बीएनएसएस → सीआरपीसी
12 प्रविष्टियाँ
आक्रामक हथियारों को जब्त करने का अधिकार।
इस संहिता के अंतर्गत किसी भी प्रकार की गिरफ्तारी करने वाला पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति, गिरफ्तारी के तुरंत बाद, गिरफ्तार व्यक्ति से उसके पास मौजूद किसी भी प्रकार के आपत्तिजनक हथियार को जब्त कर सकता है, और इस प्रकार जब्त किए गए सभी हथियारों को उस न्यायालय या अधिकारी को सौंप देगा जिसके समक्ष इस संहिता के अनुसार…
पूरा पढ़ेंधारा 52. आक्रामक आयुधों को अभिगृहीत करने की शक्ति
52. आक्रामक आयुधों को अभिगृहीत करने की शक्ति इस संहिता के अधीन कोई गिरफ्तारी करने वाला अधिकारी या अन्य व्यक्ति, गिरफ्तार किए गए व्यक्ति से ऐसे कोई आक्रामक आयुध ले सकेगा, जो उसके शरीर पर हों, और इस प्रकार लिए गए सब आयुधों को उस न्यायालय या अधिकारी को परिदत्त करेगा, जिसके समक्ष गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी या व्यक्ति से…
पूरा पढ़ेंबलात्कार के आरोपी व्यक्ति की चिकित्सक द्वारा जांच।
(1) जब किसी व्यक्ति को बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि उसकी जांच से ऐसे अपराध के घटित होने के संबंध में साक्ष्य प्राप्त होंगे, तो सरकार या स्थानीय प्राधिकरण द्वारा संचालित अस्पताल में कार्यरत किसी पंजीकृत चिकित्सक के लिए और अपराध स्थल से…
पूरा पढ़ेंधारा 53A. चिकित्सा-व्यवसायी द्वारा बलात्संग के अभियुक्त व्यक्ति की परीक्षा
53A. चिकित्सा-व्यवसायी द्वारा बलात्संग के अभियुक्त व्यक्ति की परीक्षा (1) जब कोई व्यक्ति बलात्संग करने के या बलात्संग करने का प्रयत्न करने के अपराध के आरोप में गिरफ्तार किया जाता है और यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त आधार हैं कि उसके शरीर की परीक्षा से ऐसा अपराध किए जाने के बारे में साक्ष्य मिलेगा, तब सरकार द्वारा…
पूरा पढ़ेंउच्च न्यायालयों के समक्ष मुकदमे।
जब किसी अपराध की सुनवाई उच्च न्यायालय द्वारा धारा 447 के अलावा किसी अन्य तरीके से की जाती है, तो वह उस अपराध की सुनवाई में वही प्रक्रिया अपनाएगा जो सत्र न्यायालय उस मामले की सुनवाई करते समय अपनाता।
पूरा पढ़ेंधारा 474. उच्च न्यायालय के समक्ष विचारण
474. उच्च न्यायालय के समक्ष विचारण जब किसी अपराध का विचारण उच्च न्यायालय द्वारा धारा 407 के अधीन से अन्यथा किया जाता है, तब वह उस अपराध के विचारण में वही प्रक्रिया अवलंबित करेगा जो सेशन न्यायालय, यदि वह उस मामले का विचारण कर रहा होता तो, अवलंबित करता।
पूरा पढ़ेंजिन व्यक्तियों पर कोर्ट-मार्शल द्वारा मुकदमा चलाया जा सकता है, उन्हें कमांडिंग अधिकारियों को सौंपना।
(1) केंद्र सरकार इस संहिता और वायु सेना अधिनियम, 1950 (45 ऑफ 1950), सेना अधिनियम, 1950 (46 ऑफ 1950), नौसेना अधिनियम, 1957 (62 ऑफ 1957), और संघ के सशस्त्र बलों से संबंधित किसी अन्य कानून के अनुरूप नियम बना सकती है, उन मामलों के संबंध में जिनमें सेना, नौसेना या वायु सेना कानून, या ऐसे अन्य कानून के अधीन व्यक्तियों पर इस…
पूरा पढ़ेंधारा 475. सेना न्यायालय द्वारा विचारणीय व्यक्तियों का कमान अधिकारियों को परिदान
475. सेना न्यायालय द्वारा विचारणीय व्यक्तियों का कमान अधिकारियों को परिदान (1) केंद्रीय सरकार, इस संहिता तथा सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) और वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) और संघ के सशस्त्र बलों से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि से संगत नियम, उन मामलों के बारे में बना…
पूरा पढ़ेंप्रपत्र।
संविधान के अनुच्छेद 227 द्वारा प्रदत्त शक्ति के अधीन रहते हुए, द्वितीय अनुसूची में निर्धारित प्रपत्रों का उपयोग, प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक बदलावों के साथ, उसमें उल्लिखित संबंधित उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है, और यदि उनका उपयोग किया जाता है तो वे पर्याप्त होंगे।
पूरा पढ़ेंधारा 476. प्ररूप
476. प्ररूप संविधान के अनुच्छेद 227 द्वारा प्रदत्त शक्ति के अधीन रहते हुए, द्वितीय अनुसूची में उपवर्णित प्ररूप, ऐसे फेरफारों सहित जो प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के अनुसार अपेक्षित हों, उनमें वर्णित तत्संबंधी प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाए जा सकेंगे, और यदि उपयोग में लाए जाएं तो पर्याप्त होंगे।
पूरा पढ़ेंनियम बनाने का उच्च न्यायालय का अधिकार।
