिवाद पर किसी अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट परिवादी की और उपस्थित साक्षियों की, यदि कोई हों, शपथ पर परीक्षा करेगा और ऐसी परीक्षा का सार लेखबद्ध किया जाएगा तथा उस पर परिवादी और साक्षियों द्वारा और मजिस्ट्रेट द्वारा भी हस्ताक्षर किए जाएंगे: परन्तु जब परिवाद लिखित रूप में किया जाता है तब…
पूरा पढ़ेंशिकायतकर्ता की जांच।
(1) किसी शिकायत पर किसी अपराध का संज्ञान लेते समय अधिकार क्षेत्र रखने वाला मजिस्ट्रेट, शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों (यदि कोई हो) से शपथ पर पूछताछ करेगा और ऐसी पूछताछ का सार लिखित रूप में दर्ज किया जाएगा और उस पर शिकायतकर्ता और गवाहों तथा मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। बशर्ते कि मजिस्ट्रेट द्वारा किसी अपराध…
पूरा पढ़ेंधारा 200. परिवादी की परीक्षा
200. परिवादी की परीक्षा परिवाद पर किसी अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट परिवादी की और उपस्थित साक्षियों की, यदि कोई हों, शपथ पर परीक्षा करेगा और ऐसी परीक्षा का सार लेखबद्ध किया जाएगा तथा उस पर परिवादी और साक्षियों द्वारा और मजिस्ट्रेट द्वारा भी हस्ताक्षर किए जाएंगे: परन्तु जब परिवाद लिखित रूप में किया जाता है तब…
पूरा पढ़ेंशिकायतकर्ता की जांच।
(1) किसी शिकायत पर किसी अपराध का संज्ञान लेते समय अधिकार क्षेत्र रखने वाला मजिस्ट्रेट, शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों (यदि कोई हो) से शपथ पर पूछताछ करेगा और ऐसी पूछताछ का सार लिखित रूप में दर्ज किया जाएगा और उस पर शिकायतकर्ता और गवाहों तथा मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। बशर्ते कि मजिस्ट्रेट द्वारा किसी अपराध…
पूरा पढ़ेंनई उपधारा
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मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया मामले का संज्ञान लेने के लिए सक्षम नहीं है।
यदि शिकायत ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष की जाती है जो अपराध का संज्ञान लेने के लिए सक्षम नहीं है, तो वह निम्नलिखित कार्य करेगा:— (क) यदि शिकायत लिखित में है, तो उसे उचित न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए इस आशय के पृष्ठांकन के साथ लौटा दें; (ख) यदि शिकायत लिखित में न हो, तो शिकायतकर्ता को उचित न्यायालय में निर्देशित करें।
पूरा पढ़ेंधारा 201. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जो मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है
201. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जो मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है यदि परिवाद ऐसे मजिस्ट्रेट से किया जाता है जो अपराध का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है, तो वह— (क) यदि परिवाद लिखित रूप में है तो, उसे इस आशय के पृष्ठांकन सहित उचित न्यायालय के समक्ष पेश किए जाने के लिए लौटा देगा; (ख) यदि परिवाद लिखित…
पूरा पढ़ेंप्रक्रिया जारी करने का स्थगन।
(1) किसी मजिस्ट्रेट को ऐसे अपराध की शिकायत प्राप्त होने पर, जिसका संज्ञान लेने के लिए वह अधिकृत है या जो धारा 212 के अधीन उसे सौंपी गई है, यदि वह उचित समझे तो, और ऐसे मामले में जहां आरोपी उस क्षेत्र से बाहर रहता है जिसमें वह अपना अधिकार क्षेत्र प्रयोग करता है, आरोपी के विरुद्ध प्रक्रिया जारी करने को स्थगित कर सकता है,…
पूरा पढ़ेंधारा 202. आदेशिका जारी करना स्थगित करना
202. आदेशिका जारी करना स्थगित करना (1) कोई मजिस्ट्रेट, ऐसे अपराध के परिवाद की प्राप्ति पर जिसका संज्ञान करने के लिए वह प्राधिकृत है या जो धारा 192 के अधीन उसे सौंपा गया है, यदि वह ठीक समझे तो [और उस मामले में करेगा जहां अभियुक्त ऐसे स्थान पर निवास कर रहा है जो उस क्षेत्र से परे है जिसमें वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग…
पूरा पढ़ेंशिकायत खारिज।
यदि शिकायतकर्ता और गवाहों के शपथ पर दिए गए बयानों (यदि कोई हो) और धारा 225 के तहत की गई जांच या छानबीन (यदि कोई हो) के परिणाम पर विचार करने के बाद मजिस्ट्रेट की राय है कि आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह शिकायत को खारिज कर देगा, और ऐसे प्रत्येक मामले में वह ऐसा करने के अपने कारणों को संक्षेप में दर्ज…
पूरा पढ़ेंधारा 203. परिवाद का खारिज किया जाना
203. परिवाद का खारिज किया जाना यदि परिवादी के और साक्षियों के शपथ पर किए गए कथनों पर (यदि कोई हों) तथा धारा 202 के अधीन की गई जांच या अन्वेषण के (यदि कोई हो) परिणाम पर विचार करने के पश्चात् मजिस्ट्रेट की यह राय है कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह परिवाद खारिज कर देगा और ऐसे प्रत्येक मामले में वह…
पूरा पढ़ेंप्रक्रिया का मुद्दा।
(1) यदि किसी अपराध का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट की राय में कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार हो, और मामला इस प्रकार प्रतीत हो— (क) समन मामले में, वह अभियुक्त को उसकी उपस्थिति के लिए समन जारी करेगा; या (ख) वारंट के मामले में, वह वारंट जारी कर सकता है, या यदि वह उचित समझे तो समन जारी कर सकता है, ताकि अभियुक्त को…
पूरा पढ़ेंधारा 204. आदेशिका का जारी किया जाना
204. आदेशिका का जारी किया जाना (1) यदि अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट की यह राय है कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है और मामला— (क) समन-मामला प्रतीत होता है, तो वह अभियुक्त की हाजिरी के लिए अपना समन जारी करेगा; अथवा (ख) वारंट-मामला प्रतीत होता है, तो वह अभियुक्त को ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष या (यदि उसे…
पूरा पढ़ेंमजिस्ट्रेट अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है।
(1) जब भी कोई मजिस्ट्रेट समन जारी करता है, तो वह, यदि उसे ऐसा करने का कारण दिखाई दे, तो अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है और उसे अपने अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दे सकता है। (2) परन्तु मामले की जाँच करने वाला या मुकदमा चलाने वाला मजिस्ट्रेट, अपने विवेक से, कार्यवाही के किसी भी चरण में,…
पूरा पढ़ेंधारा 205. मजिस्ट्रेट अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा
205. मजिस्ट्रेट अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा (1) जब कभी मजिस्ट्रेट समन जारी करता है, तब यदि वह ऐसा करने का कारण देखता है तो वह अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा और उसे अपने प्लीडर द्वारा हाजिर होने की अनुज्ञा दे सकेगा। (2) किंतु मामले की जांच या विचारण करने वाला मजिस्ट्रेट,…
पूरा पढ़ेंमामूली अपराधों के मामलों में विशेष समन।
(1) यदि किसी छोटे अपराध का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट की राय में, मामले का निपटारा धारा 283 या धारा 284 के तहत संक्षेप में किया जा सकता है, तो मजिस्ट्रेट, सिवाय उस स्थिति के जब वह लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से विपरीत राय रखता हो, आरोपी को समन जारी करेगा जिसमें उसे या तो स्वयं या किसी अधिवक्ता के माध्यम…
