संविधान (52वाँ संशोधन) अधिनियम, 1985
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 101
- 102
- 190
- 191
कार्यक्रम प्रभावित हुए
- दसवीं अनुसूची
राजनीतिक दल-बदल की बुराई राष्ट्रीय चिंता का विषय रही है। यदि इसका मुकाबला नहीं किया गया, तो यह हमारे लोकतंत्र की नींव और इसे कायम रखने वाले सिद्धांतों को ही कमजोर कर सकती है।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (बावनवाँ संशोधन) विधेयक, 1985 (विधेयक संख्या 22, 1985) के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1985 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
दलबदल की बुराई राष्ट्रीय चिंता का विषय रही है। यदि इसका मुकाबला नहीं किया गया, तो यह हमारे लोकतंत्र की नींव और इसे कायम रखने वाले सिद्धांतों को ही कमजोर कर सकती है। इसी उद्देश्य से राष्ट्रपति ने संसद में अपने संबोधन में आश्वासन दिया था कि सरकार संसद के वर्तमान सत्र में दलबदल रोधी विधेयक पेश करने का इरादा रखती है। यह विधेयक दलबदल को गैरकानूनी घोषित करने और उपरोक्त आश्वासन को पूरा करने के लिए है।
2. इस विधेयक में संविधान में संशोधन का प्रस्ताव है ताकि यह प्रावधान किया जा सके कि संसद या राज्य विधानमंडल का कोई निर्वाचित सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल द्वारा उम्मीदवार के रूप में चुना गया हो, और संसद या राज्य विधानमंडल का कोई मनोनीत सदस्य, जो पद ग्रहण करते समय किसी राजनीतिक दल का सदस्य हो या पद ग्रहण करने के छह महीने के भीतर किसी राजनीतिक दल का सदस्य बन जाता हो, दल-बदल के आधार पर अयोग्य घोषित किया जाएगा यदि वह स्वेच्छा से ऐसे राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग देता है या ऐसे सदन में ऐसे दल के किसी निर्देश के विपरीत मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है या ऐसे दल से निष्कासित कर दिया जाता है। संसद या राज्य विधानमंडल का कोई स्वतंत्र सदस्य भी अयोग्य घोषित किया जाएगा यदि वह अपने चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है। संसद या राज्य विधानमंडल का मनोनीत सदस्य, जो नामांकन के समय किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं है और जिसने पद ग्रहण करने की तिथि से छह महीने की अवधि समाप्त होने से पहले किसी राजनीतिक दल का सदस्य नहीं बना है, यदि वह उक्त छह महीने की अवधि समाप्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्य घोषित हो जाएगा। विधेयक में राजनीतिक दलों के विभाजन और विलय के संबंध में भी उपयुक्त प्रावधान किए गए हैं। विधेयक में एक विशेष प्रावधान शामिल किया गया है ताकि सदन के पीठासीन अधिकारी के रूप में निर्वाचित व्यक्ति अपने राजनीतिक दल से संबंध तोड़ सके। संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य के प्रस्तावित अयोग्यता के दायरे में आने के संबंध में प्रश्न का निर्धारण सदन के पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाएगा; यदि प्रश्न स्वयं पीठासीन अधिकारी से संबंधित है, तो इसका निर्णय सदन द्वारा उस संबंध में निर्वाचित सदन के सदस्य द्वारा किया जाएगा।
3. यह विधेयक उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास करता है। भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। भारत गणराज्य के छत्तीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप से अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
(1) इस अधिनियम को संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1985 कहा जा सकता है।
(2) यह ऐसी तिथि_671 से लागू होगा, जिसे केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त करे।
अनुच्छेद 101 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 101 में, खंड (3) के उपखंड (क) में, शब्द, कोष्ठक और अंक "अनुच्छेद 102 का खंड (1)" के स्थान पर शब्द, कोष्ठक और अंक "अनुच्छेद 102 का खंड (1) या खंड (2)" प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 102 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 102 में,-
(क) कोष्ठक, अंक और शब्द "(2) इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए", के स्थान पर "स्पष्टीकरण.-इस खंड के प्रयोजनों के लिए" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ख) अंत में निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(2) कोई व्यक्ति संसद के किसी भी सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य होगा यदि वह दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किया गया हो।
