The Admiralty (Jurisdiction and Settlement of Maritime Claims) Act, 2017 2अध्याय I · Preliminary
धारा 2 · परिभाषाएँ।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) इस अधिनियम में,—
(क) “एडमिरल्टी क्षेत्राधिकार” से तात्पर्य इस अधिनियम के अंतर्गत निर्दिष्ट समुद्री दावों के संबंध में धारा 3 के अंतर्गत उच्च न्यायालय द्वारा प्रयोग किए जाने वाले क्षेत्राधिकार से है;
(ख) “एडमिरल्टी कार्यवाही” से तात्पर्य किसी उच्च न्यायालय के समक्ष की गई ऐसी किसी कार्यवाही से है, जो एडमिरल्टी क्षेत्राधिकार का प्रयोग करती हो;
(ग) “गिरफ्तारी” का अर्थ है किसी समुद्री दावे को सुरक्षित करने के लिए उच्च न्यायालय के आदेश द्वारा किसी पोत को हटाने के लिए हिरासत में लेना या प्रतिबंधित करना, जिसमें किसी निर्णय या आदेश के निष्पादन या संतुष्टि में पोत की ज़ब्ती शामिल है;
(घ) “माल” से तात्पर्य किसी भी संपत्ति से है जिसमें जीवित पशु, कंटेनर, पैलेट या परिवहन या पैकेजिंग या सामान की ऐसी अन्य वस्तुएं शामिल हैं, चाहे ऐसी संपत्ति किसी पोत के डेक पर या उसके नीचे ले जाई जाती हो;
(ई) नौसेना संबंधी कार्यवाही के संबंध में “उच्च न्यायालय” से तात्पर्य कलकत्ता उच्च न्यायालय, बॉम्बे उच्च न्यायालय, मद्रास उच्च न्यायालय, कर्नाटक उच्च न्यायालय, गुजरात उच्च न्यायालय, उड़ीसा उच्च न्यायालय, केरल उच्च न्यायालय, तेलंगाना राज्य और आंध्र प्रदेश राज्य के लिए हैदराबाद स्थित न्यायपालिका उच्च न्यायालय या इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी अन्य उच्च न्यायालय से है;
(f) “समुद्री दावा” से तात्पर्य धारा 4 में निर्दिष्ट दावे से है;
(g) “समुद्री ग्रहणाधिकार” से तात्पर्य धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (क) से ( ङ ) में निर्दिष्ट पोत के स्वामी, पट्टेदार, प्रबंधक या संचालक के विरुद्ध समुद्री दावे से है, जो उस धारा की उपधारा (2) के अधीन विद्यमान रहेगा;
(h) “अधिसूचना” से तात्पर्य राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना से है;
(i) “बंदरगाह” का वही अर्थ होगा जो भारतीय बंदरगाह अधिनियम, 1908 (15 ऑफ 1908) में इसे दिया गया है;
(j) “निर्धारित” से तात्पर्य इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा निर्धारित से है;
(k) “प्रादेशिक जल” का वही अर्थ होगा जो प्रादेशिक जल, महाद्वीपीय शेल्फ, अनन्य आर्थिक क्षेत्र और अन्य समुद्री क्षेत्र अधिनियम, 1976 (1976 का 80) में इसे दिया गया है; और
(एल) “जहाज” में कोई भी जहाज, नाव, नौकायन पोत या अन्य प्रकार का पोत शामिल है जिसका उपयोग जलमार्ग से नौवहन के लिए किया जाता है या किया जाता है, चाहे वह प्रणोदित हो या नहीं, और इसमें बजरा, हल्का पोत या अन्य तैरता हुआ पोत, होवरक्राफ्ट, अपतटीय उद्योग मोबाइल इकाई, डूबा हुआ या फंसा हुआ या परित्यक्त पोत और ऐसे पोत के अवशेष शामिल हैं।
स्पष्टीकरण. —इस खंड के प्रयोजनों के लिए किसी पोत को पोत नहीं माना जाएगा, जब वह इस हद तक टूटा हुआ हो कि उसे नौवहन के लिए उपयोग में नहीं लाया जा सकता, जैसा कि एक सर्वेक्षक द्वारा प्रमाणित किया गया हो।
(2) यहाँ प्रयुक्त शब्द और अभिव्यक्तियाँ, जो परिभाषित नहीं हैं तथा जो व्यापारी जहाजरानी अधिनियम, 1958 (44 ऑफ 1958) में परिभाषित हैं, उनका वही अर्थ होगा जो उस अधिनियम में उन्हें दिया गया है।
