संविधान (46वाँ संशोधन) अधिनियम, 1982
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 269
- 286
- 366
कार्यक्रम प्रभावित हुए
- सातवीं अनुसूची
भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अनुसरण में अधिनियमित विक्रय कर कानून और संविधान के लागू होने के बाद पारित विक्रय कर संबंधी कानून इस आधार पर आगे बढ़े कि विधायी सूचियों में प्रविष्टियों की व्यापक व्याख्या के नियम को ध्यान में रखते हुए, "माल की बिक्री" अभिव्यक्ति...
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (छियालीसवाँ संशोधन) विधेयक, 1981 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (छियालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1982 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अनुसरण में अधिनियमित विक्रय कर कानून और संविधान के लागू होने के बाद पारित विक्रय कर संबंधी कानून इस आधार पर बनाए गए थे कि विधायी सूचियों में प्रविष्टियों की व्यापक व्याख्या के नियम को ध्यान में रखते हुए, "माल की बिक्री" अभिव्यक्ति को व्यापक अर्थ दिया जाएगा। हालांकि, गैन्नन डंकरली मामले (AIR 1958 SC 560) में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि संविधान की सातवीं अनुसूची में प्रयुक्त "माल की बिक्री" अभिव्यक्ति का वही अर्थ है जो माल विक्रय अधिनियम, 1930 में है। यह निर्णय निर्माण अनुबंधों से संबंधित था।
2. बाद के कई निर्णयों के माध्यम से, सर्वोच्च न्यायालय ने गैन्नन डंकरली मामले के निर्णय के आधार पर, बिक्री के समान दिखने वाले कई अन्य लेन-देनों को बिक्री कर से मुक्त माना है। इन निर्णयों के परिणामस्वरूप, संघ सूची की प्रविष्टि 92ए या राज्य सूची की प्रविष्टि 54 के अंतर्गत बिक्री कर के दायरे में आने के लिए किसी लेन-देन में निम्नलिखित तत्व होने चाहिए, अर्थात्, अनुबंध करने के लिए सक्षम पक्ष, आपसी सहमति और अनुबंध के एक पक्ष से दूसरे पक्ष को माल का मूल्य के बदले हस्तांतरण।
3. इस स्थिति के कारण कर चोरी के कई तरीके उपलब्ध हो गए हैं। इसका एक उदाहरण अंतर-राज्यीय माल हस्तांतरण है, अर्थात् एक राज्य में स्थित प्रधान कार्यालय या मुख्य इकाई से दूसरे राज्य में स्थित शाखा या एजेंट को माल का हस्तांतरण, या इसके विपरीत, या माल का माल हस्तांतरण, ताकि केंद्रीय बिक्री कर अधिनियम के तहत अंतर-राज्यीय बिक्री पर बिक्री कर का भुगतान करने से बचा जा सके। जबकि किसी कार्य अनुबंध के मामले में, यदि अनुबंध में सामग्री की बिक्री को श्रम लागत से अलग माना जाता है, तो सामग्री की बिक्री कर योग्य होगी, लेकिन अविभाज्य कार्य अनुबंध के मामले में, ऐसे अनुबंध के निष्पादन में शामिल वस्तुओं के स्वामित्व के हस्तांतरण पर बिक्री कर लगाना संभव नहीं है, क्योंकि यह माना गया है कि सामग्री की बिक्री नहीं होती है और उनका स्वामित्व चल संपत्ति के रूप में हस्तांतरित नहीं होता है। यद्यपि व्यावहारिक रूप से किराया-खरीद समझौते में क्रेता को किराया-खरीद की तारीख पर ही माल मिल जाता है, फिर भी यह माना गया है कि बिक्री तभी मानी जाती है जब क्रेता बहुत बाद में खरीद का विकल्प चुनता है। इसलिए, खरीद का विकल्प चुने जाने के समय माल के मूल्यह्रास के बाद के मूल्य पर ही बिक्री कर लगता है। इसी प्रकार, पंजीकृत क्लब या अन्य व्यक्तियों के संघ (जिनका निगमित दर्जा हो) द्वारा अपने सदस्यों को की गई बिक्री कर योग्य होती है, जबकि गैर-निगमित क्लब या व्यक्तियों के संघ द्वारा अपने सदस्यों को की गई बिक्री कर योग्य नहीं होती, क्योंकि कानून की दृष्टि से ऐसे क्लब या संघ का अपने सदस्यों से कोई अलग अस्तित्व नहीं होता। एसोसिएटेड होटल्स ऑफ इंडिया मामले (AIR 1972 SC 1131) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि होटल में ठहरे व्यक्ति को होटल व्यवसायी द्वारा भोजन या पेय पदार्थ की आपूर्ति में कोई बिक्री शामिल नहीं होती।
