चेक बाउंस — समय-सीमा

चेक अनादर के मामले में तीन तारीखें तय हैं और तीनों कड़ी हैं। बैंक के रिटर्न मेमो की तारीख डालिए — नोटिस, भुगतान और परिवाद की अंतिम तिथियाँ यहीं बन जाएँगी।

चेक बाउंस — समय-सीमा

वही पर्ची जिस पर बैंक ने चेक लौटाने का कारण लिखा है। धारा 138 के परंतुक (ख) की तीस दिन की गिनती इसी सूचना से चलती है।

यह ख़ाली छोड़ा जा सकता है। धारा 138 का परंतुक (ग) पंद्रह दिन आहर्ता को नोटिस मिलने से गिनता है, भेजने से नहीं।

नोटिस लेने से इनकार किया या लौट आया ("लेने वाला नहीं मिला")? तो उसी तारीख को नोटिस तामील माना जाता है — वही तारीख यहाँ डालिए (सी.सी. अलावी हाजी, 2007)।

ऊपर रिटर्न मेमो की तारीख डालिए। तीनों समय-सीमाएँ उसी से गिनी जाती हैं।

धारा 142(1)(ख) “तीस दिन” नहीं, “एक मास” कहती है। साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 3(35) के अनुसार मास कैलेंडर से गिना जाता है, इसलिए यह पन्ना भी कैलेंडर मास ही गिनता है — 31 जनवरी से एक मास 28 फ़रवरी को समाप्त होगा, 2 मार्च को नहीं।

ईसीएस / एनएसीएच / ऑटो-डेबिट लौट गया?

खाते में पर्याप्त राशि न होने से इलेक्ट्रॉनिक निधि अंतरण (ईसीएस, एनएसीएच मैंडेट, ऑटो-डेबिट) न हो पाए, तो यह भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 25 का अपराध है — दो वर्ष तक कारावास, या अंतरण की रकम के दुगुने तक जुर्माना, या दोनों। समय-सीमा वही है: बैंक की सूचना से तीस दिन में माँग-नोटिस, भुगतान के पंद्रह दिन, और परिवाद के लिए परक्राम्य लिखत अधिनियम का अध्याय 17 (धारा 142 सहित) लागू होता है (धारा 25(5))। ऊपर की तारीखें इस पर भी लागू हैं; नोटिस में चेक की जगह मैंडेट/लेन-देन का विवरण लिखिए।

भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम धारा 25 पढ़ें

प.लि. अधि. धारा 142अध्याय 17

देरी क्षमा करने की शक्ति — धारा 142(1)(ख) का परंतुक

धारा 142(1)(ख) का परंतुक कहता है कि विहित अवधि बीत जाने के बाद भी न्यायालय परिवाद का संज्ञान ले सकेगा, यदि परिवादी न्यायालय का यह समाधान कर दे कि उस अवधि के भीतर परिवाद न कर पाने का उसके पास पर्याप्त कारण था।

यह छूट न्यायालय के विवेक पर है और अपने आप नहीं मिलती — कारण बताना और सिद्ध करना परिवादी पर है। किंतु इतना निश्चित है कि ऊपर दिखी बीती हुई तारीख किसी मामले के समाप्त हो जाने की घोषणा नहीं है।

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प.लि. अधि. धारा 138अध्याय 17

अपराध और उसकी तीन शर्तें — धारा 138

धारा 138 के अनुसार, जहाँ किसी व्यक्ति द्वारा अपने खाते पर आहरित चेक किसी ऋण या अन्य दायित्व के, पूर्णतः या भागतः, उन्मोचन के लिए दिया गया हो और वह खाते में अपर्याप्त धनराशि के कारण, अथवा बैंक से तय की गई राशि से अधिक होने के कारण, बैंक द्वारा अदत्त लौटा दिया जाए, तो वह व्यक्ति अपराध करने वाला समझा जाएगा।

दंड है — दो वर्ष तक का कारावास, या चेक की रकम के दुगुने तक का जुर्माना, या दोनों। जुर्माने की कोई रुपयों में तय ऊपरी सीमा नहीं है; वह चेक की रकम का गुणक है, इसलिए हर चेक के लिए अलग होगा।

किंतु धारा 138 का परंतुक कहता है कि यह धारा तब तक लागू नहीं होगी जब तक — (क) चेक आहरण की तारीख से छह मास के भीतर, या उसकी वैधता की अवधि के भीतर, जो भी पहले हो, बैंक में प्रस्तुत न किया गया हो; (ख) चेक के अदत्त लौटने की सूचना बैंक से मिलने के तीस दिन के भीतर परिदाती या सम्यक अनुक्रम में धारक द्वारा आहर्ता को लिखित नोटिस देकर भुगतान की माँग न की गई हो; और (ग) आहर्ता ने वह नोटिस मिलने के पंद्रह दिन के भीतर भुगतान न किया हो।

