संविधान (7वाँ संशोधन) अधिनियम, 1956
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 1
- 80
- 131
- 153
- 158
- 168
- 171
- 216
- 217
- 222
लेख सम्मिलित किए गए
- 258-ए
- 290-ए
- 350-ए
- 372-ए
- 378-ए
लेख प्रतिस्थापित
- 81
- 170
- 220
- 224
- 230
- 298
- 371
कार्यक्रम प्रभावित हुए
- दूसरी अनुसूची
प्रभावित हिस्से
- भाग VIII
राज्यों के पुनर्गठन की योजना को लागू करने के लिए, 1 अक्टूबर, 1956 से संविधान में कई संशोधन करना आवश्यक है।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (सातवां संशोधन) विधेयक, 1956 (विधेयक संख्या 29, 1956) के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
राज्यों के पुनर्गठन की योजना को लागू करने के लिए, 1 अक्टूबर, 1956 से संविधान में कई संशोधन करना आवश्यक है। यह विधेयक इन संशोधनों के साथ-साथ संविधान के कुछ प्रावधानों में भी संशोधन करना चाहता है, जो उच्च न्यायालयों और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, संघ और राज्यों की कार्यकारी शक्ति और विधायी सूचियों में कुछ प्रविष्टियों से संबंधित हैं। संशोधनों के कारण नीचे दिए गए हैं:-
खंड 2.- पुनर्गठन योजना में न केवल नए राज्यों की स्थापना और मौजूदा राज्यों के क्षेत्रफल और सीमाओं में परिवर्तन शामिल हैं, बल्कि राज्यों की तीन श्रेणियों (भाग क, भाग ख और भाग स) का उन्मूलन और कुछ क्षेत्रों को केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में वर्गीकृत करना भी शामिल है। इसके लिए अनुच्छेद 1 में उपयुक्त संशोधन किया जाना आवश्यक है और प्रथम अनुसूची को पूर्णतः संशोधित किया जाना चाहिए।
खंड 3.- अनुच्छेद 80 में प्रस्तावित संशोधन औपचारिक और परिणामी हैं। राज्य पुनर्गठन विधेयक, 1956 के भाग II में प्रस्तावित क्षेत्रीय परिवर्तन और नए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के गठन के लिए संविधान की चौथी अनुसूची का पूर्ण संशोधन आवश्यक है, जिसके द्वारा राज्यों की परिषद में मौजूदा राज्यों को सीटें आवंटित की जाती हैं। वर्तमान आवंटन 1941 की जनगणना में प्रत्येक राज्य की जनसंख्या के आधार पर किया जाता है और भाग क और भाग ख के प्रत्येक राज्य को आवंटित सीटों की संख्या इस सूत्र के अनुसार है: पहले पांच मिलियन के लिए प्रति मिलियन एक सीट और एक मिलियन से अधिक प्रत्येक अतिरिक्त दो मिलियन या उसके भाग के लिए एक सीट। नवीनतम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सीटों के आवंटन को संशोधित करने का प्रस्ताव है, लेकिन पहले वाले सूत्र के अनुसार ही।
खंड 4.- भाग सी राज्यों के अस्तित्व को समाप्त करने और केंद्र शासित प्रदेशों की स्थापना के कारण अनुच्छेद 81 और 82 में व्यापक संशोधन अपरिहार्य हो गया है। अनुच्छेद 81(1)(ख) में यह प्रावधान कि "राज्यों को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित, समूहीकृत या गठित किया जाएगा" अब उपयुक्त नहीं रहेगा, क्योंकि पुनर्गठन के बाद प्रत्येक राज्य इतना बड़ा होगा कि उसे कई निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जा सके और इस उद्देश्य के लिए अन्य राज्यों के साथ समूहीकृत करना या एक ही क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र में "गठित" करना संभव नहीं होगा। केंद्र शासित प्रदेशों के लिए उपयुक्त प्रावधान करने हेतु अनुच्छेद 81 के खंड (2) और अनुच्छेद 82 को संयोजित और संशोधित करना आवश्यक होगा। अनुच्छेदों में टुकड़ों में संशोधन करने के बजाय, उन्हें संशोधित और सरल बनाने का प्रस्ताव है। संयोगवश, संशोधित अनुच्छेद 81 के खंड (1)(ख) में संसद द्वारा केंद्र शासित प्रदेशों को आवंटित किए जा सकने वाले प्रतिनिधियों की कुल संख्या की अधिकतम सीमा निर्धारित करने का प्रस्ताव है।
खंड 5.- अनुच्छेद 131 के परंतुक में प्रस्तावित संशोधन भाग बी राज्यों के अस्तित्व के समाप्त होने के फलस्वरूप है। वर्तमान परंतुक के दोनों भागों को मिला दिया गया है।
खंड 6.-अनुच्छेद 153 में यह प्रावधान है कि प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। चूंकि कुछ परिस्थितियों में दो या दो से अधिक राज्यों के लिए राज्यपाल नियुक्त करना वांछनीय हो सकता है, इसलिए इस अनुच्छेद में एक प्रावधान जोड़ने का प्रस्ताव है ताकि ऐसी नियुक्ति में किसी भी संभावित तकनीकी बाधा को दूर किया जा सके।
खंड 7.-अनुच्छेद 168 के खंड (1) के उपखंड (क) में कुछ राज्यों में द्विसदनीय विधानमंडलों का प्रावधान है। यह प्रस्तावित है कि पुनर्गठित राज्यों में पंजाब और मैसूर में ऐसा विधानमंडल बना रहे और विस्तारित मध्य प्रदेश में भी ऐसा विधानमंडल हो। चूंकि मध्य प्रदेश के लिए विधान परिषद के गठन में समय लगेगा, इसलिए अनुच्छेद 168(1)(क) के संबंधित संशोधन को राष्ट्रपति की सार्वजनिक अधिसूचना के माध्यम से भविष्य में लागू करने का प्रस्ताव है।
खंड 8.- इसका उद्देश्य अनुच्छेद 170 को मुख्य रूप से अनुच्छेद 81 और 82 के अनुरूप लाने के लिए संशोधित करना है, जैसा कि खंड 4 द्वारा संशोधित किया गया है।
खंड 9.- अनुच्छेद 171 के खंड (1) के अधीन, किसी राज्य की विधान परिषद की अधिकतम संख्या उस राज्य की विधान सभा की संख्या के एक-चौथाई निर्धारित की गई है। यद्यपि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में यह अधिकतम संख्या पर्याप्त है, परन्तु छोटे राज्यों के मामले में इससे कठिनाई उत्पन्न होती है। अतः, अधिकतम संख्या को विधान सभा की संख्या के एक-तिहाई करने का प्रस्ताव है।
खंड 10.-अनुच्छेद 216 राष्ट्रपति को उच्च न्यायालय में समय-समय पर आवश्यकतानुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति करने और प्रत्येक उच्च न्यायालय के लिए अलग आदेश द्वारा न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या निर्धारित करने का अधिकार देता है। व्यावहारिक दृष्टि से यह परंतुक महत्वहीन है, क्योंकि अधिकतम संख्या निर्धारित करने वाले आदेश को राष्ट्रपति आवश्यकता पड़ने पर बदल सकते हैं। अतिरिक्त और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति, जिसके लिए खंड 14 में प्रावधान किया गया है, के लिए भी या तो आदेश में बार-बार संशोधन करना होगा या अधिकतम संख्या को बहुत अधिक निर्धारित करना होगा। अतः अनुच्छेद 216 के परंतुक को हटाने का प्रस्ताव है।
खंड 11.- इस खंड में प्रस्तावित अनुच्छेद 217 के खंड (1) का संशोधन सीमित अवधि के लिए अतिरिक्त और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रावधान के प्रस्ताव के फलस्वरूप है।
अनुच्छेद 12.- बार से उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के चयन को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक अनुच्छेद 220 में निहित सेवानिवृत्ति के बाद वकालत पर पूर्ण प्रतिबंध है। इस अनुच्छेद में संशोधन प्रस्तावित है ताकि इस पूर्ण प्रतिबंध को शिथिल किया जा सके और सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय और उस उच्च न्यायालय के अलावा किसी अन्य उच्च न्यायालय में वकालत करने की अनुमति दी जा सके जिसमें वे स्थायी न्यायाधीश थे।
खंड 13.-अनुच्छेद 222 राष्ट्रपति को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों के तबादलों का अधिकार देता है। इस अनुच्छेद के खंड (2) में यह प्रावधान है कि जब किसी न्यायाधीश का तबादला किया जाता है, तो वह अपने वेतन के अतिरिक्त एक क्षतिपूर्ति भत्ता प्राप्त करने का हकदार होगा। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार का भत्ता देने का कोई वास्तविक औचित्य नहीं है, इसलिए खंड (2) को हटाने का प्रस्ताव है।
खंड 14.- उच्च न्यायालय की पीठ में अल्पकालिक कार्य के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को वापस बुलाने का अनुच्छेद 224 में दिया गया प्रावधान न तो पर्याप्त पाया गया है और न ही संतोषजनक। अतः, इस अनुच्छेद के स्थान पर अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान प्रस्तावित किया जाता है ताकि लंबित कार्यभारों को पूरा किया जा सके और अस्थायी रिक्तियों में कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति की जा सके।