(क) “एडमिरल्टी क्षेत्राधिकार” से तात्पर्य इस अधिनियम के अंतर्गत निर्दिष्ट समुद्री दावों के संबंध में धारा 3 के अंतर्गत उच्च न्यायालय द्वारा प्रयोग किए जाने वाले क्षेत्राधिकार से है;
(ख) “एडमिरल्टी कार्यवाही” से तात्पर्य किसी उच्च न्यायालय के समक्ष की गई ऐसी किसी कार्यवाही से है, जो एडमिरल्टी क्षेत्राधिकार का प्रयोग करती हो;
(ग) “गिरफ्तारी” का अर्थ है किसी समुद्री दावे को सुरक्षित करने के लिए उच्च न्यायालय के आदेश द्वारा किसी पोत को हटाने के लिए हिरासत में लेना या प्रतिबंधित करना, जिसमें किसी निर्णय या आदेश के निष्पादन या संतुष्टि में पोत की ज़ब्ती शामिल है;
(घ) “माल” से तात्पर्य किसी भी संपत्ति से है जिसमें जीवित पशु, कंटेनर, पैलेट या परिवहन या पैकेजिंग या सामान की ऐसी अन्य वस्तुएं शामिल हैं, चाहे ऐसी संपत्ति किसी पोत के डेक पर या उसके नीचे ले जाई जाती हो;
(ई) नौसेना संबंधी कार्यवाही के संबंध में “उच्च न्यायालय” से तात्पर्य कलकत्ता उच्च न्यायालय, बॉम्बे उच्च न्यायालय, मद्रास उच्च न्यायालय, कर्नाटक उच्च न्यायालय, गुजरात उच्च न्यायालय, उड़ीसा उच्च न्यायालय, केरल उच्च न्यायालय, तेलंगाना राज्य और आंध्र प्रदेश राज्य के लिए हैदराबाद स्थित न्यायपालिका उच्च न्यायालय या इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किसी अन्य उच्च न्यायालय से है;
(f) “समुद्री दावा” से तात्पर्य धारा 4 में निर्दिष्ट दावे से है;
(g) “समुद्री ग्रहणाधिकार” से तात्पर्य धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (क) से ( ङ ) में निर्दिष्ट पोत के स्वामी, पट्टेदार, प्रबंधक या संचालक के विरुद्ध समुद्री दावे से है, जो उस धारा की उपधारा (2) के अधीन विद्यमान रहेगा;
(h) “अधिसूचना” से तात्पर्य राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना से है;
(i) “बंदरगाह” का वही अर्थ होगा जो भारतीय बंदरगाह अधिनियम, 1908 (15 ऑफ 1908) में इसे दिया गया है;
(j) “निर्धारित” से तात्पर्य इस अधिनियम के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा निर्धारित से है;
(k) “प्रादेशिक जल” का वही अर्थ होगा जो प्रादेशिक जल, महाद्वीपीय शेल्फ, अनन्य आर्थिक क्षेत्र और अन्य समुद्री क्षेत्र अधिनियम, 1976 (1976 का 80) में इसे दिया गया है; और
(एल) “जहाज” में कोई भी जहाज, नाव, नौकायन पोत या अन्य प्रकार का पोत शामिल है जिसका उपयोग जलमार्ग से नौवहन के लिए किया जाता है या किया जाता है, चाहे वह प्रणोदित हो या नहीं, और इसमें बजरा, हल्का पोत या अन्य तैरता हुआ पोत, होवरक्राफ्ट, अपतटीय उद्योग मोबाइल इकाई, डूबा हुआ या फंसा हुआ या परित्यक्त पोत और ऐसे पोत के अवशेष शामिल हैं।
स्पष्टीकरण. —इस खंड के प्रयोजनों के लिए किसी पोत को पोत नहीं माना जाएगा, जब वह इस हद तक टूटा हुआ हो कि उसे नौवहन के लिए उपयोग में नहीं लाया जा सकता, जैसा कि एक सर्वेक्षक द्वारा प्रमाणित किया गया हो।
(2) यहाँ प्रयुक्त शब्द और अभिव्यक्तियाँ, जो परिभाषित नहीं हैं तथा जो व्यापारी जहाजरानी अधिनियम, 1958 (44 ऑफ 1958) में परिभाषित हैं, उनका वही अर्थ होगा जो उस अधिनियम में उन्हें दिया गया है।
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