पूरा पढ़ेंधारा 206. लघु अपराध के मामलों में विशेष समन
206. लघु अपराध के मामलों में विशेष समन (1) यदि किसी लघु अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट की यह राय है कि मामला धारा 260 [या धारा 261] के अधीन संक्षेपतः निपटाया जा सकता है, तो मजिस्ट्रेट, सिवाय उस दशा के जिसमें वह लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से इसके प्रतिकूल राय रखता है, अभियुक्त को ऐसा समन जारी करेगा जिसमें उससे…
पूरा पढ़ेंअभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की प्रति उपलब्ध कराएं।
यदि कार्यवाही पुलिस रिपोर्ट पर शुरू की गई है, तो मजिस्ट्रेट बिना किसी देरी के, और किसी भी स्थिति में आरोपी की पेशी या उपस्थिति की तारीख से चौदह दिनों से अधिक समय के भीतर, आरोपी और पीड़ित (यदि किसी वकील द्वारा प्रतिनिधित्व किया जा रहा हो) को निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रति नि:शुल्क उपलब्ध कराएगा: (i) पुलिस…
पूरा पढ़ेंअभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की प्रति उपलब्ध कराएं।
यदि कार्यवाही पुलिस रिपोर्ट के आधार पर शुरू की गई है, तो मजिस्ट्रेट बिना किसी देरी के आरोपी को निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रति नि:शुल्क उपलब्ध कराएगा:-- (i) पुलिस रिपोर्ट; (ii) धारा 154 के तहत दर्ज की गई पहली सूचना रिपोर्ट; (iii) धारा 161 की उपधारा (3) के तहत उन सभी व्यक्तियों के बयान दर्ज किए गए हैं जिन्हें…
पूरा पढ़ेंसत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्तों को बयानों और दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराना।
जहां, पुलिस रिपोर्ट के अलावा किसी अन्य आधार पर दर्ज किए गए मामले में, धारा 227 के तहत प्रक्रिया जारी करने वाले मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध का विचारण केवल सत्र न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है, तो मजिस्ट्रेट तुरंत आरोपी को निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रति नि:शुल्क उपलब्ध कराएगा: (i) मजिस्ट्रेट…
पूरा पढ़ेंधारा 208. सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजों की प्रतियां देना
208. सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजों की प्रतियां देना जहां पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संस्थित किसी मामले में धारा 204 के अधीन आदेशिका जारी करने वाले मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है, वहां मजिस्ट्रेट अभियुक्त को निम्नलिखित में से…
पूरा पढ़ेंजब अपराध का विचारण केवल सत्र न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है, तो मामले को सत्र न्यायालय को सौंप दिया जाता है।
जब पुलिस रिपोर्ट या किसी अन्य माध्यम से दर्ज किए गए किसी मामले में आरोपी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होता है या उसे लाया जाता है और मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध का विचारण केवल सत्र न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है, तो वह— (क) धारा 230 या धारा 231 के प्रावधानों का अनुपालन करने के बाद मामले को सत्र न्यायालय को…
पूरा पढ़ेंधारा 209. जब अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय हो तब मामले का सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया जाना
209. जब अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय हो तब मामले का सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया जाना जब पुलिस रिपोर्ट पर या अन्यथा संस्थित किसी मामले में अभियुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होता है या लाया जाता है और मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय है, तब वह— (क) यथास्थिति,…
पूरा पढ़ेंकिसी अपराध के संबंध में शिकायत का मामला और पुलिस जांच होने पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
(1) जब किसी ऐसे मामले में, जो पुलिस रिपोर्ट के अलावा किसी अन्य आधार पर दर्ज किया गया हो (जिसे इसके बाद शिकायत मामला कहा जाएगा), मजिस्ट्रेट को उसके द्वारा की जा रही जांच या मुकदमे के दौरान यह प्रतीत हो कि पुलिस द्वारा उस अपराध के संबंध में जांच चल रही है जो उसके द्वारा की जा रही जांच या मुकदमे का विषय है, तो मजिस्ट्रेट…
पूरा पढ़ेंधारा 210. जब उसी अपराध के संबंध में परिवाद-मामला और पुलिस अन्वेषण दोनों हों तब अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया
210. जब उसी अपराध के संबंध में परिवाद-मामला और पुलिस अन्वेषण दोनों हों तब अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया (1) जब पुलिस रिपोर्ट से अन्यथा संस्थित किसी मामले में (जिसे इसमें इसके पश्चात् परिवाद-मामला कहा गया है) मजिस्ट्रेट को अपने द्वारा की जा रही जांच या विचारण के दौरान यह प्रतीत कराया जाता है कि उस अपराध के संबंध में,…
पूरा पढ़ेंआरोप की सामग्री।
(1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में उस अपराध का उल्लेख होगा जिसके लिए अभियुक्त पर आरोप लगाया गया है। (2) यदि अपराध को सृजित करने वाला कानून उसे कोई विशिष्ट नाम देता है, तो अपराध को आरोप में केवल उसी नाम से वर्णित किया जा सकता है। (3) यदि अपराध को सृजित करने वाला कानून उसे कोई विशिष्ट नाम नहीं देता है, तो अपराध की…
पूरा पढ़ेंधारा 211. आरोप की अंतर्वस्तु
211. आरोप की अंतर्वस्तु (1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में वह अपराध कथित किया जाएगा जिसका अभियुक्त पर आरोप है। (2) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया है, तो आरोप में उस अपराध का वर्णन केवल उसी नाम से किया जा सकेगा। (3) यदि उस विधि ने, जो वह अपराध सृजित करती है, उसे कोई…
पूरा पढ़ेंसमय, स्थान और व्यक्ति से संबंधित विवरण।
(1) आरोप पत्र में कथित अपराध के समय और स्थान तथा उस व्यक्ति (यदि कोई हो) जिसके विरुद्ध या उस वस्तु (यदि कोई हो) जिसके संबंध में वह अपराध किया गया था, के बारे में ऐसे विवरण शामिल होंगे जो आरोपी को उस मामले की सूचना देने के लिए यथोचित रूप से पर्याप्त हों जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है। (2) जब अभियुक्त पर आपराधिक…
पूरा पढ़ेंधारा 212. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां
212. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां (1) आरोप में अभिकथित अपराध के समय और स्थान के बारे में तथा उस व्यक्ति (यदि कोई हो) के बारे में, जिसके विरुद्ध, या उस वस्तु (यदि कोई हो) के बारे में, जिसके संबंध में वह अपराध किया गया था, ऐसी विशिष्टियां अंतर्विष्ट होंगी जो अभियुक्त को उस बात की सूचना देने के लिए,…
पूरा पढ़ेंअपराध करने का तरीका कब बताना आवश्यक है?
