एफ़आईआर डिकोडर
एफ़आईआर में लिखी धाराएँ यहाँ चिपकाइए — हर धारा का मतलब सरल हिन्दी में।
कुल स्थिति
इस धारा का वर्गीकरण अभी हमारे पास प्रकाशित नहीं है।
सबसे ऊँचा न्यायालय: कोर्ट-मार्शल (बल का अपना न्यायालय)
सज़ा की अधिकतम सीमा
मृत्युदंड — इस समूह में ऐसा अपराध है जिसमें आजीवन कारावास या मृत्युदंड का उपबंध है। नीचे दिए गए आँकड़े केवल नियत-अवधि वाले अपराधों के हैं और वही अंतिम सीमा नहीं हैं।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 25 में कोई पूर्वनिर्धारित नियम नहीं है: न्यायालय अपराधों की गंभीरता को देखते हुए यह आदेश देगा कि सज़ाएँ साथ-साथ चलेंगी या एक के बाद एक। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन — 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले की प्रक्रिया।
- दंड
- मृत्युदंड
यह केवल विधि में लिखी अधिकतम सीमा है, कोई भविष्यवाणी नहीं। वास्तविक सज़ा न्यायालय तय करता है और उसमें कम करने वाली परिस्थितियाँ, अभिवाक् सौदेबाजी, परिवीक्षा और पहले काटी गई अवधि की कटौती शामिल होती है।
इस मामले में क्या संभव है
नीचे हर उत्तर पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा बताता है और कोष्ठक में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की पुरानी धारा।
1 जुलाई 2024 या उसके बाद दर्ज मामलों पर BNSS लागू होती है। मामले की तारीख नहीं दी गई, इसलिए यह धाराओं से अनुमान है।
FIR
पता नहींसंज्ञेय है या नहीं, यह प्रकाशित नहीं है।
गिरफ़्तारी या नोटिस
नहींकम से कम एक अपराध में सात वर्ष से अधिक, आजीवन कारावास या मृत्युदंड है, इसलिए नोटिस वाला नियम लागू नहीं होता।
भा.ना.सु.सं. धारा 35(3) (दं.प्र.सं. धारा 41A)इन धाराओं के कारण: The Navy Act, 1957 धारा 37
ज़मानत
पता नहींज़मानती है या नहीं, यह प्रकाशित नहीं है।
अग्रिम ज़मानत
पता नहींइन धाराओं का वर्गीकरण अभी प्रकाशित नहीं है, इसलिए इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता।
डिफ़ॉल्ट ज़मानत
हाँपहली रिमांड से 90 दिन में पुलिस रिपोर्ट (आरोप-पत्र) दाखिल न हो, तो ज़मानत अधिकार बन जाती है — रिमांड का दिन पहला दिन गिना जाता है।
भा.ना.सु.सं. धारा 187(3) (दं.प्र.सं. धारा 167(2))इन धाराओं के कारण: The Navy Act, 1957 धारा 37
विचाराधीन बंदी की रिहाई
नहींमृत्युदंड या आजीवन कारावास वाले अपराध पर यह लागू नहीं।
भा.ना.सु.सं. धारा 479 (दं.प्र.सं. धारा 436A)इन धाराओं के कारण: The Navy Act, 1957 धारा 37
समझौता (राज़ीनामा)
पता नहींसमझौता-योग्य है या नहीं, यह प्रकाशित नहीं है।
प्ली बार्गेनिंग
नहींप्ली बार्गेनिंग नहीं: इस मामले का एक अपराध देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर असर डालने वाला अधिसूचित अपराध है।
- विशेष अधिनियम:देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर असर डालने वाले अपराध के रूप में अधिसूचित (का.आ. 1042(अ), 11 जुलाई 2006), इसलिए प्ली बार्गेनिंग उपलब्ध नहीं। BNSS धारा 289 की अधिसूचना
भा.ना.सु.सं. धारा 289 (दं.प्र.सं. धारा 265A)इन धाराओं के कारण: The Navy Act, 1957 धारा 37
संक्षिप्त विचारण
नहींसंक्षिप्त विचारण नहीं: कम से कम एक अपराध में तीन वर्ष से अधिक की सज़ा है (CrPC में सीमा दो वर्ष थी)।
भा.ना.सु.सं. धारा 283(2) (दं.प्र.सं. धारा 260)इन धाराओं के कारण: The Navy Act, 1957 धारा 37
परिवीक्षा (प्रोबेशन)
नहींमृत्युदंड या आजीवन कारावास वाले अपराध में परिवीक्षा नहीं।