खंड 15.- पुनर्गठन के बाद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की संवैधानिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अनुच्छेद 230, 231 और 232 को संशोधित और सरल बनाने का प्रस्ताव है। जबकि अनुच्छेद 214 के तहत सामान्यतः प्रत्येक राज्य के लिए एक अलग उच्च न्यायालय होगा, दो या दो से अधिक राज्यों के लिए संयुक्त उच्च न्यायालय स्थापित करने की शक्ति की आवश्यकता होगी। साथ ही, आवश्यकता पड़ने पर किसी केंद्र शासित प्रदेश में उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार का विस्तार करने और ऐसे क्षेत्र से उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार को बाहर करने की शक्ति की आवश्यकता होगी। संशोधित अनुच्छेद 230 और 231 इन्हीं प्रावधानों को लागू करने के लिए बनाए गए हैं।
अनुच्छेद 16.- संविधान के भाग अष्टम में भाग सी राज्यों के प्रशासन का प्रावधान है तथा भाग नौ में भाग डी क्षेत्रों के प्रशासन का प्रावधान है। भाग अष्टम में संशोधन करके संघ शासित प्रदेशों के प्रशासन का प्रावधान करने और भाग नौ को निरस्त करने का प्रस्ताव है।
खंड 17.- जबकि राष्ट्रपति अनुच्छेद 258 (1) द्वारा किसी राज्य सरकार या उसके अधिकारियों को संघ के कार्य सौंपने के लिए सशक्त हैं, वहीं राज्य के राज्यपाल को केंद्र सरकार या उसके अधिकारियों को राज्य के कार्य सौंपने में सक्षम बनाने वाला कोई संबंधित प्रावधान नहीं है। राज्यों में कुछ विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन के संबंध में यह कमी व्यावहारिक रूप से महत्वपूर्ण पाई गई है। इस कमी को अनुच्छेद 258ए द्वारा दूर करने का प्रस्ताव है।
खंड 18.- मई 1949 में त्रावणकोर और कोचीन के शासकों द्वारा संयुक्त राज्य त्रावणकोर और कोचीन के गठन के लिए किए गए समझौते के अनुच्छेद VIII में यह प्रावधान था कि त्रावणकोर देवस्वोम कोष में प्रतिवर्ष 51 लाख रुपये का योगदान देने का त्रावणकोर का दायित्व संयुक्त राज्य का दायित्व बना रहेगा। इस व्यवस्था की पुष्टि संविधान के अनुच्छेद 238(10)(ii) द्वारा की गई थी। यह प्रस्ताव है कि केरल राज्य के गठन के बाद भी मौजूदा व्यवस्था जारी रखी जाए, लेकिन त्रावणकोर-कोचीन से मद्रास को क्षेत्र के हस्तांतरण को देखते हुए, उस राज्य की समेकित निधि से त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड में योगदान 51 लाख रुपये से घटाकर 46.5 लाख रुपये कर दिया जाए।
खंड 19.- इस खंड में अनुच्छेद 298 के दायरे को संशोधित और विस्तृत करने का प्रस्ताव है, मुख्य रूप से यह स्पष्ट करने के लिए कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारें किसी भी वाणिज्यिक या औद्योगिक उपक्रम को चलाने के लिए सक्षम हैं, चाहे वह केंद्र या राज्य की विधायी क्षमता के अंतर्गत आने वाले मामले से संबंधित हो या न हो। इसी प्रकार, संघ या राज्य द्वारा संपत्ति का स्वामित्व, अधिग्रहण और निपटान तथा अनुबंध करना संवैधानिक रूप से अनुचित नहीं होगा। साथ ही, संशोधित अनुच्छेद में यह प्रावधान है कि संघ और राज्यों की यह विस्तारित कार्यकारी शक्ति, संघ के मामले में राज्य द्वारा बनाए गए कानून के अधीन होगी तथा राज्यों के मामले में संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन होगी।
खंड 20.- इस खंड में प्रस्तावित नया अनुच्छेद 350ए, पुनर्गठन के बाद राज्यों में भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षा उपायों के संबंध में राज्य पुनर्गठन आयोग की महत्वपूर्ण सिफारिशों में से एक को लागू करने के लिए बनाया गया है।
खंड 21.- यह प्रस्तावित है कि अनुच्छेद 371 को एक अन्य अनुच्छेद द्वारा प्रतिस्थापित किया जाए जिसमें आंध्र और पंजाब राज्यों के संबंध में विशेष प्रावधान हों। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को राज्य विधान सभा की क्षेत्रीय समितियों का गठन करने और सरकार के कामकाज के नियमों और विधान सभा की कार्यप्रणाली के नियमों में उपयुक्त संशोधन करने का निर्देश देकर उनके सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने में सक्षम बनाएगा।
खंड 22.- त्रावणकोर-कोचीन उच्च न्यायालय, निर्धारित तिथि से, नए केरल राज्य का उच्च न्यायालय बन जाएगा और मैसूर और राजस्थान के उच्च न्यायालय क्रमशः विस्तारित "नए" राज्यों के उच्च न्यायालय के रूप में उसी नाम से बने रहेंगे। इन राज्यों में वकीलों की आय और न्यायिक सेवाओं को देय वेतन के स्तर को ध्यान में रखते हुए, यह माना जाता है कि इन उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को देय वेतन को अन्य उच्च न्यायालयों के स्तर तक बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है। संविधान की द्वितीय अनुसूची के अनुच्छेद 10 के उप-अनुच्छेद (1) में संशोधन प्रस्तावित है, जिसमें इन तीनों उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को 3,000 रुपये और अन्य न्यायाधीशों को 2,500 रुपये का वेतन देने का प्रावधान है। कभी-कभी किसी सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करना आवश्यक हो जाता है। ऐसे न्यायाधीश की पेंशन रोकने के लिए किसी कानूनी प्रावधान के अभाव में, उनसे यह वचन लेने की प्रथा रही है कि वे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान पेंशन का दावा नहीं करेंगे। चूंकि यह स्पष्ट रूप से असंतोषजनक है, इसलिए द्वितीय अनुसूची के अनुच्छेद 10(1) में उसी तर्ज पर एक प्रावधान जोड़ने का प्रस्ताव है, जैसा कि इसी प्रकार की परिस्थितियों में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के वेतन को विनियमित करने के लिए अनुच्छेद 9(1) में प्रावधान है।
अनुच्छेद 10 के उप-अनुच्छेद (3) और (4) की अब आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उच्च न्यायालय न्यायाधीश (सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1954 में उचित प्रावधान किया गया है।
खंड 23.- सरकार द्वारा संपत्ति के अधिग्रहण और मांग के मूलतः एक ही विषय से संबंधित विधायी सूचियों में तीन प्रविष्टियों (सूची प्रथम की 33, सूची द्वितीय की 36 और सूची तृतीय की 42) के अस्तित्व से विधायी प्रक्रिया में अनावश्यक तकनीकी कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। इन कठिनाइयों से बचने और संवैधानिक स्थिति को सरल बनाने के लिए, संघ और राज्य सूची की प्रविष्टियों को हटाकर समवर्ती सूची की प्रविष्टि को एक व्यापक प्रविष्टि से प्रतिस्थापित करने का प्रस्ताव है जो इस विषय को समाहित करती हो।
खंड 24.- संघ सूची की प्रविष्टि 67 में "प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारकों और अभिलेखों, तथा पुरातात्विक स्थलों और अवशेषों, जिन्हें संसद द्वारा विधि द्वारा राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है" का उल्लेख है। संसद के अधिनियम द्वारा बड़ी संख्या में प्राचीन स्मारकों, पुरातात्विक स्थलों आदि को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया गया है। उस अधिनियम की सूचियों में मामूली सा भी परिवर्तन या परिवर्धन करने के लिए संसद के एक अन्य अधिनियम की आवश्यकता होती है, जो अनावश्यक रूप से जटिल प्रक्रिया प्रतीत होती है। अतः, इस प्रविष्टि में संशोधन करके "संसद द्वारा विधि द्वारा घोषित" शब्दों के स्थान पर "संसद द्वारा निर्मित विधि द्वारा या उसके अधीन घोषित" शब्द प्रतिस्थापित करने का प्रस्ताव है। यही संशोधन संबंधित प्रावधानों, राज्य सूची की प्रविष्टि 12, समवर्ती सूची की प्रविष्टि 40 और अनुच्छेद 49 में भी प्रस्तावित है।