अनुच्छेद 190 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 190 में, खंड (3) के उपखंड (क) में, शब्द, कोष्ठक और अंक "अनुच्छेद 191 का खंड (1)" के स्थान पर शब्द, कोष्ठक और अंक "अनुच्छेद 191 का खंड (1) या खंड (2)" प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 191 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 191 में,-
(क) कोष्ठक, अंक और शब्द "(2) इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए", के स्थान पर "स्पष्टीकरण.- इस खंड के प्रयोजनों के लिए" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ख) अंत में निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(2) कोई व्यक्ति किसी राज्य की विधान सभा या विधान परिषद का सदस्य होने के लिए अयोग्य होगा यदि वह दसवीं अनुसूची के अधीन अयोग्य घोषित किया गया हो।
दसवीं अनुसूची का जोड़ा जाना
संविधान की नौवीं अनुसूची के बाद निम्नलिखित अनुसूची जोड़ी जाएगी, अर्थात्:--
दसवीं अनुसूची
[अनुच्छेद 102(2) और 191(2)]
दलबदल के आधार पर अयोग्यता संबंधी प्रावधान
1. व्याख्या .-इस अनुसूची में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) "सदन" से तात्पर्य संसद के सदन या विधान सभा या, जैसा भी मामला हो, किसी राज्य के विधानमंडल के सदन से है;
(ख) अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 या, जैसा भी मामला हो, अनुच्छेद 4 के प्रावधानों के अनुसार किसी राजनीतिक दल से संबंधित सदन के सदस्य के संबंध में "विधानमंडल दल" से तात्पर्य उक्त प्रावधानों के अनुसार उस राजनीतिक दल से संबंधित सदन के सभी सदस्यों के समूह से है;
(ग) सदन के किसी सदस्य के संबंध में "मूल राजनीतिक दल" से तात्पर्य उस राजनीतिक दल से है जिससे वह अनुच्छेद 2 के उप-अनुच्छेद (1) के प्रयोजनों के लिए संबंधित है;
(घ) "अनुच्छेद" से तात्पर्य इस अनुसूची के अनुच्छेद से है।
2. दलबदल के आधार पर अयोग्यता।
(1) अनुच्छेद 3, 4 और 5 के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, किसी भी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का सदस्य सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य होगा-
(क) यदि उसने स्वेच्छा से ऐसे राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग दी हो; या
(ख) यदि वह अपने संबंधित राजनीतिक दल या उसके द्वारा इस संबंध में अधिकृत किसी व्यक्ति या प्राधिकरण द्वारा जारी किसी निर्देश के विपरीत सदन में मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, और दोनों ही मामलों में ऐसे राजनीतिक दल, व्यक्ति या प्राधिकरण की पूर्व अनुमति प्राप्त नहीं करता है, और ऐसे मतदान या अनुपस्थिति को ऐसे मतदान या अनुपस्थिति की तिथि से पंद्रह दिनों के भीतर ऐसे राजनीतिक दल, व्यक्ति या प्राधिकरण द्वारा क्षमा नहीं किया गया है।
स्पष्टीकरण.-इस उप-अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए,-
(क) सदन के निर्वाचित सदस्य को उस राजनीतिक दल का सदस्य माना जाएगा, यदि कोई हो, जिसके द्वारा उसे सदन के सदस्य के रूप में चुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया गया था;
(ख) सदन का मनोनीत सदस्य-
(i) यदि वह किसी राजनीतिक दल का सदस्य है और नामांकन की तिथि पर उस दल का सदस्य है, तो उसे उस राजनीतिक दल का सदस्य माना जाएगा;
(ii) किसी अन्य मामले में, उसे उस राजनीतिक दल का सदस्य माना जाएगा जिसका वह सदस्य बनता है, या, जैसा भी मामला हो, अनुच्छेद 99 या, जैसा भी मामला हो, अनुच्छेद 188 की आवश्यकताओं का अनुपालन करने के बाद अपनी सीट ग्रहण करने की तारीख से छह महीने की समाप्ति से पहले पहली बार सदस्य बनता है।
(2) सदन का कोई निर्वाचित सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल द्वारा उम्मीदवार के रूप में चुने जाने के अलावा किसी अन्य तरीके से निर्वाचित हुआ हो, सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य हो जाएगा यदि वह ऐसे चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
