जमानत — कौन-सा रास्ता

यह नहीं बताता कि जमानत मिलेगी या नहीं। यह बताता है कि आपकी स्थिति में कौन-सी धारा लागू होती है और वह क्या कहती है।

मुफ़्त कानूनी सहायता आपका अधिकार है (NALSA / ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण)।

क्या गिरफ़्तारी हो चुकी है?

डिफ़ॉल्ट जमानत — यह आपका अधिकार है

यदि पहली रिमांड से 90 दिन (मृत्यु, आजीवन या दस वर्ष या अधिक से दंडनीय अपराध) या 60 दिन (अन्य सभी) में आरोप-पत्र दाखिल नहीं हुआ, तो जमानत आपका अधिकार बन जाती है — भा.ना.सु.सं. धारा 187(3) (पहले दं.प्र.सं. धारा 167(2))। बहुत से लोग केवल इसलिए जेल में रहते हैं क्योंकि उन्हें यह पता नहीं होता।

भा.ना.सु.सं. धारा 187(3)(पहले दं.प्र.सं. धारा 167)

आरोप-पत्र दाखिल न होने पर डिफ़ॉल्ट जमानत — भा.ना.सु.सं. धारा 187(3)

भा.ना.सु.सं. की धारा 187(3) (पहले दं.प्र.सं. धारा 167(2) का परंतुक) के अनुसार मजिस्ट्रेट अन्वेषण के लिए हिरासत की अनुमति 90 दिन से अधिक नहीं दे सकता, जहाँ अपराध मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष या अधिक के कारावास से दंडनीय है; और अन्य सभी अपराधों में 60 दिन से अधिक नहीं। उस अवधि के बीत जाने पर अभियुक्त जमानत पर छोड़े जाने का हकदार है, यदि वह जमानत देने को तैयार है और दे देता है।

  • गिनती रिमांड के दिन से होती है — रिमांड का दिन भी गिना जाता है (प्रवर्तन निदेशालय बनाम कपिल वधावन, 2023)।
  • दं.प्र.सं. में 90 दिन वाली श्रेणी 'कम से कम दस वर्ष' थी, जिससे 'दस वर्ष तक' वाले अपराध 60 दिन में आते थे (राकेश कुमार पॉल, 2017)। भा.ना.सु.सं. ने इसे 'दस वर्ष या अधिक' कर दिया है।
  • यह अधिकार अवधि पूरी होते ही अर्जित हो जाता है, किंतु उसका उपयोग करना पड़ता है: आवेदन करना होगा और जमानत देने की तैयारी दिखानी होगी। यदि आवेदन से पहले आरोप-पत्र दाखिल हो गया, तो अधिकार समाप्त हो जाता है।
  • इस उपबंध के अधीन छोड़ा गया हर व्यक्ति भा.ना.सु.सं. के अध्याय 35 (पहले दं.प्र.सं. अध्याय 33) के अधीन छोड़ा गया माना जाएगा — अर्थात् वही सामान्य जमानत-शर्तें लागू होती हैं।
  • अपूर्ण या 'पूरक' आरोप-पत्र, जो केवल अवधि रोकने के लिए दाखिल किया गया हो, इस अधिकार को समाप्त नहीं करता।

बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य (2020) में उच्चतम न्यायालय ने दोहराया कि दं.प्र.सं. धारा 167(2) (अब भा.ना.सु.सं. धारा 187(3)) के अधीन डिफ़ॉल्ट जमानत अनुच्छेद 21 से जुड़ा अपरिहार्य (indefeasible) अधिकार है, न कि न्यायालय के विवेक का विषय।

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विचाराधीन बंदी की रिहाई

भा.ना.सु.सं. धारा 479 (पहले दं.प्र.सं. धारा 436क): जिस विचाराधीन बंदी ने अधिकतम सज़ा की आधी अवधि काट ली है, उसे बंधपत्र पर छोड़ा जाना है — पहली बार के अपराधी के लिए एक-तिहाई, जो BNSS में नया है। मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराधों पर यह लागू नहीं।

  1. भा.ना.सु.सं. धारा 479(पहले दं.प्र.सं. धारा 436A)

    अधिकतम सज़ा की आधी (पहली बार में एक-तिहाई) अवधि काट चुके विचाराधीन बंदी की रिहाई — भा.ना.सु.सं. धारा 479

    भा.ना.सु.सं. की धारा 479 (पहले दं.प्र.सं. धारा 436क) के अनुसार जिस व्यक्ति ने अन्वेषण, जाँच या विचारण के दौरान उस अपराध के लिए नियत अधिकतम कारावास की आधी अवधि तक हिरासत काट ली है, उसे न्यायालय जमानत पर छोड़ेगा। पहली बार अपराध करने वाले को — जो पहले कभी दोषसिद्ध नहीं हुआ — एक-तिहाई अवधि के बाद बंधपत्र पर छोड़ा जाएगा। यह उन अपराधों पर लागू नहीं होता जिनमें मृत्युदंड या आजीवन कारावास एक दंड के रूप में नियत है (दं.प्र.सं. में केवल मृत्युदंड वाले अपराध बाहर थे)।

