सीआरपीसी → बीएनएसएस
22 प्रविष्टियाँ
धारा 22. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की स्थानीय अधिकारिता
22. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की स्थानीय अधिकारिता (1) राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, जिला मजिस्ट्रेट, समय-समय पर, उन क्षेत्रों की स्थानीय सीमाएं परिनिश्चित कर सकेगा, जिनके भीतर कार्यपालक मजिस्ट्रेट उन सब या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे, जो इस संहिता के अधीन उनमें निहित की जाएं। (2) ऐसे परिनिश्चयन…
पूरा पढ़ेंकार्यपालिका का स्थानीय अधिकार क्षेत्र।
(1) राज्य सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, जिला मजिस्ट्रेट समय-समय पर उन क्षेत्रों की स्थानीय सीमाएँ निर्धारित कर सकता है जिनके भीतर कार्यपालिका मजिस्ट्रेट इस संहिता के अधीन उन्हें सौंपी गई सभी या किसी भी शक्ति का प्रयोग कर सकते हैं। (2) ऐसी परिभाषा द्वारा अन्यथा प्रदान किए जाने के अलावा, प्रत्येक मजिस्ट्रेट का…
पूरा पढ़ेंधारा 28. वे दंडादेश जो उच्च न्यायालय और सेशन न्यायाधीश दे सकते हैं
28. वे दंडादेश जो उच्च न्यायालय और सेशन न्यायाधीश दे सकते हैं (1) उच्च न्यायालय विधि द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश दे सकता है। (2) सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश विधि द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश दे सकता है; किन्तु ऐसे किसी न्यायाधीश द्वारा दिया गया मृत्यु दंडादेश उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि के अधीन होगा। (3)…
पूरा पढ़ेंउच्च न्यायालयों और सत्र न्यायाधीशों द्वारा दी जाने वाली सजाएँ।
(1) उच्च न्यायालय विधि द्वारा अधिकृत कोई भी सजा सुना सकता है। (2) सत्र न्यायाधीश या अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कानून द्वारा अधिकृत कोई भी सजा सुना सकता है; लेकिन ऐसे किसी न्यायाधीश द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि के अधीन होगी।
पूरा पढ़ेंधारा 198A. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन
198A. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन कोई न्यायालय भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 498क के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान उन तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट पर, जो ऐसा अपराध गठित करते हैं, या अपराध से व्यथित व्यक्ति द्वारा या उसके पिता, माता, भाई, बहन द्वारा या उसके पिता या माता के भाई या बहन…
पूरा पढ़ेंभारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत अपराधों का अभियोजन।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न्यायालय तब तक नहीं लेगा, जब तक कि ऐसे अपराध का गठन करने वाले तथ्यों की पुलिस रिपोर्ट न हो, या अपराध से पीड़ित व्यक्ति द्वारा, या उसके पिता, माता, भाई, बहन, या उसके पिता या माता के भाई या बहन द्वारा, या न्यायालय की अनुमति से, रक्त, विवाह या दत्तक…
पूरा पढ़ेंधारा 198B. अपराध का संज्ञान
198B. अपराध का संज्ञान कोई न्यायालय, भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (1860 का 45) की धारा 376ख के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, जहां व्यक्ति वैवाहिक संबंध में हैं, संज्ञान, पत्नी द्वारा पति के विरुद्ध प्रस्तुत किए गए या किए गए परिवाद पर उन तथ्यों की, जो उस अपराध का गठन करते हैं, प्रथमदृष्ट्या तुष्टि के सिवाय, नहीं करेगा ।
पूरा पढ़ेंअपराध का संज्ञान।
