संविधान (8वाँ संशोधन) अधिनियम, 1959
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 334
इस विधेयक का उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 31, 31ए और 305 तथा नौवीं अनुसूची में संशोधन करना है।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (चौथा संशोधन) विधेयक, 1954 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1954 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
इस विधेयक का उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 31, 31ए और 305 तथा नौवीं अनुसूची में संशोधन करना है।
2. सर्वोच्च न्यायालय के हाल के निर्णयों ने अनुच्छेद 31 के खंड (1) और (2) को बहुत व्यापक अर्थ दिया है। यद्यपि दोनों खंडों के शब्दों में अंतर है, फिर भी उन्हें एक ही उद्देश्य से संबंधित माना जाता है। खंड (1) में निर्दिष्ट संपत्ति से वंचित करना, संपत्ति के अधिकार में किसी भी प्रकार की कटौती सहित, व्यापकतम अर्थ में समझा जाना चाहिए। भले ही यह किसी विशुद्ध नियामक प्रावधान के कारण हुआ हो और राज्य द्वारा उस या किसी अन्य संपत्ति अधिकार का अधिग्रहण या कब्जा न लिया गया हो, इन निर्णयों के अनुसार वैध होने के लिए कानून को अनुच्छेद के खंड (2) के तहत मुआवजे का प्रावधान करना होगा। अतः, निजी संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण और अधिग्रहण की राज्य की शक्ति को अधिक स्पष्ट रूप से पुनः परिभाषित करना और इसे उन मामलों से अलग करना आवश्यक समझा जाता है जहां राज्य के नियामक या निषेधात्मक कानूनों के संचालन के परिणामस्वरूप "संपत्ति से वंचित करना" होता है। विधेयक के खंड 2 में यही करने का प्रयास किया गया है।
3. यह याद किया जाएगा कि हमारे सामाजिक कल्याण विधान कार्यक्रम में सबसे पहले आए जमींदारी उन्मूलन कानूनों पर मुख्य रूप से अनुच्छेद 14, 19 और 31 के संदर्भ में प्रभावित हितों द्वारा हमला किया गया था, और विलंबकारी और व्यर्थ मुकदमेबाजी को समाप्त करने और इन कानूनों को अदालतों में चुनौती से ऊपर रखने के लिए, संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 31ए और 31बी और नौवीं अनुसूची को अधिनियमित किया गया था। अनुच्छेद 14, 19 और 31 की व्याख्या करने वाले बाद के न्यायिक निर्णयों ने केंद्र और राज्यों के लिए अन्य और समान रूप से महत्वपूर्ण सामाजिक कल्याणकारी कानूनों को वांछित दिशा में पारित करने में गंभीर कठिनाइयाँ खड़ी कर दी हैं, उदाहरण के लिए, निम्नलिखित:- (i) यद्यपि जमींदारी व्यवस्था और राज्य तथा किसानों के बीच मौजूद असंख्य मध्यस्थों का उन्मूलन लगभग हो चुका है, फिर भी भूमि सुधार में हमारे अगले उद्देश्य हैं: किसी भी व्यक्ति के स्वामित्व या कब्जे वाली कृषि भूमि की सीमा निर्धारित करना, निर्धारित अधिकतम सीमा से अधिक भूमि का निपटान करना और कृषि जोतों में भूमि मालिकों और किरायेदारों के अधिकारों में और संशोधन करना। (ii) शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की उचित योजना के लिए खाली और बंजर भूमि का लाभकारी उपयोग और झुग्गी-झोपड़ी वाले क्षेत्रों का निष्कासन आवश्यक है। (iii) राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के हित में, राज्य को देश के खनिज और तेल संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए, जिसमें विशेष रूप से, अन्वेषण लाइसेंस, खनन पट्टे और इसी तरह के समझौतों की शर्तों और नियमों को रद्द करने या संशोधित करने की शक्ति