जब मामले की प्रकृति ऐसी हो कि धारा 234 और 235 में उल्लिखित विवरण अभियुक्त को उस मामले की पर्याप्त सूचना न दें जिसके लिए उस पर आरोप लगाया गया है, तो आरोप पत्र में कथित अपराध को अंजाम देने के तरीके के ऐसे विवरण भी शामिल होंगे जो उस उद्देश्य के लिए पर्याप्त होंगे। चित्र। (क) ए पर किसी निश्चित समय और स्थान पर किसी निश्चित…
पूरा पढ़ेंधारा 213. अपराध किए जाने की रीति कब कथित की जानी चाहिए
213. अपराध किए जाने की रीति कब कथित की जानी चाहिए जब मामले की प्रकृति ऐसी है कि धारा 211 और धारा 212 में वर्णित विशिष्टियां अभियुक्त को उस बात की पर्याप्त सूचना नहीं देतीं जिसका उस पर आरोप है, तब आरोप में उस रीति की, जिससे अभिकथित अपराध किया गया था, ऐसी विशिष्टियां भी अंतर्विष्ट होंगी जो उस प्रयोजन के लिए पर्याप्त…
पूरा पढ़ेंयहां 'आरोप' शब्द का प्रयोग उस कानूनी अर्थ में किया गया है जिसके तहत अपराध दंडनीय है।
प्रत्येक आरोप में, अपराध का वर्णन करने के लिए प्रयुक्त शब्दों को उस कानून द्वारा निर्धारित अर्थ में प्रयुक्त माना जाएगा जिसके तहत ऐसा अपराध दंडनीय है।
पूरा पढ़ेंधारा 214. आरोप में शब्दों का वह अर्थ लिया जाना जो उस विधि में है जिसके अधीन अपराध दंडनीय है
214. आरोप में शब्दों का वह अर्थ लिया जाना जो उस विधि में है जिसके अधीन अपराध दंडनीय है प्रत्येक आरोप में किसी अपराध का वर्णन करने में प्रयुक्त शब्द उस अर्थ में प्रयुक्त हुए समझे जाएंगे जो उन्हें उस विधि द्वारा क्रमशः दिया गया है जिसके अधीन ऐसा अपराध दंडनीय है।
पूरा पढ़ेंत्रुटियों का प्रभाव।
अपराध या आरोप में बताए जाने वाले विवरणों को बताने में कोई त्रुटि, या अपराध या उन विवरणों को बताने में कोई चूक, मामले के किसी भी चरण में महत्वपूर्ण नहीं मानी जाएगी, जब तक कि आरोपी वास्तव में ऐसी त्रुटि या चूक से गुमराह न हुआ हो और इसके कारण न्याय में विफलता न हुई हो। चित्र। (क) ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा…
पूरा पढ़ेंधारा 215. गलतियों का प्रभाव
215. गलतियों का प्रभाव अपराध को या उन विशिष्टियों को, जिनका आरोप में कथित किया जाना अपेक्षित है, कथित करने में कोई गलती, और अपराध या उन विशिष्टियों को कथित करने का कोई लोप, मामले के किसी भी प्रक्रम में तात्विक न समझा जाएगा, जब तक कि अभियुक्त वस्तुतः ऐसी गलती या लोप से भ्रमित न हो गया हो और उससे न्याय की विफलता न हो गई…
पूरा पढ़ेंन्यायालय आरोप में बदलाव कर सकता है।
(1) कोई न्यायालय निर्णय सुनाए जाने से पहले किसी भी समय किसी आरोप में परिवर्तन या जोड़ कर सकता है। (2) ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़कर समझाया जाएगा। (3) यदि किसी आरोप में परिवर्तन या परिवर्धन इस प्रकार का हो कि न्यायालय की राय में मुकदमे की कार्यवाही तुरंत शुरू करने से अभियुक्त को उसके बचाव में या…
पूरा पढ़ेंधारा 216. न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकेगा
216. न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकेगा (1) कोई न्यायालय निर्णय सुनाए जाने के पूर्व किसी भी समय किसी आरोप को परिवर्तित कर सकेगा या उसमें परिवर्धन कर सकेगा। (2) ऐसा प्रत्येक परिवर्तन या परिवर्धन अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा। (3) यदि आरोप में किया गया परिवर्तन या परिवर्धन ऐसा है कि न्यायालय की राय में विचारण…
पूरा पढ़ेंआरोप में परिवर्तन होने पर गवाहों को पुनः बुलाना।
जब भी मुकदमे की शुरुआत के बाद न्यायालय द्वारा आरोप में परिवर्तन या कोई आरोप जोड़ा जाता है, तो अभियोजक और आरोपी को इसकी अनुमति दी जाएगी— (क) किसी भी गवाह को, जिसकी पहले जांच की जा चुकी हो, वापस बुलाना या पुनः तलब करना और ऐसे परिवर्तन या परिवर्धन के संबंध में उसकी जांच करना, जब तक कि न्यायालय, लिखित रूप में दर्ज किए…
पूरा पढ़ेंधारा 217. आरोप परिवर्तित किए जाने पर साक्षियों का पुनः बुलाया जाना
217. आरोप परिवर्तित किए जाने पर साक्षियों का पुनः बुलाया जाना जब कभी विचारण के प्रारंभ के पश्चात् न्यायालय द्वारा कोई आरोप परिवर्तित किया जाता है या उसमें परिवर्धन किया जाता है, तब अभियोजक को और अभियुक्त को यह अनुज्ञात होगा कि वे— (क) किसी ऐसे साक्षी को, जिसकी परीक्षा की जा चुकी हो, पुनः बुलाएं या पुनः समन करें और ऐसे…
पूरा पढ़ेंअलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप।