कोई भी न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 67 के तहत दंडनीय अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा, जब तक कि पत्नी द्वारा पति के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने पर अपराध गठित करने वाले तथ्यों से प्रथम दृष्टया संतुष्टि न हो जाए।
पूरा पढ़ेंधारा 199. मानहानि के लिए अभियोजन
199. मानहानि के लिए अभियोजन (1) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 21 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान उस अपराध से व्यथित किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं: परन्तु जहां ऐसा व्यक्ति अठारह वर्ष से कम आयु का है, या जड़ या विकृतचित्त है, या रुग्णता या अंगशैथिल्य के कारण…
पूरा पढ़ेंमानहानि के लिए अभियोग।
(1) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 356 के तहत दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न्यायालय तब तक नहीं लेगा जब तक कि उस अपराध से पीड़ित किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत न की गई हो: बशर्ते कि यदि ऐसा व्यक्ति बच्चा हो, या मानसिक रूप से अस्वस्थ हो, या बौद्धिक अक्षमता से ग्रस्त हो, या बीमारी या दुर्बलता के कारण शिकायत करने में…
पूरा पढ़ेंधारा 200. परिवादी की परीक्षा
200. परिवादी की परीक्षा परिवाद पर किसी अपराध का संज्ञान करने वाला मजिस्ट्रेट परिवादी की और उपस्थित साक्षियों की, यदि कोई हों, शपथ पर परीक्षा करेगा और ऐसी परीक्षा का सार लेखबद्ध किया जाएगा तथा उस पर परिवादी और साक्षियों द्वारा और मजिस्ट्रेट द्वारा भी हस्ताक्षर किए जाएंगे: परन्तु जब परिवाद लिखित रूप में किया जाता है तब…
पूरा पढ़ेंशिकायतकर्ता की जांच।
(1) किसी शिकायत पर किसी अपराध का संज्ञान लेते समय अधिकार क्षेत्र रखने वाला मजिस्ट्रेट, शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों (यदि कोई हो) से शपथ पर पूछताछ करेगा और ऐसी पूछताछ का सार लिखित रूप में दर्ज किया जाएगा और उस पर शिकायतकर्ता और गवाहों तथा मजिस्ट्रेट द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। बशर्ते कि मजिस्ट्रेट द्वारा किसी अपराध…
पूरा पढ़ेंधारा 201. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जो मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है
201. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जो मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है यदि परिवाद ऐसे मजिस्ट्रेट से किया जाता है जो अपराध का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है, तो वह— (क) यदि परिवाद लिखित रूप में है तो, उसे इस आशय के पृष्ठांकन सहित उचित न्यायालय के समक्ष पेश किए जाने के लिए लौटा देगा; (ख) यदि परिवाद लिखित…
पूरा पढ़ेंमजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया मामले का संज्ञान लेने के लिए सक्षम नहीं है।
यदि शिकायत ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष की जाती है जो अपराध का संज्ञान लेने के लिए सक्षम नहीं है, तो वह निम्नलिखित कार्य करेगा:— (क) यदि शिकायत लिखित में है, तो उसे उचित न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए इस आशय के पृष्ठांकन के साथ लौटा दें; (ख) यदि शिकायत लिखित में न हो, तो शिकायतकर्ता को उचित न्यायालय में निर्देशित करें।
पूरा पढ़ेंधारा 202. आदेशिका जारी करना स्थगित करना
202. आदेशिका जारी करना स्थगित करना (1) कोई मजिस्ट्रेट, ऐसे अपराध के परिवाद की प्राप्ति पर जिसका संज्ञान करने के लिए वह प्राधिकृत है या जो धारा 192 के अधीन उसे सौंपा गया है, यदि वह ठीक समझे तो [और उस मामले में करेगा जहां अभियुक्त ऐसे स्थान पर निवास कर रहा है जो उस क्षेत्र से परे है जिसमें वह अपनी अधिकारिता का प्रयोग…
पूरा पढ़ेंप्रक्रिया जारी करने का स्थगन।
