संविधान (38वाँ संशोधन) अधिनियम, 1975
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 123
- 213
- 239बी
- 352
- 356
- 359
- 360
संविधान (उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 1975 संविधान के अनुच्छेद 123, 213, 239B, 352, 356, 359 और 360 में संशोधन करना चाहता है।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (उनतीसवाँ संशोधन) विधेयक, 1975 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (अड़तीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1975 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
संविधान (उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 1975 संविधान के अनुच्छेद 123, 213, 239B, 352, 356, 359 और 360 में संशोधन करना चाहता है।
2. अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार देता है, जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों, यदि उन्हें लगता है कि परिस्थितियाँ ऐसी हैं जिनके कारण तत्काल कार्रवाई करना आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को भी इसी प्रकार की शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इसी प्रकार की शक्तियाँ अनुच्छेद 239B के तहत प्रशासक को भी दी गई हैं, जब किसी केंद्र शासित प्रदेश का विधानमंडल सत्र में न हो। अनुच्छेद 123, 213 और 239B के स्पष्ट अर्थों से यह स्पष्ट है कि इन अनुच्छेदों में उल्लिखित संतुष्टि व्यक्तिपरक संतुष्टि है और इस पर न्यायोचित विचार नहीं किया जा सकता। इसमें कोई संदेह नहीं है कि संविधान निर्माताओं का भी यही उद्देश्य था। हालांकि, इस मुद्दे की वैधता को लेकर मुकदमे चल रहे हैं और यह तर्क दिया जा रहा है कि यह मुद्दा न्यायिक जांच के अधीन है। मामले को स्पष्ट करने के लिए, संविधान में यह प्रावधान करने का प्रस्ताव है कि राष्ट्रपति, राज्यपाल या प्रशासक की संतुष्टि अंतिम और निर्णायक होगी और किसी भी आधार पर किसी भी न्यायालय में इस पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकेगा।
3. अनुच्छेद 352 राष्ट्रपति को आपातकाल घोषित करने का अधिकार देता है यदि उन्हें यह विश्वास हो कि भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा युद्ध, बाह्य आक्रमण या आंतरिक अशांति से खतरे में है। अनुच्छेद 356 राष्ट्रपति को किसी राज्य की सरकार के कार्यों को स्वयं संभालने का अधिकार देता है यदि किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाता है और उस राज्य में सरकार चलाना संभव नहीं होता है। इसी प्रकार अनुच्छेद 360 राष्ट्रपति को वित्तीय आपातकाल घोषित करने का अधिकार देता है यदि उन्हें यह विश्वास हो कि भारत की वित्तीय स्थिरता खतरे में है। यहाँ भी, संतुष्टि से संबंधित मुद्दा, अनुच्छेदों के अनुसार स्पष्ट रूप से न्यायोचित नहीं है। हालाँकि, अनुच्छेद 352 के तहत जारी की गई उद्घोषणा की वैधता को कई मुकदमों में चुनौती दी गई है और इस प्रकार के मुकदमेबाजी में जनता का समय और धन बर्बाद होता है, इसलिए इन तीनों अनुच्छेदों में संशोधन प्रस्तावित है ताकि राष्ट्रपति की संतुष्टि अंतिम और निर्णायक हो और किसी भी आधार पर न्यायोचित न हो।
4. अनुच्छेद 352 के अतिरिक्त, कुछ रिट याचिकाओं में यह तर्क दिया गया है कि जब तक मूल आपातकाल की घोषणा लागू है, तब तक उसके तहत कोई और आपातकाल की घोषणा नहीं की जा सकती। इस मामले को स्पष्ट करने के लिए, अनुच्छेद 352 में यह स्पष्ट करने का प्रस्ताव है कि राष्ट्रपति विभिन्न आधारों पर अलग-अलग घोषणाएँ जारी कर सकते हैं, चाहे पहले से कोई घोषणा मौजूद हो या लागू हो।
5. आपातकाल की घोषणा लागू होने की स्थिति में, संविधान के अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार प्राप्त है कि वह भाग III में उल्लिखित अधिकारों के प्रवर्तन हेतु किसी भी न्यायालय में याचिका दायर करने के अधिकार को निलंबित करने का आदेश जारी कर सकता है। इस अनुच्छेद द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग आपातकाल के दौरान स्थिति की आवश्यकतानुसार किया जाना अनिवार्य है। दूसरी ओर, अनुच्छेद 358 आपातकाल की घोषणा लागू रहने की स्थिति में अनुच्छेद 19 के प्रावधानों को स्वतः ही निष्क्रिय कर देता है, और किसी भी कानून को बनाने या कोई भी कार्यकारी कार्रवाई करने की शक्ति उस अनुच्छेद के प्रावधानों द्वारा प्रतिबंधित नहीं होती है। अनुच्छेद 359 का अंतर्निहित उद्देश्य यह प्रतीत होता है कि जब भाग III द्वारा प्रदत्त और आदेश में उल्लिखित किसी अधिकार के संबंध में उस अनुच्छेद के खंड (1) के अंतर्गत कोई आदेश जारी किया जाता है, तो व्यावहारिक रूप से उस आदेश का उन अधिकारों के संबंध में वही प्रभाव होगा जो अनुच्छेद 358 का अनुच्छेद 19 के संबंध में है। अतः, यह प्रस्तावित है कि अनुच्छेद 358 और केवल उन अधिकारों के संबंध में, जिनका उल्लेख अनुच्छेद 359 के खंड (1) के अंतर्गत राष्ट्रपति के आदेश में किया जा सकता है, भाषा में कोई अंतर न हो।