(1) प्रत्येक उच्च न्यायालय, राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति से, नियम बना सकता है--- (क) उन व्यक्तियों के संबंध में जिन्हें इसके अधीनस्थ आपराधिक न्यायालयों में याचिका-लेखक के रूप में कार्य करने की अनुमति दी जा सकती है; (ख) ऐसे व्यक्तियों को लाइसेंस जारी करने, उनके द्वारा व्यवसाय के संचालन और उनके द्वारा लिए जाने वाले…
पूरा पढ़ेंधारा 477. उच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
477. उच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति (1) हर उच्च न्यायालय, राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से, निम्नलिखित के लिए नियम बना सकेगा— (क) उन व्यक्तियों के बारे में जिन्हें अपने अधीनस्थ दंड न्यायालयों में अर्जीनवीस के रूप में कार्य करने की अनुज्ञा दी जा सकेगी; (ख) ऐसे व्यक्तियों को अनुज्ञप्तियां देने का, उनके द्वारा…
पूरा पढ़ेंकुछ मामलों में कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सौंपे गए कार्यों में परिवर्तन करने का अधिकार।
यदि किसी राज्य की विधान सभा संकल्प द्वारा ऐसा करने की अनुमति देती है, तो राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श करने के बाद अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकती है कि धारा 127, 128, 129, 164 और 166 में कार्यपालिका मजिस्ट्रेट के संदर्भों को प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के संदर्भों के रूप में समझा जाएगा।
पूरा पढ़ेंधारा 478. कतिपय मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को आवंटित कृत्यों को परिवर्तित करने की शक्ति
478. कतिपय मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को आवंटित कृत्यों को परिवर्तित करने की शक्ति यदि किसी राज्य की विधान सभा संकल्प द्वारा ऐसी अनुज्ञा दे, तो राज्य सरकार, उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात्, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि धारा 108, धारा 109, धारा 110, धारा 145 और धारा 147 में कार्यपालक मजिस्ट्रेट…
पूरा पढ़ेंऐसे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की व्यक्तिगत रुचि हो।
कोई भी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट, अपने न्यायालय से अपील किए जाने वाले न्यायालय की अनुमति के बिना, किसी ऐसे मामले की सुनवाई या परीक्षण के लिए सौंपने का कार्य नहीं करेगा जिसमें वह स्वयं पक्षकार हो या व्यक्तिगत रूप से हित रखता हो, और कोई भी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट अपने द्वारा पारित या दिए गए किसी भी निर्णय या आदेश के…
पूरा पढ़ेंधारा 479. वे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट वैयक्तिक रूप से हितबद्ध है
479. वे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट वैयक्तिक रूप से हितबद्ध है कोई न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट, उस न्यायालय की अनुज्ञा के सिवाय जिसमें उसके न्यायालय से अपील होती है, किसी ऐसे मामले का विचारण नहीं करेगा या उसे विचारण के लिए सुपुर्द नहीं करेगा जिसमें वह पक्षकार है या वैयक्तिक रूप से हितबद्ध है, और कोई न्यायाधीश या…
पूरा पढ़ेंकुछ न्यायालयों में अभ्यास करने वाले अधिवक्ता मजिस्ट्रेट के रूप में नहीं बैठ सकते।
किसी भी मजिस्ट्रेट के न्यायालय में वकालत करने वाला कोई भी अधिवक्ता उस न्यायालय में या उस न्यायालय के स्थानीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले किसी भी न्यायालय में मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य नहीं करेगा।
पूरा पढ़ेंधारा 480. व्यवसायरत प्लीडर का कतिपय न्यायालयों में मजिस्ट्रेट के रूप में न बैठना
480. व्यवसायरत प्लीडर का कतिपय न्यायालयों में मजिस्ट्रेट के रूप में न बैठना कोई प्लीडर, जो किसी मजिस्ट्रेट के न्यायालय में विधि-व्यवसाय करता है, उस न्यायालय में या उस न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के भीतर के किसी न्यायालय में मजिस्ट्रेट के रूप में नहीं बैठेगा। राज्य संशोधन कर्नाटक: धारा 480 के पश्चात् निम्नलिखित धारा…
पूरा पढ़ेंबिक्री से संबंधित लोक सेवक को संपत्ति खरीदने या उसके लिए बोली लगाने का अधिकार नहीं है।
इस संहिता के अंतर्गत किसी संपत्ति की बिक्री के संबंध में कोई कर्तव्य निभाने वाला लोक सेवक उस संपत्ति को न तो खरीदेगा और न ही उसके लिए बोली लगाएगा।
पूरा पढ़ेंधारा 481. विक्रय से संबद्ध लोक सेवक का संपत्ति क्रय या उसके लिए बोली न लगाना