खंड 25.-यद्यपि संघ सूची में उद्योगों से संबंधित दो प्रविष्टियाँ 7 और 52 हैं, फिर भी सूची द्वितीय की प्रविष्टि 24 में केवल बाद वाली प्रविष्टि का ही उल्लेख है। सूची प्रथम की प्रविष्टि 7 का उल्लेख न होना एक चूक प्रतीत होती है और इस खंड में इसे सुधारने का प्रयास किया गया है।
अनुच्छेद 26 और अनुसूची.- इनमें संविधान और संविधान (कठिनाइयों को दूर करने) आदेश संख्या VIII में असम के आदिवासी क्षेत्रों से संबंधित प्रस्तावित परिणामी और गौण संशोधन और निरसन शामिल हैं।
भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम
भारत गणराज्य के सातवें वर्ष में संसद द्वारा यह अधिनियमित किया जाता है कि:-
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
(1) इस अधिनियम को संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 कहा जा सकता है।
(2) यह 1 नवंबर, 1956 को लागू होगा।
अनुच्छेद 1 और पहली अनुसूची का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 1 में,-
(क) खंड (2) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(2) राज्य और उनके क्षेत्र प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट होंगे।
(ख) खंड (3) में उपखंड (ख) के स्थान पर निम्नलिखित उपखंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(ख) प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट केंद्र शासित प्रदेश; और)।
(2) राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम, 1956 और बिहार एवं पश्चिम बंगाल (क्षेत्रों का हस्तांतरण) अधिनियम, 1956 द्वारा संशोधित संविधान की प्रथम अनुसूची के स्थान पर निम्नलिखित अनुसूची प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-
पहली अनुसूची
(अनुच्छेद 1 और 4)
I. राज्य
1. आंध्र प्रदेश . . . . . आंध्र राज्य अधिनियम, 1953 की धारा 3 की उपधारा (i) में निर्दिष्ट क्षेत्र और राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की उपधारा 3 में निर्दिष्ट क्षेत्र।
2. असम . . . . . . . . . . इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले असम प्रांत, खासी राज्य और असम जनजातीय क्षेत्रों में शामिल क्षेत्र, लेकिन असम (सीमा परिवर्तन) अधिनियम, 1951 की अनुसूची में निर्दिष्ट क्षेत्रों को छोड़कर।
3. बिहार . . . . . . . . . . . वे क्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले या तो बिहार प्रांत में शामिल थे या जिनका प्रशासन इस प्रकार किया जा रहा था मानो वे उस प्रांत का हिस्सा हों, लेकिन बिहार और पश्चिम बंगाल (क्षेत्रों का हस्तांतरण) अधिनियम, 1956 की धारा 3 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट क्षेत्रों को छोड़कर।
4. बंबई . . . . . . . . . राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 8 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट क्षेत्र।
5. केरल . . . . . . . . . . राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 5 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट क्षेत्र।
6. मध्य प्रदेश . . . . . राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 9 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट क्षेत्र।
7. मद्रास . . . . . . . . . वे क्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले या तो मद्रास प्रांत में शामिल थे या जिनका प्रशासन इस प्रकार किया जा रहा था मानो वे उस प्रांत का हिस्सा हों, और राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 4 में निर्दिष्ट क्षेत्र, लेकिन आंध्र राज्य अधिनियम, 1953 की धारा 3 की उपधारा (1) और धारा 4 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट क्षेत्रों को छोड़कर, और राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (ख), धारा 6 और धारा 7 की उपधारा (1) के खंड (घ) में निर्दिष्ट क्षेत्रों को छोड़कर।
8. मैसूर . . . . . . . . . राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट क्षेत्र।
9. उड़ीसा . . . . . . . . . . वे क्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले या तो उड़ीसा प्रांत में शामिल थे या जिनका प्रशासन इस प्रकार किया जा रहा था मानो वे उस प्रांत का हिस्सा हों।
10. पंजाब . . . . . . . . . . राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 11 में निर्दिष्ट क्षेत्र।
11. राजस्थान . . . . . . . . राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 10 में निर्दिष्ट क्षेत्र।
12. उत्तर प्रदेश . . . . . . वे क्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले या तो संयुक्त प्रांत के नाम से जाने जाने वाले प्रांत में शामिल थे या जिनका प्रशासन इस प्रकार किया जा रहा था मानो वे उस प्रांत का हिस्सा हों।
13. पश्चिम बंगाल . . . . . . . वे क्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले या तो पश्चिम बंगाल प्रांत में शामिल थे या जिनका प्रशासन इस प्रकार किया जा रहा था मानो वे उस प्रांत का हिस्सा हों, और चंदर नगर (विलय) अधिनियम, 1954 की धारा 2 के खंड (ग) में परिभाषित चंदर नगर क्षेत्र, और बिहार और पश्चिम बंगाल (क्षेत्रों का हस्तांतरण) अधिनियम, 1956 की धारा 3 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट क्षेत्र।
14. जम्मू और कश्मीर... वह क्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर में समाहित था।
II. केंद्र शासित प्रदेश
1. दिल्ली . . . . . . . . . . . वह क्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले दिल्ली के मुख्य आयुक्त प्रांत में शामिल था।
2. हिमाचल प्रदेश . . . . वे क्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले हिमाचल प्रदेश और बिलासपुर के नाम से मुख्य आयुक्त के प्रांतों के रूप में प्रशासित किए जा रहे थे।
3. मणिपुर . . . . . . . . . वह क्षेत्र जिसे इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले मणिपुर नाम से एक मुख्य आयुक्त प्रांत के रूप में प्रशासित किया जा रहा था।
4. त्रिपुरा . . . . . . . . . वह क्षेत्र जिसे इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले त्रिपुरा नाम से एक मुख्य आयुक्त प्रांत के रूप में प्रशासित किया जा रहा था।
5. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह . . . . . वह क्षेत्र जो इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के मुख्य आयुक्त प्रांत में शामिल था।
6. लक्षद्वीप, मिनिकॉय और अमीनदीवी द्वीप समूह... राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 6 में निर्दिष्ट क्षेत्र।
अनुच्छेद 80 और चौथी अनुसूची का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 80 में,-
(क) खंड (1) के उपखंड (ख) में, "राज्यों" शब्द के बाद, "और केंद्र शासित प्रदेशों" शब्द जोड़े जाएंगे;
(ख) खंड (2) में, "राज्यों के" शब्दों के बाद "और केंद्र शासित प्रदेशों के" शब्द जोड़े जाएंगे;
(ग) खंड (4) में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट" शब्द और अक्षर हटा दिए जाएंगे; और
(घ) खंड (5) में, "प्रथम अनुसूची के भाग सी में निर्दिष्ट राज्य" शब्दों और अक्षर के स्थान पर "केंद्र शासित प्रदेश" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
(2) राज्यों के पुनर्गठन अधिनियम, 1956 और बिहार एवं पश्चिम बंगाल (क्षेत्रों का हस्तांतरण) अधिनियम, 1956 द्वारा संशोधित संविधान की चौथी अनुसूची के स्थान पर निम्नलिखित अनुसूची प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-
"चौथी अनुसूची
[अनुच्छेद 4(1) और 80(2)]
राज्य परिषद में सीटों का आवंटन
निम्नलिखित तालिका के पहले स्तंभ में निर्दिष्ट प्रत्येक राज्य या केंद्र शासित प्रदेश को, उस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के सामने स्थित दूसरे स्तंभ में निर्दिष्ट सीटों की संख्या आवंटित की जाएगी।
1. आंध्र प्रदेश 18
