एफ़आईआर डिकोडर
एफ़आईआर में लिखी धाराएँ यहाँ चिपकाइए — हर धारा का मतलब सरल हिन्दी में।
कुल स्थिति
इनमें कम से कम एक अजमानतीय अपराध है
पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है
सबसे ऊँचा न्यायालय: सत्र न्यायालय
सज़ा की अधिकतम सीमा
- क्रमवार (एक के बाद एक)
- 10 वर्ष
- साथ-साथ चलने पर
- 10 वर्ष
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 25 में कोई पूर्वनिर्धारित नियम नहीं है: न्यायालय अपराधों की गंभीरता को देखते हुए यह आदेश देगा कि सज़ाएँ साथ-साथ चलेंगी या एक के बाद एक। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन — 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले की प्रक्रिया।
सेशन न्यायालय कोई भी विधिपूर्ण दंड दे सकता है, अतः यहाँ कोई भी कुल-सीमा लागू नहीं होती (मुथुरामलिंगम बनाम राज्य, (2016) 8 SCC 313)।
यह केवल विधि में लिखी अधिकतम सीमा है, कोई भविष्यवाणी नहीं। वास्तविक सज़ा न्यायालय तय करता है और उसमें कम करने वाली परिस्थितियाँ, अभिवाक् सौदेबाजी, परिवीक्षा और पहले काटी गई अवधि की कटौती शामिल होती है।
इस मामले में क्या संभव है
नीचे हर उत्तर पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा बताता है और कोष्ठक में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की पुरानी धारा।
1 जुलाई 2024 या उसके बाद दर्ज मामलों पर BNSS लागू होती है। मामले की तारीख नहीं दी गई, इसलिए यह धाराओं से अनुमान है।
FIR
हाँसंज्ञेय अपराध: पुलिस को FIR दर्ज करनी होगी — मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक सूचना पर, और किसी भी थाने में (ज़ीरो FIR)।
भा.ना.सु.सं. धारा 173 (दं.प्र.सं. धारा 154)इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
गिरफ़्तारी या नोटिस
नहींकम से कम एक अपराध में सात वर्ष से अधिक, आजीवन कारावास या मृत्युदंड है, इसलिए नोटिस वाला नियम लागू नहीं होता।
भा.ना.सु.सं. धारा 35(3) (दं.प्र.सं. धारा 41A)इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
ज़मानत
अज़मानतीकम से कम एक अपराध अज़मानती है: ज़मानत न्यायालय के विवेक पर है — मजिस्ट्रेट (धारा 480) या सत्र न्यायालय / उच्च न्यायालय (धारा 483)।
भा.ना.सु.सं. धारा 480 (दं.प्र.सं. धारा 437)भा.ना.सु.सं. धारा 483 (दं.प्र.सं. धारा 439)इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
अग्रिम ज़मानत
हाँगिरफ़्तारी की आशंका हो तो सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय से अग्रिम ज़मानत माँगी जा सकती है। कुछ विशेष अधिनियम इसे रोकते हैं, जैसे अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 18।
भा.ना.सु.सं. धारा 482 (दं.प्र.सं. धारा 438)इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
डिफ़ॉल्ट ज़मानत
हाँपहली रिमांड से 90 दिन में पुलिस रिपोर्ट (आरोप-पत्र) दाखिल न हो, तो ज़मानत अधिकार बन जाती है — रिमांड का दिन पहला दिन गिना जाता है।
भा.ना.सु.सं. धारा 187(3) (दं.प्र.सं. धारा 167(2))इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
विचाराधीन बंदी की रिहाई
हाँअधिकतम सज़ा का आधा (5 वर्ष) हिरासत में बिता चुके विचाराधीन बंदी को ज़मानत पर छोड़ा जाएगा; पहली बार के अपराधी को एक-तिहाई (3 वर्ष 4 माह) के बाद बॉन्ड पर।
समझौता (राज़ीनामा)
नहींकम से कम एक अपराध समझौता-योग्य नहीं, इसलिए राज़ीनामे से मामला समाप्त नहीं होता। केवल उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति (BNSS धारा 528, पूर्व में CrPC धारा 482) से रद्द हो सकता है।
भा.ना.सु.सं. धारा 359(1) (दं.प्र.सं. धारा 320(1))इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
प्ली बार्गेनिंग
नहींमृत्युदंड, आजीवन कारावास या सात वर्ष से अधिक की सज़ा वाले अपराध में प्ली बार्गेनिंग नहीं होती।
भा.ना.सु.सं. धारा 289 (दं.प्र.सं. धारा 265A)इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
