संविधान (24वाँ संशोधन) अधिनियम, 1971
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 13
- 368
प्रसिद्ध गोलक नाथ मामले [1967, 2 एससीआर 762] में सर्वोच्च न्यायालय ने संकीर्ण बहुमत से अपने ही पहले के उन निर्णयों को पलट दिया, जिनमें मौलिक अधिकारों से संबंधित भाग III सहित संविधान के सभी भागों में संशोधन करने की संसद की शक्ति को बरकरार रखा गया था।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) विधेयक, 1971 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (चौबीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
प्रसिद्ध गोलक नाथ मामले [1967, 2 एससीआर 762] में सर्वोच्च न्यायालय ने अल्पमत से अपने ही पूर्व के उन निर्णयों को पलट दिया, जिनमें संसद को संविधान के सभी भागों, जिनमें मौलिक अधिकारों से संबंधित तीसरा भाग भी शामिल है, में संशोधन करने की शक्ति दी गई थी। इस निर्णय का परिणाम यह है कि संसद को संविधान के तीसरे भाग द्वारा प्रदत्त किसी भी मौलिक अधिकार को छीनने या सीमित करने की शक्ति नहीं है, भले ही राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने और संविधान की प्रस्तावना में निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ऐसा करना आवश्यक हो जाए। अतः यह आवश्यक समझा जाता है कि स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया जाए कि संसद को संविधान के किसी भी प्रावधान में संशोधन करने की शक्ति है, ताकि तीसरे भाग के प्रावधानों को भी संशोधन शक्ति के दायरे में शामिल किया जा सके।
2. यह विधेयक अनुच्छेद 368 में उपयुक्त संशोधन करने का प्रयास करता है और यह स्पष्ट करता है कि अनुच्छेद 368 संविधान में संशोधन तथा उसकी प्रक्रिया का प्रावधान करता है। विधेयक में यह भी प्रावधान है कि जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित संविधान संशोधन विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो उन्हें उस पर अपनी स्वीकृति देनी होगी। विधेयक संविधान के अनुच्छेद 13 में भी संशोधन करने का प्रयास करता है ताकि यह अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी संशोधन पर लागू न हो। भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। भारत गणराज्य के बाईसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप से अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (चौबीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 कहा जा सकता है।
अनुच्छेद 13 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 13 में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-- "(4) इस अनुच्छेद की कोई बात अनुच्छेद 368 के अधीन किए गए इस संविधान के किसी संशोधन पर लागू नहीं होगी।"
अनुच्छेद 368 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 368 को उसके खंड (2) के रूप में पुनः क्रमांकित किया जाएगा, और-
(क) उस लेख के हाशिये पर लिखे शीर्षक के स्थान पर निम्नलिखित हाशिये पर लिखा शीर्षक प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति और उसकी प्रक्रिया।
(ख) इस प्रकार पुनः क्रमांकित खंड (2) के पहले, निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(1) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, संसद अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करते हुए इस अनुच्छेद में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इस संविधान के किसी प्रावधान में जोड़, परिवर्तन या निरसन कर सकती है।
(ग) खंड (2) में, जैसा कि पुनः क्रमांकित किया गया है, "इसे राष्ट्रपति की सहमति के लिए प्रस्तुत किया जाएगा और विधेयक को ऐसी सहमति दिए जाने पर", शब्दों के स्थान पर "इसे राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाएगा जो विधेयक को अपनी सहमति देंगे और उसके बाद" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(घ) इस प्रकार पुनः क्रमांकित खंड (2) के स्थान पर निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(3) अनुच्छेद 13 की कोई बात इस अनुच्छेद के अधीन किए गए किसी संशोधन पर लागू नहीं होगी।
