संविधान (4वाँ संशोधन) अधिनियम, 1955
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 31
- 31ए
लेख प्रतिस्थापित
- 305
कार्यक्रम प्रभावित हुए
- नौवीं अनुसूची
इस विधेयक का उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 31, 31ए और 305 तथा नौवीं अनुसूची में संशोधन करना है।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (चौथा संशोधन) विधेयक, 1954 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1954 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
इस विधेयक का उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 31, 31ए और 305 तथा नौवीं अनुसूची में संशोधन करना है।
2. सर्वोच्च न्यायालय के हाल के निर्णयों ने अनुच्छेद 31 के खंड (1) और (2) को बहुत व्यापक अर्थ दिया है। यद्यपि दोनों खंडों के शब्दों में अंतर है, फिर भी उन्हें एक ही विषय से संबंधित माना जाता है। खंड (1) में निर्दिष्ट संपत्ति से वंचित करना, संपत्ति के अधिकार में किसी भी प्रकार की कटौती सहित, व्यापकतम अर्थ में समझा जाना चाहिए। भले ही यह किसी विशुद्ध नियामक प्रावधान के कारण हुआ हो और राज्य द्वारा उस या किसी अन्य संपत्ति अधिकार का अधिग्रहण या कब्जा न लिया गया हो, इन निर्णयों के अनुसार वैध होने के लिए कानून को अनुच्छेद के खंड (2) के तहत मुआवजे का प्रावधान करना होगा। अतः, निजी संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण और अधिग्रहण की राज्य की शक्ति को अधिक स्पष्ट रूप से पुनः परिभाषित करना और इसे उन मामलों से अलग करना आवश्यक समझा जाता है जहां राज्य के नियामक या निषेधात्मक कानूनों के संचालन के परिणामस्वरूप "संपत्ति से वंचित करना" होता है। विधेयक के खंड 2 में यही करने का प्रयास किया गया है।
3. यह याद रखना चाहिए कि हमारे सामाजिक कल्याण विधान कार्यक्रम में सबसे पहले आए जमींदारी उन्मूलन कानूनों पर मुख्य रूप से अनुच्छेद 14, 19 और 31 के संदर्भ में प्रभावित हितों द्वारा हमला किया गया था, और विलंबकारी और व्यर्थ मुकदमेबाजी को समाप्त करने और इन कानूनों को अदालतों में चुनौती से ऊपर रखने के लिए, संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 31ए और 31बी और नौवीं अनुसूची को अधिनियमित किया गया था। अनुच्छेद 14, 19 और 31 की व्याख्या करने वाले बाद के न्यायिक निर्णयों ने केंद्र और राज्यों के लिए अन्य और समान रूप से महत्वपूर्ण सामाजिक कल्याण कानूनों को वांछित दिशा में पारित करने में गंभीर कठिनाइयाँ खड़ी कर दी हैं, उदाहरण के लिए, निम्नलिखित:-
(i) जबकि जमींदारी व्यवस्था और राज्य तथा भूमि जोतने वाले के बीच के असंख्य मध्यस्थों का उन्मूलन लगभग पूरा हो चुका है, भूमि सुधार में हमारे अगले उद्देश्य कृषि भूमि की सीमा निर्धारित करना है जो किसी व्यक्ति के स्वामित्व या कब्जे में हो सकती है, निर्धारित अधिकतम सीमा से अधिक भूमि का निपटान करना और कृषि जोतों में भूमि मालिकों और किरायेदारों के अधिकारों में और संशोधन करना है।
(ii) शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की उचित योजना के लिए खाली और बंजर भूमि का लाभकारी उपयोग और झुग्गी-झोपड़ी वाले क्षेत्रों का निष्कासन आवश्यक है।
(iii) राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के हित में, राज्य को देश के खनिज और तेल संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए, जिसमें विशेष रूप से अन्वेषण लाइसेंस, खनन पट्टे और इसी प्रकार के समझौतों की शर्तों और नियमों को रद्द करने या संशोधित करने की शक्ति शामिल है। यह उन सार्वजनिक उपयोगिता उपक्रमों के संबंध में भी आवश्यक है जो राज्य द्वारा प्रदत्त लाइसेंसों के तहत जनता को बिजली, प्रकाश या पानी की आपूर्ति करते हैं।
(iv) जनहित में या किसी वाणिज्यिक या औद्योगिक उपक्रम या अन्य संपत्ति के बेहतर प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए, अस्थायी अवधि के लिए राज्य प्रबंधन के अधीन उसे लेना अक्सर आवश्यक होता है। संविधान के तहत ऐसे अस्थायी हस्तांतरण के लिए प्रावधान करने वाले कानून अनुमेय होने चाहिए।
