UP Gangsters Act 10
धारा 10 · िशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) विशेष न्यायालय अपने द्वारा विचारणीय किसी अपराध का संज्ञान, विचारण के लिए अभियुक्त को उसे सुपुर्द किये गये बिना उन तथ्यों का, जिनसे ऐसा अपराध बनता है. परिवाद प्राप्त होने पर या ऐसे तथ्यों की, पुलिस रिपोर्ट पर कर सकता है।
(2) जहाँ विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय कोई अपराध तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के कारावास से या जुर्माने से या दोनों से दण्डनीय है, वहाँ विशेष न्यायालय, संहिता की धारा 260 की उपधारा (1) या धारा 262 में किसी बात के होते हुए भी, उस अपराध का विचारण संहिता में विहित प्रक्रिया के अनुसार संक्षेपतः कर सकता है और संहिता की धारा 263 से 265 तक के उपबन्ध, यथासाध्य, ऐसे विचारण पर लागू होंगेः
परन्तु जब इस उपधारा के अधीन संक्षिप्त विचारण के दौरान विशेष न्यायालय को यह प्रतीत हो कि मामले का स्वरूप ऐसा है कि उसका संक्षेपतः विचारण करना अवांछनीय है, तब विशेष न्यायालय किन्हीं साक्षियों को जिनकी परीक्षा की जा चुकी है, पुनः बुलायेगा और ऐसे अपराध के विचारण के लिएसंहिता के उपवन्धों द्वारा उपवन्धित रीति से मामले की पुनः सुनवाई प्रारंभ करेगा और उक्त उपवन्ध विशेष न्यायालय को और उसके संबंध में, उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे किसी मजिस्ट्रेट को और उसके सम्बन्ध में, लागू होते हैं:
परन्तु यह और कि इस उपधारा के अधीन संक्षिप्त विचारण में किसी दोषसिद्धि के मामले में दो वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास का दण्डादेश देना विशेष न्यायालय के लिए विधिपूर्ण होगा।
(3) विशेष न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य प्राप्त करने की दृष्टि से जिसके बारे में किसी अपराध से प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संपृक्त या संसर्गित होने का अनुमान है; ऐसे व्यक्ति को इस शर्त पर क्षमा प्रदान कर सकता है कि वह उस अपराध के और उससे संपृक्त अन्य प्रत्येक व्यक्ति के संबंध में, चाहे वह उसके करने में कर्ता रहा हो या दुष्प्रेरक, अपने ज्ञान से सभी परिस्थितियों को पूर्ण और सही रूप में प्रकट करें और इस प्रकार प्रदान की गयी कोई क्षमा संहिता की धारा 308 के प्रयोजनार्थ, संहिता की धारा 307 के अधीन प्रदान की गयी समझी जायगी।
(4) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, विशेष न्यायालय को किसी अपराध के विचारण के प्रयोजन के लिए सेशन न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी और वह मजिस्ट्रेट द्वारा वारण्ट के मामलों में विचारण के लिए संहिता में विहित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।
(5) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, धारा 7 की उप धारा (3) के अधीन विशेष न्यायालय को अन्तरित प्रत्येक मामले के संबंध में उसी प्रकार कार्यवाही की जायगी मानो ऐसा मामला संहिता की धारा 406 के अधीन ऐसे विशेष न्यायालय को अन्तरित किया गया हो।
(2) जहाँ विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय कोई अपराध तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के कारावास से या जुर्माने से या दोनों से दण्डनीय है, वहाँ विशेष न्यायालय, संहिता की धारा 260 की उपधारा (1) या धारा 262 में किसी बात के होते हुए भी, उस अपराध का विचारण संहिता में विहित प्रक्रिया के अनुसार संक्षेपतः कर सकता है और संहिता की धारा 263 से 265 तक के उपबन्ध, यथासाध्य, ऐसे विचारण पर लागू होंगेः
परन्तु जब इस उपधारा के अधीन संक्षिप्त विचारण के दौरान विशेष न्यायालय को यह प्रतीत हो कि मामले का स्वरूप ऐसा है कि उसका संक्षेपतः विचारण करना अवांछनीय है, तब विशेष न्यायालय किन्हीं साक्षियों को जिनकी परीक्षा की जा चुकी है, पुनः बुलायेगा और ऐसे अपराध के विचारण के लिएसंहिता के उपवन्धों द्वारा उपवन्धित रीति से मामले की पुनः सुनवाई प्रारंभ करेगा और उक्त उपवन्ध विशेष न्यायालय को और उसके संबंध में, उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे किसी मजिस्ट्रेट को और उसके सम्बन्ध में, लागू होते हैं:
परन्तु यह और कि इस उपधारा के अधीन संक्षिप्त विचारण में किसी दोषसिद्धि के मामले में दो वर्ष से अनधिक अवधि के कारावास का दण्डादेश देना विशेष न्यायालय के लिए विधिपूर्ण होगा।
(3) विशेष न्यायालय किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य प्राप्त करने की दृष्टि से जिसके बारे में किसी अपराध से प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संपृक्त या संसर्गित होने का अनुमान है; ऐसे व्यक्ति को इस शर्त पर क्षमा प्रदान कर सकता है कि वह उस अपराध के और उससे संपृक्त अन्य प्रत्येक व्यक्ति के संबंध में, चाहे वह उसके करने में कर्ता रहा हो या दुष्प्रेरक, अपने ज्ञान से सभी परिस्थितियों को पूर्ण और सही रूप में प्रकट करें और इस प्रकार प्रदान की गयी कोई क्षमा संहिता की धारा 308 के प्रयोजनार्थ, संहिता की धारा 307 के अधीन प्रदान की गयी समझी जायगी।
(4) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, विशेष न्यायालय को किसी अपराध के विचारण के प्रयोजन के लिए सेशन न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी और वह मजिस्ट्रेट द्वारा वारण्ट के मामलों में विचारण के लिए संहिता में विहित प्रक्रिया का अनुसरण करेगा।
(5) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, धारा 7 की उप धारा (3) के अधीन विशेष न्यायालय को अन्तरित प्रत्येक मामले के संबंध में उसी प्रकार कार्यवाही की जायगी मानो ऐसा मामला संहिता की धारा 406 के अधीन ऐसे विशेष न्यायालय को अन्तरित किया गया हो।
इस धारा पर आपका निजी नोट
यह नोट सिर्फ़ आप देख सकते हैं।
