SC/ST Act 14अध्याय IV · Special Courts
धारा 14 · विशेष न्यायालय और अनन्य विशेष न्यायालय।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
1 [14. विशेष न्यायालय और अनन्य विशेष न्यायालय। --(1) शीघ्र सुनवाई की व्यवस्था करने के उद्देश्य से, राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक जिलों के लिए एक अनन्य विशेष न्यायालय की स्थापना करेगी:
बशर्ते कि जिन जिलों में इस अधिनियम के अंतर्गत कम मामले दर्ज किए गए हों, वहां राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे जिलों के लिए सत्र न्यायालय को इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय के रूप में निर्दिष्ट करेगी।
इसके अलावा, इस प्रकार स्थापित या निर्दिष्ट न्यायालयों को इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों का प्रत्यक्ष संज्ञान लेने का अधिकार होगा।
(2) राज्य सरकार का यह कर्तव्य होगा कि वह पर्याप्त संख्या में न्यायालयों की स्थापना करे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस अधिनियम के अंतर्गत मामलों का निपटारा यथासंभव दो महीने की अवधि के भीतर हो जाए।
(3) विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय में प्रत्येक मुकदमे की कार्यवाही तब तक प्रतिदिन जारी रहेगी जब तक कि उपस्थित सभी गवाहों की जांच न हो जाए, जब तक कि विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से कार्यवाही को अगले दिन से आगे स्थगित करना आवश्यक न समझे:]
बशर्ते कि जब मुकदमा इस अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध से संबंधित हो, तो मुकदमा यथासंभव आरोप पत्र दाखिल करने की तिथि से दो महीने की अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा।
राज्य संशोधन
कर्नाटक
धारा 14 का संशोधन.-- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (केंद्रीय अधिनियम 33 ऑफ 1989) की धारा 14 में, “इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों का विचारण करने के लिए” शब्दों के स्थान पर “मूल क्षेत्राधिकार के न्यायालय के रूप में इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों का संज्ञान लेने और ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिए” शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
[कर्नाटक अधिनियम 35, 2003, धारा 2 देखें ]
बशर्ते कि जिन जिलों में इस अधिनियम के अंतर्गत कम मामले दर्ज किए गए हों, वहां राज्य सरकार, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे जिलों के लिए सत्र न्यायालय को इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों की सुनवाई के लिए विशेष न्यायालय के रूप में निर्दिष्ट करेगी।
इसके अलावा, इस प्रकार स्थापित या निर्दिष्ट न्यायालयों को इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों का प्रत्यक्ष संज्ञान लेने का अधिकार होगा।
(2) राज्य सरकार का यह कर्तव्य होगा कि वह पर्याप्त संख्या में न्यायालयों की स्थापना करे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस अधिनियम के अंतर्गत मामलों का निपटारा यथासंभव दो महीने की अवधि के भीतर हो जाए।
(3) विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय में प्रत्येक मुकदमे की कार्यवाही तब तक प्रतिदिन जारी रहेगी जब तक कि उपस्थित सभी गवाहों की जांच न हो जाए, जब तक कि विशेष न्यायालय या अनन्य विशेष न्यायालय लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से कार्यवाही को अगले दिन से आगे स्थगित करना आवश्यक न समझे:]
बशर्ते कि जब मुकदमा इस अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध से संबंधित हो, तो मुकदमा यथासंभव आरोप पत्र दाखिल करने की तिथि से दो महीने की अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा।
राज्य संशोधन
कर्नाटक
धारा 14 का संशोधन.-- अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (केंद्रीय अधिनियम 33 ऑफ 1989) की धारा 14 में, “इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों का विचारण करने के लिए” शब्दों के स्थान पर “मूल क्षेत्राधिकार के न्यायालय के रूप में इस अधिनियम के अंतर्गत अपराधों का संज्ञान लेने और ऐसे अपराधों का विचारण करने के लिए” शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
[कर्नाटक अधिनियम 35, 2003, धारा 2 देखें ]
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