परिसीमा कैलकुलेटर
कुछ अपराधों में न्यायालय एक निश्चित अवधि के बाद संज्ञान नहीं ले सकता। यह गणना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 514 से 519 (पहले दं.प्र.सं. धारा 468 से 473) पर आधारित है।
परिसीमा कैलकुलेटर
एक वर्ष तक की सज़ा: एक वर्ष के बाद न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा।
इन धाराओं के कारण: The Bombay State Reserve Police Force Act, 1951 धारा 13
कई अपराध साथ हों तो सबसे गंभीर अपराध की अवधि लगती है (धारा 514(3)); गिनती FIR या शिकायत दर्ज होने की तारीख तक होती है।
अपराध का पता न हो तो जानकारी की तारीख, और अपराधी अज्ञात हो तो उसकी पहचान की तारीख लागू होती है।
गिनती से बाहर रहने वाले दिन (यदि हों)
भा.ना.सु.सं. धारा 516 (पहले दं.प्र.सं. 470): गलत न्यायालय में सद्भावपूर्ण अभियोजन, स्थगन-आदेश, मंजूरी की प्रतीक्षा, या अभियुक्त का भारत से बाहर/फ़रार रहना — इन दिनों को जोड़ें।
परिसीमा अवधिएक वर्ष
भा.ना.सु.सं. धारा 514
भा.ना.सु.सं. धारा 514(2) (पहले दं.प्र.सं. धारा 468(2)) के अनुसार परिसीमा काल है — केवल जुर्माने से दंडनीय अपराध में छह मास; एक वर्ष से अनधिक कारावास से दंडनीय अपराध में एक वर्ष; और एक वर्ष से अधिक किंतु तीन वर्ष से अनधिक कारावास से दंडनीय अपराध में तीन वर्ष। तीन वर्ष से अधिक कारावास वाले अपराधों के लिए धारा 514 कोई अवधि नियत नहीं करती।
भा.ना.सु.सं. धारा 514(3) (पहले दं.प्र.सं. धारा 468(3)) के अनुसार जिन अपराधों का विचारण एक साथ किया जा सकता है, उनमें परिसीमा काल उस अपराध के अनुसार तय होगा जिसका दंड अधिक कठोर है।
आर्थिक अपराध (परिसीमा की अप्रयोज्यता) अधिनियम, 1974 की धारा 2 के अनुसार दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 36 — अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अध्याय 38 — की कोई बात उन अपराधों पर लागू नहीं होगी जो उस अधिनियम की अनुसूची में दिए गए अधिनियमों के अधीन दंडनीय हैं, और न उन अपराधों पर जिनका विचारण उनके साथ किया जाता है। अनुसूची में आयकर, सीमा-शुल्क, केंद्रीय उत्पाद-शुल्क, स्टांप और ऐसे ही अनेक अधिनियम हैं। यदि आपका मामला उनमें से किसी के अधीन है, तो ऊपर की गणना उस पर लागू ही नहीं होती — वहाँ कोई परिसीमा काल है ही नहीं।
भा.ना.सु.सं. धारा 514 का स्पष्टीकरण अब शब्दों में कहता है कि परिसीमा काल की गणना के लिए सुसंगत तिथि परिवाद दाखिल करने की तिथि (धारा 223) या सूचना अभिलिखित किए जाने की तिथि (धारा 173) है — न कि वह तिथि जिस दिन मजिस्ट्रेट संज्ञान लेता है। दं.प्र.सं. में यह नियम सारा मैथ्यू बनाम इंस्टीट्यूट ऑफ़ कार्डियो वैस्कुलर डिज़ीज़ेज़, (2014) 2 एससीसी 62 में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने तय किया था। अर्थात् जिस परिवादी ने समय के भीतर परिवाद या एफ़आईआर दर्ज करा दी, वह न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने में हुए विलंब के कारण अपना मामला नहीं खोता।
पूरी धारा पढ़िएअवधि कब से शुरू होती है — भा.ना.सु.सं. धारा 515 (दं.प्र.सं. 469)
भा.ना.सु.सं. धारा 515(1) (पहले दं.प्र.सं. धारा 469(1)) के अनुसार परिसीमा काल तीन में से जो पहले आए, उस दिन से आरंभ होता है: अपराध की तारीख से; या जहाँ अपराध का होना व्यथित व्यक्ति या किसी पुलिस अधिकारी को ज्ञात नहीं था, वहाँ उस पहले दिन से जब वह उनमें से किसी के ज्ञान में आया; या जहाँ यह ज्ञात नहीं था कि अपराध किसने किया, वहाँ उस पहले दिन से जब अपराधी की पहचान व्यथित व्यक्ति या अन्वेषण करने वाले पुलिस अधिकारी को ज्ञात हुई।
भा.ना.सु.सं. धारा 515(2) (पहले दं.प्र.सं. धारा 469(2)) के अनुसार जिस दिन से अवधि गिनी जानी है, वह दिन गिनती में नहीं लिया जाएगा — अवधि अगले दिन से चलती है। यह पन्ना उसी तरह गिनता है।
