संविधान (97वाँ संशोधन) अधिनियम, 2011
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 19
लेख सम्मिलित किए गए
- 43-बी
प्रभावित हिस्से
- भाग 9
सहकारी क्षेत्र ने वर्षों से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और व्यापक विकास हासिल किया है। हालांकि, सदस्यों के हितों की रक्षा करने और इन संस्थाओं के गठन के उद्देश्यों की पूर्ति में इसने कुछ कमियां दिखाई हैं।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम
भारत गणराज्य के 62वें वर्ष में संसद द्वारा यह अधिनियमित किया जाता है कि-
1. राष्ट्रपति की सहमति 12 जनवरी, 2012 को प्राप्त हुई और भारत के राजपत्र, अतिरिक्त, भाग II, खंड 1, दिनांक 13 जनवरी, 2012, पृष्ठ 1-5, संख्या 12 में प्रकाशित हुई। प्रस्तावना-उद्देश्यों और कारणों का विवरण-सहकारी क्षेत्र ने वर्षों से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और व्यापक विकास हासिल किया है। हालांकि, इसने सदस्यों के हितों की रक्षा करने और उन उद्देश्यों की पूर्ति में कमियां दिखाई हैं जिनके लिए इन संस्थाओं का गठन किया गया था। ऐसे उदाहरण भी हैं जहां चुनाव अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिए गए हैं और मनोनीत पदाधिकारी या प्रशासक लंबे समय तक इन संस्थाओं के प्रभारी बने रहे हैं। इससे सहकारी समितियों के प्रबंधन की अपने सदस्यों के प्रति जवाबदेही कम हो जाती है। कई सहकारी संस्थाओं में प्रबंधन में अपर्याप्त व्यावसायिकता के कारण खराब सेवाएं और कम उत्पादकता हुई है। सहकारी संस्थाओं को सुस्थापित लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर चलना चाहिए और चुनाव समय पर और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष तरीके से आयोजित किए जाने चाहिए। इसलिए, देश के आर्थिक विकास में इन संस्थानों के योगदान को सुनिश्चित करने और सदस्यों और आम जनता के हितों की सेवा करने के साथ-साथ उनकी स्वायत्तता, लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली और पेशेवर प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए इन संस्थानों को पुनर्जीवित करने हेतु मौलिक सुधारों की शुरुआत करने की आवश्यकता है।
2. "सहकारी समितियाँ" संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 32 में सूचीबद्ध विषय है और राज्य विधानमंडलों ने तदनुसार सहकारी समितियों पर कानून बनाए हैं। राज्य अधिनियमों के अंतर्गत, सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा विकास के लाभों के समान वितरण को सुनिश्चित करने के प्रयासों के तहत सहकारी समितियों के बड़े पैमाने पर विकास की परिकल्पना की गई थी। यद्यपि यह देखा गया है कि सहकारी समितियों के पर्याप्त विस्तार के बावजूद, उनका गुणात्मक प्रदर्शन वांछित स्तर तक नहीं पहुँच पाया है। राज्यों के सहकारी समिति अधिनियमों में सुधार की आवश्यकता को देखते हुए, राज्य सरकारों के साथ कई बार और राज्य सहकारिता मंत्रियों के सम्मेलनों में परामर्श आयोजित किए गए हैं। सहकारी समितियों को अनावश्यक बाहरी हस्तक्षेपों से मुक्त रखने तथा उनकी स्वायत्त संगठनात्मक संरचना और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए संविधान में संशोधन की प्रबल आवश्यकता महसूस की गई है।
3. केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि देश में सहकारी समितियाँ लोकतांत्रिक, पेशेवर, स्वायत्त और आर्थिक रूप से सुदृढ़ तरीके से कार्य करें। आवश्यक सुधार लाने के उद्देश्य से, संविधान में एक नया भाग शामिल करने का प्रस्ताव है ताकि सहकारी समितियों के कामकाज के महत्वपूर्ण पहलुओं जैसे लोकतांत्रिक, स्वायत्त और पेशेवर कामकाज को कवर करने वाले कुछ प्रावधान प्रदान किए जा सकें। राज्यों द्वारा सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने के प्रयासों हेतु संविधान के भाग IV (राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत) में एक नया अनुच्छेद भी जोड़ने का प्रस्ताव है। संविधान में प्रस्तावित नए भाग में, अन्य बातों के अलावा, बहु-राज्यीय सहकारी समितियों के संबंध में संसद और अन्य सहकारी समितियों के मामले में राज्य विधानमंडलों को निम्नलिखित मामलों को निर्धारित करने वाले उपयुक्त कानून बनाने का अधिकार दिया गया है, अर्थात्- (क) लोकतांत्रिक सदस्य-नियंत्रण, सदस्य-आर्थिक भागीदारी और स्वायत्त कामकाज के सिद्धांतों पर आधारित सहकारी समितियों के निगमन, विनियमन और समापन के प्रावधान; (ख) सहकारी समिति के निदेशकों की अधिकतम संख्या इक्कीस सदस्यों से अधिक न होने का प्रावधान करना; (ग) बोर्ड के निर्वाचित सदस्यों और उसके पदाधिकारियों के लिए चुनाव की तारीख से पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल निर्धारित करना; (घ) सहकारी समिति के निदेशक मंडल को छह महीने की अधिकतम समय सीमा के भीतर निरस्त या निलंबित किए जाने का प्रावधान करना; (ङ) स्वतंत्र पेशेवर लेखापरीक्षा का प्रावधान करना; (च) सहकारी समितियों के सदस्यों को सूचना का अधिकार प्रदान करना; (छ) राज्य सरकारों को सहकारी समितियों की गतिविधियों और खातों की आवधिक रिपोर्ट प्राप्त करने का अधिकार देना; (ज) प्रत्येक सहकारी समिति के बोर्ड में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए एक सीट और महिलाओं के लिए दो सीटें आरक्षित करना, जिसमें इन श्रेणियों के व्यक्ति सदस्य हों; (झ) सहकारी समितियों से संबंधित अपराधों और ऐसे अपराधों के लिए दंड का प्रावधान करना।
4. यह उम्मीद की जाती है कि ये प्रावधान न केवल सहकारी समितियों के स्वायत्त और लोकतांत्रिक कामकाज को सुनिश्चित करेंगे, बल्कि सदस्यों और अन्य हितधारकों के प्रति प्रबंधन की जवाबदेही भी सुनिश्चित करेंगे और कानून के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए निवारक उपाय प्रदान करेंगे।
5. विधेयक उपरोक्त उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करता है।
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
(1) इस अधिनियम को संविधान (निन्यानवेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2011 कहा जा सकता है।
(2) यह उस तिथि से लागू होगा जो केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त करे।
अनुच्छेद 19 का संशोधन
संविधान के भाग III में, अनुच्छेद 19 में, खंड (1) में, उपखंड (सी) में, "या संघों" शब्दों के बाद, "सहकारी समितियाँ" शब्द जोड़े जाएँगे।
नए अनुच्छेद 43-B का अंतःस्थापन
संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 43-ए के बाद निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्-
43-ख. सहकारी समितियों को प्रोत्साहन।
राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।
नए भाग IX-B का अंतःस्थापन
संविधान के भाग IX-A के बाद निम्नलिखित भाग जोड़ा जाएगा, अर्थात्-
भाग IX-B
सहकारी समितियाँ
243. -जेडएच. परिभाषाएँ.-