(1) प्रत्येक पृथक अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है, एक अलग आरोप होगा, और ऐसे प्रत्येक आरोप की सुनवाई अलग से की जाएगी: बशर्ते कि यदि आरोपी व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा ऐसा चाहता है और मजिस्ट्रेट की राय है कि इससे उस व्यक्ति को कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है, तो मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति के…
पूरा पढ़ेंधारा 218. पृथक् अपराधों के लिए पृथक् आरोप
218. पृथक् अपराधों के लिए पृथक् आरोप (1) प्रत्येक पृथक् अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर अभियोग है, पृथक् आरोप होगा और ऐसे प्रत्येक आरोप का विचारण पृथक्तः किया जाएगा: परन्तु जहां अभियुक्त व्यक्ति लिखित आवेदन द्वारा ऐसी वांछा करता है और मजिस्ट्रेट की यह राय है कि ऐसे व्यक्ति पर उससे प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना…
पूरा पढ़ेंएक ही वर्ष में एक ही प्रकार के अपराधों के लिए एक साथ आरोप लगाए जा सकते हैं।
(1) जब किसी व्यक्ति पर एक ही प्रकार के एक से अधिक अपराधों का आरोप लगाया जाता है, जो पहले अपराध से लेकर अंतिम अपराध तक बारह महीनों के अंतराल में किए गए हों, चाहे वे अपराध एक ही व्यक्ति के संबंध में हों या नहीं, तो उस पर अधिकतम पाँच अपराधों के लिए आरोप लगाया जा सकता है और एक ही मुकदमे में उन अपराधों के लिए मुकदमा चलाया…
पूरा पढ़ेंधारा 219. वर्ष के भीतर किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा
219. वर्ष के भीतर किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा (1) जब किसी व्यक्ति पर एक ही किस्म के एक से अधिक अपराधों का, जो ऐसे अपराधों में से प्रथम से अंतिम तक बारह मास की कालावधि के भीतर किए गए हैं, अभियोग है, चाहे वे एक ही व्यक्ति के बारे में हों या नहीं, तब उस पर उनमें से किसी भी संख्या के…
पूरा पढ़ेंएक से अधिक अपराधों के लिए मुकदमा।
(1) यदि एक ही लेन-देन बनाने के लिए आपस में जुड़े कृत्यों की एक श्रृंखला में एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं, तो उस पर प्रत्येक ऐसे अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकता है और एक ही मुकदमे में मुकदमा चलाया जा सकता है। (2) जब किसी व्यक्ति पर धारा 235 की उपधारा (2) या धारा 242 की उपधारा (1) में दिए गए…
पूरा पढ़ेंधारा 220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण
220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण (1) यदि आपस में इस प्रकार संसक्त कार्यों की, कि वे एक ही संव्यवहार बनते हैं, एक ही शृंखला में एक ही व्यक्ति द्वारा एक से अधिक अपराध किए जाते हैं, तो उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा। (2) जब किसी व्यक्ति पर, जिस पर…
पूरा पढ़ेंजहां यह संदेह हो कि कौन सा अपराध किया गया है।
(1) यदि कोई एक कृत्य या कृत्यों की श्रृंखला इस प्रकार की हो कि यह संदेह हो कि सिद्ध किए जा सकने वाले तथ्य अनेक अपराधों में से कौन सा अपराध गठित करेंगे, तो अभियुक्त पर ऐसे सभी या किसी भी अपराध को करने का आरोप लगाया जा सकता है, और ऐसे कितने भी आरोपों पर एक साथ मुकदमा चलाया जा सकता है; या उस पर उक्त अपराधों में से किसी…
पूरा पढ़ेंधारा 221. जहां यह संदेहपूर्ण है कि कौन-सा अपराध किया गया है
221. जहां यह संदेहपूर्ण है कि कौन-सा अपराध किया गया है (1) यदि कोई एक कार्य या कार्यों की शृंखला ऐसी प्रकृति की है कि यह संदेहपूर्ण है कि जो तथ्य साबित किए जा सकते हैं वे कई अपराधों में से कौन-सा अपराध बनेंगे, तो अभियुक्त पर ऐसे सब अपराधों को या उनमें से किसी को करने का आरोप लगाया जा सकेगा, और ऐसे आरोपों में से कितने…
पूरा पढ़ेंजब अपराध सिद्ध हो जाता है, तो उसे आरोपित अपराध में शामिल किया जाता है।
(1) जब किसी व्यक्ति पर अनेक विवरणों से युक्त किसी अपराध का आरोप लगाया जाता है, जिनमें से कुछ का संयोजन ही एक पूर्ण लघु अपराध का गठन करता है, और ऐसा संयोजन सिद्ध हो जाता है, परन्तु शेष विवरण सिद्ध नहीं होते, तो उसे लघु अपराध का दोषी ठहराया जा सकता है, यद्यपि उस पर इसका आरोप नहीं लगाया गया था। (2) जब किसी व्यक्ति पर…
पूरा पढ़ेंधारा 222. जब साबित हुआ अपराध आरोपित अपराध में सम्मिलित है
222. जब साबित हुआ अपराध आरोपित अपराध में सम्मिलित है (1) जब किसी व्यक्ति पर ऐसे अपराध का आरोप है जो कई विशिष्टियों से मिलकर बना है, और उनमें से केवल कुछ का संयोजन एक पूर्ण लघु अपराध बनता है, और ऐसा संयोजन साबित हो जाता है किंतु शेष विशिष्टियां साबित नहीं होतीं, तब वह उस लघु अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा, यद्यपि…
पूरा पढ़ेंकिन व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया जा सकता है?