4. न्यू इंडिया शुगर मिल्स मामले (AIR 1963 SC 1207) में, सर्वोच्च न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि नियंत्रण आदेश के तहत निर्देश के अनुसरण में नियंत्रित वस्तुओं के हस्तांतरण में, विक्रेता की स्वेच्छा या आपसी सहमति का तत्व अनुपस्थित होता है, और इसलिए, माल विक्रय अधिनियम, 1930 में परिभाषित विक्रय नहीं होता है। हालांकि, ऑयल एंड नेचुरल गैस कमीशन बनाम स्टेट ऑफ बिहार (AIR 1976 SC 2478) में, सर्वोच्च न्यायालय को नियंत्रित वस्तुओं के हस्तांतरण पर विक्रय कर लगाने की देयता के संबंध में अपने पूर्व निर्णयों पर विचार करने का अवसर मिला। सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना कि जहां कोई वैधानिक बाध्यताएं हैं, वहां स्वयं कानून को ही सहमति प्रदान करने वाला और सहमति की विधि प्रदान करने वाला माना जाना चाहिए। विष्णु एजेंसीज बनाम... वाणिज्यिक कर अधिकारी (AIR 1978 SC 449) मामले में, सात में से छह न्यायाधीशों ने न्यू इंडिया शुगर मिल्स मामले में दिए गए निर्णय को पलटने पर सहमति व्यक्त की, जबकि सातवें न्यायाधीश ने इस मामले को भिन्न माना। इसलिए, इस मामले को पूरी तरह स्पष्ट करना वांछनीय समझा जाता है।
5. राज्यों द्वारा माल की बिक्री पर कर लगाने की शक्ति और केंद्रीय बिक्री कर अधिनियम, 1956 से संबंधित विभिन्न समस्याओं को भारत के विधि आयोग को भेजा गया था। आयोग ने अपनी 61वीं रिपोर्ट में इन मामलों पर विचार किया और अन्य बातों के साथ-साथ संविधान में कुछ संशोधनों की सिफारिश की, यदि प्रशासनिक नीति के रूप में पूर्ववर्ती अनुच्छेदों में उल्लिखित प्रकार के लेन-देन पर कर लगाने का निर्णय लिया जाता है।
6. फिल्मों को पट्टे पर देने के माध्यम से भी बिक्री कर से बचा जा रहा है। किसी फिल्म से संबंधित मुख्य अधिकार उसके उपयोग से जुड़ा होता है और एक निश्चित अवधि तक उपयोग के बाद, अधिकांश मामलों में फिल्म का कोई मूल्य नहीं रह जाता है। इसलिए, यह देखा गया है कि फिल्म की सीधी बिक्री करने के बजाय, केवल उपयोग के अधिकार को पट्टे पर देना या हस्तांतरित करना ही उचित समझा जाता है।
7. राज्य सरकारों से, जिन्हें विक्रय कर से प्राप्त राजस्व आवंटित किया गया है, ऐसी रिपोर्टें प्राप्त हुई हैं कि अंतर-राज्यीय माल विक्रय पर लगने वाले केंद्रीय विक्रय कर की बड़े पैमाने पर चोरी माल की एक राज्य से दूसरे राज्य में खेप भेजने की युक्ति के माध्यम से की जा रही है, और स्थानीय विक्रय कर का दुरुपयोग कार्य अनुबंधों, किराया-खरीद लेनदेन, फिल्मों के पट्टे आदि के माध्यम से हो रहा है। यद्यपि संसद इन लेनदेनों पर कर लगा सकती है, लेकिन चूंकि विक्रय कर को हमेशा से ही राज्यों को आवंटित किए जाने वाले राजस्व मद के रूप में माना जाता रहा है, इसलिए इन लेनदेनों के संबंध में, जो विक्रय के समान हैं, यह माना जाता है कि वही नीति अपनाई जानी चाहिए।
8. उपर्युक्त मामलों के अतिरिक्त, उत्तरी भारत कैटरर्स (इंडिया) लिमिटेड बनाम दिल्ली के उपराज्यपाल (AIR 1978 SC 1591) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के परिणामस्वरूप एक नई समस्या उत्पन्न हो गई है। राज्य इस आधार पर कार्यवाही कर रहे थे कि एसोसिएटेड होटल्स ऑफ इंडिया का मामला केवल होटल व्यवसायी द्वारा होटल में ठहरे व्यक्ति को भोजन या पेय पदार्थ की आपूर्ति पर लागू होता है और रेस्तरां द्वारा खाद्य पदार्थों की बिक्री पर कर लगाया जा सकता है। लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने उपरोक्त मामले में यह माना है कि होटल या रेस्तरां में भोजन परोसना बिक्री कर लगाने के उद्देश्य से भोजन की बिक्री नहीं है, बल्कि इसे मानवीय आवश्यकता की पूर्ति या शारीरिक आवश्यकता की सेवा के रूप में माना जाना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि रेस्तरां में आने वाले ग्राहक से पूरे भोजन का शुल्क लिया जाता है या प्रत्येक व्यंजन के अनुसार अलग-अलग।