इस भाग में, जब तक संदर्भ अन्यथा अपेक्षित न हो-
(क) "अधिकृत व्यक्ति" से तात्पर्य अनुच्छेद 243-जेडक्यू में उल्लिखित व्यक्ति से है;
(ख) "बोर्ड" से तात्पर्य किसी सहकारी समिति के निदेशक मंडल या शासी निकाय से है, चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए, जिसे समिति के मामलों के प्रबंधन का निर्देशन और नियंत्रण सौंपा गया है;
(ग) "सहकारी समिति" से तात्पर्य किसी राज्य में उस समय लागू सहकारी समितियों से संबंधित किसी कानून के तहत पंजीकृत या पंजीकृत मानी जाने वाली समिति से है;
(घ) "बहु-राज्यीय सहकारी समिति" से तात्पर्य ऐसी समिति से है जिसके उद्देश्य किसी एक राज्य तक सीमित नहीं हैं और जो ऐसी सहकारी समितियों से संबंधित किसी भी लागू कानून के तहत पंजीकृत है या पंजीकृत मानी जाती है;
(ई) "पदाधिकारी" से तात्पर्य किसी सहकारी समिति के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव या कोषाध्यक्ष से है तथा इसमें किसी सहकारी समिति के बोर्ड द्वारा निर्वाचित किया जाने वाला कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल है;
(f) "रजिस्ट्रार" से तात्पर्य केंद्र सरकार द्वारा बहु-राज्यीय सहकारी समितियों के संबंध में नियुक्त केंद्रीय रजिस्ट्रार और राज्य सरकार द्वारा सहकारी समितियों के संबंध में किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानून के तहत नियुक्त सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार से है;
(जी) "राज्य अधिनियम" से तात्पर्य किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा निर्मित किसी कानून से है;
(h) "राज्य स्तरीय सहकारी समिति" से तात्पर्य ऐसी सहकारी समिति से है जिसका कार्यक्षेत्र किसी राज्य के संपूर्ण भाग में फैला हो और जिसे किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा निर्मित किसी कानून में इस प्रकार परिभाषित किया गया हो।
243. -ZI. सहकारी समितियों का निगमन।-
इस भाग के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी राज्य का विधानमंडल, स्वैच्छिक गठन, लोकतांत्रिक सदस्य-नियंत्रण, सदस्य-आर्थिक भागीदारी और स्वायत्त कार्यप्रणाली के सिद्धांतों पर आधारित सहकारी समितियों के निगमन, विनियमन और समापन के संबंध में कानून द्वारा प्रावधान कर सकता है।
243. बोर्ड के सदस्यों और पदाधिकारियों की संख्या और कार्यकाल।
(1) बोर्ड में उतने निदेशक होंगे जितने किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा कानून द्वारा निर्धारित किए गए हों: बशर्ते कि किसी सहकारी समिति के निदेशकों की अधिकतम संख्या इक्कीस से अधिक न हो:
इसके अलावा, राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, प्रत्येक सहकारी समिति के बोर्ड में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए एक सीट और महिलाओं के लिए दो सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करेगा, जिसमें सदस्य व्यक्ति हों और ऐसे वर्ग या श्रेणी के व्यक्ति हों।
(2) बोर्ड के निर्वाचित सदस्यों और उसके पदाधिकारियों का कार्यकाल चुनाव की तारीख से पांच वर्ष होगा और पदाधिकारियों का कार्यकाल बोर्ड के कार्यकाल के साथ समाप्त होगा:
बशर्ते कि यदि बोर्ड का कार्यकाल उसके मूल कार्यकाल के आधे से कम हो, तो बोर्ड उसी वर्ग के सदस्यों में से नामांकन द्वारा बोर्ड में आकस्मिक रिक्ति को भर सकता है, जिसके संबंध में आकस्मिक रिक्ति उत्पन्न हुई है।