निम्नलिखित व्यक्तियों पर एक साथ आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है, अर्थात्:— (क) एक ही लेन-देन के दौरान किए गए एक ही अपराध के आरोपी व्यक्ति; (ख) किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति तथा ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के आरोपी व्यक्ति; (ग) धारा 242 के अर्थ में एक ही प्रकार के एक से अधिक…
पूरा पढ़ेंधारा 223. कौन-से व्यक्ति संयुक्ततः आरोपित किए जा सकेंगे
223. कौन-से व्यक्ति संयुक्ततः आरोपित किए जा सकेंगे निम्नलिखित व्यक्तियों पर आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक साथ किया जा सकेगा, अर्थात्— (क) वे व्यक्ति, जो एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में किए गए एक ही अपराध के अभियुक्त हैं; (ख) वे व्यक्ति, जो किसी अपराध के अभियुक्त हैं, और वे व्यक्ति, जो ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण के…
पूरा पढ़ेंकई आरोपों में से किसी एक में दोष सिद्ध होने पर शेष आरोपों को वापस ले लिया जाना।
जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक आरोपों से संबंधित अभियोग लगाया जाता है, और जब उनमें से एक या अधिक आरोपों पर दोष सिद्ध हो चुका होता है, तो शिकायतकर्ता या अभियोजन पक्ष का अधिकारी न्यायालय की सहमति से शेष अभियोग वापस ले सकता है, या न्यायालय स्वयं ऐसे अभियोगों की जांच या मुकदमे पर रोक लगा सकता है, और इस प्रकार…
पूरा पढ़ेंधारा 224. कई आरोपों में से एक पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण
224. कई आरोपों में से एक पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण जब उसी व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक शीर्षों वाला आरोप विरचित किया जाता है, और जब उनमें से एक या अधिक पर दोषसिद्धि हो गई है, तब परिवादी, या अभियोजन का संचालन करने वाला अधिकारी, न्यायालय की सम्मति से, शेष आरोप या आरोपों को प्रत्याहृत कर सकेगा, अथवा…
पूरा पढ़ेंइस मामले की सुनवाई लोक अभियोजक द्वारा की जाएगी।
सत्र न्यायालय के समक्ष प्रत्येक मुकदमे में अभियोजन पक्ष का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाएगा।
पूरा पढ़ेंधारा 225. विचारण का लोक अभियोजक द्वारा संचालित किया जाना
225. विचारण का लोक अभियोजक द्वारा संचालित किया जाना सत्र न्यायालय के समक्ष प्रत्येक विचारण में अभियोजन का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाएगा।
पूरा पढ़ेंअभियोजन पक्ष के लिए मामला शुरू करना।
जब अभियुक्त धारा 232 के तहत या उस समय लागू किसी अन्य कानून के तहत मामले की सुनवाई के लिए न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है या उसे लाया जाता है, तो अभियोजक अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप का वर्णन करते हुए और यह बताते हुए अपना मामला शुरू करेगा कि वह किस साक्ष्य के माध्यम से अभियुक्त के अपराध को साबित करना चाहता है।
पूरा पढ़ेंधारा 226. अभियोजन के मामले का प्रारंभिक कथन
226. अभियोजन के मामले का प्रारंभिक कथन जब अभियुक्त धारा 209 के अधीन मामले की सुपुर्दगी के अनुसरण में न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है, तब अभियोजक अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप का वर्णन करके और यह कथन करके कि वह अभियुक्त का दोष किस साक्ष्य द्वारा साबित करना प्रस्थापित करता है, अपने मामले का प्रारंभिक…
पूरा पढ़ेंस्राव होना।
(1) अभियुक्त धारा 232 के तहत मामले की सुनवाई की तिथि से साठ दिनों की अवधि के भीतर बरी होने के लिए आवेदन कर सकता है। (2) यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करने के बाद, और इस संबंध में अभियुक्त और अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद, न्यायाधीश को लगता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने…
पूरा पढ़ेंधारा 227. उन्मोचन
227. उन्मोचन यदि मामले के अभिलेख पर और उसके साथ पेश किए गए दस्तावेजों पर विचार करने के पश्चात्, तथा इस निमित्त अभियुक्त के और अभियोजन के निवेदन सुनने के पश्चात्, न्यायाधीश यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और ऐसा करने के अपने कारण…
पूरा पढ़ेंस्राव होना।
(1) अभियुक्त धारा 232 के तहत मामले की सुनवाई की तिथि से साठ दिनों की अवधि के भीतर बरी होने के लिए आवेदन कर सकता है। (2) यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करने के बाद, और इस संबंध में अभियुक्त और अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद, न्यायाधीश को लगता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने…
पूरा पढ़ेंनई उपधारा
New Sub-Section
स्राव होना।
(1) अभियुक्त धारा 232 के तहत मामले की सुनवाई की तिथि से साठ दिनों की अवधि के भीतर बरी होने के लिए आवेदन कर सकता है। (2) यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करने के बाद, और इस संबंध में अभियुक्त और अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद, न्यायाधीश को लगता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने…
पूरा पढ़ेंधारा 227. उन्मोचन
227. उन्मोचन यदि मामले के अभिलेख पर और उसके साथ पेश किए गए दस्तावेजों पर विचार करने के पश्चात्, तथा इस निमित्त अभियुक्त के और अभियोजन के निवेदन सुनने के पश्चात्, न्यायाधीश यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और ऐसा करने के अपने कारण…
पूरा पढ़ेंआरोप का निर्धारण।
(1) यदि उपर्युक्त विचार-विमर्श और सुनवाई के बाद न्यायाधीश की यह राय हो कि यह अनुमान लगाने का आधार है कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है जो— (क) यदि मामला सत्र न्यायालय द्वारा विशेष रूप से विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप निर्धारित कर सकता है और आदेश द्वारा मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम…
पूरा पढ़ेंधारा 228. आरोप की विरचना
228. आरोप की विरचना (1) यदि पूर्वोक्त रूप से विचार करने और सुनवाई के पश्चात् न्यायाधीश की यह राय है कि यह उपधारणा करने का आधार है कि अभियुक्त ने कोई ऐसा अपराध किया है जो— (क) केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित कर सकेगा और आदेश द्वारा मामला विचारण के लिए मुख्य न्यायिक…
पूरा पढ़ेंदोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
यदि अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करता है, तो न्यायाधीश उस स्वीकारोक्ति को दर्ज करेगा और अपने विवेकानुसार उसे दोषी ठहरा सकता है।
