संविधान (3वाँ संशोधन) अधिनियम, 1954
अवलोकन
कार्यक्रम प्रभावित हुए
- सातवीं अनुसूची
अनुच्छेद 81(1)(क) लोकसभा में निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम सीमा 500 निर्धारित करता है। अनुच्छेद 81(1)(ख) यह प्रावधान करता है कि राज्यों को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित, समूहीकृत या गठित किया जाएगा और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र को आवंटित किए जाने वाले सदस्यों की संख्या इस प्रकार निर्धारित की जाएगी जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि…
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 1952 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 1952 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
अनुच्छेद 81(1)(क) लोकसभा में निर्वाचित सदस्यों की अधिकतम सीमा 500 निर्धारित करता है। अनुच्छेद 81(1)(ख) यह प्रावधान करता है कि राज्यों को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित, समूहीकृत या गठित किया जाएगा और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र को आवंटित किए जाने वाले सदस्यों की संख्या इस प्रकार निर्धारित की जाएगी कि प्रत्येक 750,000 जनसंख्या पर कम से कम एक सदस्य और प्रत्येक 500,000 जनसंख्या पर अधिकतम एक सदस्य हो।
संसद एवं विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों का वर्तमान परिसीमन जनसंख्या के अनुमानों पर आधारित है, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 387 के अंतर्गत राष्ट्रपति के आदेश द्वारा कानूनी वैधता प्रदान की गई है। यद्यपि, संविधान के अनुच्छेद 81(3) के अनुसार, प्रत्येक जनगणना पूर्ण होने पर, लोकसभा तथा प्रत्येक राज्य की विधान सभाओं में विभिन्न प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व का पुनर्गठन संसद द्वारा विधि द्वारा निर्धारित प्राधिकारी द्वारा, विधिपूर्वक तथा तिथि से किया जाएगा। इस अनुच्छेद में उल्लिखित मामलों के लिए एक विधेयक संसद में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस विधेयक में लोकसभा तथा राज्य विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व के पुनर्गठन हेतु 1951 की जनगणना में निर्धारित जनसंख्या के आधार पर परिसीमन आयोग की स्थापना का प्रावधान किया गया है।
राष्ट्रपति के आदेश में अनुमानित विभिन्न राज्यों की जनसंख्या और 1951 की जनगणना में निर्धारित जनसंख्या में काफी अंतर है। वर्तमान में, लोकसभा में भाग क और भाग ख राज्यों को अनुमानित जनसंख्या के प्रत्येक 7.2 लाख पर एक सदस्य के आधार पर सीटें आवंटित की गई हैं, जिससे इन राज्यों को कुल 470 सदस्य प्राप्त होते हैं। सभी मामलों में जनगणना के आंकड़े अधिक हैं, और अनुच्छेद 81(1)(क) में निर्धारित 500 सदस्यों की कुल सीमा को देखते हुए, इन राज्यों को आवंटित सीटों की कुल संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि करना संभव नहीं है। इसलिए, प्रतिनिधित्व को 1951 की जनगणना के अनुसार प्रत्येक 7.2 लाख जनसंख्या पर एक सदस्य से घटाकर प्रत्येक 7.5 लाख जनसंख्या पर एक सदस्य करना आवश्यक है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, यह आंकड़ा 7.5 लाख अनुच्छेद 81(1)(ख) के तहत वर्तमान स्थिति के अनुसार अधिकतम अनुमत संख्या है; लेकिन फिर भी, यदि किसी राज्य में संसदीय निर्वाचन क्षेत्र की औसत जनसंख्या 750,000 है, तो यह स्पष्ट है कि कुछ निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या इस संख्या से अधिक होगी। अतः यह आवश्यक है कि अनुच्छेद 81(1)(ख) में संशोधन किया जाए और उसमें निर्धारित सीमाओं में ढील दी जाए ताकि संविधान के अनुच्छेद 81(3) के अनुसार लोकसभा में प्रतिनिधित्व के पुनर्व्यवस्थापन हेतु निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन में संवैधानिक अनियमितता से बचा जा सके। तदनुसार, यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 81(1)(ख) में संशोधन करता है ताकि उसमें उल्लिखित संख्याओं को क्रमशः 850,000 और 650,000 से प्रतिस्थापित किया जा सके।
भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम।
भारत गणराज्य के पंचम वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (तृतीय संशोधन) अधिनियम 1954 कहा जा सकता है।
सातवीं अनुसूची का संशोधन
संविधान की सातवीं अनुसूची में, सूची III की प्रविष्टि 33 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-
33. व्यापार और वाणिज्य, तथा उत्पादन, आपूर्ति और वितरण,-
(क) किसी भी उद्योग के उत्पाद, जहाँ संसद द्वारा कानून बनाकर संघ द्वारा ऐसे उद्योग का नियंत्रण जनहित में आवश्यक घोषित किया गया हो, और ऐसे उत्पादों के समान प्रकार की आयातित वस्तुएँ;
(ख) खाद्य पदार्थ, जिनमें खाद्य तेल बीज और तेल शामिल हैं;
(ग) पशुओं का चारा, जिसमें तेल खली और अन्य सांद्रित चारा शामिल है;
(घ) कच्ची कपास, चाहे बिना जिनिंग की हुई हो या बिना जिनिंग की हुई, और कपास के बीज; और
(ई) कच्चा जूट।"