(3) सदन का मनोनीत सदस्य सदन का सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा यदि वह अनुच्छेद 99 या, जैसा भी मामला हो, अनुच्छेद 188 की आवश्यकताओं का अनुपालन करने के बाद अपनी सीट ग्रहण करने की तिथि से छह महीने की समाप्ति के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
(4) इस अनुच्छेद के पूर्वगामी प्रावधानों में किसी बात के होते हुए भी, वह व्यक्ति जो संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1985 के प्रारंभ होने पर किसी सदन का सदस्य है (चाहे निर्वाचित हो या मनोनीत), वह निम्नलिखित कार्य करेगा:-
(i) यदि वह ऐसे प्रारंभ होने से ठीक पहले किसी राजनीतिक दल का सदस्य था, तो इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (1) के प्रयोजनों के लिए, उसे ऐसे राजनीतिक दल द्वारा स्थापित उम्मीदवार के रूप में ऐसे सदन के सदस्य के रूप में निर्वाचित माना जाएगा;
(ii) किसी अन्य मामले में, सदन का निर्वाचित सदस्य माना जाएगा, जो इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (2) के प्रयोजनों के लिए किसी राजनीतिक दल द्वारा उम्मीदवार के रूप में चुने जाने के अलावा किसी अन्य रूप में निर्वाचित हुआ हो, या, जैसा भी मामला हो, इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (3) के प्रयोजनों के लिए सदन का मनोनीत सदस्य माना जाएगा।
3. दल-बदल के आधार पर अयोग्यता विभाजन की स्थिति में लागू नहीं होगी।- यदि किसी सदन का कोई सदस्य यह दावा करता है कि वह और उसके विधायक दल के अन्य सदस्य उस गुट का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उसके मूल राजनीतिक दल में विभाजन के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुआ है, और ऐसे समूह में उस विधायक दल के कम से कम एक-तिहाई सदस्य शामिल हैं,-
(क) वह अनुच्छेद 2 की उपधारा (1) के तहत निम्नलिखित आधार पर अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा-
(i) कि उसने स्वेच्छा से अपने मूल राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग दी है; या
(ii) कि उसने ऐसे सदन में ऐसे दल द्वारा या उसके द्वारा इस संबंध में अधिकृत किसी व्यक्ति या प्राधिकरण द्वारा जारी किसी निर्देश के विपरीत मतदान किया है या मतदान से अनुपस्थित रहा है, ऐसे दल, व्यक्ति या प्राधिकरण की पूर्व अनुमति प्राप्त किए बिना, और ऐसे मतदान या अनुपस्थित रहने को ऐसे दल, व्यक्ति या प्राधिकरण द्वारा ऐसे मतदान या अनुपस्थित रहने की तिथि से पंद्रह दिनों के भीतर क्षमा नहीं किया गया है; और
(ख) ऐसे विभाजन के समय से, ऐसे गुट को अनुच्छेद 2 के उप-अनुच्छेद (1) के प्रयोजनों के लिए वह राजनीतिक दल माना जाएगा जिससे वह संबंधित है और इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए उसका मूल राजनीतिक दल माना जाएगा।
4. दलबदल के आधार पर अयोग्यता विलय की स्थिति में लागू नहीं होगी।
(1) किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 2 के उप-अनुच्छेद (1) के तहत अयोग्य घोषित नहीं किया जाएगा, यदि उसका मूल राजनीतिक दल किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय हो जाता है और वह दावा करता है कि वह और उसके मूल राजनीतिक दल के कोई अन्य सदस्य-
(क) ऐसे किसी अन्य राजनीतिक दल के सदस्य बन गए हों या, जैसा भी मामला हो, ऐसे विलय से गठित किसी नए राजनीतिक दल के सदस्य बन गए हों; या
(ख) विलय को स्वीकार नहीं किया है और एक अलग समूह के रूप में कार्य करने का विकल्प चुना है, और ऐसे विलय के समय से, ऐसा अन्य राजनीतिक दल या नया राजनीतिक दल या समूह, जैसा भी मामला हो, अनुच्छेद 2 के उप-पैराग्राफ (1) के प्रयोजनों के लिए वह राजनीतिक दल माना जाएगा जिससे वह संबंधित है और इस उप-पैराग्राफ के प्रयोजनों के लिए उसका मूल राजनीतिक दल माना जाएगा।
(2) इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (1) के प्रयोजनों के लिए, सदन के किसी सदस्य की मूल राजनीतिक पार्टी का विलय तभी हुआ माना जाएगा, जब संबंधित पार्टी के विधानमंडल सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों ने ऐसे विलय पर सहमति व्यक्त की हो।
5. छूट.- इस अनुसूची में किसी बात के होते हुए भी, लोकसभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष, राज्य परिषद के उपाध्यक्ष, किसी राज्य की विधान परिषद के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष, या किसी राज्य की विधान सभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के पद पर निर्वाचित व्यक्ति इस अनुसूची के अधीन अयोग्य नहीं होगा।
