संविधान (23वाँ संशोधन) अधिनियम, 1969
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 330
- 332
- 333
- 334
संविधान के अनुच्छेद 334 में यह प्रावधान है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों के आरक्षण और लोकसभा तथा राज्यों की विधान सभाओं में एंग्लो-इंडियन समुदाय के नामांकन द्वारा प्रतिनिधित्व से संबंधित संविधान के प्रावधान समाप्त हो जाएंगे।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (तेईसवां संशोधन) विधेयक, 1969 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (तेईसवां संशोधन) अधिनियम, 1969 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
संविधान के अनुच्छेद 334 में यह प्रावधान है कि लोकसभा और राज्यों की विधान सभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों और एंग्लो-इंडियन समुदाय के नामांकन द्वारा प्रतिनिधित्व से संबंधित संविधान के प्रावधान संविधान के लागू होने की तिथि से बीस वर्ष की अवधि समाप्त होने पर समाप्त हो जाएंगे। यद्यपि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ने पिछले बीस वर्षों में काफी प्रगति की है, फिर भी संविधान सभा द्वारा उपर्युक्त आरक्षित सीटों और सदस्यों के नामांकन संबंधी प्रावधान बनाते समय जिन कारणों का ध्यान रखा गया था, वे अब मान्य नहीं हैं। अतः, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण और एंग्लो-इंडियन समुदाय के नामांकन द्वारा प्रतिनिधित्व को दस वर्षों की अवधि के लिए जारी रखने का प्रस्ताव है।
2. 1963 में अस्तित्व में आए नागालैंड राज्य की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी आदिवासी है। जिन राज्यों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति बहुमत में हैं, वहां की विधानसभाओं में उनके लिए आरक्षण का संशोधन करना अनुचित होगा। अतः, नागालैंड सरकार की इच्छा के अनुरूप, यह प्रस्ताव है कि नागालैंड में लोकसभा या राज्य विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई आरक्षण न किया जाए। इस उद्देश्य से संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में संशोधन किया जा रहा है।
3. संविधान के अनुच्छेद 333 के तहत, राज्य विधान सभाओं में मनोनीत किए जा सकने वाले एंग्लो-इंडियनों की संख्या राज्यपाल के विवेकाधिकार पर निर्भर है। अब इस अनुच्छेद में संशोधन प्रस्तावित है ताकि यह प्रावधान किया जा सके कि किसी भी राज्य विधान सभा में राज्यपाल द्वारा एक से अधिक एंग्लो-इंडियन मनोनीत न किए जाएं। हालांकि, यह संशोधन मौजूदा विधान सभाओं के भंग होने तक उनमें एंग्लो-इंडियन समुदाय के प्रतिनिधित्व को प्रभावित नहीं करेगा। भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। भारत गणराज्य के बीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप से अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (तेईसवां संशोधन) अधिनियम, 1969 कहा जा सकता है।
अनुच्छेद 330 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 330 में, खंड (1) के उपखंड (ख) में, "असम के जनजातीय क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर" शब्दों के स्थान पर "असम और नागालैंड के जनजातीय क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 332 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 332 में खंड (1) में, "असम के जनजातीय क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर" शब्दों के स्थान पर "असम और नागालैंड के जनजातीय क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों को छोड़कर" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 333 का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 333 में, "समुदाय के उतने सदस्यों को सभा में मनोनीत करे जितना वह उचित समझे" के स्थान पर "उस समुदाय के एक सदस्य को सभा में मनोनीत करे" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
(2) उपधारा (1) में निहित कोई भी बात इस अधिनियम के प्रारंभ होने के समय विद्यमान किसी राज्य की विधान सभा में एंग्लो-इंडियन समुदाय के किसी भी प्रतिनिधित्व को उस विधान सभा के विघटन तक प्रभावित नहीं करेगी।
अनुच्छेद 334 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 334 में, "बीस वर्ष" शब्दों के स्थान पर "तीस वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