शामिल है। राज्य द्वारा प्रदत्त लाइसेंसों के अंतर्गत जनता को बिजली, प्रकाश या जल की आपूर्ति करने वाले सार्वजनिक उपयोगिता उपक्रमों के संबंध में भी यह आवश्यक है। (iv) जनहित में या उपक्रम या संपत्ति के बेहतर प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए किसी वाणिज्यिक या औद्योगिक उपक्रम या अन्य संपत्ति को अस्थायी अवधि के लिए राज्य प्रबंधन के अधीन लेना अक्सर आवश्यक होता है। राज्य प्रबंधन को ऐसे अस्थायी हस्तांतरण का प्रावधान करने वाले कानून संविधान के अंतर्गत अनुमेय होने चाहिए। (v) कंपनी कानून में वर्तमान में विचाराधीन सुधार, जैसे प्रबंध एजेंसी प्रणाली का क्रमिक उन्मूलन, राष्ट्रीय हित में दो या दो से अधिक कंपनियों के अनिवार्य विलय का प्रावधान, एक कंपनी से दूसरी कंपनी को उपक्रम का हस्तांतरण आदि, को चुनौती से परे रखा जाना आवश्यक है। तदनुसार, विधेयक के खंड 3 में अनुच्छेद 31ए के दायरे को इस प्रकार विस्तारित करने का प्रस्ताव है ताकि आवश्यक कल्याणकारी कानूनों की इन श्रेणियों को इसमें शामिल किया जा सके।
4. अनुच्छेद 31ए में प्रस्तावित संशोधन के फलस्वरूप, विधेयक के खंड 5 में संविधान की नौवीं अनुसूची में दो और राज्य अधिनियमों और चार केंद्रीय अधिनियमों को शामिल करने का प्रस्ताव है, जो संशोधित अनुच्छेद 31ए के खंड (1) के उपखंड (घ) और (च) के दायरे में आते हैं। इसका प्रभाव यह होगा कि अनुच्छेद 31बी के प्रावधानों के तहत उन्हें पूर्णतः पूर्वव्यापी मान्यता प्राप्त हो जाएगी।
5. हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले में, सगीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में, यह प्रश्न उठाया गया कि क्या किसी विशेष व्यापार या व्यवसाय में राज्य के एकाधिकार का प्रावधान करने वाला अधिनियम अनुच्छेद 301 द्वारा प्रदत्त व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता के साथ टकराव करता है, लेकिन इस प्रश्न का कोई निर्णय नहीं लिया गया। संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 19 के खंड (6) में संशोधन किया गया ताकि ऐसे राज्य एकाधिकारों को उस अनुच्छेद के खंड (1) के उपखंड (जी) के दायरे से बाहर रखा जा सके, लेकिन संविधान के भाग XIII में अनुच्छेद 301 के आरंभिक शब्दों के संदर्भ में कोई संबंधित प्रावधान नहीं किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से यह प्रतीत होता है कि संसद या राज्य विधानमंडल को किसी विशेष व्यापार या वाणिज्य क्षेत्र में राज्य एकाधिकार लागू करने का स्पष्ट अधिकार होने के बावजूद, इस कानून को न्यायालयों के समक्ष अनुच्छेद 301 के तहत "जनहित में" या अनुच्छेद 304(ख) के तहत "उचित प्रतिबंध" के रूप में उचित ठहराया जाना आवश्यक हो सकता है। यह माना जाता है कि ऐसे किसी भी प्रश्न पर अंतिम निर्णय विधानमंडल का होना चाहिए। तदनुसार, विधेयक के खंड 4 में अनुच्छेद 305 में संशोधन का प्रस्ताव है ताकि इसे स्पष्ट किया जा सके। भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। भारत गणराज्य के दसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप से अधिनियमित किया जाता है:---
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (आठवां संशोधन) अधिनियम, 1959 कहा जा सकता है।
अनुच्छेद 334 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 334 में, "दस वर्ष" शब्दों के स्थान पर "बीस वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