(v) कंपनी कानून में वर्तमान में विचाराधीन सुधार, जैसे प्रबंध एजेंसी प्रणाली का क्रमिक उन्मूलन, राष्ट्रीय हित में दो या दो से अधिक कंपनियों के अनिवार्य विलय का प्रावधान, एक कंपनी से दूसरी कंपनी में उपक्रम का हस्तांतरण आदि, को चुनौती से ऊपर रखा जाना चाहिए।
तदनुसार, विधेयक के खंड 3 में अनुच्छेद 31ए के दायरे को इस प्रकार विस्तारित करने का प्रस्ताव है ताकि इसमें आवश्यक कल्याणकारी विधानों की इन श्रेणियों को शामिल किया जा सके।
4. अनुच्छेद 31ए में प्रस्तावित संशोधन के फलस्वरूप, विधेयक के खंड 5 में संविधान की नौवीं अनुसूची में दो और राज्य अधिनियमों और चार केंद्रीय अधिनियमों को शामिल करने का प्रस्ताव है, जो संशोधित अनुच्छेद 31ए के खंड (1) के उपखंड (घ) और (च) के दायरे में आते हैं। इसका प्रभाव यह होगा कि अनुच्छेद 31बी के प्रावधानों के तहत उन्हें पूर्णतः पूर्वव्यापी मान्यता प्राप्त हो जाएगी।
5. हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले में, सगीर अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में, यह प्रश्न उठाया गया कि क्या किसी विशेष व्यापार या व्यवसाय में राज्य के एकाधिकार का प्रावधान करने वाला अधिनियम अनुच्छेद 301 द्वारा प्रदत्त व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता के साथ टकराव करता है, लेकिन इस प्रश्न का कोई निर्णय नहीं लिया गया। संविधान (प्रथम संशोधन) अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 19 के खंड (6) में संशोधन किया गया ताकि ऐसे राज्य एकाधिकारों को उस अनुच्छेद के खंड (1) के उपखंड (जी) के दायरे से बाहर रखा जा सके, लेकिन संविधान के भाग XIII में अनुच्छेद 301 के आरंभिक शब्दों के संदर्भ में कोई संबंधित प्रावधान नहीं किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से यह प्रतीत होता है कि संसद या राज्य विधानमंडल को किसी विशेष व्यापार या वाणिज्य क्षेत्र में राज्य एकाधिकार लागू करने का स्पष्ट अधिकार होने के बावजूद, इस कानून को न्यायालयों के समक्ष अनुच्छेद 301 के तहत "जनहित में" या अनुच्छेद 304(बी) के तहत "उचित प्रतिबंध" के रूप में उचित ठहराया जाना आवश्यक हो सकता है। ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार के किसी भी प्रश्न का अंतिम निर्णय विधानमंडल के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए। तदनुसार, विधेयक के खंड 4 में अनुच्छेद 305 में संशोधन का प्रस्ताव है ताकि इसे स्पष्ट किया जा सके।
भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम।
भारत गणराज्य के छठे वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1955 कहा जा सकता है।
अनुच्छेद 31 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 31 में खंड (2) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्:---
(2) किसी भी संपत्ति का अनिवार्य अधिग्रहण या अधिग्रहण सार्वजनिक उद्देश्य के अलावा और किसी ऐसे कानून के अधिकार के तहत नहीं किया जाएगा जो इस प्रकार अधिग्रहित या अधिग्रहण की गई संपत्ति के लिए मुआवजे का प्रावधान करता हो और या तो मुआवजे की राशि निर्धारित करता हो या उन सिद्धांतों और तरीकों को निर्दिष्ट करता हो जिनके आधार पर मुआवजा निर्धारित और दिया जाना है; और ऐसे किसी भी कानून को किसी भी न्यायालय में इस आधार पर चुनौती नहीं दी जाएगी कि उस कानून द्वारा प्रदान किया गया मुआवजा पर्याप्त नहीं है।
(2क) जहाँ कोई कानून किसी संपत्ति के स्वामित्व या कब्जे के अधिकार को राज्य या राज्य के स्वामित्व या नियंत्रण वाले निगम को हस्तांतरित करने का प्रावधान नहीं करता है, तो उसे संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण या मांग का प्रावधान नहीं माना जाएगा, भले ही इससे किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित किया जाता हो।
अनुच्छेद 31A का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 31ए में,--
(क) खंड (1) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, तथा यह सर्वसम्मत माना जाएगा, अर्थात्:-