भा.ना.सु.सं. धारा 401 (दं.प्र.सं. धारा 360)इन धाराओं के कारण: The Navy Act, 1957 धारा 37
शिकायत की समय-सीमा
नहींतीन वर्ष से अधिक की सज़ा: कोई समय-सीमा नहीं।
कई अपराध साथ हों तो सबसे गंभीर अपराध की अवधि लगती है (धारा 514(3)); गिनती FIR या शिकायत दर्ज होने की तारीख तक होती है।
भा.ना.सु.सं. धारा 514 (दं.प्र.सं. धारा 468)इन धाराओं के कारण: The Navy Act, 1957 धारा 37
यदि आरोपी बच्चा है (किशोर न्याय)
हाँजघन्य अपराध (न्यूनतम सज़ा सात वर्ष या अधिक)। 16 से 18 वर्ष के बच्चे का बोर्ड प्रारंभिक मूल्यांकन करता है और मामला बाल न्यायालय भेज सकता है (धारा 15, 18(3))।
किशोर न्याय अधिनियम धारा 2(33)इन धाराओं के कारण: The Navy Act, 1957 धारा 37
- §37—The Navy Act, 1957
कार्रवाई में अवज्ञा के लिए शास्ति
- विचारण न्यायालयकोर्ट-मार्शल (बल का अपना न्यायालय)
- दंड
- मृत्युदंड
इस अधिनियम के अधीन विचारण कोर्ट-मार्शल या बल के अपने न्यायालय द्वारा होता है। भा.ना.सु.सं. के संज्ञेय और जमानतीय वाले वर्गीकरण यहाँ लागू नहीं होते; गिरफ़्तारी, अभिरक्षा और विचारण यही अधिनियम तय करता है।
इसी अधिनियम के अपने उपबंध के अनुसार
पूरी धारा पढ़िए
आगे क्या होता है
FIR दर्ज होना
संज्ञेय अपराध की सूचना पर FIR दर्ज होती है, और उसकी प्रति सूचना देने वाले या पीड़ित को तुरंत मुफ़्त दी जाती है। तीन से सात वर्ष वाले अपराध में पुलिस DSP की अनुमति से 14 दिन की प्रारंभिक जाँच कर सकती है (यह BNSS में नया है)।
भा.ना.सु.सं. धारा 173(2) (दं.प्र.सं. धारा 154(2))भा.ना.सु.सं. धारा 173(3)
नोटिस या गिरफ़्तारी
सात वर्ष तक के अपराध में पहले हाज़िर होने का नोटिस दिया जाता है, जब तक गिरफ़्तारी के कारण दर्ज न हों। गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी का आधार और ज़मानत का अधिकार बताया जाना ज़रूरी है।
भा.ना.सु.सं. धारा 35(3) (दं.प्र.सं. धारा 41A)भा.ना.सु.सं. धारा 47 (दं.प्र.सं. धारा 50)
24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने
बिना वारंट गिरफ़्तार व्यक्ति को यात्रा का समय छोड़कर 24 घंटे से अधिक मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
रिमांड
पुलिस हिरासत कुल 15 दिन तक, एक साथ या टुकड़ों में, 60/90 दिन की अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के भीतर। बाकी समय न्यायिक हिरासत।
पुलिस रिपोर्ट (आरोप-पत्र)
जाँच पूरी होने पर पुलिस रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को जाती है। पहली रिमांड से 90 दिन में दाखिल न हो तो डिफ़ॉल्ट ज़मानत अधिकार है। पुलिस को 90 दिन के भीतर पीड़ित को जाँच की प्रगति बतानी होती है।
भा.ना.सु.सं. धारा 193 (दं.प्र.सं. धारा 173)भा.ना.सु.सं. धारा 187(3) (दं.प्र.सं. धारा 167(2))
संज्ञान, आरोप और विचारण
न्यायालय संज्ञान लेकर आरोप तय करता है। प्ली बार्गेनिंग का आवेदन आरोप तय होने के 30 दिन के भीतर करना होता है (CrPC में ऐसी कोई सीमा नहीं थी)।
कौन-सी संहिता लागू होगी?
प्रक्रिया: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है; उस दिन पहले से लंबित अन्वेषण, जाँच या विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन चलता रहता है (भा.ना.सु.सं. धारा 531(2)(क))। अपराध: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया कृत्य भारतीय न्याय संहिता के अधीन, उससे पहले का भारतीय दंड संहिता के अधीन।
मुफ़्त कानूनी सहायता आपका अधिकार है (NALSA / ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण)।