संक्षिप्त विचारण
नहींसंक्षिप्त विचारण नहीं: कम से कम एक अपराध में तीन वर्ष से अधिक की सज़ा है (CrPC में सीमा दो वर्ष थी)।
भा.ना.सु.सं. धारा 283(2) (दं.प्र.सं. धारा 260)इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
परिवीक्षा (प्रोबेशन)
तथ्यों पर निर्भरसात वर्ष से अधिक की सज़ा: परिवीक्षा तभी, जब दोषी 21 वर्ष से कम आयु का हो या महिला हो।
भा.ना.सु.सं. धारा 401 (दं.प्र.सं. धारा 360)इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
शिकायत की समय-सीमा
नहींतीन वर्ष से अधिक की सज़ा: कोई समय-सीमा नहीं।
कई अपराध साथ हों तो सबसे गंभीर अपराध की अवधि लगती है (धारा 514(3)); गिनती FIR या शिकायत दर्ज होने की तारीख तक होती है।
भा.ना.सु.सं. धारा 514 (दं.प्र.सं. धारा 468)इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
यदि आरोपी बच्चा है (किशोर न्याय)
हाँगंभीर अपराध: मामला किशोर न्याय बोर्ड के पास जाँच के लिए।
किशोर न्याय अधिनियम धारा 2(54)इन धाराओं के कारण: The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002 धारा 78
- §78—The Delhi Metro Railway (Operation And Maintenance) Act, 2002
कतिपय मेट्रो रेल संपत्तियों को नुकसान या उनका नाश
- संज्ञेयपुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है
- अजमानतीयजमानत न्यायालय के विवेक पर है
- समझौता योग्य नहीं
- विचारण न्यायालयसत्र न्यायालय
- अधिकतम दंड
- 10 वर्ष
प्रथम अनुसूची भाग II के नियम से निकाला गया — धारावार सूचीबद्ध नहीं
पूरी धारा पढ़िए
आगे क्या होता है
FIR दर्ज होना
संज्ञेय अपराध की सूचना पर FIR दर्ज होती है, और उसकी प्रति सूचना देने वाले या पीड़ित को तुरंत मुफ़्त दी जाती है। तीन से सात वर्ष वाले अपराध में पुलिस DSP की अनुमति से 14 दिन की प्रारंभिक जाँच कर सकती है (यह BNSS में नया है)।
भा.ना.सु.सं. धारा 173(2) (दं.प्र.सं. धारा 154(2))भा.ना.सु.सं. धारा 173(3)
नोटिस या गिरफ़्तारी
सात वर्ष तक के अपराध में पहले हाज़िर होने का नोटिस दिया जाता है, जब तक गिरफ़्तारी के कारण दर्ज न हों। गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी का आधार और ज़मानत का अधिकार बताया जाना ज़रूरी है।
भा.ना.सु.सं. धारा 35(3) (दं.प्र.सं. धारा 41A)भा.ना.सु.सं. धारा 47 (दं.प्र.सं. धारा 50)
24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने
बिना वारंट गिरफ़्तार व्यक्ति को यात्रा का समय छोड़कर 24 घंटे से अधिक मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
रिमांड
पुलिस हिरासत कुल 15 दिन तक, एक साथ या टुकड़ों में, 60/90 दिन की अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के भीतर। बाकी समय न्यायिक हिरासत।
पुलिस रिपोर्ट (आरोप-पत्र)
जाँच पूरी होने पर पुलिस रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को जाती है। पहली रिमांड से 90 दिन में दाखिल न हो तो डिफ़ॉल्ट ज़मानत अधिकार है। पुलिस को 90 दिन के भीतर पीड़ित को जाँच की प्रगति बतानी होती है।
भा.ना.सु.सं. धारा 193 (दं.प्र.सं. धारा 173)भा.ना.सु.सं. धारा 187(3) (दं.प्र.सं. धारा 167(2))
संज्ञान, आरोप और विचारण
न्यायालय संज्ञान लेकर आरोप तय करता है। प्ली बार्गेनिंग का आवेदन आरोप तय होने के 30 दिन के भीतर करना होता है (CrPC में ऐसी कोई सीमा नहीं थी)।
कौन-सी संहिता लागू होगी?
प्रक्रिया: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है; उस दिन पहले से लंबित अन्वेषण, जाँच या विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन चलता रहता है (भा.ना.सु.सं. धारा 531(2)(क))। अपराध: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया कृत्य भारतीय न्याय संहिता के अधीन, उससे पहले का भारतीय दंड संहिता के अधीन।
मुफ़्त कानूनी सहायता आपका अधिकार है (NALSA / ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण)।