पूरा पढ़ेंदोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
यदि अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करता है, तो न्यायाधीश उस स्वीकारोक्ति को दर्ज करेगा और अपने विवेकानुसार उसे दोषी ठहरा सकता है।
पूरा पढ़ेंअभियोजन साक्ष्य प्रस्तुत करने की तिथि।
यदि अभियुक्त अपना पक्ष रखने से इनकार करता है, या पक्ष नहीं रखता है, या मुकदमा चलाने का दावा करता है, या धारा 252 के तहत दोषी नहीं ठहराया जाता है, तो न्यायाधीश गवाहों की परीक्षा के लिए एक तारीख तय करेगा, 97 और अभियोजन पक्ष के आवेदन पर, किसी भी गवाह की उपस्थिति या किसी दस्तावेज़ या अन्य वस्तु के उत्पादन को बाध्य करने के…
पूरा पढ़ेंअभियोजन साक्ष्य प्रस्तुत करने की तिथि।
यदि अभियुक्त अपना पक्ष रखने से इनकार करता है, या अपना पक्ष नहीं रखता है, या मुकदमे की मांग करता है, या धारा 229 के तहत दोषी नहीं ठहराया जाता है, तो न्यायाधीश गवाहों की जांच के लिए एक तारीख तय करेगा, और अभियोजन पक्ष के आवेदन पर, किसी भी गवाह की उपस्थिति को बाध्य करने या किसी दस्तावेज या अन्य वस्तु को पेश करने के लिए…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) निर्धारित तिथि पर न्यायाधीश अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्यों को लेने की कार्यवाही करेगा: बशर्ते कि इस उपधारा के तहत किसी गवाह के साक्ष्य को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से रिकॉर्ड किया जा सकता है। (2) किसी लोक सेवक के साक्ष्य का बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लिया जा सकता…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) इस प्रकार निर्धारित तिथि पर, न्यायाधीश अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी साक्ष्यों को लेने की कार्यवाही करेगा। (2) न्यायाधीश अपने विवेक से किसी गवाह की जिरह को तब तक स्थगित करने की अनुमति दे सकता है जब तक कि किसी अन्य गवाह या गवाहों की जांच न हो जाए या आगे जिरह के लिए किसी गवाह को वापस बुला…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) निर्धारित तिथि पर न्यायाधीश अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्यों को लेने की कार्यवाही करेगा: बशर्ते कि इस उपधारा के तहत किसी गवाह के साक्ष्य को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से रिकॉर्ड किया जा सकता है। (2) किसी लोक सेवक के साक्ष्य का बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लिया जा सकता…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) इस प्रकार निर्धारित तिथि पर, न्यायाधीश अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी साक्ष्यों को लेने की कार्यवाही करेगा। (2) न्यायाधीश अपने विवेक से किसी गवाह की जिरह को तब तक स्थगित करने की अनुमति दे सकता है जब तक कि किसी अन्य गवाह या गवाहों की जांच न हो जाए या आगे जिरह के लिए किसी गवाह को वापस बुला…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) निर्धारित तिथि पर न्यायाधीश अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्यों को लेने की कार्यवाही करेगा: बशर्ते कि इस उपधारा के तहत किसी गवाह के साक्ष्य को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से रिकॉर्ड किया जा सकता है। (2) किसी लोक सेवक के साक्ष्य का बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लिया जा सकता…
पूरा पढ़ेंनई उपधारा
New Sub-Section
अभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) निर्धारित तिथि पर न्यायाधीश अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्यों को लेने की कार्यवाही करेगा: बशर्ते कि इस उपधारा के तहत किसी गवाह के साक्ष्य को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से रिकॉर्ड किया जा सकता है। (2) किसी लोक सेवक के साक्ष्य का बयान ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लिया जा सकता…
पूरा पढ़ेंअभियोजन के लिए साक्ष्य।
(1) इस प्रकार निर्धारित तिथि पर, न्यायाधीश अभियोजन पक्ष के समर्थन में प्रस्तुत किए जाने वाले सभी साक्ष्यों को लेने की कार्यवाही करेगा। (2) न्यायाधीश अपने विवेक से किसी गवाह की जिरह को तब तक स्थगित करने की अनुमति दे सकता है जब तक कि किसी अन्य गवाह या गवाहों की जांच न हो जाए या आगे जिरह के लिए किसी गवाह को वापस बुला…
पूरा पढ़ेंबरी होना।
यदि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर विचार करने, आरोपी से पूछताछ करने और इस मुद्दे पर अभियोजन और बचाव पक्ष की बात सुनने के बाद न्यायाधीश को लगता है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आरोपी ने अपराध किया है, तो न्यायाधीश बरी करने का आदेश दर्ज करेगा।
पूरा पढ़ेंबरी होना।
यदि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर विचार करने, आरोपी से पूछताछ करने और इस मुद्दे पर अभियोजन और बचाव पक्ष की बात सुनने के बाद न्यायाधीश को लगता है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आरोपी ने अपराध किया है, तो न्यायाधीश बरी करने का आदेश दर्ज करेगा।
पूरा पढ़ेंरक्षात्मक मुद्रा में प्रवेश करना।
(1) जहां अभियुक्त धारा 255 के तहत बरी नहीं होता है, तो उसे अपना बचाव करने और उसके समर्थन में कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा जाएगा। (2) यदि अभियुक्त कोई लिखित बयान देता है, तो न्यायाधीश उसे अभिलेख में दाखिल करेगा। (3) यदि अभियुक्त किसी गवाह की उपस्थिति को बाध्य करने या किसी दस्तावेज़ या वस्तु के उत्पादन के लिए…
पूरा पढ़ेंरक्षात्मक मुद्रा में प्रवेश करना।
(1) जहां अभियुक्त धारा 232 के तहत बरी नहीं होता है, तो उसे अपना बचाव करने और उसके समर्थन में कोई भी साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए कहा जाएगा। (2) यदि अभियुक्त कोई लिखित बयान देता है, तो न्यायाधीश उसे अभिलेख के साथ दर्ज करेगा। (3) यदि अभियुक्त किसी गवाह की उपस्थिति को बाध्य करने या किसी दस्तावेज़ या वस्तु के उत्पादन के…
पूरा पढ़ेंतर्क।
जब बचाव पक्ष के गवाहों (यदि कोई हो) की जांच पूरी हो जाए, तो अभियोजक अपना पक्ष संक्षेप में प्रस्तुत करेगा और अभियुक्त या उसका वकील जवाब देने का हकदार होगा। बशर्ते कि यदि अभियुक्त या उसके अधिवक्ता द्वारा कानून का कोई मुद्दा उठाया जाता है, तो अभियोजन पक्ष न्यायाधीश की अनुमति से ऐसे कानूनी मुद्दे के संबंध में अपनी दलीलें…
पूरा पढ़ेंधारा 234. तर्क