(1) किसी मजिस्ट्रेट को ऐसे अपराध की शिकायत प्राप्त होने पर, जिसका संज्ञान लेने के लिए वह अधिकृत है या जो धारा 212 के अधीन उसे सौंपी गई है, यदि वह उचित समझे तो, और ऐसे मामले में जहां आरोपी उस क्षेत्र से बाहर रहता है जिसमें वह अपना अधिकार क्षेत्र प्रयोग करता है, आरोपी के विरुद्ध प्रक्रिया जारी करने को स्थगित कर सकता है,…
पूरा पढ़ेंधारा 203. परिवाद का खारिज किया जाना
203. परिवाद का खारिज किया जाना यदि परिवादी के और साक्षियों के शपथ पर किए गए कथनों पर (यदि कोई हों) तथा धारा 202 के अधीन की गई जांच या अन्वेषण के (यदि कोई हो) परिणाम पर विचार करने के पश्चात् मजिस्ट्रेट की यह राय है कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह परिवाद खारिज कर देगा और ऐसे प्रत्येक मामले में वह…
पूरा पढ़ेंशिकायत खारिज।
यदि शिकायतकर्ता और गवाहों के शपथ पर दिए गए बयानों (यदि कोई हो) और धारा 225 के तहत की गई जांच या छानबीन (यदि कोई हो) के परिणाम पर विचार करने के बाद मजिस्ट्रेट की राय है कि आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह शिकायत को खारिज कर देगा, और ऐसे प्रत्येक मामले में वह ऐसा करने के अपने कारणों को संक्षेप में दर्ज…
पूरा पढ़ेंधारा 204. आदेशिका का जारी किया जाना
204. आदेशिका का जारी किया जाना (1) यदि अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट की यह राय है कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है और मामला— (क) समन-मामला प्रतीत होता है, तो वह अभियुक्त की हाजिरी के लिए अपना समन जारी करेगा; अथवा (ख) वारंट-मामला प्रतीत होता है, तो वह अभियुक्त को ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष या (यदि उसे…
पूरा पढ़ेंप्रक्रिया का मुद्दा।
(1) यदि किसी अपराध का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट की राय में कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार हो, और मामला इस प्रकार प्रतीत हो— (क) समन मामले में, वह अभियुक्त को उसकी उपस्थिति के लिए समन जारी करेगा; या (ख) वारंट के मामले में, वह वारंट जारी कर सकता है, या यदि वह उचित समझे तो समन जारी कर सकता है, ताकि अभियुक्त को…
पूरा पढ़ेंधारा 205. मजिस्ट्रेट अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा
205. मजिस्ट्रेट अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा (1) जब कभी मजिस्ट्रेट समन जारी करता है, तब यदि वह ऐसा करने का कारण देखता है तो वह अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा और उसे अपने प्लीडर द्वारा हाजिर होने की अनुज्ञा दे सकेगा। (2) किंतु मामले की जांच या विचारण करने वाला मजिस्ट्रेट,…
पूरा पढ़ेंमजिस्ट्रेट अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है।
(1) जब भी कोई मजिस्ट्रेट समन जारी करता है, तो वह, यदि उसे ऐसा करने का कारण दिखाई दे, तो अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है और उसे अपने अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दे सकता है। (2) परन्तु मामले की जाँच करने वाला या मुकदमा चलाने वाला मजिस्ट्रेट, अपने विवेक से, कार्यवाही के किसी भी चरण में,…
पूरा पढ़ेंधारा 206. लघु अपराध के मामलों में विशेष समन
206. लघु अपराध के मामलों में विशेष समन (1) यदि किसी लघु अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट की यह राय है कि मामला धारा 260 [या धारा 261] के अधीन संक्षेपतः निपटाया जा सकता है, तो मजिस्ट्रेट, सिवाय उस दशा के जिसमें वह लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से इसके प्रतिकूल राय रखता है, अभियुक्त को ऐसा समन जारी करेगा जिसमें उससे…
पूरा पढ़ेंमामूली अपराधों के मामलों में विशेष समन।