9. अतः, अनुच्छेद 366 में "माल की बिक्री या खरीद पर कर" की परिभाषा को शामिल करने के लिए संविधान में उपयुक्त संशोधन प्रस्तावित है, जिसके लिए एक नया खंड (29ए) जोड़ा जाएगा। इस परिभाषा के दायरे में विशेष रूप से निम्नलिखित पर कर शामिल होगा: (i) नियंत्रित वस्तुओं का प्रतिफल के बदले हस्तांतरण; (ii) किसी कार्य अनुबंध के निष्पादन में शामिल माल में स्वामित्व का हस्तांतरण; (iii) किराया-खरीद या किश्तों में भुगतान की किसी भी प्रणाली पर माल की सुपुर्दगी; (iv) किसी भी उद्देश्य के लिए किसी भी माल के उपयोग के अधिकार का नकद, आस्थगित भुगतान या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के बदले हस्तांतरण; (v) किसी गैर-निगमित संघ या व्यक्तियों के समूह द्वारा अपने किसी सदस्य को नकद, आस्थगित भुगतान या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के बदले माल की आपूर्ति; (vi) किसी सेवा के माध्यम से या उसके भाग के रूप में नकद, आस्थगित भुगतान या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के बदले भोजन या किसी पेय की आपूर्ति। (खंड 4 देखें)।
10. संघ सूची में सातवीं अनुसूची में प्रविष्टि 92बी के रूप में एक नई प्रविष्टि जोड़ने का प्रस्ताव है, ताकि अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान माल की खेप पर कर लगाया जा सके। (खंड 5 देखें)।
11. अनुच्छेद 269 के खंड (1) में संशोधन प्रस्तावित है ताकि अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान माल की खेप पर लगने वाला कर राज्यों को सौंपा जा सके। उस अनुच्छेद के खंड (3) में संशोधन प्रस्तावित है ताकि संसद को यह निर्धारित करने के लिए विधि द्वारा सिद्धांत बनाने का अधिकार हो कि माल की खेप अंतरराज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान कब होती है। (खंड 2 देखें)।
12. अनुच्छेद 286 के खंड (3) में संशोधन प्रस्तावित है ताकि संसद को किसी कार्य अनुबंध के निष्पादन में शामिल माल के हस्तांतरण पर, किराया-खरीद या किश्तों में भुगतान की किसी भी प्रणाली पर माल की सुपुर्दगी पर और किसी भी माल के उपयोग के अधिकार पर कर लगाने की प्रणाली, दरों और अन्य संबंधित प्रावधानों के संबंध में कानून द्वारा प्रतिबंध और शर्तें निर्दिष्ट करने में सक्षम बनाया जा सके। (खंड 3 देखें)।
13. प्रस्तावित संशोधनों से राज्य के राजस्व में काफी हद तक वृद्धि होगी। विधेयक का खंड 6, भोजन या पेय पदार्थ की आपूर्ति पर कर लगाने वाले कानूनों और ऐसे किसी भी कानून के तहत कर के रूप में की गई वसूली को वैध ठहराता है। हालांकि, एसोसिएटेड होटल्स ऑफ इंडिया मामले में फैसले की तारीख और वर्तमान संशोधन अधिनियम के लागू होने की तारीख के बीच की अवधि में, होटल व्यवसायी द्वारा होटल में ठहरे व्यक्ति को आपूर्ति किए गए भोजन या पेय पदार्थ पर कोई बिक्री कर देय नहीं होगा, यदि विधेयक के खंड 6 के उपखंड (2) में उल्लिखित शर्तें पूरी होती हैं। रेस्टोरेंट द्वारा आपूर्ति किए गए भोजन या पेय पदार्थ के मामले में, यह राहत केवल नॉर्दर्न इंडिया कैटरर्स (इंडिया) लिमिटेड मामले में फैसले की तारीख और वर्तमान संशोधन अधिनियम के लागू होने की तारीख के बाद की अवधि के लिए उपलब्ध होगी।
14. यह विधेयक उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास करता है। भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। भारत गणराज्य के तैंतीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप से अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (छियालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1982 कहा जा सकता है।
अनुच्छेद 269 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 269 में,-