यहाँ 'छह मास' पढ़कर छह मास मत गिनिए। परंतुक स्वयं कहता है 'या उसकी वैधता की अवधि के भीतर, जो भी पहले हो', और भारतीय रिज़र्व बैंक के परिपत्र DBOD.AML BC.No.47/14.01.001/2011-12 (4 नवंबर 2011) के अनुसार 1 अप्रैल 2012 से बैंक चेक, ड्राफ़्ट, पे ऑर्डर और बैंकर्स चेक का भुगतान उसकी तारीख से तीन मास के बाद प्रस्तुत होने पर नहीं करेंगे। इसलिए व्यवहार में वैधता तीन मास की है, और वही 'जो भी पहले हो' वाली अवधि है। छह मास पर भरोसा करके प्रस्तुत किया गया चेक बैंक 'stale' कहकर लौटा देगा — और तब अनादर धन की कमी से नहीं हुआ, इसलिए धारा 138 का अपराध ही नहीं बनता।

इन तीनों शर्तों का पूरा होना अपराध बनने की शर्त है, न कि केवल प्रक्रिया की औपचारिकता। इनमें से कोई एक चूक जाए तो शिकायत करने के लिए कोई अपराध ही नहीं बचता — यही कारण है कि तारीखें इस पन्ने पर सबसे ऊपर हैं।

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प.लि. अधि. धारा 142अध्याय 17

परिवाद कौन, कब और कहाँ करे — धारा 142

धारा 142(1)(क) के अनुसार धारा 138 के अपराध का संज्ञान केवल परिदाती या सम्यक अनुक्रम में धारक द्वारा की गई लिखित परिवाद पर ही लिया जाएगा। इसलिए यह पुलिस में एफ़आईआर वाला मामला नहीं है — यह मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद है।

धारा 142(1)(ख) के अनुसार वह परिवाद उस तारीख से एक मास के भीतर किया जाना चाहिए जिस तारीख को धारा 138 के परंतुक के खंड (ग) के अधीन वाद-हेतुक उत्पन्न होता है — अर्थात् पंद्रह दिन की अवधि बीत जाने पर।

धारा 142(1)(ग) के अनुसार महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट से निम्नतर कोई न्यायालय धारा 138 के अपराध का विचारण नहीं करेगा। धारा 142(2) यह तय करती है कि कौन-सा न्यायालय — साधारणतः वह शाखा जहाँ परिदाती का खाता है और जहाँ चेक वसूली के लिए दिया गया।

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इस चेक पर रकम का हिसाब

प.लि. अधि. धारा 142(2)अध्याय 17

परिवाद किस न्यायालय में — धारा 142(2)

(क) चेक आपके खाते के माध्यम से वसूली के लिए दिया गया था: उस न्यायालय में जिसकी सीमा में आपकी (परिदाती की) वह बैंक शाखा है जहाँ आपका खाता है — चेक किसी भी शाखा में जमा किया हो, वह आपके खाते वाली शाखा में दिया माना जाता है।

(ख) चेक खाते के माध्यम से नहीं, सीधे भुगतान के लिए प्रस्तुत किया गया था: उस न्यायालय में जिसकी सीमा में आहर्ता के खाते वाली बैंक शाखा है।

यह परिवाद-मामला है: मजिस्ट्रेट परिवादी की शपथ पर परीक्षा करता है — भा.ना.सु.सं. धारा 223 (पहले दं.प्र.सं. धारा 200); धारा 145 के अधीन यह परीक्षा शपथपत्र पर हो सकती है।

अंतिम निर्णय से पहले अंतरिम प्रतिकर — धारा 143क

धारा 143क के अनुसार, धारा 138 के मामले का विचारण करने वाला न्यायालय आहर्ता को आदेश दे सकता है कि वह परिवादी को अंतरिम प्रतिकर दे — संक्षिप्त विचारण या समन-मामले में तब, जब आहर्ता दोष स्वीकार न करे, और अन्य मामलों में आरोप विरचित होने पर। यह चेक की रकम के बीस प्रतिशत से अधिक नहीं होगा और आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर देय होगा।

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समझौते से समाप्ति — धारा 147

धारा 147 के अनुसार इस अधिनियम के अधीन प्रत्येक अपराध शमनीय है। व्यवहार में अधिकांश चेक-अनादर के मामले भुगतान हो जाने पर समझौते से ही समाप्त होते हैं; परिवाद दायर करना उस बातचीत को बंद नहीं करता।

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माँग-नोटिस का प्रारूप

नोटिस में चेक का विवरण, रकम, अनादर का कारण और भुगतान की स्पष्ट माँग होनी चाहिए। प्रारूपों वाले पन्ने पर भरकर छापने योग्य नमूने रखे गए हैं।

शिकायत और आवेदन के प्रारूप

परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 — धारा 6 तथा अध्याय 17

इन धाराओं का अंग्रेज़ी पाठ इस पुस्तकालय में उपलब्ध है; प्राधिकृत हिंदी पाठ अभी नहीं जोड़ा गया है। कानून के शब्दों का मशीनी अनुवाद यहाँ नहीं दिया जाएगा — जब तक प्राधिकृत पाठ नहीं मिलता, यह जगह ख़ाली रहेगी।

मुफ़्त कानूनी सहायता आपका अधिकार है (NALSA / ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण)।