2. असम 7
3. बिहार 22
4. बॉम्बे 27
5. केरल 9
6. मध्य प्रदेश 16
7. मद्रास 17
8. मैसूर 12
9. उड़ीसा 10
10. पंजाब 11
11. राजस्थान 10
12. उत्तर प्रदेश 34
13. पश्चिम बंगाल 16
14. जम्मू और कश्मीर 4
15. दिल्ली 3
16. हिमाचल प्रदेश
17. दिल्ली 1
18. त्रिपुरा 1
कुल 220
अनुच्छेद 81 और 82 के स्थान पर नए अनुच्छेदों का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्:-
"81. लोक सभा की संरचना,-
(1) अनुच्छेद 331 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, लोक सभा में निम्नलिखित सदस्य होंगे-
(क) राज्यों में प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने गए पांच सौ से अधिक सदस्य नहीं; और
(ख) केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने के लिए बीस से अधिक सदस्य नहीं होंगे, जिनका चुनाव संसद द्वारा विधिवत रूप से किया जाएगा।
(2) खंड (1) के उपखंड (क) के प्रयोजनों के लिए,-
(क) लोकसभा में प्रत्येक राज्य को इतनी सीटें आवंटित की जाएंगी कि उन सीटों की संख्या और राज्य की जनसंख्या का अनुपात, जहाँ तक संभव हो, सभी राज्यों के लिए समान हो; और
(ख) प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में इस प्रकार विभाजित किया जाएगा कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या और उसे आवंटित सीटों की संख्या के बीच का अनुपात, जहाँ तक संभव हो, पूरे राज्य में समान हो।
(3) इस अनुच्छेद में, "जनसंख्या" अभिव्यक्ति का अर्थ पिछली जनगणना में निर्धारित जनसंख्या है जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित किए गए हैं।
82. प्रत्येक जनगणना के बाद पुनः समायोजन।
प्रत्येक जनगणना के पूर्ण होने पर, लोकसभा में राज्य को आवंटित सीटों का क्रम और प्रत्येक राज्य का क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन, संसद द्वारा विधिवत निर्धारित प्राधिकारी द्वारा और विधिवत रूप से पुनर्व्यवस्थित किया जाएगा।
बशर्ते कि इस प्रकार का पुनर्व्यवस्थापन तत्कालीन लोकसभा के भंग होने तक लोकसभा में प्रतिनिधित्व को प्रभावित नहीं करेगा।"
अनुच्छेद 131 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 131 में परंतुक के स्थान पर निम्नलिखित परंतुक प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
बशर्ते कि उक्त क्षेत्राधिकार किसी संधि, समझौते, अनुबंध, वचनबद्धता, सनद या अन्य समान दस्तावेज से उत्पन्न विवाद पर लागू नहीं होगा, जो इस संविधान के प्रारंभ होने से पहले किया गया हो या निष्पादित किया गया हो, या जो इसके प्रारंभ होने के बाद भी लागू रहता हो, या जिसमें यह प्रावधान हो कि उक्त क्षेत्राधिकार ऐसे विवाद पर लागू नहीं होगा।
अनुच्छेद 153 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 153 में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
इस अनुच्छेद में कोई भी बात एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों के राज्यपाल के रूप में नियुक्त करने से नहीं रोकेगी।
अनुच्छेद 158 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 158 में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(3-ए) जहां एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है, वहां राज्यपाल को देय पारिश्रमिक और भत्ते राज्यों के बीच ऐसे अनुपात में आवंटित किए जाएंगे जैसा राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्धारित करे।
अनुच्छेद 168 का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 168 के खंड (1) के उपखंड (क) में, "मद्रास" शब्द के स्थान पर "मैसूर" शब्द जोड़ा जाएगा।
(2) उक्त उपखंड में, राष्ट्रपति द्वारा सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा "बॉम्बे" शब्द के बाद नियुक्त तिथि से "मध्य प्रदेश" शब्द जोड़ा जाएगा।
अनुच्छेद 170 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 170 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
170. विधान सभाओं की संरचना।-
(1) अनुच्छेद 333 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक राज्य की विधान सभा में पाँच सौ से अधिक और साठ से कम सदस्य नहीं होंगे, जो राज्य के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने जाएँगे।
(2) खंड (1) के प्रयोजनों के लिए, प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में इस प्रकार विभाजित किया जाएगा कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या और उसे आवंटित सीटों की संख्या के बीच का अनुपात, जहाँ तक संभव हो, पूरे राज्य में समान हो।
स्पष्टीकरण - इस खंड में, "जनसंख्या" अभिव्यक्ति से तात्पर्य पिछली जनगणना में निर्धारित जनसंख्या से है जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित किए गए हैं।
(3) प्रत्येक जनगणना पूर्ण होने पर, प्रत्येक राज्य की विधान सभा में सीटों की कुल संख्या और प्रत्येक राज्य का प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन, संसद द्वारा विधि द्वारा निर्धारित प्राधिकारी द्वारा और विधि द्वारा पुनर्व्यवस्थित किया जाएगा: बशर्ते कि ऐसा पुनर्व्यवस्थित करना तत्कालीन विधान सभा के विघटन तक विधान सभा में प्रतिनिधित्व को प्रभावित नहीं करेगा।
अनुच्छेद 171 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 171 के खंड (1) में, "एक चौथाई" शब्द के स्थान पर "एक तिहाई" शब्द प्रतिस्थापित किया जाएगा।
अनुच्छेद 216 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 216 में प्रावधान को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 217 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 217 के खंड (1) में, "वह साठ वर्ष की आयु प्राप्त करने तक पद धारण करेगा" शब्दों के स्थान पर निम्नलिखित शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्:-
"अतिरिक्त या कार्यवाहक न्यायाधीश के मामले में, वह अनुच्छेद 224 में दिए गए प्रावधान के अनुसार पद धारण करेगा, और किसी अन्य मामले में, वह साठ वर्ष की आयु प्राप्त करने तक पद धारण करेगा।"
अनुच्छेद 220 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 220 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
220. स्थायी न्यायाधीश के पद से हटने के बाद वकालत पर प्रतिबंध।- इस संविधान के लागू होने के बाद, किसी भी उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में पद धारण करने वाला कोई भी व्यक्ति, सर्वोच्च न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों को छोड़कर, भारत में किसी भी न्यायालय या किसी भी प्राधिकरण के समक्ष पैरवी या कार्य नहीं करेगा। स्पष्टीकरण।- इस अनुच्छेद में, "उच्च न्यायालय" अभिव्यक्ति में प्रथम अनुसूची के भाग बी में निर्दिष्ट राज्य के उच्च न्यायालय को शामिल नहीं किया गया है, जैसा कि यह संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के लागू होने से पहले अस्तित्व में था।
अनुच्छेद 222 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 222 में,-
(क) खंड (1) में, "भारत के क्षेत्र के भीतर" शब्द हटा दिए जाएंगे; और
(ख) खंड (2) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 224 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 224 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
224. अतिरिक्त और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति।
(1) यदि किसी उच्च न्यायालय के कार्य में अस्थायी वृद्धि के कारण या उसमें लंबित कार्यों के कारण राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि उस न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में उस समय के लिए वृद्धि की जानी चाहिए, तो राष्ट्रपति विधिवत योग्य व्यक्तियों को न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए नियुक्त कर सकते हैं, जैसा कि वे निर्दिष्ट करें।