(3) किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, सहकारी समिति के उद्देश्यों एवं गतिविधियों से संबंधित बैंकिंग, प्रबंधन, वित्त या किसी अन्य क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाले व्यक्तियों को बोर्ड के सदस्य के रूप में सह-विकल्पित करने का प्रावधान करेगा।
बशर्ते कि ऐसे सह-विकल्पित सदस्यों की संख्या खंड (1) के पहले परंतुक में निर्दिष्ट इक्कीस निदेशकों के अतिरिक्त दो से अधिक न हो:
इसके अलावा, ऐसे सह-चुने गए सदस्यों को सहकारी समिति के किसी भी चुनाव में सदस्य के रूप में मतदान करने का अधिकार नहीं होगा और न ही वे बोर्ड के पदाधिकारियों के रूप में चुने जाने के पात्र होंगे।
इसके अलावा, सहकारी समिति के कार्यात्मक निदेशक भी बोर्ड के सदस्य होंगे और ऐसे सदस्यों को खंड (1) के पहले परंतुक में निर्दिष्ट निदेशकों की कुल संख्या की गणना के उद्देश्य से बाहर रखा जाएगा।
243. -जेडके. बोर्ड के सदस्यों का चुनाव।-
(1) किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी कानून में किसी बात के होते हुए भी, किसी बोर्ड का चुनाव बोर्ड के कार्यकाल की समाप्ति से पहले इस प्रकार आयोजित किया जाएगा कि यह सुनिश्चित हो सके कि बोर्ड के नव निर्वाचित सदस्य निवर्तमान बोर्ड के सदस्यों के कार्यकाल की समाप्ति पर तुरंत पदभार ग्रहण कर लें।
(2) सहकारी समिति के लिए मतदाता सूचियों की तैयारी और सभी चुनावों के संचालन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण ऐसे प्राधिकरण या निकाय में निहित होगा, जैसा कि किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा कानून द्वारा निर्धारित किया जाए:
बशर्ते कि किसी राज्य का विधानमंडल, कानून द्वारा, ऐसे चुनावों के संचालन के लिए प्रक्रिया और दिशा-निर्देशों का प्रावधान कर सकता है।
243. -जेडएल.- बोर्ड और अंतरिम प्रबंधन का अधिस्थापन और निलंबन।-
(1) किसी भी कानून में किसी बात के होते हुए भी, किसी भी बोर्ड को छह महीने से अधिक की अवधि के लिए भंग या निलंबित नहीं किया जाएगा: बशर्ते कि बोर्ड को निम्नलिखित मामलों में भंग या निलंबित किया जा सकता है-
(i) इसकी लगातार चूक; या
(ii) अपने कर्तव्यों के पालन में लापरवाही के कारण; या
(iii) बोर्ड ने सहकारी समिति या उसके सदस्यों के हितों के प्रतिकूल कोई कार्य किया हो; या
(iv) बोर्ड के गठन या कार्यों में गतिरोध उत्पन्न हो गया हो; या
(v) किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा अनुच्छेद 243-जेडके के खंड (2) के अधीन विधि द्वारा स्थापित प्राधिकारी या निकाय राज्य अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार चुनाव कराने में विफल रहा है:
इसके अलावा, यदि किसी सहकारी समिति में सरकार की कोई हिस्सेदारी, ऋण, वित्तीय सहायता या सरकार द्वारा कोई गारंटी नहीं है, तो उस समिति के बोर्ड को भंग या निलंबित नहीं किया जाएगा।
इसके अलावा, यदि कोई सहकारी समिति बैंकिंग व्यवसाय करती है, तो बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (10 ऑफ 1949) के प्रावधान भी लागू होंगे।
इसके अलावा, बैंकिंग व्यवसाय करने वाली किसी सहकारी समिति (बहुराज्यीय सहकारी समिति को छोड़कर) के मामले में, इस खंड के प्रावधान इस प्रकार प्रभावी होंगे मानो "छह महीने" शब्दों के स्थान पर "एक वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए गए हों।