इसका व्यावहारिक अर्थ यह है कि कई मामलों में घड़ी उस दिन से नहीं चलती जिस दिन घटना हुई, बल्कि उस दिन से जब वह ज्ञात हुई। छिपाकर किए गए अपराधों में यह अंतर वर्षों का हो सकता है।
पूरी धारा पढ़िएकौन-सा समय नहीं गिना जाता — भा.ना.सु.सं. धारा 516 (दं.प्र.सं. 470)
भा.ना.सु.सं. धारा 516(1) (पहले दं.प्र.सं. धारा 470(1)) के अनुसार वह समय अपवर्जित होगा जिसमें कोई व्यक्ति उन्हीं तथ्यों पर उसी अपराधी के विरुद्ध किसी अन्य अभियोजन को सद्भावपूर्वक और सम्यक तत्परता से चला रहा था, यदि वह न्यायालय अधिकारिता के अभाव या वैसे ही किसी कारण से उसे ग्रहण करने में असमर्थ था।
भा.ना.सु.सं. धारा 516(2) (पहले दं.प्र.सं. धारा 470(2)) के अनुसार जहाँ अभियोजन किसी व्यादेश या आदेश से रोका गया हो, वहाँ उस रोक की पूरी अवधि — जिस दिन आदेश हुआ और जिस दिन वह वापस लिया गया, वे दिन भी — अपवर्जित होगी।
भा.ना.सु.सं. धारा 516(3) (पहले दं.प्र.सं. धारा 470(3)) के अनुसार जहाँ अभियोजन की सूचना देना आवश्यक हो, या सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी की पूर्व सम्मति या मंजूरी अपेक्षित हो, वहाँ उस सूचना की अवधि या मंजूरी प्राप्त करने में लगा समय अपवर्जित होगा।
भा.ना.सु.सं. धारा 516(4) (पहले दं.प्र.सं. धारा 470(4)) के अनुसार वह समय भी अपवर्जित होगा जिसमें अपराधी भारत से अनुपस्थित रहा, या फ़रार होकर अथवा स्वयं को छिपाकर गिरफ़्तारी से बचता रहा।
भा.ना.सु.सं. धारा 517 (पहले दं.प्र.सं. धारा 471) के अनुसार यदि अवधि उस दिन समाप्त होती है जिस दिन न्यायालय बंद है, तो न्यायालय उसके खुलने के दिन संज्ञान ले सकता है।
पूरी धारा पढ़िएनिरंतर अपराध — भा.ना.सु.सं. धारा 518 (दं.प्र.सं. 472)
भा.ना.सु.सं. धारा 518 (पहले दं.प्र.सं. धारा 472) के अनुसार चालू अपराध की दशा में परिसीमा का नया काल हर उस क्षण से आरंभ होता है जिस क्षण तक अपराध चलता रहता है।
इसका अर्थ यह है कि जब तक वह स्थिति बनी हुई है जो स्वयं अपराध है, तब तक घड़ी बार-बार शून्य से शुरू होती रहती है — इसलिए ऊपर की गणना ऐसे अपराधों पर उसी रूप में लागू नहीं होती।
पूरी धारा पढ़िएदेरी क्षमा करने की शक्ति — भा.ना.सु.सं. धारा 519 (दं.प्र.सं. 473)
अवधि बीत जाने पर भी न्यायालय भा.ना.सु.सं. धारा 519 (पहले दं.प्र.सं. धारा 473) के अधीन, न्याय के हित में, देरी क्षमा कर सकता है। इसलिए बीती हुई अवधि का अर्थ यह नहीं कि मामला निश्चित रूप से समाप्त है।
भा.ना.सु.सं. धारा 519 (पहले दं.प्र.सं. धारा 473) के अनुसार पूर्ववर्ती उपबंधों में कुछ भी होते हुए भी, कोई भी न्यायालय परिसीमा काल बीत जाने के बाद भी अपराध का संज्ञान ले सकता है, यदि वह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से यह समाधान कर ले कि विलंब का समुचित स्पष्टीकरण दिया गया है, या न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है।
यह अपवाद संकीर्ण नहीं है, और यह न्यायालय के विवेक पर है। इसलिए ऊपर दिखा 'अवधि बीत चुकी है' किसी मामले के समाप्त होने की घोषणा नहीं है — यह केवल इतना बताता है कि भा.ना.सु.सं. धारा 519 (पहले दं.प्र.सं. धारा 473) का प्रश्न अब उठेगा।
पूरी धारा पढ़िएभा.ना.सु.सं. की धारा 513 से 519 (दं.प्र.सं. 467 से 473)
भा.ना.सु.सं. की धारा 513 से 519 और पुरानी दं.प्र.सं. की धारा 467 से 473 — दोनों का पाठ इस पुस्तकालय में हिंदी और अंग्रेज़ी में पढ़ा जा सकता है।
- 513परिभाषा — 'परिसीमा काल' का अर्थ(दं.प्र.सं. 467)
- 514परिसीमा काल बीत जाने पर संज्ञान लेने का वर्जन(दं.प्र.सं. 468)
- 515परिसीमा काल का प्रारंभ(दं.प्र.सं. 469)
- 516कुछ दशाओं में समय का अपवर्जन(दं.प्र.सं. 470)
- 517जिस दिन न्यायालय बंद हो उस दिन का अपवर्जन(दं.प्र.सं. 471)
- 518चालू अपराध(दं.प्र.सं. 472)
- 519कुछ दशाओं में परिसीमा काल का विस्तार(दं.प्र.सं. 473)
मुफ़्त कानूनी सहायता आपका अधिकार है (NALSA / ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण)।