    • कोई भी व्यक्ति अन्वेषण, जाँच या विचारण के दौरान उस अपराध के लिए नियत अधिकतम कारावास अवधि से अधिक हिरासत में किसी भी दशा में नहीं रखा जाएगा। अभियुक्त द्वारा कराई गई देरी का समय गिनती से बाहर रहता है।
    • न्यायालय लोक अभियोजक को सुनकर और कारण लिखकर आधी अवधि से आगे हिरासत जारी रखने, या बंधपत्र के बजाय जमानत-बंधपत्र पर छोड़ने, का आदेश दे सकता है।
    • धारा 479(2) — BNSS में नया: जिस व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक अपराधों या कई मामलों में अन्वेषण, जाँच या विचारण लंबित है, उसे इस धारा के अधीन नहीं छोड़ा जाएगा।
    • धारा 479(3) — BNSS में नया: आधी या एक-तिहाई अवधि पूरी होते ही जेल अधीक्षक स्वयं न्यायालय को रिहाई के लिए लिखित आवेदन करेगा।
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विशेष अधिनियम इस रास्ते को बदल देते हैं

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 37, यूएपीए की धारा 43घ(5), धन-शोधन निवारण अधिनियम की धारा 45 और अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम की धारा 18 भा.ना.सु.सं. के सामान्य जमानत-मार्ग को सीमित या समाप्त कर देती हैं।

  • एनडीपीएस अधिनियम, 1985 — धारा 37

    धारा 37 के अनुसार वाणिज्यिक मात्रा से जुड़े अपराध और धारा 19, 24 व 27क के अपराध संज्ञेय और अजमानतीय हैं, और जमानत तब तक नहीं दी जाएगी जब तक लोक अभियोजक को विरोध का अवसर न मिले और न्यायालय यह न माने कि अभियुक्त के दोषी न होने तथा जमानत पर रहते हुए अपराध न करने के उचित आधार हैं। ये शर्तें दंड प्रक्रिया संहिता की शर्तों के अतिरिक्त हैं।

  • गैरकानूनी गतिविधियाँ (निवारण) अधिनियम, 1967 — धारा 43घ(5)

    धारा 43घ(5) के अनुसार अध्याय 4 और 6 के अपराधों के अभियुक्त को जमानत नहीं दी जाएगी यदि न्यायालय, केस डायरी या पुलिस रिपोर्ट (भा.ना.सु.सं. धारा 193; पहले दं.प्र.सं. धारा 173) देखकर, यह राय बनाता है कि आरोप प्रथम दृष्टया सत्य प्रतीत होता है।

  • धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 — धारा 45

    धारा 45 दो शर्तें लगाती है: लोक अभियोजक को विरोध का अवसर मिले, और न्यायालय यह माने कि अभियुक्त के दोषी न होने तथा जमानत पर रहते हुए अपराध न करने के उचित आधार हैं। परंतुक सोलह वर्ष से कम आयु के व्यक्ति, स्त्री, रुग्ण या शिथिलांग व्यक्ति, और एक करोड़ रुपये से कम की राशि वाले मामलों को इन शर्तों से छूट देता है।

  • अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 — धारा 18

    धारा 18 के अनुसार इस अधिनियम के अधीन अपराध के आरोप में गिरफ़्तारी से जुड़े किसी मामले में अग्रिम जमानत का उपबंध — अब भा.ना.सु.सं. धारा 482 (पहले दं.प्र.सं. धारा 438) — लागू नहीं होगा। 2018 में जोड़ी गई धारा 18क इसे दोहराती है।

    यह रोक निरपेक्ष नहीं है। पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ (2020) में उच्चतम न्यायालय ने धारा 18क की संवैधानिक वैधता बनाए रखते हुए यह भी कहा कि यदि परिवाद 1989 के अधिनियम के उपबंधों की प्रयोज्यता का प्रथम दृष्टया मामला ही नहीं बनाता, तो धारा 18 और 18क(i) द्वारा बनाई गई रोक लागू नहीं होगी। शाजन स्कारिया बनाम केरल राज्य (2024) में न्यायालय ने इसे दोहराया — धारा 18 अग्रिम जमानत का उपचार केवल वहाँ वर्जित करती है जहाँ विधिमान्य गिरफ़्तारी की जा सकती हो, और जहाँ अपराध के आवश्यक तत्व परिवाद पढ़ने पर ही प्रकट न होते हों, वहाँ न्यायालय धारा 438 पर विचार करने से पूर्णतः वर्जित नहीं है। यह पन्ना यह नहीं कह सकता कि आपके मामले में क्या होगा; यह केवल इतना कहता है कि प्रश्न बंद नहीं है।

कौन-सी संहिता लागू होगी?

प्रक्रिया: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है; उस दिन पहले से लंबित अन्वेषण, जाँच या विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन चलता रहता है (भा.ना.सु.सं. धारा 531(2)(क))। अपराध: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया कृत्य भारतीय न्याय संहिता के अधीन, उससे पहले का भारतीय दंड संहिता के अधीन।

ऊपर हर अधिकार पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन दिया गया है। कोष्ठक में दी गई दं.प्र.सं. धारा संदर्भ के लिए है, और 1 जुलाई 2024 को पहले से लंबित मामले पर अब भी वही लागू होती है।

कौन-सी संहिता लागू होगी?

प्रक्रिया: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है; उस दिन पहले से लंबित अन्वेषण, जाँच या विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन चलता रहता है (भा.ना.सु.सं. धारा 531(2)(क))। अपराध: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया कृत्य भारतीय न्याय संहिता के अधीन, उससे पहले का भारतीय दंड संहिता के अधीन।