(2) यदि किसी बोर्ड को हटा दिया जाता है, तो ऐसी सहकारी समिति के मामलों का प्रबंधन करने के लिए नियुक्त प्रशासक खंड (1) में निर्दिष्ट अवधि के भीतर चुनाव कराने की व्यवस्था करेगा और प्रबंधन निर्वाचित बोर्ड को सौंप देगा।
(3) किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, प्रशासक की सेवा शर्तों के लिए प्रावधान कर सकता है।
243. -जेडएम. सहकारी समितियों के खातों का लेखापरीक्षा।-
(1) किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, सहकारी समितियों द्वारा खातों के रखरखाव और प्रत्येक वित्तीय वर्ष में कम से कम एक बार ऐसे खातों के लेखापरीक्षा के संबंध में प्रावधान कर सकता है।
(2) किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, लेखा परीक्षकों और लेखापरीक्षा फर्मों की न्यूनतम योग्यता और अनुभव निर्धारित करेगा जो सहकारी समितियों के खातों की लेखापरीक्षा करने के लिए पात्र होंगे।
(3) प्रत्येक सहकारी समिति, सहकारी समिति की आम सभा द्वारा नियुक्त खंड (2) में निर्दिष्ट लेखा परीक्षक या लेखापरीक्षा फर्मों द्वारा लेखापरीक्षा करवाएगी:
बशर्ते कि ऐसे लेखा परीक्षकों या लेखापरीक्षा फर्मों की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित पैनल या इस संबंध में राज्य सरकार द्वारा अधिकृत प्राधिकरण से की जाएगी।
(4) प्रत्येक सहकारी समिति के खातों का लेखापरीक्षा उस वित्तीय वर्ष की समाप्ति के छह महीने के भीतर किया जाएगा जिससे वे खाते संबंधित हैं।
(5) राज्य अधिनियम द्वारा परिभाषित शीर्ष सहकारी समिति के खातों की लेखापरीक्षा रिपोर्ट राज्य विधानमंडल के समक्ष उस तरीके से रखी जाएगी, जैसा कि राज्य विधानमंडल द्वारा कानून द्वारा निर्धारित किया जा सकता है।
243. -जेडएन. आम सभा की बैठकों का आयोजन।-
किसी राज्य का विधानमंडल, कानून द्वारा, यह प्रावधान कर सकता है कि प्रत्येक सहकारी समिति की वार्षिक आम सभा की बैठक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के छह महीने के भीतर बुलाई जाएगी ताकि ऐसे कानून में निर्धारित कार्यों का संचालन किया जा सके।
243. -ZO. सदस्य का सूचना प्राप्त करने का अधिकार।-
(1) किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, सहकारी समिति के प्रत्येक सदस्य को सहकारी समिति की पुस्तकों, सूचनाओं और खातों तक पहुँच प्रदान कर सकता है, जो ऐसे सदस्य के साथ उसके व्यवसाय के नियमित लेन-देन में रखी जाती हैं।
(2) किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, सहकारी समिति के प्रबंधन में सदस्यों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान कर सकता है, जिसमें सदस्यों द्वारा बैठकों में भाग लेने की न्यूनतम आवश्यकता और ऐसी विधि में प्रदान की गई न्यूनतम स्तर की सेवाओं का उपयोग करना शामिल हो।
(3) किसी राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा अपने सदस्यों के लिए सहकारी शिक्षा एवं प्रशिक्षण का प्रावधान कर सकता है।
243. -जेडपी. रिटर्न.-
प्रत्येक सहकारी समिति प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के छह महीने के भीतर राज्य सरकार द्वारा नामित प्राधिकारी को निम्नलिखित मामलों सहित विवरण प्रस्तुत करेगी, अर्थात्-
(क) इसकी गतिविधियों की वार्षिक रिपोर्ट;
(ख) इसके लेखापरीक्षित विवरण;
(ग) सहकारी समिति की आम सभा द्वारा अनुमोदित अधिशेष निपटान योजना;
(घ) सहकारी समिति के उपनियमों में किए गए संशोधनों की सूची, यदि कोई हो;