(2) जब मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी उच्च न्यायालय का कोई न्यायाधीश अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का निर्वाह करने में असमर्थ हो या उसे अस्थायी रूप से मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाए, तो राष्ट्रपति स्थायी न्यायाधीश के कार्यभार ग्रहण करने तक उस न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के लिए किसी योग्य व्यक्ति को नियुक्त कर सकते हैं।
(3) उच्च न्यायालय के अतिरिक्त या कार्यवाहक न्यायाधीश के रूप में नियुक्त कोई भी व्यक्ति साठ वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद पद धारण नहीं करेगा।
अनुच्छेद 230, 231 और 232 के स्थान पर नए अनुच्छेदों का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 230, 231 और 232 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्:-
230. केंद्र शासित प्रदेशों में उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र का विस्तार।
(1) संसद विधि द्वारा किसी केंद्र शासित प्रदेश में उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विस्तार कर सकती है, या किसी केंद्र शासित प्रदेश से उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को बाहर कर सकती है।
(2) जहाँ किसी राज्य का उच्च न्यायालय किसी केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करता है,-
(क) इस संविधान में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे राज्य के विधानमंडल को उस अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने, प्रतिबंधित करने या समाप्त करने का अधिकार प्राप्त हो; और
(ख) अनुच्छेद 227 में राज्यपाल का संदर्भ, उस क्षेत्र में अधीनस्थ न्यायालयों के लिए किसी नियम, प्रपत्र या तालिका के संबंध में, राष्ट्रपति के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा।
231. दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक सामान्य उच्च न्यायालय की स्थापना।
(1) इस अध्याय के पूर्ववर्ती प्रावधानों में किसी बात के होते हुए भी, संसद विधि द्वारा दो या दो से अधिक राज्यों या दो या दो से अधिक राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक सामान्य उच्च न्यायालय की स्थापना कर सकती है।
(2) ऐसे किसी उच्च न्यायालय के संबंध में,-
(क) अनुच्छेद 217 में राज्य के राज्यपाल के संदर्भ को उन सभी राज्यों के राज्यपालों के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा जिनके संबंध में उच्च न्यायालय क्षेत्राधिकार का प्रयोग करता है;
(ख) अधीनस्थ न्यायालयों के लिए किसी नियम, प्रपत्र या सारणी के संबंध में अनुच्छेद 227 में राज्यपाल के संदर्भ को उस राज्य के राज्यपाल के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा जिसमें अधीनस्थ न्यायालय स्थित हैं; और
(ग) अनुच्छेद 219 और 229 में राज्य के संदर्भों को उस राज्य के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा जिसमें उच्च न्यायालय का प्रधान पीठ स्थित है:
बशर्ते कि यदि ऐसा प्रधान आसन किसी केंद्र शासित प्रदेश में हो, तो अनुच्छेद 219 और 229 में राज्यपाल, लोक सेवा आयोग, विधानमंडल और राज्य की संचित निधि के संदर्भों को क्रमशः राष्ट्रपति, संघ लोक सेवा आयोग, संसद और भारत की संचित निधि के संदर्भों के रूप में समझा जाएगा।
भाग VIII का संशोधन
संविधान के आठवें भाग में-
(क) प्रथम अनुसूची के भाग सी में “राज्य” शीर्षक के स्थान पर “केंद्र शासित प्रदेश” शीर्षक प्रतिस्थापित किया जाएगा; और
(ख) अनुच्छेद 239 एवं 240 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्:-
239. केंद्र शासित प्रदेशों का प्रशासन।-
(1) जब तक संसद द्वारा विधि द्वारा अन्यथा प्रावधान न किया जाए, प्रत्येक केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा किया जाएगा, और वह जहां तक उचित समझे, अपने द्वारा नियुक्त प्रशासक के माध्यम से, जिसे वह निर्दिष्ट पदनाम दे।
(2) भाग VI में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति किसी राज्य के राज्यपाल को किसी निकटवर्ती केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासक नियुक्त कर सकता है, और यदि किसी राज्यपाल को इस प्रकार नियुक्त किया जाता है, तो वह अपने मंत्रिपरिषद से स्वतंत्र होकर ऐसे प्रशासक के रूप में अपने कार्यों का निर्वाह करेगा।
240. कुछ केंद्र शासित प्रदेशों के लिए नियम बनाने की राष्ट्रपति की शक्ति।
(1) राष्ट्रपति केंद्र शासित प्रदेशों की शांति, प्रगति और सुशासन के लिए नियम बना सकते हैं-
(क) अंडमान और निकोबार द्वीप समूह;
(ख) लक्षद्वीप, मिनिकॉय और अमीनदीवी द्वीप समूह।
(2) इस प्रकार बनाया गया कोई भी नियम संसद द्वारा बनाए गए किसी भी अधिनियम या किसी भी मौजूदा कानून को निरस्त या संशोधित कर सकता है जो उस समय केंद्र शासित प्रदेश पर लागू हो, और राष्ट्रपति द्वारा जारी किए जाने पर, उस क्षेत्र पर लागू होने वाले संसद के अधिनियम के समान ही प्रभावी होगा।
नए अनुच्छेद 258-A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 258 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
258-ए. राज्यों द्वारा संघ को कार्य सौंपने की शक्ति।-इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का राज्यपाल भारत सरकार की सहमति से, किसी भी ऐसे मामले से संबंधित कार्यों को सशर्त या बिना शर्त उस सरकार या उसके अधिकारियों को सौंप सकता है, जिस पर राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है।
नए अनुच्छेद 290-A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 290 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
290-ए. कुछ देवस्वोम निधियों को वार्षिक भुगतान - केरल राज्य की समेकित निधि से प्रतिवर्ष छियालीस लाख पचास हजार रुपये की राशि त्रावणकोर देवस्वोम निधि को आवंटित की जाएगी; और मद्रास राज्य की समेकित निधि से प्रतिवर्ष तेरह लाख पचास हजार रुपये की राशि उस राज्य में स्थापित देवस्वोम निधि को आवंटित की जाएगी, जिसका उपयोग 1 नवंबर, 1956 को त्रावणकोर-कोचीन राज्य से उस राज्य को हस्तांतरित क्षेत्रों में स्थित हिंदू मंदिरों और तीर्थस्थलों के रखरखाव के लिए किया जाता है।
अनुच्छेद 298 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 298 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
298. व्यापार आदि करने की शक्ति- संघ और प्रत्येक राज्य की कार्यकारी शक्ति किसी भी व्यापार या व्यवसाय को चलाने और संपत्ति के अधिग्रहण, धारण और निपटान तथा किसी भी उद्देश्य के लिए अनुबंध करने तक विस्तारित होगी।
उसे उपलब्ध कराया-
(क) संघ की उक्त कार्यकारी शक्ति, जहां तक ऐसा व्यापार या व्यवसाय या ऐसा उद्देश्य नहीं है जिसके संबंध में संसद कानून बना सकती है, प्रत्येक राज्य में राज्य द्वारा बनाए गए कानून के अधीन होगी; और
(ख) प्रत्येक राज्य की उक्त कार्यकारी शक्ति, जहां तक ऐसा व्यापार या व्यवसाय या ऐसा उद्देश्य नहीं है जिसके संबंध में राज्य विधानमंडल कानून बना सकता है, संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन होगी।
नए अनुच्छेद 350-A और 350-B का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 350 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़े जाएंगे, अर्थात्:-
350-ए. प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएँ.- राज्य और राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकरण का यह प्रयास होगा कि भाषाई अल्पसंख्यक समूहों से संबंधित बच्चों को प्राथमिक स्तर की शिक्षा में मातृभाषा में शिक्षा के लिए पर्याप्त सुविधाएँ प्रदान की जाएँ; और राष्ट्रपति किसी भी राज्य को ऐसी सुविधाएँ प्रदान करने के लिए आवश्यक या उचित समझे जाने वाले निर्देश जारी कर सकते हैं।
350.