(क) खंड (1) में उपखंड (जी) के स्थान पर निम्नलिखित उपखंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(h) माल की खेप पर कर (चाहे खेप उसे बनाने वाले व्यक्ति को हो या किसी अन्य व्यक्ति को), जहां ऐसी खेप अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान होती है;
(ख) खंड (3) में, "माल की बिक्री या खरीद" शब्दों के स्थान पर "माल की बिक्री या खरीद, या माल की खेप" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 286 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 286 में खंड (3) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(3) किसी राज्य का कोई कानून, जहां तक वह किसी प्रकार का दंड लगाता है, या दंड लगाने की अनुमति देता है,
(क) संसद द्वारा कानून द्वारा अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य में विशेष महत्व की घोषित वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर कर; या
(ख) वस्तुओं की बिक्री या खरीद पर लगाया जाने वाला कर, जो अनुच्छेद 366 के खंड (29क) के उपखंड (ख), उपखंड (ग) या उपखंड (घ) में निर्दिष्ट प्रकार का कर हो, कर लगाने की प्रणाली, दरों और कर के अन्य पहलुओं के संबंध में ऐसे प्रतिबंधों और शर्तों के अधीन होगा, जैसा कि संसद विधि द्वारा निर्दिष्ट कर सकती है।
अनुच्छेद 366 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 366 में खंड (29) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(29ए) "माल की बिक्री या खरीद पर कर" में शामिल है-
(क) किसी अनुबंध के अनुसरण के अलावा, नकद, आस्थगित भुगतान या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के बदले किसी वस्तु में संपत्ति के हस्तांतरण पर कर;
(ख) किसी कार्य अनुबंध के निष्पादन में शामिल माल (चाहे माल के रूप में हो या किसी अन्य रूप में) में संपत्ति के हस्तांतरण पर कर;
(ग) किराया-खरीद या किश्तों में भुगतान की किसी भी प्रणाली के माध्यम से माल की डिलीवरी पर कर;
(घ) किसी भी उद्देश्य के लिए (चाहे निर्दिष्ट अवधि के लिए हो या नहीं) किसी भी वस्तु के उपयोग के अधिकार के हस्तांतरण पर नकद, आस्थगित भुगतान या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के बदले कर;
(ई) किसी गैर-निगमित संघ या व्यक्तियों के समूह द्वारा अपने किसी सदस्य को नकद, आस्थगित भुगतान या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के बदले माल की आपूर्ति पर कर;
(f) किसी सेवा के माध्यम से या उसके भाग के रूप में या किसी अन्य तरीके से माल की आपूर्ति पर कर, जो खाद्य पदार्थ या मानव उपभोग के लिए कोई अन्य वस्तु हो या कोई पेय पदार्थ (चाहे वह मादक हो या नहीं), जहां ऐसी आपूर्ति या सेवा नकद, आस्थगित भुगतान या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के लिए हो।
और किसी भी वस्तु का ऐसा हस्तांतरण, वितरण या आपूर्ति, हस्तांतरण, वितरण या आपूर्ति करने वाले व्यक्ति द्वारा उन वस्तुओं की बिक्री और जिस व्यक्ति को ऐसा हस्तांतरण, वितरण या आपूर्ति की जाती है, उसके द्वारा उन वस्तुओं की खरीद मानी जाएगी;
सातवीं अनुसूची का संशोधन
संविधान की सातवीं अनुसूची में, सूची I-संघ सूची में, प्रविष्टि 92A के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि जोड़ी जाएगी, अर्थात्:-
92बी. माल की खेप पर कर (चाहे खेप भेजने वाले व्यक्ति को भेजी जाए या किसी अन्य व्यक्ति को), जहां ऐसी खेप अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान भेजी जाती है।
विधिमान्यकरण और छूट
(1) संविधान के प्रत्येक प्रावधान के प्रयोजनों के लिए जिसमें "माल की बिक्री या खरीद पर कर" अभिव्यक्ति आती है, और इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले पारित या निर्मित किसी भी कानून के प्रयोजनों के लिए, ऐसे किसी प्रावधान के अनुसरण में,-
