ADR Rules 4अध्याय I · Alternative Disputes Resolution Rules
धारा 4 · न्यायालय, विकल्प चुनने के निर्देश देते समय पक्षों को मार्गदर्शन प्रदान करेगा।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
- नियम 2 के खंड (ख) के तहत पक्षकारों को विकल्प का प्रयोग करने का निर्देश देने से पहले, न्यायालय उन्हें ऐसा मार्गदर्शन देगा जैसा वह उचित समझे, और उनका ध्यान निम्नलिखित कारकों की ओर आकर्षित करेगा जिन्हें उन्हें निपटान के विशेष तरीके के संबंध में अपना विकल्प चुनने से पहले ध्यान में रखना होगा: स्पष्टीकरण: वैवाहिक, भरण-पोषण और बच्चे की अभिरक्षा से संबंधित मामलों में उत्पन्न होने वाले विवादों को, अन्य बातों के अलावा, ऐसे मामलों के रूप में माना जाएगा जिनमें पक्षों के बीच संबंध को संरक्षित करना आवश्यक है। 'मध्यस्थता' से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा पक्षकारों या न्यायालय द्वारा नियुक्त मध्यस्थ, उनके बीच विवादों का निपटारा करता है और मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 (26 ऑफ 1996) के प्रावधानों को लागू करते हुए, जहां तक वे मध्यस्थता से संबंधित हैं, निर्णय पारित करता है। 'सुलह' से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा पक्षकारों या न्यायालय द्वारा नियुक्त मध्यस्थ, मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 (26 ऑफ 1996) के प्रावधानों को लागू करते हुए, जहां तक वे सुलह से संबंधित हैं, उनके बीच विवादों का सुलह कराता है, और विशेष रूप से, उस अधिनियम की धारा 67 और 73 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, विवाद के निपटारे के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत करता है और संभावित निपटारे की शर्तों को तैयार या पुनर्परिभाषित करता है; और मध्यस्थ की तुलना में उसकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण होती है। 'मध्यस्थता' से तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा पक्षकारों या न्यायालय द्वारा नियुक्त मध्यस्थ, भाग II में निहित मध्यस्थता नियमों के प्रावधानों को लागू करते हुए, उनके बीच विवादों में मध्यस्थता करता है। विशेष रूप से, मध्यस्थ के माध्यम से पक्षकारों के बीच प्रत्यक्ष रूप से या आपस में संवाद स्थापित करने में सहायता करके, पक्षकारों को मुद्दों की पहचान करने, गलतफहमियों को दूर करने, प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने, समझौते के क्षेत्रों का पता लगाने, विवाद को सुलझाने के प्रयास में विकल्प उत्पन्न करने और इस बात पर जोर देने के द्वारा कि उन्हें प्रभावित करने वाले निर्णय लेने की जिम्मेदारी उनकी स्वयं की है। 'न्यायिक समझौता' से तात्पर्य लोक अदालत या किसी उपयुक्त संस्था या व्यक्ति के समक्ष समझौते के माध्यम से अंतिम निपटान से है, जिसे विधि सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 (39 ऑफ 1987) के अर्थ में लोक अदालत के समक्ष समझौता माना जाएगा।
(i)
समय और व्यय के लिहाज से पक्षों के लिए यह लाभप्रद होगा कि वे मुकदमे में उत्पन्न विवाद का परीक्षण कराने के बजाय निपटारे के तरीकों में से किसी एक को चुन लें;(ii)
जहां पक्षों के बीच ऐसा संबंध है जिसे संरक्षित करना आवश्यक है, वहां उनके हित में होगा कि वे मामले को सुलह या मध्यस्थता के लिए संदर्भित करें, जैसा कि धारा 89 की उपधारा (1) के खंड (ख) या (घ) में परिकल्पित है;(iii)
जहां पक्षों के बीच ऐसा कोई संबंध नहीं है जिसे संरक्षित करना आवश्यक हो, वहां उनके हित में होगा कि वे मामले को धारा 89 की उपधारा (1) के खंड (क) में परिकल्पित मध्यस्थता के लिए संदर्भित करने का अनुरोध करें।(iv)
जहां पक्षकार अंतिम निपटान में रुचि रखते हैं जिससे समझौता हो सकता है, वहां उनके हित में होगा कि वे मामले को न्यायिक निपटान सहित लोक अदालत में संदर्भित करने का अनुरोध करें जैसा कि धारा 89 की उपधारा (1) के खंड (सी) में परिकल्पित है।(v)
निपटान के विभिन्न तरीकों, अर्थात् मध्यस्थता, सुलह, मध्यस्थता और न्यायिक निपटान के बीच अंतर, जैसा कि नीचे बताया गया है।इस धारा पर आपका निजी नोट
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