-बी. भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी।-
(1) भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक विशेष अधिकारी होगा।
(2) विशेष अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह इस संविधान के अधीन भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए प्रदान किए गए सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करे और राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित अंतराल पर उन मामलों पर राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करे, और राष्ट्रपति ऐसी सभी रिपोर्टों को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखने और संबंधित राज्यों की सरकारों को भेजने का प्रबंध करेगा।
अनुच्छेद 371 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 371 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
371. आंध्र प्रदेश, पंजाब और बंबई राज्यों के संबंध में विशेष प्रावधान।
(1) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति आंध्र प्रदेश या पंजाब राज्य के संबंध में आदेश द्वारा राज्य की विधान सभा की क्षेत्रीय समितियों के गठन और कार्यों के लिए, सरकार के कामकाज के नियमों और राज्य की विधान सभा की प्रक्रिया के नियमों में किए जाने वाले संशोधनों के लिए और क्षेत्रीय समितियों के उचित कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए राज्यपाल की किसी विशेष जिम्मेदारी के लिए प्रावधान कर सकता है।
(2) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति बंबई राज्य के संबंध में आदेश द्वारा राज्यपाल के लिए निम्नलिखित में से किसी विशेष उत्तरदायित्व का प्रावधान कर सकता है:
(क) विदर्भ, मराठवाड़ा, शेष महाराष्ट्र, सौराष्ट्र, कच्छ और शेष गुजरात के लिए अलग-अलग विकास बोर्डों की स्थापना, इस प्रावधान के साथ कि इन बोर्डों में से प्रत्येक के कामकाज पर एक रिपोर्ट प्रत्येक वर्ष राज्य विधान सभा के समक्ष रखी जाएगी;
(ख) उक्त क्षेत्रों में विकासात्मक व्यय के लिए निधियों का न्यायसंगत आवंटन, राज्य की समग्र आवश्यकताओं के अधीन; और
(ग) उक्त सभी क्षेत्रों के संबंध में, राज्य की समग्र आवश्यकताओं के अधीन रहते हुए, तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त सुविधाएं और राज्य सरकार के नियंत्रण में सेवाओं में रोजगार के पर्याप्त अवसर प्रदान करने वाली एक न्यायसंगत व्यवस्था।
नए अनुच्छेद 372-A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 372 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
372-ए. राष्ट्रपति को कानून बनाने की शक्ति।
(1) संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के प्रारंभ होने से ठीक पहले भारत में या उसके किसी भाग में लागू किसी कानून के प्रावधानों को उस अधिनियम द्वारा संशोधित इस संविधान के प्रावधानों के अनुरूप लाने के प्रयोजन से, राष्ट्रपति, 1 नवंबर, 1957 से पूर्व आदेश द्वारा, निरसन या संशोधन के माध्यम से, कानून में ऐसे अनुकूलन और संशोधन कर सकते हैं, जो आवश्यक या उपयुक्त हों, और यह प्रावधान कर सकते हैं कि कानून, आदेश में निर्दिष्ट तिथि से, किए गए अनुकूलन और संशोधनों के अधीन प्रभावी होगा, और ऐसे किसी अनुकूलन या संशोधन पर किसी भी न्यायालय में प्रश्न नहीं उठाया जाएगा।
(2) खंड (1) में कोई बात सक्षम विधानमंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी को राष्ट्रपति द्वारा उक्त खंड के अधीन अनुकूलित या संशोधित किसी भी कानून को निरस्त करने या उसमें संशोधन करने से नहीं रोकेगी।
नए अनुच्छेद 378-A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 378 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
378-ए. आंध्र प्रदेश विधान सभा की अवधि के संबंध में विशेष प्रावधान।-अनुच्छेद 172 में किसी बात के होते हुए भी, राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 28 और 29 के प्रावधानों के तहत गठित आंध्र प्रदेश राज्य की विधान सभा, जब तक कि उसे पहले भंग न कर दिया जाए, उक्त धारा 29 में निर्दिष्ट तिथि से पांच वर्ष की अवधि तक बनी रहेगी और इससे अधिक नहीं, और उक्त अवधि की समाप्ति उस विधान सभा के विघटन के रूप में प्रभावी होगी।
दूसरी अनुसूची का संशोधन
संविधान की दूसरी अनुसूची में,-
(क) भाग घ के शीर्षक में, "प्रथम अनुसूची के भाग क में स्थित राज्यों में" शब्द और अक्षर हटा दिए जाएंगे;
(ख) अनुच्छेद 9 के उप-अनुच्छेद (1) में, "उस पेंशन की राशि से कम किया जाएगा" शब्दों के स्थान पर निम्नलिखित शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्:-
"कम किया जाएगा-"
(क) उस पेंशन की राशि से, और
(ख) यदि उसने ऐसी नियुक्ति से पहले, ऐसी पूर्व सेवा के संबंध में उसे देय पेंशन के एक भाग के बदले में उस पेंशन के उस भाग की राशि से उसका परिवर्तित मूल्य प्राप्त किया हो, और
(ग) यदि उसने ऐसी नियुक्ति से पहले ऐसी पूर्व सेवा के संबंध में सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी प्राप्त की है, तो उस ग्रेच्युटी के समतुल्य पेंशन द्वारा।
(सी) अनुच्छेद 10 में-
(i) उप-अनुच्छेद (1) के स्थान पर निम्नलिखित उप-अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
"(1) उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को वास्तविक सेवा में व्यतीत समय के लिए निम्नलिखित दरों पर प्रति माह वेतन का भुगतान किया जाएगा, अर्थात्-
मुख्य न्यायाधीश...................... 4,000 रुपये
कोई अन्य न्यायाधीश.....……............ 3,500 रुपये:
बशर्ते कि यदि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उनकी नियुक्ति के समय भारत सरकार या उसकी पूर्ववर्ती सरकारों या किसी राज्य सरकार या उसकी पूर्ववर्ती सरकारों के अधीन किसी पूर्व सेवा के संबंध में पेंशन (विकलांगता या चोट पेंशन को छोड़कर) प्राप्त हो रही हो, तो उच्च न्यायालय में सेवा के संबंध में उनका वेतन कम कर दिया जाएगा।
(क) उस पेंशन की राशि से, और
(ख) यदि उसने ऐसी नियुक्ति से पहले, ऐसी पूर्व सेवा के संबंध में उसे देय पेंशन के एक भाग के बदले में उस पेंशन के उस भाग की राशि से उसका परिवर्तित मूल्य प्राप्त किया हो, और
(ग) यदि उसने ऐसी नियुक्ति से पहले ऐसी पूर्व सेवा के संबंध में सेवानिवृत्ति ग्रेच्युटी प्राप्त की हो, तो उस ग्रेच्युटी के समतुल्य पेंशन द्वारा।; और (ii) उप-अनुच्छेद (3) और (4) के स्थान पर निम्नलिखित उप-अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
"(3) कोई भी व्यक्ति जो संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के प्रारंभ होने से ठीक पहले प्रथम अनुसूची के भाग ख में निर्दिष्ट राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर था और ऐसे प्रारंभ होने पर उक्त अधिनियम द्वारा संशोधित उक्त अनुसूची में निर्दिष्ट राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बन गया है, यदि वह ऐसे प्रारंभ होने से ठीक पहले अपने वेतन के अतिरिक्त कोई भत्ता प्राप्त कर रहा था, तो ऐसे मुख्य न्यायाधीश के रूप में वास्तविक सेवा में व्यतीत समय के लिए इस अनुच्छेद के उप-पैरा (1) में निर्दिष्ट वेतन के अतिरिक्त समान भत्ता प्राप्त करने का हकदार होगा।"