(ई) अपनी आम सभा की बैठक आयोजित करने की तिथि और नियत समय पर चुनाव कराने के संबंध में घोषणा; और
(f) राज्य अधिनियम के किसी भी प्रावधान के अनुसरण में रजिस्ट्रार द्वारा आवश्यक कोई अन्य जानकारी।
243. -ZQ. अपराध और दंड।-
(1) किसी राज्य का विधानमंडल, विधि द्वारा, सहकारी समितियों से संबंधित अपराधों और ऐसे अपराधों के लिए दंडों हेतु प्रावधान कर सकता है।
(2) किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा खंड (1) के अंतर्गत निर्मित कानून में निम्नलिखित कार्य या चूक को अपराध माना जाएगा, अर्थात्-
(क) कोई सहकारी समिति या उसका कोई अधिकारी या सदस्य जानबूझकर झूठा विवरण प्रस्तुत करता है या झूठी जानकारी देता है, या कोई व्यक्ति जानबूझकर राज्य अधिनियम के प्रावधानों के तहत इस संबंध में अधिकृत व्यक्ति द्वारा उससे मांगी गई कोई जानकारी नहीं देता है;
(ख) कोई व्यक्ति जानबूझकर या बिना किसी उचित कारण के राज्य अधिनियम के प्रावधानों के तहत जारी किसी सम्मन, अनुरोध या वैध लिखित आदेश की अवज्ञा करता है;
(ग) कोई भी नियोक्ता जो पर्याप्त कारण के बिना, सहकारी समिति को अपने कर्मचारी से कटौती की गई राशि को कटौती की तारीख से चौदह दिनों की अवधि के भीतर भुगतान करने में विफल रहता है;
(घ) कोई भी अधिकारी या संरक्षक जो जानबूझकर किसी सहकारी समिति, जिसका वह अधिकारी या संरक्षक है, की पुस्तकों, खातों, दस्तावेजों, अभिलेखों, नकदी, प्रतिभूति और अन्य संपत्ति की अभिरक्षा किसी अधिकृत व्यक्ति को सौंपने में विफल रहता है; और
(ई) जो कोई भी बोर्ड के सदस्यों या पदाधिकारियों के चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान या चुनाव के बाद कोई भ्रष्ट आचरण अपनाता है।
243. -जेडआर. बहु-राज्यीय सहकारी समितियों पर लागू.-
इस भाग के प्रावधान बहु-राज्यीय सहकारी समितियों पर इस संशोधन के साथ लागू होंगे कि "राज्य का विधानमंडल", "राज्य अधिनियम" या "राज्य सरकार" के किसी भी संदर्भ को क्रमशः "संसद", "केंद्रीय अधिनियम" या "केंद्रीय सरकार" के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा।
243. -जेडएस. केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू.-
इस भाग के प्रावधान केंद्र शासित प्रदेशों पर लागू होंगे और यदि किसी केंद्र शासित प्रदेश में विधान सभा नहीं है, तो उस पर लागू होने के संदर्भ में वे इस प्रकार लागू होंगे जैसे किसी राज्य के विधानमंडल के संदर्भ में अनुच्छेद 239 के तहत नियुक्त उसके प्रशासक के संदर्भ में लागू होते हैं और यदि किसी केंद्र शासित प्रदेश में विधान सभा है, तो उस विधान सभा के संदर्भ में लागू होंगे।
बशर्ते कि राष्ट्रपति राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकते हैं कि इस भाग के प्रावधान किसी भी केंद्र शासित प्रदेश या उसके किसी भाग पर लागू नहीं होंगे, जैसा कि वे अधिसूचना में निर्दिष्ट करें।
243. -ZT. मौजूदा कानूनों का जारी रहना।-
इस भाग में किसी बात के होते हुए भी, संविधान (निन्यानवेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2011 के प्रारंभ होने से ठीक पहले किसी राज्य में लागू सहकारी समितियों से संबंधित किसी कानून का कोई प्रावधान, जो इस भाग के प्रावधानों के साथ असंगत है, तब तक लागू रहेगा जब तक कि सक्षम विधानमंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसमें संशोधन या उसे निरस्त न कर दिया जाए, या ऐसे प्रारंभ होने की तिथि से एक वर्ष की समाप्ति तक, जो भी कम हो।