(क) उक्त अभिव्यक्ति में, किसी सेवा के माध्यम से या उसके भाग के रूप में या किसी अन्य तरीके से, खाद्य पदार्थ या मानव उपभोग के लिए कोई अन्य वस्तु या कोई पेय पदार्थ (चाहे मादक हो या नहीं) की आपूर्ति पर लगने वाला कर (जिसे इस धारा में आगे उक्त कर कहा गया है) शामिल माना जाएगा, और हमेशा से शामिल माना जाएगा, जो नकद, आस्थगित भुगतान या अन्य मूल्यवान प्रतिफल के बदले में दिया जाता है; और
(ख) ऐसे प्रारंभ से पहले किए गए खंड (क) में निर्दिष्ट प्रकार की आपूर्ति का प्रत्येक लेन-देन विक्रय का लेन-देन माना जाएगा, और हमेशा से ऐसा ही माना जाएगा, जिसमें आपूर्ति करने वाला व्यक्ति विक्रेता और जिसे आपूर्ति की जाती है वह व्यक्ति क्रेता होता है।
और किसी भी न्यायालय, न्यायाधिकरण या प्राधिकरण के किसी भी निर्णय, आदेश या डिक्री के बावजूद, ऐसा कोई भी कानून जो ऐसे प्रारंभ से पहले पारित या बनाया गया हो और जो उपर्युक्त कर लगाता हो या लगाने की अनुमति देता हो, केवल इस आधार पर अमान्य नहीं माना जाएगा या कभी अमान्य नहीं माना जाएगा कि विधानमंडल या अन्य प्राधिकरण को ऐसा कानून पारित करने या बनाने की क्षमता नहीं थी, और तदनुसार:-
(i) इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले किसी भी ऐसे कानून के तहत लगाए गए या एकत्र किए गए या लगाए जाने या एकत्र किए जाने का दावा किए गए उपर्युक्त सभी करों को कानून के अनुसार वैध रूप से लगाया या एकत्र किया गया माना जाएगा;
(ii) किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण या प्राधिकरण के समक्ष ऐसे किसी कर की वापसी के लिए कोई मुकदमा या अन्य कार्यवाही न तो चलाई जाएगी और न ही जारी रखी जाएगी, और न ही किसी न्यायालय, न्यायाधिकरण या प्राधिकरण द्वारा ऐसे किसी कर की वापसी का निर्देश देने वाले किसी आदेश या डिक्री का प्रवर्तन किया जाएगा;
(iii) वसूली ऐसे कानून के प्रावधानों के अनुसार उन सभी राशियों की की जाएगी जो उक्त कर के रूप में उसके अधीन एकत्र की जातीं यदि यह धारा सभी प्रासंगिक समयों पर लागू होती।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, उसमें निर्दिष्ट प्रकार की कोई भी आपूर्ति उपर्युक्त कर से मुक्त होगी।
(क) जहां किसी रेस्तरां या भोजनालय (चाहे किसी भी नाम से पुकारा जाए) द्वारा 7 सितंबर, 1978 को या उसके बाद तथा इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले किसी भी समय ऐसी आपूर्ति की गई हो और उस आपूर्ति पर उपर्युक्त कर इस आधार पर वसूल नहीं किया गया हो कि उस समय ऐसा कोई कर लगाया या वसूल नहीं किया जा सकता था; या
(ख) जहां ऐसी आपूर्ति, किसी रेस्तरां या भोजनालय (चाहे किसी भी नाम से पुकारा जाए) द्वारा की गई आपूर्ति को छोड़कर, 4 जनवरी, 1972 को या उसके बाद तथा इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले किसी भी समय की गई हो और उस आपूर्ति पर उपर्युक्त कर इस आधार पर वसूल नहीं किया गया हो कि उस समय ऐसा कोई कर लगाया या वसूल नहीं किया जा सकता था:
बशर्ते कि यह साबित करने का भार कि उपर्युक्त कर खंड (क) या, जैसा भी मामला हो, खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रकृति की किसी आपूर्ति पर एकत्र नहीं किया गया था, इस उपधारा के तहत छूट का दावा करने वाले व्यक्ति पर होगा।
(3) संदेह दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि,-
(क) उपधारा (1) में कोई बात किसी व्यक्ति को निम्नलिखित से रोकने के रूप में नहीं समझी जाएगी- (i) उस उपधारा में निर्दिष्ट किसी कानून के प्रावधानों के अनुसार, उपर्युक्त कर के निर्धारण, पुनर्निर्धारण, वसूली या संग्रह पर प्रश्न उठाने से, या (ii) किसी ऐसे कानून के तहत उससे देय राशि से अधिक भुगतान किए गए उपर्युक्त कर की वापसी का दावा करने से; और
(ख) इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई भी कार्य या चूक ऐसा अपराध नहीं होगा जो इस अधिनियम के लागू न होने की स्थिति में दंडनीय न होता।
