संविधान (76वाँ संशोधन) अधिनियम, 1994
अवलोकन
कार्यक्रम प्रभावित हुए
- नौवीं अनुसूची
तमिलनाडु में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शैक्षणिक संस्थानों में सीटों के आरक्षण और सार्वजनिक सेवाओं में पदों की नियुक्तियों के आरक्षण की नीति का एक लंबा इतिहास रहा है, जो वर्ष 1921 से चला आ रहा है।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (पचासीवाँ संशोधन) विधेयक, 1994 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (छियासीवाँ संशोधन) अधिनियम, 1994 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
तमिलनाडु में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए शैक्षणिक संस्थानों में सीटों के आरक्षण और सार्वजनिक सेवाओं में पदों के आरक्षण की नीति का लंबा इतिहास रहा है, जो 1921 से लागू है। राज्य सरकार ने समय-समय पर जनता की जरूरतों के अनुरूप आरक्षण का दायरा बढ़ाया है और अब यह 69 प्रतिशत तक पहुंच गया है (18 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 1 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 50 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग)।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (AIR 1993 SC 477) मामले में 16 नवंबर, 1992 को अपना फैसला सुनाया, जिसमें यह माना गया कि अनुच्छेद 16(4) के तहत कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
3. शैक्षणिक वर्ष 1993-94 के लिए शिक्षण संस्थानों में प्रवेश का मुद्दा मद्रास उच्च न्यायालय के समक्ष एक रिट याचिका के माध्यम से उठा। मद्रास उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि तमिलनाडु सरकार उस शैक्षणिक वर्ष के दौरान अपनी पूर्वव्यापी आरक्षण नीति को जारी रख सकती है और शैक्षणिक वर्ष 1994-95 के दौरान आरक्षण की मात्रा को घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया जाना चाहिए। तमिलनाडु सरकार ने मद्रास उच्च न्यायालय के विरुद्ध एक विशेष अनुमति याचिका दायर की ताकि राज्य सरकार की वर्तमान आरक्षण नीति को पुनः स्थापित किया जा सके और पिछड़े वर्गों की उन्नति सुनिश्चित की जा सके। हालांकि, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए दोहराया कि शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के मामले में आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए।
4. तमिलनाडु विधानसभा के 9 नवंबर, 1993 को आयोजित विशेष सत्र में सर्वसम्मति से यह संकल्प लिया गया कि केंद्र सरकार से तत्काल भारत के संविधान में उपयुक्त संशोधन करने का आग्रह किया जाए, ताकि तमिलनाडु सरकार सरकारी सेवाओं और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए वर्तमान में लागू 69 प्रतिशत आरक्षण की नीति को जारी रख सके। 26 नवंबर, 1993 को तमिलनाडु में एक सर्वदलीय बैठक भी आयोजित की गई थी, जिसमें पिछड़े वर्गों के कल्याण और उन्नति के लिए 69 प्रतिशत आरक्षण के निरंतर कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने में किसी भी प्रकार की संशय या देरी न करने का आग्रह किया गया था।
5. तमिलनाडु सरकार ने तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (राज्य के अधीन सेवाओं में शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) विधेयक, 1993 नामक एक कानून बनाया और इसे संविधान के अनुच्छेद 31-सी के अनुसार भारत के राष्ट्रपति के विचारार्थ भारत सरकार को भेज दिया।
6. मामले की महत्ता और संवेदनशीलता को देखते हुए, केंद्रीय गृह मंत्री ने 13 जुलाई, 1994 को राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ विधेयक के प्रावधानों पर चर्चा करने के लिए बैठकें कीं। नेताओं के बीच आम सहमति यह थी कि विधेयक को मंजूरी दे दी जानी चाहिए। तदनुसार, राष्ट्रपति ने 19 जुलाई, 1994 को विधेयक को अपनी सहमति दे दी।
7. तदनुसार, तमिलनाडु सरकार ने तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (राज्य के अधीन सेवाओं में शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 1993 को अधिनियम संख्या 45, 1994 के रूप में 19 जुलाई, 1994 को अधिसूचित किया।
8. तमिलनाडु सरकार ने 22 जुलाई, 1994 को भारत सरकार से अनुरोध किया कि उपर्युक्त तमिलनाडु अधिनियम 45, 1994 को भारत के संविधान की नौवीं अनुसूची में निम्नलिखित कारणों से शामिल किया जाए:- "उक्त अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 31सी के अंतर्गत आता है, क्योंकि यह अनुच्छेद 39 के खंड (ख) और (ग) तथा संविधान के अनुच्छेद 38 और 46 के दायरे में आता है - अधिनियम की धारा 2 के अनुसार। यह अधिनियम संविधान के भाग IV में निहित राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों, विशेष रूप से अनुच्छेद 38, 39 (ख) और (ग) तथा 46 पर आधारित है। चूंकि यह अधिनियम अनुच्छेद 39 (ख) और (ग) में निहित राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए है, इसलिए उक्त अधिनियम को संविधान के अनुच्छेद 31सी का संरक्षण प्राप्त होगा और अतः इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के अंतर्गत चुनौती नहीं दी जा सकती, जिनके संदर्भ में अनुच्छेद 14 के तहत 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण को सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया है। अब भारत सरकार से इस अधिनियम को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने का अनुरोध करने का निर्णय लिया गया है, ताकि इस कानून को संविधान के भाग III में निहित किसी भी मौलिक अधिकार, जिसमें अनुच्छेद 15 और 16 शामिल हैं, के उल्लंघन के रूप में चुनौती न दी जा सके और इसे संविधान के अनुच्छेद 31B के तहत संरक्षण प्राप्त हो सके।
9. भारत सरकार ने राष्ट्रपति की स्वीकृति देकर तमिलनाडु विधेयक को राज्य विधानमंडल के प्रावधान का समर्थन किया है। इस निर्णय के फलस्वरूप, अब यह आवश्यक है कि तमिलनाडु अधिनियम 45, 1994 को संविधान की नौवीं अनुसूची के अंतर्गत लाया जाए ताकि न्यायिक समीक्षा के संबंध में इसे संविधान के अनुच्छेद 31B के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त हो सके।
10. यह विधेयक उपर्युक्त उद्देश्य की प्राप्ति का प्रयास करता है। भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। भारत गणराज्य के पैंतालीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप से अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (छिहत्तरवाँ संशोधन) अधिनियम, 1994 कहा जा सकता है।
नौवीं अनुसूची का संशोधन
संविधान की नौवीं अनुसूची में, प्रविष्टि 257 के बाद और व्याख्या से पहले, निम्नलिखित प्रविष्टि जोड़ी जाएगी, अर्थात्:-
257ए. तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (राज्य के अधीन सेवाओं में शैक्षणिक संस्थानों में सीटों और नियुक्तियों या पदों के आरक्षण) अधिनियम, 1993 (तमिलनाडु अधिनियम 45 ऑफ 1994)।"