481. विक्रय से संबद्ध लोक सेवक का संपत्ति क्रय या उसके लिए बोली न लगाना ऐसा लोक सेवक, जिसे इस संहिता के अधीन किसी संपत्ति के विक्रय के संबंध में कोई कर्तव्य पालन करना है, उस संपत्ति का क्रय नहीं करेगा और न उसके लिए बोली लगाएगा।
पूरा पढ़ेंउच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का संरक्षण।
इस संहिता में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस संहिता के तहत किसी आदेश को प्रभावी बनाने के लिए, या किसी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए, या अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिए आवश्यक आदेश देने हेतु उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित करता हो।
पूरा पढ़ेंधारा 482. उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति की व्यावृत्ति
482. उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति की व्यावृत्ति इस संहिता की कोई बात उच्च न्यायालय की उन अंतर्निहित शक्तियों को सीमित करने वाली या उन पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी जो इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिए, अथवा किसी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग का निवारण करने के लिए, अथवा अन्यथा न्याय के…
पूरा पढ़ेंन्यायालयों पर निरंतर पर्यवेक्षण करना उच्च न्यायालय का कर्तव्य है।
प्रत्येक उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ सत्र न्यायालयों और न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालयों पर इस प्रकार अपना अधीक्षण करेगा कि न्यायाधीशों और मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों का शीघ्र और उचित निपटारा सुनिश्चित हो सके।
पूरा पढ़ेंधारा 483. न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर सतत अधीक्षण रखने का उच्च न्यायालय का कर्तव्य
483. न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर सतत अधीक्षण रखने का उच्च न्यायालय का कर्तव्य हर उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर अपना अधीक्षण इस प्रकार करेगा जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि ऐसे मजिस्ट्रेटों द्वारा मामलों का शीघ्र और उचित निपटारा होता है।
पूरा पढ़ें- BNSS §50CRPC §52बदलाव हुआ
आक्रामक हथियारों को जब्त करने का अधिकार।
धारा 52. आक्रामक आयुधों को अभिगृहीत करने की शक्ति
- BNSS §52CRPC §53Aबदलाव हुआ
बलात्कार के आरोपी व्यक्ति की चिकित्सक द्वारा जांच।
धारा 53A. चिकित्सा-व्यवसायी द्वारा बलात्संग के अभियुक्त व्यक्ति की परीक्षा
- BNSS §520CRPC §474
उच्च न्यायालयों के समक्ष मुकदमे।
धारा 474. उच्च न्यायालय के समक्ष विचारण
- BNSS §521CRPC §475
जिन व्यक्तियों पर कोर्ट-मार्शल द्वारा मुकदमा चलाया जा सकता है, उन्हें कमांडिंग अधिकारियों को सौंपना।
धारा 475. सेना न्यायालय द्वारा विचारणीय व्यक्तियों का कमान अधिकारियों को परिदान
- BNSS §522CRPC §476
प्रपत्र।
धारा 476. प्ररूप
- BNSS §523CRPC §477
नियम बनाने का उच्च न्यायालय का अधिकार।
धारा 477. उच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
- BNSS §524CRPC §478
कुछ मामलों में कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सौंपे गए कार्यों में परिवर्तन करने का अधिकार।
धारा 478. कतिपय मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को आवंटित कृत्यों को परिवर्तित करने की शक्ति
- BNSS §525CRPC §479
ऐसे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट की व्यक्तिगत रुचि हो।
धारा 479. वे मामले जिनमें न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट वैयक्तिक रूप से हितबद्ध है
- BNSS §526CRPC §480बदलाव हुआ
कुछ न्यायालयों में अभ्यास करने वाले अधिवक्ता मजिस्ट्रेट के रूप में नहीं बैठ सकते।
धारा 480. व्यवसायरत प्लीडर का कतिपय न्यायालयों में मजिस्ट्रेट के रूप में न बैठना
- BNSS §527CRPC §481
बिक्री से संबंधित लोक सेवक को संपत्ति खरीदने या उसके लिए बोली लगाने का अधिकार नहीं है।
धारा 481. विक्रय से संबद्ध लोक सेवक का संपत्ति क्रय या उसके लिए बोली न लगाना
- BNSS §528CRPC §482
उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों का संरक्षण।
धारा 482. उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति की व्यावृत्ति
- BNSS §529CRPC §483बदलाव हुआ
न्यायालयों पर निरंतर पर्यवेक्षण करना उच्च न्यायालय का कर्तव्य है।
धारा 483. न्यायिक मजिस्ट्रेटों के न्यायालयों पर सतत अधीक्षण रखने का उच्च न्यायालय का कर्तव्य
