संविधान (91वाँ संशोधन) अधिनियम, 2003
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 75
- 164
लेख सम्मिलित किए गए
- 361बी
कार्यक्रम प्रभावित हुए
- दसवीं अनुसूची
भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित दलबदल विरोधी कानून को मजबूत करने और उसमें संशोधन करने की मांग समय-समय पर कुछ हलकों में उठाई गई है, इस आधार पर कि ये प्रावधान दलबदल को रोकने के वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने में सक्षम नहीं रहे हैं।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
1. समय-समय पर कुछ हलकों में भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित दलबदल विरोधी कानून को मजबूत करने और उसमें संशोधन करने की मांग उठाई गई है, क्योंकि इन प्रावधानों से दलबदल पर रोक लगाने का वांछित लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पाया है। दसवीं अनुसूची की इस आधार पर भी आलोचना की गई है कि यह सामूहिक दलबदल की अनुमति देती है जबकि व्यक्तिगत दलबदल को अवैध घोषित करती है। भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 3 में विभाजन की स्थिति में अयोग्यता से छूट देने के प्रावधान की विशेष रूप से सरकार पर इसके अस्थिर प्रभाव के कारण कड़ी आलोचना हुई है।
2. मई 1990 की अपनी रिपोर्ट में (दिनेश गोस्वामी समिति), भारत के विधि आयोग ने “चुनावी कानूनों में सुधार” पर अपनी 170वीं रिपोर्ट (1999) में और संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग (एनसीआरडब्ल्यूसी) ने 31 मार्च 2002 की अपनी रिपोर्ट में, अन्य बातों के साथ-साथ, विभाजन की स्थिति में अयोग्यता से छूट से संबंधित भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 3 को हटाने की सिफारिश की है। एनसीआरडब्ल्यूसी का यह भी मत है कि दलबदलू को उसके इस कृत्य के लिए दंडित किया जाना चाहिए और उसे कम से कम मौजूदा विधानमंडल के शेष कार्यकाल की अवधि तक या अगले नए चुनाव तक, जो भी पहले हो, किसी भी सार्वजनिक पद, जैसे मंत्री या किसी अन्य लाभकारी राजनीतिक पद को धारण करने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। इन सुझावों को स्वीकार करने का प्रस्ताव है।
3. एनसीआरडब्ल्यूसी ने यह भी पाया है कि केंद्र और राज्यों की विभिन्न सरकारों द्वारा मंत्रिपरिषदें असामान्य रूप से बड़ी गठित की जा रही थीं और इस प्रथा को कानून द्वारा प्रतिबंधित किया जाना चाहिए तथा किसी राज्य या केंद्र सरकार में मंत्रियों की संख्या पर अधिकतम सीमा विधानमंडल के सदन की कुल संख्या के 10% तक निर्धारित की जानी चाहिए।
4. उपरोक्त के आलोक में, संविधान में संशोधन करके भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 3 को हटाने का प्रस्ताव है और यह प्रावधान करने का प्रस्ताव है कि मंत्रिपरिषद का आकार संबंधित सदन या सदनों की संख्या के 10% से अधिक नहीं होना चाहिए, चाहे वह एकसदनीय हो या द्विसदनीय। हालांकि, सिक्किम, मिजोरम और गोवा जैसे छोटे राज्यों के मामले में, जिनकी विधानसभाओं में क्रमशः 32, 40 और 40 सदस्य हैं, मंत्रियों की न्यूनतम संख्या सात प्रस्तावित है।
5. यह विधेयक उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास करता है। भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। भारत गणराज्य के चौवनवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नानुसार अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (इक्यानवेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2003 कहा जा सकता है।
अनुच्छेद 75 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 75 में खंड (1) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़े जाएंगे, अर्थात्:--
“(1क) मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या लोक सभा के सदस्यों की कुल संख्या के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
(1ख) संसद के किसी भी सदन का कोई भी सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल से संबंधित हो और दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 2 के तहत उस सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित किया गया हो, खंड (1) के तहत मंत्री नियुक्त होने के लिए भी अयोग्य होगा। यह अयोग्यता उसकी अयोग्यता की तिथि से लेकर उस तिथि तक लागू होगी जब तक कि उस सदस्य के रूप में उसका कार्यकाल समाप्त न हो जाए, या यदि वह ऐसी अवधि की समाप्ति से पहले संसद के किसी भी सदन के लिए चुनाव लड़ता है, तो उस तिथि तक लागू होगी जब तक कि उसे निर्वाचित घोषित न कर दिया जाए, इनमें से जो भी पहले हो।
अनुच्छेद 164 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 164 में खंड (1) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़े जाएंगे, अर्थात्:--
“(1क) किसी राज्य में मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या के पंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी:
बशर्ते कि किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या बारह से कम न हो:
इसके अलावा, यदि किसी राज्य में मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या संविधान (इक्यानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2003 के प्रारंभ होने के समय उक्त पंद्रह प्रतिशत या प्रथम परंतुक में निर्दिष्ट संख्या से अधिक हो, तो उस राज्य में मंत्रियों की कुल संख्या को राष्ट्रपति द्वारा सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा निर्धारित तिथि से छह महीने के भीतर इस खंड के प्रावधानों के अनुरूप लाया जाएगा।