"(1) अनुच्छेद 13 में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी कानून जो इसके लिए प्रावधान करता हो-
(क) राज्य द्वारा किसी संपत्ति या उसमें निहित किसी अधिकार का अधिग्रहण या ऐसे किसी अधिकार का समापन या संशोधन, या
(ख) किसी संपत्ति का प्रबंधन राज्य द्वारा सीमित अवधि के लिए, या तो जनहित में या संपत्ति के उचित प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए अपने हाथ में लेना, या
(ग) सार्वजनिक हित में या किसी निगम के उचित प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए दो या दो से अधिक निगमों का विलय, या
(घ) निगमों के प्रबंध एजेंटों, सचिवों और कोषाध्यक्षों, प्रबंध निदेशकों, निदेशकों या प्रबंधकों के किसी भी अधिकार का या उनके शेयरधारकों के किसी भी मतदान अधिकार का समाप्त होना या उसमें संशोधन होना, या
(ई) किसी खनिज या खनिज तेल की खोज या प्राप्ति के उद्देश्य से किसी समझौते, पट्टे या लाइसेंस के आधार पर अर्जित किसी भी अधिकार का समाप्त होना या उसमें संशोधन होना, या ऐसे किसी समझौते, पट्टे या लाइसेंस का समय से पहले समाप्त होना या रद्द होना, इस आधार पर शून्य माना जाएगा कि यह अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 या अनुच्छेद 31 द्वारा प्रदत्त किसी भी अधिकार के साथ असंगत है, या उसे छीनता है या कम करता है।
बशर्ते कि यदि ऐसा कानून किसी राज्य के विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून है, तो इस अनुच्छेद के प्रावधान उस पर तब तक लागू नहीं होंगे जब तक कि राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित किए जाने के बाद उस कानून को उनकी स्वीकृति प्राप्त न हो जाए।
(ख) खंड (2) में,-
(i) उपखंड (क) में, "अनुदान" शब्द के बाद, "और मद्रास और त्रावणकोर-कोचीन राज्यों में, कोई जनमान अधिकार" शब्द जोड़े जाएंगे, और यह माना जाएगा कि वे हमेशा से जोड़े गए हैं; और
(ii) उपखंड (ख) में, "किरायेदार" शब्द के बाद, "रैयत, उप-रैयत" शब्द जोड़े जाएंगे, और यह माना जाएगा कि वे हमेशा से जोड़े गए हैं।
अनुच्छेद 305 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 305 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
305. मौजूदा कानूनों और राज्य एकाधिकारों के लिए प्रावधान करने वाले कानूनों का संरक्षण।-अनुच्छेद 301 और 303 में कुछ भी किसी मौजूदा कानून के प्रावधानों को प्रभावित नहीं करेगा, सिवाय इसके कि राष्ट्रपति आदेश द्वारा अन्यथा निर्देश दे सकते हैं; और अनुच्छेद 301 में कुछ भी संविधान (चौथा संशोधन) अधिनियम, 1955 के प्रारंभ होने से पहले बनाए गए किसी भी कानून के संचालन को प्रभावित नहीं करेगा, जहां तक यह अनुच्छेद 19 के खंड (6) के उपखंड (ii) में संदर्भित किसी भी मामले से संबंधित है, या संसद या किसी राज्य के विधानमंडल को ऐसे किसी मामले से संबंधित कोई कानून बनाने से नहीं रोकेगा।
नौवीं अनुसूची का संशोधन
संविधान की नौवीं अनुसूची में, प्रविष्टि 13 के बाद, निम्नलिखित प्रविष्टियाँ जोड़ी जाएंगी, अर्थात्:---
14. बिहार विस्थापित व्यक्ति पुनर्वास (भूमि अधिग्रहण) अधिनियम, 1950 (बिहार अधिनियम XXXVIII, 1950)।
15. संयुक्त प्रांत भूमि अधिग्रहण (शरणार्थियों का पुनर्वास) अधिनियम, 1948 (यूपी अधिनियम XXVI 1948)।
16. विस्थापित व्यक्तियों का पुनर्वास (भूमि अधिग्रहण) अधिनियम, 1948 (अधिनियम एलएक्स ऑफ 1948)।
17. बीमा अधिनियम, 1938 (अधिनियम IV ऑफ 1938) की धारा 52ए से 52जी तक, जैसा कि बीमा (संशोधन) अधिनियम, 1950 (अधिनियम XLVII ऑफ 1950) की धारा 42 द्वारा सम्मिलित किया गया है।
18. रेल कंपनियां (आपातकालीन प्रावधान) अधिनियम, 1951 (अधिनियम एलआई ऑफ 1951)।
19. उद्योग (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 (अधिनियम LXV ऑफ 1951) का अध्याय III-A, जैसा कि उद्योग (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 1953 (अधिनियम XXVI ऑफ 1953) की धारा 13 द्वारा जोड़ा गया है।
20. पश्चिम बंगाल भूमि विकास एवं योजना अधिनियम, 1948 (पश्चिम बंगाल अधिनियम XXI, 1948), जैसा कि पश्चिम बंगाल अधिनियम XXIX, 1951 द्वारा संशोधित किया गया है।