234. तर्क जब प्रतिरक्षा के साक्षियों की (यदि कोई हों) परीक्षा पूरी हो जाती है, तब अभियोजक अपने मामले का उपसंहार करेगा और अभियुक्त या उसका प्लीडर उत्तर देने का हकदार होगा: परन्तु जहां अभियुक्त या उसके प्लीडर द्वारा विधि का कोई प्रश्न उठाया जाता है, वहां अभियोजन, न्यायाधीश की अनुज्ञा से, विधि के ऐसे प्रश्न के संबंध में…
पूरा पढ़ेंदोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय।
(1) दलीलों और विधि संबंधी बिंदुओं (यदि कोई हो) को सुनने के बाद, न्यायाधीश मामले में यथाशीघ्र, दलीलों के पूर्ण होने की तिथि से तीस दिनों की अवधि के भीतर निर्णय देगा, जिसे लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से पैंतालीस दिनों की अवधि तक बढ़ाया जा सकता है। (2) यदि अभियुक्त दोषी पाया जाता है, तो न्यायाधीश, जब तक कि वह…
पूरा पढ़ेंधारा 235. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय
235. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय (1) तर्कों और विधि के प्रश्नों (यदि कोई हों) को सुनने के पश्चात् न्यायाधीश मामले में निर्णय देगा। (2) यदि अभियुक्त दोषसिद्ध किया जाता है, तो न्यायाधीश, जब तक कि वह धारा 360 के उपबंधों के अनुसार कार्यवाही न करे, दंडादेश के प्रश्न पर अभियुक्त को सुनेगा और तब विधि के अनुसार उस पर…
पूरा पढ़ेंपूर्व दोषसिद्धि।
ऐसे मामले में जहां धारा 234 की उपधारा (7) के प्रावधानों के तहत पूर्व दोषसिद्धि का आरोप लगाया गया है, और आरोपी यह स्वीकार नहीं करता है कि उसे आरोप में बताए अनुसार पहले दोषी ठहराया गया है, तो न्यायाधीश उक्त आरोपी को धारा 252 या धारा 258 के तहत दोषी ठहराने के बाद कथित पूर्व दोषसिद्धि के संबंध में साक्ष्य ले सकता है, और…
पूरा पढ़ेंधारा 236. पूर्व दोषसिद्धि
236. पूर्व दोषसिद्धि ऐसे मामले में, जहां धारा 211 की उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन पूर्व दोषसिद्धि का आरोप लगाया जाता है और अभियुक्त यह स्वीकार नहीं करता कि वह आरोप में अभिकथित रूप से पूर्व में दोषसिद्ध किया जा चुका है, वहां न्यायाधीश, धारा 229 या धारा 235 के अधीन उक्त अभियुक्त को दोषसिद्ध कर देने के पश्चात्, अभिकथित…
पूरा पढ़ेंधारा 222 की उपधारा (2) के तहत दायर मामलों में प्रक्रिया।
(1) धारा 222 की उपधारा (2) के तहत किसी अपराध का संज्ञान लेने वाला सत्र न्यायालय, मजिस्ट्रेट न्यायालय के समक्ष पुलिस रिपोर्ट के अलावा अन्य किसी आधार पर दायर वारंट मामलों के परीक्षण की प्रक्रिया के अनुसार मामले की सुनवाई करेगा। बशर्ते कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध अपराध किए जाने का आरोप है, जब तक कि सत्र न्यायालय, दर्ज किए…
पूरा पढ़ेंधारा 237. धारा 199(2) के अधीन संस्थित मामलों में प्रक्रिया
237. धारा 199(2) के अधीन संस्थित मामलों में प्रक्रिया (1) धारा 199 की उपधारा (2) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान करने वाला सत्र न्यायालय मामले का विचारण, मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित मामलों से अन्यथा संस्थित वारंट-मामलों के विचारण की प्रक्रिया के अनुसार करेगा: परन्तु वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध…
पूरा पढ़ें- BNSS §218CRPC §197बदलाव हुआ
न्यायाधीशों और लोक सेवकों पर मुकदमा चलाना।
धारा 197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन
- BNSS §219CRPC §198बदलाव हुआ
वैवाहिक अपराधों के लिए अभियोजन।
धारा 198. विवाह के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन
- BNSS §220CRPC §198A
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत अपराधों का अभियोजन।
धारा 198A. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन
- BNSS §221CRPC §198B
अपराध का संज्ञान।
धारा 198B. अपराध का संज्ञान
- BNSS §222CRPC §199बदलाव हुआ
मानहानि के लिए अभियोग।
धारा 199. मानहानि के लिए अभियोजन
- BNSS §223CRPC §200बदलाव हुआ
शिकायतकर्ता की जांच।
धारा 200. परिवादी की परीक्षा
- BNSS §223CRPC §200
शिकायतकर्ता की जांच।
धारा 200. परिवादी की परीक्षा
- BNSS §223(2)CRPC §New Sub-Section
शिकायतकर्ता की जांच।
नई उपधारा
BNSS §223(2)CRPC §New Sub-Section - BNSS §224CRPC §201
मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया मामले का संज्ञान लेने के लिए सक्षम नहीं है।
धारा 201. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जो मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है
- BNSS §225CRPC §202
प्रक्रिया जारी करने का स्थगन।
धारा 202. आदेशिका जारी करना स्थगित करना
- BNSS §226CRPC §203
शिकायत खारिज।
धारा 203. परिवाद का खारिज किया जाना
- BNSS §227CRPC §204बदलाव हुआ
प्रक्रिया का मुद्दा।
धारा 204. आदेशिका का जारी किया जाना
- BNSS §228CRPC §205
मजिस्ट्रेट अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है।
धारा 205. मजिस्ट्रेट अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा
- BNSS §229CRPC §206बदलाव हुआ
मामूली अपराधों के मामलों में विशेष समन।
धारा 206. लघु अपराध के मामलों में विशेष समन
- BNSS §230CRPC §207बदलाव हुआ
अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की प्रति उपलब्ध कराएं।
- BNSS §231CRPC §208बदलाव हुआ
सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्तों को बयानों और दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराना।
धारा 208. सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजों की प्रतियां देना
- BNSS §232CRPC §209बदलाव हुआ
जब अपराध का विचारण केवल सत्र न्यायालय द्वारा ही किया जा सकता है, तो मामले को सत्र न्यायालय को सौंप दिया जाता है।
धारा 209. जब अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय हो तब मामले का सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया जाना
- BNSS §233CRPC §210
किसी अपराध के संबंध में शिकायत का मामला और पुलिस जांच होने पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
धारा 210. जब उसी अपराध के संबंध में परिवाद-मामला और पुलिस अन्वेषण दोनों हों तब अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया
- BNSS §234CRPC §211
आरोप की सामग्री।
धारा 211. आरोप की अंतर्वस्तु
- BNSS §235CRPC §212
समय, स्थान और व्यक्ति से संबंधित विवरण।
धारा 212. समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां
- BNSS §236CRPC §213
अपराध करने का तरीका कब बताना आवश्यक है?