(1ख) किसी राज्य की विधान सभा या विधान परिषद युक्त राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का कोई राजनीतिक दल का सदस्य, जो दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 2 के अधीन उस सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित किया गया है, खंड (1) के अधीन मंत्री नियुक्त होने के लिए भी अयोग्य होगा, उस तिथि से लेकर उस तिथि तक जब तक कि उस सदस्य के रूप में उसका कार्यकाल समाप्त न हो जाए, या यदि वह ऐसी अवधि की समाप्ति से पहले किसी राज्य की विधान सभा या विधान परिषद युक्त राज्य के विधानमंडल के किसी सदन के लिए चुनाव लड़ता है, तो उस तिथि तक जब तक कि उसे निर्वाचित घोषित न कर दिया जाए, जो भी पहले हो।
नए अनुच्छेद 361B का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 361ए के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:--
पारिश्रमिक वाले राजनीतिक पद पर नियुक्ति के लिए अयोग्यता
'361बी. किसी भी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का कोई सदस्य, जो दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 2 के तहत सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित किया गया है, वह अपनी अयोग्यता की तिथि से लेकर सदन के सदस्य के रूप में उसके कार्यकाल की समाप्ति तिथि तक या सदन के चुनाव में उसके निर्वाचित घोषित होने की तिथि तक, जो भी पहले हो, किसी भी पारिश्रमिकीय राजनीतिक पद को धारण करने के लिए भी अयोग्य होगा।
स्पष्टीकरण.—इस लेख के प्रयोजन के लिए,--
(क) “मकान” अभिव्यक्ति का वही अर्थ होगा जो दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 1 के खंड (क) में दिया गया है;
(ख) “पारिश्रमिकीय राजनीतिक पद” अभिव्यक्ति से तात्पर्य किसी भी पद से है—
(i) भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन, जहाँ ऐसे पद के लिए वेतन या पारिश्रमिक भारत सरकार या राज्य सरकार के सार्वजनिक राजस्व से दिया जाता है; या
(ii) किसी ऐसे निकाय के अधीन, चाहे वह निगमित हो या नहीं, जो पूर्णतः या आंशिकतः भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के स्वामित्व में हो और ऐसे पद के लिए वेतन या पारिश्रमिक ऐसे निकाय द्वारा भुगतान किया जाता हो, सिवाय इसके कि ऐसा वेतन या पारिश्रमिक प्रकृति में क्षतिपूर्ति के रूप में दिया जाता हो।
दसवीं अनुसूची का संशोधन
संविधान की दसवीं अनुसूची में,--
(क) अनुच्छेद 1 में, खंड (ख) में, शब्द और अंक “अनुच्छेद 3 या, जैसा भी मामला हो,” को हटा दिया जाएगा;
(ख) अनुच्छेद 2 में, उप-अनुच्छेद (1) में, शब्द और अंक “अनुच्छेद 3, 4 और 5” के स्थान पर शब्द और अंक “अनुच्छेद 4 और 5” प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ग) अनुच्छेद 3 को हटा दिया जाएगा।
परिशिष्ट
भारत के संविधान से उद्धरण
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दसवीं अनुसूची
[अनुच्छेद 102(2) और 191(2)]
दलबदल के आधार पर अयोग्यता संबंधी प्रावधान
1. व्याख्या.— इस अनुसूची में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,--
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(ख) अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 या, जैसा भी मामला हो, अनुच्छेद 4 के प्रावधानों के अनुसार किसी राजनीतिक दल से संबंधित सदन के सदस्य के संबंध में “विधानमंडल दल” का अर्थ उस सदन के उन सभी सदस्यों का समूह है जो उस समय उक्त प्रावधानों के अनुसार उस राजनीतिक दल से संबंधित हैं।
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2. दलबदल के आधार पर अयोग्यता।
(1) अनुच्छेद 3, 4 और 5 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी भी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का सदस्य सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य होगा—
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3. दल-बदल के आधार पर अयोग्यता विभाजन की स्थिति में लागू नहीं होगी।
जहां किसी सदन का कोई सदस्य यह दावा करता है कि वह और उसकी विधायिका पार्टी के अन्य सदस्य उस गुट का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उसकी मूल राजनीतिक पार्टी में विभाजन के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ है, और ऐसे समूह में उस विधायिका पार्टी के कम से कम एक तिहाई सदस्य शामिल हैं,--
(क) वह अनुच्छेद 2 की उपधारा (1) के तहत निम्नलिखित आधार पर अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा--
(i) कि उसने स्वेच्छा से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग दी है; या
(ii) कि उसने ऐसे सदन में किसी पार्टी द्वारा या उसके द्वारा इस संबंध में अधिकृत किसी व्यक्ति या प्राधिकरण द्वारा जारी किसी निर्देश के विपरीत मतदान किया है या मतदान से अनुपस्थित रहा है, ऐसी पार्टी, व्यक्ति या प्राधिकरण की पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना, और ऐसे मतदान या अनुपस्थित रहने को ऐसी पार्टी, व्यक्ति या प्राधिकरण द्वारा ऐसे मतदान या अनुपस्थित रहने की तिथि से पंद्रह दिनों के भीतर क्षमा नहीं किया गया है; और
(ख) ऐसे विभाजन के समय से, ऐसे गुट को अनुच्छेद 2 के उप-अनुच्छेद (1) के प्रयोजनों के लिए वह राजनीतिक दल माना जाएगा जिससे वह संबंधित है और इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए उसका मूल राजनीतिक दल माना जाएगा।
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