एफ़आईआर डिकोडर

एफ़आईआर में लिखी धाराएँ यहाँ चिपकाइए — हर धारा का मतलब सरल हिन्दी में।

कुल स्थिति

इनमें कम से कम एक अजमानतीय अपराध है

पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है

सबसे ऊँचा न्यायालय: प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट

सज़ा की अधिकतम सीमा

क्रमवार (एक के बाद एक)
3 वर्ष
साथ-साथ चलने पर
3 वर्ष

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 25 में कोई पूर्वनिर्धारित नियम नहीं है: न्यायालय अपराधों की गंभीरता को देखते हुए यह आदेश देगा कि सज़ाएँ साथ-साथ चलेंगी या एक के बाद एक। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन — 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले की प्रक्रिया।

न्यूनतम दंड (विधिक)
3 वर्ष
जहाँ विधिक न्यूनतम है, न्यायालय उससे कम सज़ा नहीं दे सकता।
जुर्माना
₹50,000

यह केवल विधि में लिखी अधिकतम सीमा है, कोई भविष्यवाणी नहीं। वास्तविक सज़ा न्यायालय तय करता है और उसमें कम करने वाली परिस्थितियाँ, अभिवाक् सौदेबाजी, परिवीक्षा और पहले काटी गई अवधि की कटौती शामिल होती है।

इस मामले में क्या संभव है

नीचे हर उत्तर पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा बताता है और कोष्ठक में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की पुरानी धारा।

1 जुलाई 2024 या उसके बाद दर्ज मामलों पर BNSS लागू होती है। मामले की तारीख नहीं दी गई, इसलिए यह धाराओं से अनुमान है।

  • FIR

    हाँ

    संज्ञेय अपराध: पुलिस को FIR दर्ज करनी होगी — मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक सूचना पर, और किसी भी थाने में (ज़ीरो FIR)।

    भा.ना.सु.सं. धारा 173 (दं.प्र.सं. धारा 154)इन धाराओं के कारण: Arunachal Pradesh Property Rights to Slum Dwellers Act, 2012 धारा 18

  • गिरफ़्तारी या नोटिस

    हाँ

    सात वर्ष तक के अपराध में गिरफ़्तारी अपने-आप नहीं होती: पुलिस को पहले हाज़िर होने का नोटिस देना होता है, जब तक धारा 35(1)(b) के कारण दर्ज न हों। साठ वर्ष से अधिक आयु या अशक्त व्यक्ति को तीन वर्ष से कम सज़ा वाले अपराध में DSP की अनुमति के बिना गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता (धारा 35(7))।

    भा.ना.सु.सं. धारा 35(3) (दं.प्र.सं. धारा 41A)

  • ज़मानत

    अज़मानती

    कम से कम एक अपराध अज़मानती है: ज़मानत न्यायालय के विवेक पर है — मजिस्ट्रेट (धारा 480) या सत्र न्यायालय / उच्च न्यायालय (धारा 483)।

    भा.ना.सु.सं. धारा 480 (दं.प्र.सं. धारा 437)भा.ना.सु.सं. धारा 483 (दं.प्र.सं. धारा 439)इन धाराओं के कारण: Arunachal Pradesh Property Rights to Slum Dwellers Act, 2012 धारा 18

  • अग्रिम ज़मानत

    हाँ

    गिरफ़्तारी की आशंका हो तो सत्र न्यायालय या उच्च न्यायालय से अग्रिम ज़मानत माँगी जा सकती है। कुछ विशेष अधिनियम इसे रोकते हैं, जैसे अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 18।

    भा.ना.सु.सं. धारा 482 (दं.प्र.सं. धारा 438)इन धाराओं के कारण: Arunachal Pradesh Property Rights to Slum Dwellers Act, 2012 धारा 18

  • डिफ़ॉल्ट ज़मानत

    हाँ

    पहली रिमांड से 60 दिन में पुलिस रिपोर्ट (आरोप-पत्र) दाखिल न हो, तो ज़मानत अधिकार बन जाती है — रिमांड का दिन पहला दिन गिना जाता है।

    भा.ना.सु.सं. धारा 187(3) (दं.प्र.सं. धारा 167(2))

  • विचाराधीन बंदी की रिहाई

    हाँ

    अधिकतम सज़ा का आधा (1 वर्ष 6 माह) हिरासत में बिता चुके विचाराधीन बंदी को ज़मानत पर छोड़ा जाएगा; पहली बार के अपराधी को एक-तिहाई (1 वर्ष) के बाद बॉन्ड पर।

    भा.ना.सु.सं. धारा 479 (दं.प्र.सं. धारा 436A)

  • समझौता (राज़ीनामा)

    नहीं

    कम से कम एक अपराध समझौता-योग्य नहीं, इसलिए राज़ीनामे से मामला समाप्त नहीं होता। केवल उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति (BNSS धारा 528, पूर्व में CrPC धारा 482) से रद्द हो सकता है।

    भा.ना.सु.सं. धारा 359(1) (दं.प्र.सं. धारा 320(1))इन धाराओं के कारण: Arunachal Pradesh Property Rights to Slum Dwellers Act, 2012 धारा 18

  • प्ली बार्गेनिंग

    तथ्यों पर निर्भर

    सज़ा के आधार पर उपलब्ध — जब तक अपराध किसी महिला या बच्चे के विरुद्ध न हो, या देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर असर डालने वाला अधिसूचित अपराध न हो। आवेदन आरोप तय होने के 30 दिन के भीतर (BNSS धारा 290)। न्यायालय न्यूनतम सज़ा का आधा (पहली बार के अपराधी को एक-चौथाई), या न्यूनतम न हो तो अधिकतम का एक-चौथाई (पहली बार: छठा भाग) दे सकता है (BNSS धारा 293)।