धारा 213. अपराध किए जाने की रीति कब कथित की जानी चाहिए
- BNSS §237CRPC §214
यहां 'आरोप' शब्द का प्रयोग उस कानूनी अर्थ में किया गया है जिसके तहत अपराध दंडनीय है।
धारा 214. आरोप में शब्दों का वह अर्थ लिया जाना जो उस विधि में है जिसके अधीन अपराध दंडनीय है
- BNSS §238CRPC §215
त्रुटियों का प्रभाव।
धारा 215. गलतियों का प्रभाव
- BNSS §239CRPC §216
न्यायालय आरोप में बदलाव कर सकता है।
धारा 216. न्यायालय आरोप परिवर्तित कर सकेगा
- BNSS §240CRPC §217
आरोप में परिवर्तन होने पर गवाहों को पुनः बुलाना।
धारा 217. आरोप परिवर्तित किए जाने पर साक्षियों का पुनः बुलाया जाना
- BNSS §241CRPC §218
अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप।
धारा 218. पृथक् अपराधों के लिए पृथक् आरोप
- BNSS §242CRPC §219बदलाव हुआ
एक ही वर्ष में एक ही प्रकार के अपराधों के लिए एक साथ आरोप लगाए जा सकते हैं।
धारा 219. वर्ष के भीतर किए गए एक ही किस्म के तीन अपराधों का आरोप एक साथ लगाया जा सकेगा
- BNSS §243CRPC §220
एक से अधिक अपराधों के लिए मुकदमा।
धारा 220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण
- BNSS §244CRPC §221
जहां यह संदेह हो कि कौन सा अपराध किया गया है।
धारा 221. जहां यह संदेहपूर्ण है कि कौन-सा अपराध किया गया है
- BNSS §245CRPC §222
जब अपराध सिद्ध हो जाता है, तो उसे आरोपित अपराध में शामिल किया जाता है।
धारा 222. जब साबित हुआ अपराध आरोपित अपराध में सम्मिलित है
- BNSS §246CRPC §223
किन व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया जा सकता है?
धारा 223. कौन-से व्यक्ति संयुक्ततः आरोपित किए जा सकेंगे
- BNSS §247CRPC §224
कई आरोपों में से किसी एक में दोष सिद्ध होने पर शेष आरोपों को वापस ले लिया जाना।
धारा 224. कई आरोपों में से एक पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण
- BNSS §248CRPC §225
इस मामले की सुनवाई लोक अभियोजक द्वारा की जाएगी।
धारा 225. विचारण का लोक अभियोजक द्वारा संचालित किया जाना
- BNSS §249CRPC §226बदलाव हुआ
अभियोजन पक्ष के लिए मामला शुरू करना।
धारा 226. अभियोजन के मामले का प्रारंभिक कथन
- BNSS §250CRPC §227बदलाव हुआ
स्राव होना।
धारा 227. उन्मोचन
- BNSS §250(1)CRPC §New Sub-Section
स्राव होना।
नई उपधारा
BNSS §250(1)CRPC §New Sub-Section - BNSS §250CRPC §227
स्राव होना।
धारा 227. उन्मोचन
- BNSS §251CRPC §228बदलाव हुआ
आरोप का निर्धारण।
धारा 228. आरोप की विरचना
- BNSS §252CRPC §229
दोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
- BNSS §253CRPC §230
अभियोजन साक्ष्य प्रस्तुत करने की तिथि।
- BNSS §254CRPC §231बदलाव हुआ
अभियोजन के लिए साक्ष्य।
- BNSS §254CRPC §231
अभियोजन के लिए साक्ष्य।
- BNSS §254(2)CRPC §New Sub-Section
अभियोजन के लिए साक्ष्य।
नई उपधारा
BNSS §254(2)CRPC §New Sub-Section - BNSS §254CRPC §231(2) Evidence for prosecution
अभियोजन के लिए साक्ष्य।
- BNSS §255CRPC §232
बरी होना।
- BNSS §256CRPC §233
रक्षात्मक मुद्रा में प्रवेश करना।
- BNSS §257CRPC §234
तर्क।
धारा 234. तर्क
- BNSS §258CRPC §235बदलाव हुआ
दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय।
धारा 235. दोषमुक्ति या दोषसिद्धि का निर्णय
- BNSS §259CRPC §236
पूर्व दोषसिद्धि।
धारा 236. पूर्व दोषसिद्धि
- BNSS §260CRPC §237
धारा 222 की उपधारा (2) के तहत दायर मामलों में प्रक्रिया।
धारा 237. धारा 199(2) के अधीन संस्थित मामलों में प्रक्रिया