26. संपत्ति अधिग्रहण एवं अधिग्रहण संबंधी सूचियों में प्रविष्टियों का संशोधन।- संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची की प्रविष्टि 33 और राज्य सूची की प्रविष्टि 36 को हटा दिया जाएगा तथा समवर्ती सूची की प्रविष्टि 42 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-
42. संपत्ति का अधिग्रहण और मांग।
प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारकों आदि से संबंधित कुछ उपबंधों का संशोधन
संविधान के निम्नलिखित प्रत्येक प्रावधान में, अर्थात्:-
(i) संघ सूची की प्रविष्टि 67,
(ii) राज्य सूची की प्रविष्टि 12,
(iii) समवर्ती सूची की प्रविष्टि 40, और
(iv) अनुच्छेद 49,
"संसद द्वारा विधि द्वारा घोषित" शब्दों के स्थान पर "संसद द्वारा निर्मित विधि द्वारा या उसके अधीन घोषित" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
राज्य सूची की प्रविष्टि 24 का संशोधन
संविधान की सातवीं अनुसूची में, राज्य सूची की प्रविष्टि 24 में, शब्द और अंक "प्रविष्टि 52" के स्थान पर, शब्द और अंक "प्रविष्टियाँ 7 और 52" प्रतिस्थापित किए जाएँगे।
आनुषंगिक और गौण संशोधन तथा निरसन और व्यावृत्तियाँ
(1) अनुसूची में निर्देशित परिणामी और छोटे संशोधन और निरसन संविधान में और संविधान के अनुच्छेद 392 के तहत बनाए गए संविधान (कठिनाइयों को दूर करने) आदेश संख्या VIII में किए जाएंगे।
(2) उक्त अनुसूची द्वारा संविधान के अनुच्छेद 243 के निरसन के बावजूद, राष्ट्रपति द्वारा उस अनुच्छेद के अधीन बनाए गए और इस अधिनियम के प्रारंभ होने से ठीक पहले लागू सभी विनियम तब तक लागू रहेंगे जब तक कि किसी सक्षम विधानमंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनमें परिवर्तन, निरसन या संशोधन न कर दिया जाए।
अनुसूची
(धारा 29 देखें)
संविधान में परिणामी और गौण संशोधन और निरसन
अनुच्छेद 3.- परंतुक में, "प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में निर्दिष्ट" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 16.- खंड (3) में, "प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट किसी राज्य या उसके क्षेत्र के भीतर किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण के अधीन उस राज्य के भीतर निवास संबंधी कोई आवश्यकता" के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा-
किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश की सरकार या उसके भीतर किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण के अधीन, उस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के भीतर निवास संबंधी कोई आवश्यकता।
अनुच्छेद 31-ए.-खंड (2) के उपखंड (क) में, "त्रावणकोर-कोचीन" के स्थान पर "केरल" प्रतिस्थापित किया जाएगा।
अनुच्छेद 58.- स्पष्टीकरण में, "या राजप्रमुख या उपराजप्रमुख" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 66.- स्पष्टीकरण में, "या राजप्रमुख या उपराजप्रमुख" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 72.- खंड (3) में, "या राजप्रमुख" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 73.- खंड (1) के परंतुक में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 101.- खंड (2) में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट" को हटा दें, और "ऐसे राज्य" के स्थान पर "एक राज्य" प्रतिस्थापित करें।
अनुच्छेद 112.- खंड (3) के उपखंड (घ)(iii) में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ में निर्दिष्ट राज्य के अनुरूप प्रांत" के स्थान पर "भारत डोमिनियन का राज्यपाल प्रांत" प्रतिस्थापित किया जाएगा।
अनुच्छेद 143.- खंड (2) में, "खंड (i) का" को हटा दें और "उक्त खंड" के स्थान पर "उक्त परंतुक" प्रतिस्थापित करें।
अनुच्छेद 151.- खंड (2) में, "या राजप्रमुख" शब्द को हटा दें।
भाग VI – .-शीर्षक में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ में" वाक्यांश को हटा दें।
अनुच्छेद 152.- "प्रथम अनुसूची के भाग अ में निर्दिष्ट राज्य" के स्थान पर "जम्मू और कश्मीर राज्य शामिल नहीं है" प्रतिस्थापित करें।
अनुच्छेद 214- "(1)" और खंड (2) और (3) को हटा दें। अनुच्छेद 217- खंड (2) के उपखंड (ख) में, "प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट किसी राज्य में" को हटा दें।
अनुच्छेद 219.- "राज्य में" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 229.- खंड (1) के परंतुक में तथा खंड (2) के परंतुक में, "जिसमें उच्च न्यायालय का प्रधान पीठ है" शब्द को हटा दें।
भाग VII को छोड़ दें।
अनुच्छेद 241.-
(क) खंड (1) में, "प्रथम अनुसूची के भाग सी में निर्दिष्ट राज्य" के स्थान पर "केंद्र शासित प्रदेश" प्रतिस्थापित किया जाएगा, और "ऐसे राज्य" के स्थान पर "ऐसे क्षेत्र" प्रतिस्थापित किया जाएगा।
(ख) खंड (3) और (4) के स्थान पर प्रतिस्थापित करें-
(3) इस संविधान के प्रावधानों और इस संविधान द्वारा या इसके अधीन उस विधानमंडल को प्रदत्त शक्तियों के आधार पर उपयुक्त विधानमंडल के किसी भी कानून के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के प्रारंभ होने से ठीक पहले किसी केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने वाला प्रत्येक उच्च न्यायालय, ऐसे प्रारंभ होने के बाद भी उस क्षेत्राधिकार का प्रयोग करता रहेगा।
(4) इस अनुच्छेद में कोई बात संसद की उस शक्ति को कम नहीं करती है जिसके तहत वह किसी राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को किसी केंद्र शासित प्रदेश या उसके किसी भाग तक विस्तारित या समाप्त कर सकती है।
अनुच्छेद 242 को हटा दें।
भाग IX को छोड़ दें।
अनुच्छेद 244.- "प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में निर्दिष्ट" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 246.- खंड (2) और (3) में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट" को हटा दें तथा खंड (4) में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में" के स्थान पर "किसी राज्य में" प्रतिस्थापित करें।
अनुच्छेद 254.- खंड (2) में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 255.- "प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में निर्दिष्ट" को हटा दें। अनुच्छेद 259 को हटा दें।
अनुच्छेद 264.-अनुच्छेद 264 के स्थान पर प्रतिस्थापित करें-
264. व्याख्या.-इस भाग में, 'वित्त आयोग' से तात्पर्य अनुच्छेद 280 के अधीन गठित वित्त आयोग से है।
अनुच्छेद 267.- खंड (2) में, "या राजप्रमुख" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 268.- खंड (1) में, "प्रथम अनुसूची के भाग सी में निर्दिष्ट राज्य" के स्थान पर "केंद्र शासित प्रदेश" प्रतिस्थापित किया जाएगा।
अनुच्छेद 269.- खंड (2) में, "प्रथम अनुसूची के भाग सी में निर्दिष्ट राज्य" के स्थान पर "केंद्र शासित प्रदेश" प्रतिस्थापित करें।
अनुच्छेद 270.- खंड (2) और (3) में, "प्रथम अनुसूची के भाग सी में निर्दिष्ट राज्य" के स्थान पर "केंद्र शासित प्रदेश" प्रतिस्थापित किया जाएगा।
अनुच्छेद 278 को हटा दें।
अनुच्छेद 280.-खंड (3) में, उपखंड (सी) को हटा दें और उपखंड (डी) को उपखंड (सी) के रूप में पुनः अंकित करें।