6. यह विधेयक उपर्युक्त उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास करता है। भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। भारत गणराज्य के छब्बीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नानुसार अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (अड़तीसवां संशोधन) अधिनियम, 1975 कहा जा सकता है।
अनुच्छेद 123 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 123 में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, और यह खंड हमेशा से जुड़ा हुआ माना जाएगा, अर्थात्:-
(4) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, खंड (1) में उल्लिखित राष्ट्रपति की संतुष्टि अंतिम और निर्णायक होगी और किसी भी आधार पर किसी भी न्यायालय में इस पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 213 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 213 में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, और यह खंड हमेशा से जुड़ा हुआ माना जाएगा, अर्थात्:-
(4) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, खंड (1) में उल्लिखित राज्यपाल की संतुष्टि अंतिम और निर्णायक होगी तथा किसी भी न्यायालय में किसी भी आधार पर इस पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 239B का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 239B में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, और यह खंड हमेशा से जुड़ा हुआ माना जाएगा, अर्थात्:-
(4) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, खंड (1) में उल्लिखित प्रशासक की संतुष्टि अंतिम और निर्णायक होगी तथा किसी भी न्यायालय में किसी भी आधार पर इस पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 352 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 352 में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़े जाएंगे, और इन्हें हमेशा से जोड़ा हुआ माना जाएगा, अर्थात्:-
(4) इस अनुच्छेद द्वारा राष्ट्रपति को प्रदत्त शक्ति में विभिन्न आधारों पर, जैसे युद्ध, बाह्य आक्रमण, आंतरिक अशांति, युद्ध, बाह्य आक्रमण या आंतरिक अशांति के आसन्न खतरे पर, विभिन्न उद्घोषणाएँ जारी करने की शक्ति शामिल होगी, चाहे खंड (1) के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा पहले से ही कोई उद्घोषणा जारी की गई हो और ऐसी उद्घोषणा लागू हो।
(5) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) खंड (1) और खंड (3) में उल्लिखित राष्ट्रपति की संतुष्टि अंतिम और निर्णायक होगी और किसी भी आधार पर किसी भी न्यायालय में इस पर प्रश्न नहीं उठाया जाएगा;
(ख) खंड (2) के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, न तो सर्वोच्च न्यायालय और न ही कोई अन्य न्यायालय किसी भी आधार पर, वैधता के संबंध में किसी प्रश्न पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र रखेगा-
(i) राष्ट्रपति द्वारा खंड (1) में वर्णित आशय की उद्घोषणा; या
(ii) ऐसी उद्घोषणा का निरंतर संचालन।
अनुच्छेद 356 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 356 में खंड (4) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, और यह खंड हमेशा से जुड़ा हुआ माना जाएगा, अर्थात्:-
(5) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, खंड (1) में उल्लिखित राष्ट्रपति की संतुष्टि अंतिम और निर्णायक होगी और किसी भी न्यायालय में किसी भी आधार पर इस पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकेगा।
अनुच्छेद 359 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 359 में खंड (1) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, और यह खंड हमेशा से जुड़ा हुआ माना जाएगा, अर्थात्:-
"(1क) जब तक खंड (1) के तहत जारी किया गया कोई आदेश, जिसमें भाग III द्वारा प्रदत्त किसी अधिकार का उल्लेख हो, प्रभावी रहता है, तब तक उस भाग में उन अधिकारों को प्रदान करने वाली कोई भी बात उक्त भाग में परिभाषित राज्य की किसी भी कानून को बनाने या किसी भी कार्यकारी कार्रवाई करने की शक्ति को प्रतिबंधित नहीं करेगी, जिसे राज्य उस भाग में निहित प्रावधानों के अभाव में बनाने या करने में सक्षम होता, बल्कि इस प्रकार बनाया गया कोई भी कानून, उस सीमा तक, अप्रभावी हो जाएगा जैसे ही उपर्युक्त आदेश का प्रभाव समाप्त हो जाता है, सिवाय उन कार्यों के जो कानून के अप्रभावी होने से पहले किए गए हों या न किए गए हों।"
अनुच्छेद 360 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 360 में खंड (4) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, और यह खंड हमेशा से जुड़ा हुआ माना जाएगा, अर्थात्:-
(5) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) खंड (1) में उल्लिखित राष्ट्रपति की संतुष्टि अंतिम और निर्णायक होगी तथा किसी भी न्यायालय में किसी भी आधार पर इस पर प्रश्न नहीं उठाया जाएगा;
(ख) खंड (2) के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, न तो सर्वोच्च न्यायालय और न ही कोई अन्य न्यायालय किसी भी आधार पर, वैधता के संबंध में किसी प्रश्न पर विचार करने का अधिकार क्षेत्र रखेगा-
(i) राष्ट्रपति द्वारा खंड (1) में वर्णित आशय की उद्घोषणा; या
(ii) ऐसी उद्घोषणा का निरंतर संचालन।