(क) यदि वह किसी पद पर निर्वाचित होने के कारण स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग देता है जिसका वह चुनाव से ठीक पहले सदस्य था और जब तक वह उस पद पर बना रहता है, तब तक उस राजनीतिक दल में पुनः शामिल नहीं होता या किसी अन्य राजनीतिक दल का सदस्य नहीं बनता; या
(ख) यदि वह, ऐसे पद पर निर्वाचित होने के कारण उस राजनीतिक दल की सदस्यता त्याग देता है जिससे वह ऐसे चुनाव से ठीक पहले संबंधित था, और ऐसे पद को छोड़ने के बाद उस राजनीतिक दल में पुनः शामिल हो जाता है।
6. दलबदल के आधार पर अयोग्यता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय।
(1) यदि किसी सदन के किसी सदस्य के इस अनुसूची के अधीन अयोग्यता के अधीन होने का प्रश्न उठता है, तो प्रश्न सदन के अध्यक्ष या, जैसा भी मामला हो, अध्यक्ष के निर्णय के लिए भेजा जाएगा और उनका निर्णय अंतिम होगा: बशर्ते कि यदि प्रश्न यह हो कि सदन का अध्यक्ष या अध्यक्ष ऐसी अयोग्यता के अधीन हो गया है, तो प्रश्न सदन के ऐसे सदस्य के निर्णय के लिए भेजा जाएगा जिसे सदन इस संबंध में निर्वाचित करे और उनका निर्णय अंतिम होगा।
(2) इस अनुसूची के अधीन किसी सदन के सदस्य की अयोग्यता के संबंध में इस अनुच्छेद के उप-पैरा (1) के अंतर्गत सभी कार्यवाही अनुच्छेद 122 के अर्थ में संसद में कार्यवाही या, जैसा भी मामला हो, अनुच्छेद 212 के अर्थ में किसी राज्य के विधानमंडल में कार्यवाही मानी जाएगी।
7. न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र पर प्रतिबंध.- इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, इस अनुसूची के अधीन सदन के किसी सदस्य की अयोग्यता से संबंधित किसी भी मामले में किसी न्यायालय को कोई अधिकार क्षेत्र नहीं होगा।
8. नियम.-
(1) इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (2) के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, सदन का अध्यक्ष या स्पीकर इस अनुसूची के प्रावधानों को प्रभावी करने के लिए नियम बना सकता है, और विशेष रूप से, और पूर्वोक्त की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए प्रावधान कर सकते हैं:
(क) सदन के विभिन्न सदस्यों द्वारा संबद्ध राजनीतिक दलों (यदि कोई हो) के संबंध में रजिस्टर या अन्य अभिलेखों का रखरखाव;
(ख) विधानमंडल दल के नेता द्वारा सदन के किसी सदस्य के संबंध में अनुच्छेद 2 के उप-अनुच्छेद (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रकृति की किसी माफी के संबंध में प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्ट, वह समय जिसके भीतर और वह प्राधिकारी जिसे ऐसी रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी;
(ग) वे रिपोर्टें जो कोई राजनीतिक दल सदन के किसी सदस्य को अपने राजनीतिक दल में शामिल करने के संबंध में प्रस्तुत करेगा तथा सदन का वह अधिकारी जिसे ऐसी रिपोर्टें प्रस्तुत की जाएंगी; और (घ) अनुच्छेद 6 के उप-अनुच्छेद (1) में निर्दिष्ट किसी प्रश्न का निर्णय करने की प्रक्रिया, जिसमें ऐसे प्रश्न का निर्णय करने के उद्देश्य से की जाने वाली किसी भी जांच की प्रक्रिया भी शामिल है।
(2) इस अनुच्छेद के उप-अनुच्छेद (1) के तहत सदन के अध्यक्ष या अध्यक्ष द्वारा बनाए गए नियम, बनाए जाने के बाद यथाशीघ्र सदन के समक्ष कुल तीस दिनों की अवधि के लिए रखे जाएंगे, जो एक सत्र या दो या दो से अधिक लगातार सत्रों में शामिल हो सकती है, और उक्त तीस दिनों की अवधि की समाप्ति पर प्रभावी होंगे, जब तक कि सदन द्वारा उन्हें संशोधनों सहित या बिना संशोधनों के अनुमोदित न कर दिया जाए या अस्वीकृत न कर दिया जाए, और यदि वे इस प्रकार अनुमोदित हो जाते हैं, तो वे अनुमोदन के दिन उसी रूप में या ऐसे संशोधित रूप में, जैसा भी मामला हो, प्रभावी होंगे, और यदि वे इस प्रकार अस्वीकृत हो जाते हैं, तो वे अप्रभावी होंगे।
(3) सदन का अध्यक्ष या स्पीकर, अनुच्छेद 105 या, जैसा भी मामला हो, अनुच्छेद 194 के प्रावधानों और इस संविधान के अधीन उसे प्राप्त किसी अन्य शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यह निर्देश दे सकता है कि इस अनुच्छेद के अंतर्गत बनाए गए नियमों का किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर उल्लंघन करने पर सदन के विशेषाधिकार के उल्लंघन के समान ही कार्रवाई की जाए।