अनुच्छेद 283.- खंड (2) में, "या राजप्रमुख" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 291- "(1)" और खंड (2) को हटा दें।
अनुच्छेद 299.- खंड (1) में से "या राजप्रमुख" को हटा दें, और खंड (2) में से "न ही राजप्रमुख" को हटा दें।
अनुच्छेद 304.- खंड (क) में "अन्य राज्यों" के स्थान पर "या केंद्र शासित प्रदेश" प्रतिस्थापित करें।
अनुच्छेद 306 को हटा दें।
अनुच्छेद 308.- "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट राज्य" के स्थान पर "जम्मू और कश्मीर राज्य शामिल नहीं है" प्रतिस्थापित करें।
अनुच्छेद 309.- "या राजप्रमुख" का लोप करें।
अनुच्छेद 310.- खंड (1) में "या, जैसा भी मामला हो, राजप्रमुख" को हटा दें, और खंड (2) में "या राजप्रमुख" और "या राजप्रमुख" को हटा दें।
अनुच्छेद 311.- खंड (2) में से "या राजप्रमुख" शब्द हटा दें। अनुच्छेद 315.- खंड (4) में से "या राजप्रमुख" शब्द हटा दें।
अनुच्छेद 316.- खंड (1) और (2) में से "या राजप्रमुख" शब्द हटा दें। अनुच्छेद 317.- खंड (2) में से "या राजप्रमुख" शब्द हटा दें।
अनुच्छेद 318.- "या राजप्रमुख" का लोप करें।
अनुच्छेद 320.- खंड (3) में, "या राजप्रमुख" और "या राजप्रमुख, जैसा भी मामला हो" को हटा दें, और खंड (5) में, "या राजप्रमुख" को हटा दें।
अनुच्छेद 323.- खंड (2) में, "या राजप्रमुख" और "या राजप्रमुख, जैसा भी मामला हो" को हटा दें।
अनुच्छेद 324.- खंड (6) में, "या राजप्रमुख" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 330.-खंड (2) में, जहाँ कहीं भी "राज्य" आता है, उसके बाद "या केंद्र शासित प्रदेश" डालें।
अनुच्छेद 332.- खंड (1) में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 333.- "या राजप्रमुख" शब्द को हटा दें। अनुच्छेद 337.- "प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में निर्दिष्ट" शब्द को हटा दें।
अनुच्छेद 339.- खंड (1) में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ और भाग ब में निर्दिष्ट" को हटा दें तथा खंड (2) में, "ऐसे किसी राज्य" के स्थान पर "एक राज्य" प्रतिस्थापित करें।
अनुच्छेद 341.- खंड (1) में, "किसी राज्य" के स्थान पर "या केंद्र शासित प्रदेश" डालें, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट" को हटा दें, "या राजप्रमुख" को हटा दें और "उस राज्य" के स्थान पर "या केंद्र शासित प्रदेश, जैसा भी मामला हो" डालें।
अनुच्छेद 342.- खंड (1) में, "किसी राज्य" के स्थान पर "या केंद्र शासित प्रदेश" डालें, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट" को हटा दें, "या राजप्रमुख" को हटा दें और "उस राज्य" के स्थान पर "या केंद्र शासित प्रदेश, जैसा भी मामला हो" डालें।
अनुच्छेद 348.- "या राजप्रमुख" का लोप करें।
अनुच्छेद 356.- खंड (1) में, "या राजप्रमुख" और "या राजप्रमुख, जैसा भी मामला हो" को हटा दें।
अनुच्छेद 361.- खंड (2), (3) और (4) में से "या राजप्रमुख" को हटा दें तथा खंड (4) में से "या राजप्रमुख" को हटा दें। अनुच्छेद 362.- खंड (1) को हटा दें।
अनुच्छेद 366.- खंड (21) को हटाकर खंड (30) के स्थान पर प्रतिस्थापित किया जाए- "(30) 'केंद्र शासित प्रदेश' से तात्पर्य प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट केंद्र शासित प्रदेश से है तथा इसमें भारत के भूभाग के अंतर्गत आने वाला कोई अन्य भूभाग भी शामिल है, जो उस अनुसूची में निर्दिष्ट नहीं है।"
अनुच्छेद 367.- खंड (2) में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ या भाग ब में निर्दिष्ट" और "या राजप्रमुख" को हटा दें।
अनुच्छेद 368.-प्रथम अनुसूची के भाग क और ख में निर्दिष्ट वाक्यांश को हटा दें।
अनुच्छेद 378 से 391 तक, दोनों सहित, हटा दें।
दूसरी अनुसूची.-
(क) भाग अ के शीर्षक में और अनुच्छेद 1 में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ में निर्दिष्ट" शब्द को हटा दिया जाए;
(ख) अनुच्छेद 2 में, "इस प्रकार निर्दिष्ट" शब्द को हटा दें;
(ग) अनुच्छेद 3 में, "ऐसे राज्यों" के स्थान पर "राज्यों" प्रतिस्थापित किया जाएगा;
(घ) भाग ख को हटा दिया जाए;
(ई) भाग सी के शीर्षक में, प्रथम अनुसूची के भाग अ में उल्लिखित "किसी राज्य का" शब्द को हटाकर, "किसी ऐसे राज्य" के स्थान पर "एक राज्य" शब्द प्रतिस्थापित किया जाए; और
(f) अनुच्छेद 8 में, "प्रथम अनुसूची के भाग अ में निर्दिष्ट राज्य का" शब्द को हटा दें, और "ऐसे राज्य" के स्थान पर "एक राज्य" प्रतिस्थापित करें।
पांचवीं अनुसूची.-
(क) अनुच्छेद 1 में से "प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में निर्दिष्ट राज्य से तात्पर्य है, परन्तु" वाक्यांश को हटा दें;
(बी) पैराग्राफ 3 में, "या राजप्रमुख" को छोड़ दें;
(ग) अनुच्छेद 4 में, उप-अनुच्छेद (2) में "या राजप्रमुख, जैसा भी मामला हो" को हटा दें तथा उप-अनुच्छेद (3) में "या राजप्रमुख" को हटा दें;
(घ) अनुच्छेद 5 में, उप-अनुच्छेद (1) और (2) में, "या राजप्रमुख, जैसा भी मामला हो" को हटा दें, उप-अनुच्छेद (3) में, "या राजप्रमुख" को हटा दें और उप-अनुच्छेद (5) में, "या राजप्रमुख" को हटा दें।
छठी अनुसूची.- अनुच्छेद 18 में, उप-अनुच्छेद (2) में, "भाग IX" के स्थान पर "अनुच्छेद 240" प्रतिस्थापित करें, और "प्रथम अनुसूची के भाग D में निर्दिष्ट क्षेत्र" के स्थान पर "उस अनुच्छेद में निर्दिष्ट केंद्र शासित प्रदेश" प्रतिस्थापित करें।
सातवीं अनुसूची.- सूची प्रथम में,-
(क) प्रविष्टि 32 में से “प्रथम अनुसूची के भाग क या भाग ख में निर्दिष्ट” शब्द को हटा दें; और
(ख) प्रविष्टि 79 के स्थान पर प्रतिस्थापित करें,-
"79. किसी केंद्र शासित प्रदेश में उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विस्तार और किसी केंद्र शासित प्रदेश से उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का अपवर्जन।"
संविधान में परिणामी संशोधन (कठिनाइयों का निवारण) आदेश संख्या VIII
संविधान (कठिनाइयों को दूर करने) आदेश संख्या VIII में, अनुच्छेद 2 के उप-अनुच्छेद (1), (2) और (3) के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा-
"(1) अनुच्छेद 81 में,-
(क) खंड (1) के उपखंड (ख) में, "केंद्र शासित प्रदेशों" शब्दों के स्थान पर, "और छठी अनुसूची के अनुच्छेद 20 से संलग्न सारणी के भाग ख में निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्र" शब्द, अक्षर और अंक, सम्मिलित किए जाएंगे; और
(ख) खंड (2) में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
बशर्ते कि असम राज्य को जिन निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, उनमें छठी अनुसूची के अनुच्छेद 20 से संलग्न तालिका के भाग बी में निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्र शामिल नहीं होंगे।
(2) अनुच्छेद 170 के खंड (2) में, "राज्य भर में" शब्दों के बाद, निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
बशर्ते कि असम राज्य को जिन निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, उनमें छठी अनुसूची के अनुच्छेद 20 से संलग्न तालिका के भाग बी में निर्दिष्ट जनजातीय क्षेत्र शामिल नहीं होंगे।