(1) यदि किसी छोटे अपराध का संज्ञान लेने वाले मजिस्ट्रेट की राय में, मामले का निपटारा धारा 283 या धारा 284 के तहत संक्षेप में किया जा सकता है, तो मजिस्ट्रेट, सिवाय उस स्थिति के जब वह लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से विपरीत राय रखता हो, आरोपी को समन जारी करेगा जिसमें उसे या तो स्वयं या किसी अधिवक्ता के माध्यम…
पूरा पढ़ेंधारा 220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण
220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण (1) यदि आपस में इस प्रकार संसक्त कार्यों की, कि वे एक ही संव्यवहार बनते हैं, एक ही शृंखला में एक ही व्यक्ति द्वारा एक से अधिक अपराध किए जाते हैं, तो उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा। (2) जब किसी व्यक्ति पर, जिस पर…
पूरा पढ़ेंएक से अधिक अपराधों के लिए मुकदमा।
(1) यदि एक ही लेन-देन बनाने के लिए आपस में जुड़े कृत्यों की एक श्रृंखला में एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं, तो उस पर प्रत्येक ऐसे अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकता है और एक ही मुकदमे में मुकदमा चलाया जा सकता है। (2) जब किसी व्यक्ति पर धारा 235 की उपधारा (2) या धारा 242 की उपधारा (1) में दिए गए…
पूरा पढ़ेंधारा 221. जहां यह संदेहपूर्ण है कि कौन-सा अपराध किया गया है
221. जहां यह संदेहपूर्ण है कि कौन-सा अपराध किया गया है (1) यदि कोई एक कार्य या कार्यों की शृंखला ऐसी प्रकृति की है कि यह संदेहपूर्ण है कि जो तथ्य साबित किए जा सकते हैं वे कई अपराधों में से कौन-सा अपराध बनेंगे, तो अभियुक्त पर ऐसे सब अपराधों को या उनमें से किसी को करने का आरोप लगाया जा सकेगा, और ऐसे आरोपों में से कितने…
पूरा पढ़ेंजहां यह संदेह हो कि कौन सा अपराध किया गया है।
(1) यदि कोई एक कृत्य या कृत्यों की श्रृंखला इस प्रकार की हो कि यह संदेह हो कि सिद्ध किए जा सकने वाले तथ्य अनेक अपराधों में से कौन सा अपराध गठित करेंगे, तो अभियुक्त पर ऐसे सभी या किसी भी अपराध को करने का आरोप लगाया जा सकता है, और ऐसे कितने भी आरोपों पर एक साथ मुकदमा चलाया जा सकता है; या उस पर उक्त अपराधों में से किसी…
पूरा पढ़ेंधारा 222. जब साबित हुआ अपराध आरोपित अपराध में सम्मिलित है
222. जब साबित हुआ अपराध आरोपित अपराध में सम्मिलित है (1) जब किसी व्यक्ति पर ऐसे अपराध का आरोप है जो कई विशिष्टियों से मिलकर बना है, और उनमें से केवल कुछ का संयोजन एक पूर्ण लघु अपराध बनता है, और ऐसा संयोजन साबित हो जाता है किंतु शेष विशिष्टियां साबित नहीं होतीं, तब वह उस लघु अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा, यद्यपि…
पूरा पढ़ेंजब अपराध सिद्ध हो जाता है, तो उसे आरोपित अपराध में शामिल किया जाता है।
(1) जब किसी व्यक्ति पर अनेक विवरणों से युक्त किसी अपराध का आरोप लगाया जाता है, जिनमें से कुछ का संयोजन ही एक पूर्ण लघु अपराध का गठन करता है, और ऐसा संयोजन सिद्ध हो जाता है, परन्तु शेष विवरण सिद्ध नहीं होते, तो उसे लघु अपराध का दोषी ठहराया जा सकता है, यद्यपि उस पर इसका आरोप नहीं लगाया गया था। (2) जब किसी व्यक्ति पर…
पूरा पढ़ेंधारा 223. कौन-से व्यक्ति संयुक्ततः आरोपित किए जा सकेंगे
223. कौन-से व्यक्ति संयुक्ततः आरोपित किए जा सकेंगे निम्नलिखित व्यक्तियों पर आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक साथ किया जा सकेगा, अर्थात्— (क) वे व्यक्ति, जो एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में किए गए एक ही अपराध के अभियुक्त हैं; (ख) वे व्यक्ति, जो किसी अपराध के अभियुक्त हैं, और वे व्यक्ति, जो ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण के…
पूरा पढ़ेंकिन व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया जा सकता है?