    भा.ना.सु.सं. धारा 289 (दं.प्र.सं. धारा 265A)

  • संक्षिप्त विचारण

    हाँ

    मजिस्ट्रेट इन्हें संक्षिप्त रूप से सुन सकता है, जो तेज़ होता है; संक्षिप्त विचारण में तीन माह से अधिक कारावास नहीं दिया जा सकता (BNSS धारा 285(2))।

    भा.ना.सु.सं. धारा 283(2) (दं.प्र.सं. धारा 260)

  • परिवीक्षा (प्रोबेशन)

    हाँ

    पहले कोई दोषसिद्धि न हो तो न्यायालय सज़ा देने के बजाय अच्छे आचरण की परिवीक्षा पर छोड़ सकता है; अपराधी परिवीक्षा अधिनियम, 1958 भी लागू हो सकता है।

    भा.ना.सु.सं. धारा 401 (दं.प्र.सं. धारा 360)

  • शिकायत की समय-सीमा

    हाँ

    एक से तीन वर्ष तक की सज़ा: तीन वर्ष के बाद न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा।

    कई अपराध साथ हों तो सबसे गंभीर अपराध की अवधि लगती है (धारा 514(3)); गिनती FIR या शिकायत दर्ज होने की तारीख तक होती है।

    भा.ना.सु.सं. धारा 514 (दं.प्र.सं. धारा 468)इन धाराओं के कारण: Arunachal Pradesh Property Rights to Slum Dwellers Act, 2012 धारा 18

  • यदि आरोपी बच्चा है (किशोर न्याय)

    हाँ

    छोटा अपराध (अधिकतम तीन वर्ष): किशोर न्याय बोर्ड संक्षिप्त प्रक्रिया से निपटाता है।

    किशोर न्याय अधिनियम धारा 2(45)इन धाराओं के कारण: Arunachal Pradesh Property Rights to Slum Dwellers Act, 2012 धारा 18

  • §18—Arunachal Pradesh Property Rights to Slum Dwellers Act, 2012

    अतिक्रमणों को रोकने का उत्तरदायित्व

    • संज्ञेयपुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है
    • अजमानतीयजमानत न्यायालय के विवेक पर है
    • समझौता योग्य नहीं
    • विचारण न्यायालयप्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट
    अधिकतम दंड
    3 वर्ष
    न्यूनतम दंड (विधिक)
    3 वर्ष
    जुर्माना
    ₹50,000

    इसी अधिनियम के अपने उपबंध के अनुसार

    पूरी धारा पढ़िए

आगे क्या होता है

  1. FIR दर्ज होना

    संज्ञेय अपराध की सूचना पर FIR दर्ज होती है, और उसकी प्रति सूचना देने वाले या पीड़ित को तुरंत मुफ़्त दी जाती है। तीन से सात वर्ष वाले अपराध में पुलिस DSP की अनुमति से 14 दिन की प्रारंभिक जाँच कर सकती है (यह BNSS में नया है)।

    भा.ना.सु.सं. धारा 173(2) (दं.प्र.सं. धारा 154(2))भा.ना.सु.सं. धारा 173(3)

  2. नोटिस या गिरफ़्तारी

    सात वर्ष तक के अपराध में पहले हाज़िर होने का नोटिस दिया जाता है, जब तक गिरफ़्तारी के कारण दर्ज न हों। गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी का आधार और ज़मानत का अधिकार बताया जाना ज़रूरी है।

    भा.ना.सु.सं. धारा 35(3) (दं.प्र.सं. धारा 41A)भा.ना.सु.सं. धारा 47 (दं.प्र.सं. धारा 50)

  3. 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने

    बिना वारंट गिरफ़्तार व्यक्ति को यात्रा का समय छोड़कर 24 घंटे से अधिक मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना हिरासत में नहीं रखा जा सकता।

    भा.ना.सु.सं. धारा 58 (दं.प्र.सं. धारा 57)

  4. रिमांड

    पुलिस हिरासत कुल 15 दिन तक, एक साथ या टुकड़ों में, 60/90 दिन की अवधि के पहले 40 या 60 दिनों के भीतर। बाकी समय न्यायिक हिरासत।

    भा.ना.सु.सं. धारा 187(2) (दं.प्र.सं. धारा 167(2))

  5. पुलिस रिपोर्ट (आरोप-पत्र)

    जाँच पूरी होने पर पुलिस रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को जाती है। पहली रिमांड से 60 दिन में दाखिल न हो तो डिफ़ॉल्ट ज़मानत अधिकार है। पुलिस को 90 दिन के भीतर पीड़ित को जाँच की प्रगति बतानी होती है।

    भा.ना.सु.सं. धारा 193 (दं.प्र.सं. धारा 173)भा.ना.सु.सं. धारा 187(3) (दं.प्र.सं. धारा 167(2))

  6. संज्ञान, आरोप और विचारण

    न्यायालय संज्ञान लेकर आरोप तय करता है। प्ली बार्गेनिंग का आवेदन आरोप तय होने के 30 दिन के भीतर करना होता है (CrPC में ऐसी कोई सीमा नहीं थी)।

    भा.ना.सु.सं. धारा 290 (दं.प्र.सं. धारा 265B)

कौन-सी संहिता लागू होगी?

प्रक्रिया: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है; उस दिन पहले से लंबित अन्वेषण, जाँच या विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन चलता रहता है (भा.ना.सु.सं. धारा 531(2)(क))। अपराध: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया कृत्य भारतीय न्याय संहिता के अधीन, उससे पहले का भारतीय दंड संहिता के अधीन।

मुफ़्त कानूनी सहायता आपका अधिकार है (NALSA / ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण)।