निम्नलिखित व्यक्तियों पर एक साथ आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है, अर्थात्:— (क) एक ही लेन-देन के दौरान किए गए एक ही अपराध के आरोपी व्यक्ति; (ख) किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति तथा ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के आरोपी व्यक्ति; (ग) धारा 242 के अर्थ में एक ही प्रकार के एक से अधिक…
पूरा पढ़ेंधारा 224. कई आरोपों में से एक पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण
224. कई आरोपों में से एक पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण जब उसी व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक शीर्षों वाला आरोप विरचित किया जाता है, और जब उनमें से एक या अधिक पर दोषसिद्धि हो गई है, तब परिवादी, या अभियोजन का संचालन करने वाला अधिकारी, न्यायालय की सम्मति से, शेष आरोप या आरोपों को प्रत्याहृत कर सकेगा, अथवा…
पूरा पढ़ेंकई आरोपों में से किसी एक में दोष सिद्ध होने पर शेष आरोपों को वापस ले लिया जाना।
जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक आरोपों से संबंधित अभियोग लगाया जाता है, और जब उनमें से एक या अधिक आरोपों पर दोष सिद्ध हो चुका होता है, तो शिकायतकर्ता या अभियोजन पक्ष का अधिकारी न्यायालय की सहमति से शेष अभियोग वापस ले सकता है, या न्यायालय स्वयं ऐसे अभियोगों की जांच या मुकदमे पर रोक लगा सकता है, और इस प्रकार…
पूरा पढ़ेंधारा 225. विचारण का लोक अभियोजक द्वारा संचालित किया जाना
225. विचारण का लोक अभियोजक द्वारा संचालित किया जाना सत्र न्यायालय के समक्ष प्रत्येक विचारण में अभियोजन का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाएगा।
पूरा पढ़ेंइस मामले की सुनवाई लोक अभियोजक द्वारा की जाएगी।
सत्र न्यायालय के समक्ष प्रत्येक मुकदमे में अभियोजन पक्ष का संचालन लोक अभियोजक द्वारा किया जाएगा।
पूरा पढ़ेंधारा 226. अभियोजन के मामले का प्रारंभिक कथन
226. अभियोजन के मामले का प्रारंभिक कथन जब अभियुक्त धारा 209 के अधीन मामले की सुपुर्दगी के अनुसरण में न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है, तब अभियोजक अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप का वर्णन करके और यह कथन करके कि वह अभियुक्त का दोष किस साक्ष्य द्वारा साबित करना प्रस्थापित करता है, अपने मामले का प्रारंभिक…
पूरा पढ़ेंअभियोजन पक्ष के लिए मामला शुरू करना।
जब अभियुक्त धारा 232 के तहत या उस समय लागू किसी अन्य कानून के तहत मामले की सुनवाई के लिए न्यायालय के समक्ष उपस्थित होता है या उसे लाया जाता है, तो अभियोजक अभियुक्त के विरुद्ध लगाए गए आरोप का वर्णन करते हुए और यह बताते हुए अपना मामला शुरू करेगा कि वह किस साक्ष्य के माध्यम से अभियुक्त के अपराध को साबित करना चाहता है।
पूरा पढ़ेंधारा 227. उन्मोचन
227. उन्मोचन यदि मामले के अभिलेख पर और उसके साथ पेश किए गए दस्तावेजों पर विचार करने के पश्चात्, तथा इस निमित्त अभियुक्त के और अभियोजन के निवेदन सुनने के पश्चात्, न्यायाधीश यह समझता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है, तो वह अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और ऐसा करने के अपने कारण…
पूरा पढ़ेंस्राव होना।
(1) अभियुक्त धारा 232 के तहत मामले की सुनवाई की तिथि से साठ दिनों की अवधि के भीतर बरी होने के लिए आवेदन कर सकता है। (2) यदि मामले के अभिलेख और उसके साथ प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार करने के बाद, और इस संबंध में अभियुक्त और अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद, न्यायाधीश को लगता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कार्यवाही करने…
पूरा पढ़ेंधारा 228. आरोप की विरचना
228. आरोप की विरचना (1) यदि पूर्वोक्त रूप से विचार करने और सुनवाई के पश्चात् न्यायाधीश की यह राय है कि यह उपधारणा करने का आधार है कि अभियुक्त ने कोई ऐसा अपराध किया है जो— (क) केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित कर सकेगा और आदेश द्वारा मामला विचारण के लिए मुख्य न्यायिक…
पूरा पढ़ेंआरोप का निर्धारण।
(1) यदि उपर्युक्त विचार-विमर्श और सुनवाई के बाद न्यायाधीश की यह राय हो कि यह अनुमान लगाने का आधार है कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है जो— (क) यदि मामला सत्र न्यायालय द्वारा विशेष रूप से विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप निर्धारित कर सकता है और आदेश द्वारा मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम…
पूरा पढ़ेंदोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
यदि अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करता है, तो न्यायाधीश उस स्वीकारोक्ति को दर्ज करेगा और अपने विवेकानुसार उसे दोषी ठहरा सकता है।
पूरा पढ़ेंदोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
यदि अभियुक्त अपना अपराध स्वीकार करता है, तो न्यायाधीश उस स्वीकारोक्ति को दर्ज करेगा और अपने विवेकानुसार उसे दोषी ठहरा सकता है।
पूरा पढ़ें- CRPC §22BNSS §16
धारा 22. कार्यपालक मजिस्ट्रेटों की स्थानीय अधिकारिता
कार्यपालिका का स्थानीय अधिकार क्षेत्र।
- CRPC §28BNSS §22
धारा 28. वे दंडादेश जो उच्च न्यायालय और सेशन न्यायाधीश दे सकते हैं
उच्च न्यायालयों और सत्र न्यायाधीशों द्वारा दी जाने वाली सजाएँ।
- CRPC §198ABNSS §220
धारा 198A. भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498क के अधीन अपराधों का अभियोजन
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 के तहत अपराधों का अभियोजन।
- CRPC §198BBNSS §221
धारा 198B. अपराध का संज्ञान
अपराध का संज्ञान।
- CRPC §199BNSS §222
धारा 199. मानहानि के लिए अभियोजन
मानहानि के लिए अभियोग।
- CRPC §200BNSS §223
धारा 200. परिवादी की परीक्षा
शिकायतकर्ता की जांच।
- CRPC §201BNSS §224
धारा 201. उस मजिस्ट्रेट द्वारा प्रक्रिया जो मामले का संज्ञान करने के लिए सक्षम नहीं है
मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया मामले का संज्ञान लेने के लिए सक्षम नहीं है।
- CRPC §202BNSS §225
धारा 202. आदेशिका जारी करना स्थगित करना
प्रक्रिया जारी करने का स्थगन।
- CRPC §203BNSS §226
धारा 203. परिवाद का खारिज किया जाना
शिकायत खारिज।
- CRPC §204BNSS §227
धारा 204. आदेशिका का जारी किया जाना
प्रक्रिया का मुद्दा।
- CRPC §205BNSS §228
धारा 205. मजिस्ट्रेट अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा
मजिस्ट्रेट अभियुक्त की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दे सकता है।
- CRPC §206BNSS §229
धारा 206. लघु अपराध के मामलों में विशेष समन
मामूली अपराधों के मामलों में विशेष समन।
- CRPC §220BNSS §243
धारा 220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण
एक से अधिक अपराधों के लिए मुकदमा।
- CRPC §221BNSS §244
धारा 221. जहां यह संदेहपूर्ण है कि कौन-सा अपराध किया गया है
जहां यह संदेह हो कि कौन सा अपराध किया गया है।
- CRPC §222BNSS §245
धारा 222. जब साबित हुआ अपराध आरोपित अपराध में सम्मिलित है
जब अपराध सिद्ध हो जाता है, तो उसे आरोपित अपराध में शामिल किया जाता है।
- CRPC §223BNSS §246
धारा 223. कौन-से व्यक्ति संयुक्ततः आरोपित किए जा सकेंगे
किन व्यक्तियों पर संयुक्त रूप से आरोप लगाया जा सकता है?
- CRPC §224BNSS §247
धारा 224. कई आरोपों में से एक पर दोषसिद्धि होने पर शेष आरोपों का प्रत्याहरण
कई आरोपों में से किसी एक में दोष सिद्ध होने पर शेष आरोपों को वापस ले लिया जाना।
- CRPC §225BNSS §248
धारा 225. विचारण का लोक अभियोजक द्वारा संचालित किया जाना
इस मामले की सुनवाई लोक अभियोजक द्वारा की जाएगी।
- CRPC §226BNSS §249
धारा 226. अभियोजन के मामले का प्रारंभिक कथन
अभियोजन पक्ष के लिए मामला शुरू करना।
- CRPC §227BNSS §250
धारा 227. उन्मोचन
स्राव होना।
- CRPC §228BNSS §251
धारा 228. आरोप की विरचना
आरोप का निर्धारण।
- CRPC §229BNSS §252
दोष स्वीकार करने पर दोषसिद्धि।
